आचार्य महाश्रमण

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जिसमें आसमान को छूने का जज्बा होता है, जमीन भी उसकी हो जाती है, वस्तुत: जो व्यक्ति कुछ होने की तमन्ना रखता है, कुछ कर गुजरने का हौसला रखता है, वह एक दिन अवश्य ही अपने भाग्य, बुद्धि और परिश्रम के बलबुते पर जनमानस के मानचित्र पर सफल व्यक्तित्व के रूप में उभर जाता है। विलक्षण कर्त्तृत्व और विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी आचार्य महाश्रमण का जन्म वि.सं. २०१९ वैशाख शुक्ला ९ (१३ मई १९६२) रविवार को सरदाशहर में हुआ।
सरदारशहर राजस्थान का एक प्रमुख क्षेत्र है। गांधी विद्या मंदिर की स्थापना के बाद यह नगर राजस्थान के शैक्षणिक मानचित्र पर उभरकर आ गया, यहां अनेक आकर्षक दर्शनीय स्थल हैं। सरदारशहर तेरापंथ धर्मसंघ के अनेक ऐतिहासिक प्रसंगों का केन्द्र-बिन्दु रहा है, यहां की आबादी एक लाख से भी ज्यादा है।
पारिवारिक पृष्ठभूमि : सरदारशहर में दूगड़ जाति के परिवार सबसे अधिक है, अनेक गांवों से आकर यहां बसने वाले दूगड़ परिवारों में एक परिवार है श्रीमान झूमरमलजी दूगड़ का, उनके पूर्वज ‘मेहरी’ गांव से आकर बसे थे इसलिए वे मेहरी वाले ‘दूगड़’ कहलाने लगे। श्री झूमरमलजी दूगड़ के दस सन्तानें हुई-सात पुत्र और तीन पुत्रियां, उस समय ‘माता’ (चेचक) एक असाध्य बीमारी थी, उस लाइलाज बीमारी से ग्रस्त एक पुत्र और एक पुत्री का अल्पवय में ही स्वर्गवास हो गया। श्री झूमरमलजी जोरहाट (असम) में रहते थे, उनका हार्डवेयर का व्यवसाय था, वे सहज, सरल, शांत स्वभावी और ईमानदार व्यक्ति थे। पन्द्रह-बीस मिनट तक नमस्कार-महामंत्र का जप करना उनका नित्यक्रम था। मानव जीवन की मूल्यवत्ता को समझने वाली और उसे निपुणता से जीने वाली श्रीमती नेमादेवी दूगड़ विवेक-सम्पन्न, व्यवहार-कुशल और समझदार महिला थी, वे अपने दायित्व के प्रति पूर्ण जागरूक थी। संघ और संघपति के प्रति उनमें गहरी श्रद्धा थी, उनका भाषा-विवेक गजब का था। जीवन के सन्ध्याकाल में उनको पक्षाघात हो गया, उस समय अनेक लोग उनसे मिलने आते, एक दिन एक भाई ने पूछा-‘माजी! आपको तो बहुत गर्व होता होगा कि मेरा बेटा युवाचार्य है।’ उन्होंने तत्काल कहा- ‘मैं इस बात का गर्व नहीं करती कि बेटा युवाचार्य है पर मुझे इस बात का गौरव अवश्य है कि बेटासंघ की सेवा कर रहा है।’

बातें बचपन की : मोहन बचपन से ही प्रतिभा सम्पन्न था, उसमें गहरी सूझबूझ ग्रहणशीलता और प्रशासनिक योग्यता प्रारंभ से ही थी, उसने जैसे ही अपनी उम्र के पांच वर्ष संपन्न किए, राजेन्द्र विद्यालय में प्रवेश किया। लगभग साढ़े पांच वर्ष तक इसी स्कूल में अध्ययन किया, उस समय स्कूल के प्रधानाध्यापक श्री रेवतमलजी भाटी थे। मोहन ने स्कूल जाने से पहले ही वर्णमाला और कुछ पहाड़े सीख लिए थे। तीसरी, चौथी और पांचवीं कक्षा में वह कक्षा-प्रतिनिधि (मोनिटर) के रूप में निर्वाचित हुआ, तीनों कक्षाओं में गणित और सामान्य विज्ञान में विशेष योग्यता प्राप्त की और कक्षा तीसरी और पाचवीं में प्रथम स्थान भी प्राप्त किया। तीसरी कक्षा में खेलकूद/सांस्कृतिक प्रतियोगिता के अंतर्गत उपस्थिति में भी प्रथम स्थान प्राप्त किया, अनेक धार्मिक व अन्य प्रतियोगिताओं में भी वह प्राय: प्रथम रहता, मोहन अपनी कक्षा के दो-तीन मेधावी छात्रों में से एक था, वह अध्ययन में होशियार था तो लड़ाई-झगड़े में भी कम नहीं था, मोहन बचपन से बहुत चंचल था। घर में अनेक बच्चे थे। भाई-भतीजों के साथ लड़ाई-झगड़ा चलता रहता। छुट्टियों के दिनों में तो उसका अधिकांश समय खेलकूद में ही व्यतीत होता। कभी-कभी जब माँ परेशान होकर बच्चों को पकड़ने के लिए उठती तक मोहन का छोटा भाई तो घर से बाहर दौड़ जाता और मोहन पकड़ा जाता। मां जैसे ही चपत लगाने लगती, मोहन कहता- ‘माँ! आपके ही हाथों में लगेगी।’ यह सुनते ही माँ का हाथ वहीं रूक जाता और वह मार खाने से बच जाता। मोहन की खेलने में भी अच्छी रूचि थी। कबड्डी, कांच के गोले, सतोलिया, छुपाछुपी आदि उसके प्रिय खेल थे। खेलकुद प्रतियोगिताओं में वह प्राय:भाग लेता था।

मन बदल गया : एक बार श्री झूमलजी जोरहाट से गोदरेज कम्पनी के आठ-दस ताले लेकर आए। मोहन को वे ताले अच्छे लगे, उसने उनमें से दो ताले चुरा लिए, फिर सोचा, अभी इनका उपयोग करूंगा तो पकड़ा जाऊँगा और मुझे डांट भी पड़ेगी, जब मैं थोड़ा बड़ा हो जाऊँगा तब इन तालों को काम में लूंगा, अपनी ताखी (दिवार में स्थित छोटी अलमारी) को लगाऊँगा। वह तालों को छुपाने के लिए घर के पिछवाड़े में गया, जहां बाखल (मिट्टी युक्त खुली जगह) थी। मोहन ने वहां एक गढ्ढा खोदा और उसमें उन दोनों तालों को रखकर ऊपर मिट्टी डाल दी।
कुछ देर बाद मां ने देखा कि दो ताले कम कैसे हो गए? वह इधर-उधर ताले खोजने लगी। मां को इस प्रकार खोजते देखकर मोहन का मन बदल गया, उसने सोचा-ताले चुराकर मैंने अच्छा नहीं किया, वह तत्काल मां के पास गया और पूछा- ‘माँ! क्या खोज रही हो?’
माँ- ‘मोहन! अभी तुम्हारे पिताजी कुछ ताले लेकर आए थे, उसमें से दो ताले नहीं मिल रहे हैं, उन्हीं को खोज रही हूं।’
मोहन -‘माँ! मैं भी खोजता हूं, शायद कहीं मिल जाएं।’
यों कहकर मोहन सीधा बाखल में गया, उस गढ्ढे की मिट्टी को हटाया और दोनों ताले लाकर माँ को दिखाते हुए पूछा- ‘माँ! क्या ये ही ताले हैं?’
मां- ‘हां मोहन! ये ही हैं।’ इस प्रकार मोहन खोजी सिद्ध हो गया।

सत्य साबित हुई : मोहन के जन्म के दो-तीन साल बाद ही पिता श्री झूमरमलजी अस्वस्थ हो गए, उनकी किडनी एवं लीवर ठीक से कार्य नहीं कर रही थी, वे मधुमेह रोग से भी आक्रान्त थे, उनके पेट में पानी भर जाता और पैरों में सूजन आ जाती। चिकित्सा के लिए उन्हें रतनगढ़ ले जाया गया। मोहन भी साथ था, उसने एक दिन भोजन करते हुए सहजभाव से कहा- ‘माँ! पिताजी का कितना ही इलाज करा लो, ठीक तो होंगे नहीं।’
मां ने डांटते हुए कहा- ‘मोहन! ऐसी अशुभ बात क्यों बोलता है?’
आखिर मोहन की बात सत्य साबित हो गई। कुछ दिनों बाद झूमरमलजी का स्वर्गवास हो गया, उस समय मोहन मात्र सात वर्ष का था। इक्यावन वर्ष की अवस्था में ही झूमरमलजी का चले जाना परिवार के लिए एक अपूरणीय क्षति थी किन्तु मां और बड़े भाई ने सुजानमलजी ने बड़े साहस और धैर्य के साथ पिता के रिक्त स्थान को भरने का प्रयास किया।

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ऐसे बढ़ा आकर्षण : दूगड़ परिवार का पुरूष वर्ग-साधु-साध्वियों से सम्पर्क बहुत कम रखता था। पर्व दिनों में या जब पूज्यप्रवर का प्रवास सरदारशहर में होता तो कभी-कभी दर्शन करने जाया करता था, किन्तु परिवार में सात्त्विकता, शालीनता और संस्कार-संपन्नता बरकरार थी, इस परिवार के महिला-वर्ग में साधु-साध्वियों के प्रति आकर्षण था। व्याख्यान सुनना और दर्शन-उपासना करना उनका प्राय: नियमित क्रम था।
माँ व्याख्यान सुनकर घर लौटती तब तक तो शिकायतों का अंबार-सा लग जाता। मां की अनुपस्थिति में घर में शांति रह सके इसलिए वे बच्चों से कहती- ‘तुम सब मेरे साथ सन्तों के स्थान पर चला करो।’ संतों के पास जाने का नाम सुनते ही सब इधर-उधर दौड़ जाते, एक दिन परेशान होकर मां ने कहा- ‘मोहन! तुम मेरे साथ व्याख्यान सुनने चला करो।’ मोहन चपल तो था पर आज्ञाकारी भी था। वह मां के साथ साधुओं के स्थान पर पहुंचा, उन दिनों सरदारशहर में मुनिश्री दुलीचन्दजी ‘दिनकर’ का प्रवास था, उनके साथ मुनिश्री पानमलजी (गंगाशहर) थे, जो बच्चों को कहानियां सुनाया करते थे। माँ ने मोहन को मुनिश्री पानमलजी के पास बिठाया और स्वयं व्याख्यान सुनने चली गई। मोहन को कहानियों में रस आने लगा, अब वह हमेशा अपनी इच्छा से मां के साथ सन्तों के पास आने लगा। बस, यहीं से मोहन का साधु-साध्वियों के पास जाने का क्रम शुरू हो गया। घर का आकर्षण धीरे-धीरे कम होने लगा और सन्तों के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा, अब तक जो आनन्द खेलकूद और लड़ाई-झगड़े में आता था, अब वह सन्तों की उपासना करने और उनसे कुछ सीखने में आने लगा।
तेरापंथ दर्शन मनीषी मंत्री मुनिश्री सुमेरमलजी (लाडनूं) का विक्रम संवत २०३०-३१ का चतुर्मास सरदारशहर में हुआ।

मुनिश्री तेरापंथ इतिहास के अच्छे ज्ञाता हैं, उनका तत्त्वज्ञान पर अच्छा अधिकार है, उन्होंने ज्योतिषविद्या में भी दक्षता प्राप्त की थी, उनका व्याख्यान कर्णप्रिय और ज्ञानवर्धक होता था, मुनिश्री सुमेरमलजी का सरदारशहर प्रवास मोहन के लिए वरदान सिद्ध हुआ, उसका अधिकांश समय सन्तों के स्थान पर ही व्यतीत होने लगा।
सफलता का द्वार : जो व्यक्ति समय के मूल्य को पहचानता है और समय पर अपना कार्य करता है, सफलता उसके द्वार पर दस्तक देती है। यद्यपि मोहन ने समय-प्रबन्धन का कभी प्रशिक्षण नहीं लिया, फिर भी वह योजनाबद्ध तरीके से अपना कार्य करता था, उसने अपनी दिनचर्या निर्धारित कर ली, उस दिनचर्या का अतिक्रमण उसे बिलकुल पसन्द नहीं था, कदाचित् किसी कारणवश एक मिनट भी दिनचर्या सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पहले शुरू होती और प्रहर रात्रि बीतने के बाद संपन्न होती। दिनरात के चौदह-पन्द्रह घंटे या कुछ कम/अधिक समय उसके सेवा, स्वाध्याय, अध्ययन, कंठस्थ आदि में बीत जाते।
उसकी दिनचर्या की एक तालिका कुछ इस प्रकार है-

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शयन-प्रहर रात्रि के बाद : मुनिश्री सुमेरमलजी के साथ मुनिश्री सोहनलालजी (चाड़वास), मुनिश्री पूनमचंदजी (श्रीडूंगरगढ़), मुनिश्री रोशनलालजी (सरदारशहर) थे। मोहन मुनिश्री सोहनलालजी के निर्देशन में अध्ययनरत रहा। विद्यार्थियों को सिखाने-पढ़ाने में मुनिश्री सोहनलालजी की कला बेजोड़ थी, वे केवल सिखाते ही नहीं थे, वैराग्य के संस्कार भी देते थे, वे हमारे धर्मसंघ के एक श्रेष्ठ कलाकार, स्वाध्यायशील और आचारनिष्ठ सन्त थे, उन्होंने मोहन को तत्त्वज्ञान के अनेक थोकड़े कंठस्थ करा दिए, जैसे-पचीस बोल, तेरहद्वार, बासठिया, बावन-बोल, गतागत, पाना की चर्चा, लघुदण्डक तथा थोकड़ों में अन्तिम थोकड़ा माना जाने वाला ‘गमा’ भी कंठस्थ करा दिया, उन्होंने आचार्य भिक्षु के ‘दान-दया’ के सिद्धांत से भी मोहन को अवगत कराया। मोहन घंटोंघंटों तक मुनिश्री सोहनलालजी के पास अध्ययन करता, कंठस्थ ज्ञान का पुनरावर्तन करता और तात्त्विक चर्चा करता। मोहन का उनके प्रति लगाव जैसा हो गया, जब कभी वे अस्वस्थ हो जाते तो मोहन का किसी भी कार्य में मन नहीं लगता और तो क्या, भोजन करने में भी मन नहीं लगता, जब वह खाना खाने घर आता तब मां से कहता- ‘मां! आज जल्दी खाना डाल दो, मुझे अभी वापस जाना है, आज हमारे ‘बापजी’ ठीक नहीं है।’
मुनिश्री रोशनलालजी वैरागियों के परिवार वालों से संपर्क करने तथा वैरागियों की देखभाल रखने में बड़े दक्ष थे, मोहन उनके संपर्क में भी बहुत रहा, वे गोचरी के लिए पधारते तब मोहन प्राय: उनके साथ रहता, रास्ते में सेवा करता।
मुनिजन मोहन को यदा-कदा दीक्षा लेने के लिए प्रेरित करते रहते। मुनिश्री सुमेरमलजी ने भी मोहन को कई बार दीक्षा लेने के लिए कहा पर मोहन हमेशा एक अच्छा श्रावक की बात कहता रहा।
जल उठा दीप : वि.सं. २०३० भाद्रव शुक्ला षष्ठी। अष्टमाचार्य पूज्य कालूगणी का महाप्रयाण दिवस। मुनिश्री सुमेरमलजी ने कहा –
‘मोहन! आज तुम्हें एक निर्णय कर लेना चाहिए कि गृहस्थ जीवन में रहना है या साधु बनना है।’ मुनिश्री के निर्देशानुसार मोहन गधैयाजी के नोहरे में एकान्त स्थान में जाकर बैठ गया। सर्वप्रथम पूज्य कालूगणी की माला फेरी, फिर चिन्तन करने लगा – ‘मेरे सामने दो मार्ग हैं – एक साधुत्व का और दूसरा गृहस्थ का।
साधु मार्ग में सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास, केशलुंचन, पादविहार आदि स्थिति-जनित कष्ट हो सकते हैं। दूसरी ओर गृहस्थ जीवन में भी अनेक प्रकार की चिन्ताएं आदमी को सताती रहती हैं, जैसे- व्यापार में घाटा लग जाना, सन्तान का अनुकूल न होना, पति-पत्नी में से किसी एक का छोटी अवस्था में चले जाना, अन्य अनेक पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाना आदि, जब दोनों ओर कष्ट हैं तो मुझे कौन सा मार्ग स्वीकार करना चाहिए?
तभी दिमाग में एक बात बिजली-सी कौंध गई कि कष्ट तो दोनों तरफ हैं, जहां साधु जीवन के कष्ट मुझे मोक्ष की ओर ले जाने वाले होंगे, वहीं गृहस्थ-जीवन के कष्ट मुझे अधोगति की ओर ले जा सकते हैं, यदि मैं जागरूकतापूर्वक संयम का पालन करुंगा तो मुझे पन्द्रह भवों में मुक्ति मिल जाएगी।’ बस, भीतर में जल उठे इस चिन्तन के दीप ने मोहन को साधु बनने के लिए कृतसंकल्प बना दिया, उसने वहीं बैठे-बैठे जीवन-पर्यन्त शादी करने का त्याग कर दिया।
आज्ञा प्राप्ति के प्रयत्न : मनुष्य के जीवन में ज्वारभाटे जैसा उतार-चढ़ाव आता रहता है जो व्यक्ति ज्वार को पकड़ लेता है, वह सौभाग्य की ड्योढी पर पहुंच जाता है और जो चूक जाता है, वह भाटे के दलदल में फंस जाता है। मोहन ने अपने भीतर उठते ज्वार को पकड़ा और सौभाग्य की ड्योढी पर पहुंच गया। मोहन के जीवन का वह एक Turning Point था, उसने भावुकता में बहकर कोई निर्णय नहीं किया। बहुत चिन्तन-मनन के बाद उसने अपने जीवन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निर्णय किया कि मुझे ‘साधु’ बनना है।

तेरापंथ की दीक्षा मात्र स्वयं की इच्छा से ही नहीं हो सकती, परिवार की स्वीकृति भी अनिवार्य होती है। मोहन ने स्वीकृति-प्राप्ति के लिए प्रयास प्रारंभ किया। पिताश्री झूमरमलजी दूगड़ का तो स्वर्गवास हो चुका था। मोहन ने मां से कहा- ‘मां! मुझे दीक्षा लेनी है इसलिए आपकी आज्ञा चाहिए।’ मां ने कहा- ‘मोहन! मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगी, सुजानमल जो कहेगा वही होगा।’
उस समय श्री सुजानमलजी दूगड़ परिवार के मुखिया एवं संरक्षक थे, वे एक समझदार, निर्णयक्षम और प्रामाणिकतानिष्ठ व्यक्ति हैं। परिवार में उनका अच्छा अनुशासन है, उस समय सुजानमलजी जोरहाट गए हुए थे, मोहन ने उनके नाम एक लम्बा-चौड़ा पत्र लिखा, जिसमें दीक्षा के लिए अनुमति मांगी गई। सुजानमलजी ने प्रत्युत्तर में लिखा – ‘दिक्षा के बारे में मैं अभी कुछ नहीं कह सकता, सरदारशहर आने पर ही बात हो सकेगी।’ मार्गशीर्ष महीने में वे सरदारशहर आए। घर में दीक्षा के संदर्भ में बात हुई, तब सुजानमलजी ने साफ इनकार कर दिया, जब मोहन को स्वीकृति नहीं मिली तो उसने अनुमति नहीं मिलने तक तीव्र द्रव्य से अधिक खाने का त्याग कर दिया, यह क्रम कई दिनों तक चला किन्तु आज्ञा नहीं मिली, तब एक दिन मोहन ने साहस बटोरकर कहा – ‘भाईजी! यदि आप मुझे दीक्षा के लिए स्वीकृति नहीं देंगे तो मैं आपके घर में नहीं रहूंगा।’
सुजानमलजी – ‘घर से बाहर जाने पर भी तुम्हें दीक्षा तो मिलेगी नहीं।’
मोहन – ‘कोई बात नहीं।’
सुजानमलजी – ‘फिर तू खाना कहां खाएगा?’
मोहन – ‘मैं घरों से मांग-मांगकर भोजन कर लूंगा किन्तु आपके घर में नहीं रहूंगा।’ यह कहकर मोहन घर से चला गया, उसके जाने के बाद माँ ने कहा- ‘सुजान! कहीं भावावेश में आकर मोहन कोई गलत काम कर लेगा तो हमेशा के लिए हमारी आंखों से ओझल हो जाएगा, इससे तो अच्छा है कि तुम उसे दीक्षा की आज्ञा दे दो ताकि वह हमारी आंखों के सामने तो रहेगा।’ विनीत पुत्र ने मां की आज्ञा को शिरोधार्य किया, जब सायंकाल सूर्यास्त से कुछ समय पहले मोहन अपनी पुस्तकें, आसन आदि लेने के लिए घर आया तब मां ने कहा – ‘मोहन! ऐसा करने से दीक्षा की आज्ञा नहीं मिलेगी, पहले खाना खा लो फिर भाईजी से अच्छी तरह बात कर लेना।’ मोहन ने भी मां की आज्ञा को शिरोधार्य किया। खाना खाने के बाद भाईजी से बातचीत की। भाईजी ने कहा -‘आषाढ़ महीने के बाद जब तुम्हारी इच्छा हो, मैं दीक्षा दिलाने के लिए तैयार हूं।’ मोहन को आज्ञा मिल गई। मां की आज्ञा तो भाईजी की अनुमति में ही निहित थी, उस दिन मोहन की प्रसन्नता का कोई पार नहीं था, वह तत्काल मुनिश्री के पास गया और सारी बात निवेदित की, उन दिनों मोहन ने पूज्य गुरूदेव तुलसी को एक पत्र लिखा, वह अविकल रूप में इस प्रकार हैपरमपूज्य परमपिता मेरे ह्रदयदेव युगप्रधान आचार्यश्री तुलसी के चरणों में कोटि-कोटि वन्दना।
गुरूदेव! पहली म्हारा भाईजी दीक्षा लेणै वास्तै मनै स्वीकृति कोनी दी, अब आपकी कृपा तथा सन्तां की प्रेरणा स्यूं मां और भाईजी कुछ महीना ठहरकर दीक्षा लेणै की स्वीकृति दे दी है। गुरूदेव! मैं आपकी कृपा स्यूं तथा मुनिश्री सोहनलालजी की कृपा तथा मेहनत स्यूं इण चौमासै में कई थोकड़ा सीख्या हूं, जिकामें-पाना कर चरचा, तेरहद्वार, लघुदण्डक, गतागत, बावनबोल, बासठियो, अल्पाबोहत, विचारबोध, जैन तत्त्व प्रदेश (प्रथम भाग), कर्म प्रकृति पहली सीखी हूं।
गुरूदेव! आपकै श्री चरणां में म्हारी आ ही प्रार्थना है कि बीच का चार-पांच महीना ८की म्हारै अन्तराय है, आ पूरी हुंता ही गुरूदेव मनै जल्दी स्यूं जल्दी दीक्षा दिरासी।

आपका सुविनीत शिष्य मोहन
प्रसंगोपात्त एक दिन : मुनिश्री सुमेरमलजी ने दीक्षा का मुहूर्त देखा और वैशाख महीना श्रेष्ठ बताया, किन्तु भाईजी की स्वीकृति तो आषाढ़ महीने के बाद के लिए प्राप्त थी। मुनिश्री ने उनसे कहा- आपको दीक्षा तो देनी ही है फिर आषाढ़ के बाद दें या वैशाख में दें, क्या फर्क पड़ेगा? मात्र दो-तीन महीनों के लिए अच्छे मुहूर्त को क्यों टाला जाए? तब सुजानमलजी ने कहा – ‘गुरूदेव और आप जब उचित समझें, इसको दीक्षा दे सकते हैं, मेरी ओर से स्वीकृति है।’
मोहन के साथ हीरालाल बैद, बजरंग बरड़िया और तेजकरण दूगड़ भी वैरागी थे। मोहनलाल और हीरालाल को तो परिवार की ओर से अनुमति मिल गई किन्तु बजरंग और तेजकरण को पारिवारिक स्वीकृति नहीं मिली, वे साधु तो नहीं बने किन्तु आज वे अच्छे श्रावक अवश्य हैं।
मोहन का परीक्षण किया गया, वह हर परीक्षा में स्वर्ण की भांति खरा उतरा, उस समय गुरूदेव तुलसी का प्रवास अणुव्रत-भवन, दिल्ली में था। मर्यादामहोत्सव का अवसर था, मोहन अपने परिवार के साथ गुरूदर्शन के लिए दिल्ली पहुंचा। वि.सं. २०३० माघ शुक्ला अष्टमी को प्रवचन के समय उसने एक वक्तव्य दिया, वह इस प्रकार है-

अपनी बात : ‘परमाराध्य प्रात: स्मरणीय ह्रदयसम्राट युगप्रधान आचार्यश्री के श्रीचरणों में कोटी-कोटी वन्दना! उपस्थित साधु-साध्वीवृंद! बुजुर्गों! माताओं!
आप लोग सोच रहे होंगे यह बच्चा क्यों खड़ा हुआ है? क्या कहने जा रहा है और क्या चाहता है? मेरी चाह भौतिक नहीं, आध्यात्मिक है। मेरा कथन उपदेश नहीं, निवेदन है। प्रार्थना है वह भी किसी भौतिक वस्तु के लिए नहीं, चारित्र के लिए है। साधु बनने की आकांक्षा मन में लेकर ही मैं आज यहां खड़ा हुआ हूं। आप लोग सोच रहे होंगे कि यह बच्चा है, यह साधुत्व को क्या समझेगा? जब मैं ऐसी बात किसी से सुनता हूं तो मुझे उसकी बुद्धि पर तरस आता है, ह्रदय करूणा से भर जाता है। सोचता हूं इन लोगों ने धर्म को समझा या नहीं, आत्मा को जाना या नहीं। अगर जाना है तो केवल मेरे शरीर से ही मेरा अंकन क्यों करते हैं? साधुत्व आत्मा की वस्तु है या शरीर की? याद रखें, धर्म आत्मा की वस्तु है, क्या मेरी आत्मा आपसे छोटी है? क्या कोई आत्मवादी ऐसा कह सकता है? शरीर से ही जो व्यक्ति छोटे-बड़े का अंकन करते हैं वे केवल हाड़-मांस और चमड़ी देखने वाले हैं।
एक कहानी मुझे याद आती है, जो मैंने सन्तों से ही सुनी थी। अष्टावक्रजी को आत्मचर्या के लिए राज्यसभा से निमंत्रण मिला। निश्चित समय पर अष्टावक्रजी राज्यसभा में पहुंचे, सभाभवन पण्डितों से भरा हुआ था, ज्योंही अष्टावक्रजी ने सभाभवन में प्रवेश किया, पण्डित लोग उनके शरीर को देखकर खिलखिलाकर हंस पड़े। आठ जगह से उनका शरीर टेढ़ा-मेढ़ा था। सारा भवन हंसी से गूंज उठा। अष्टावक्रजी ने राजा से कहा- ‘राजन्! यहां पण्डित कौन है? ये सब तो चमार ही चमार हैं, किससे चर्चा करुं?’ विस्मितमना राजा ने कहा -‘अष्टावक्र! ऐसे कैसे बोल रहे हो? सब सामने पण्डित ही पण्डित बैठे हैं।’
अष्टावक्र- ‘पण्डित कहां है राजन्! पण्डित लोग आत्म चर्चा में लीन रहते हैं और चमार लोग चमड़ी तथा हड्डियों की परिक्षा में लीन रहते हैं, ये सब मेरे शरीर को देखकर हंस रहे हैं इसलिए पंडित कहां हैं? हंसने वाले पण्डितों पर चपत-सी लग गई।
अब आपसे ही पूछूं -‘जो मेरे को छोटा बतलाते हैं, उन्हें क्या कहूं? आप सोचते होंगे, यह साधुत्व के नियम कैसे निभाएगा? अतिमुक्तक मुनि ने कैसे निभाया था? गजसुकुमाल मुनि ने कैसे कष्ट सहे? परीषह आत्मबल से ही सहा जाता है।’

अस्तु, पूज्य गुरूदेव! मेरी ओर ध्यान दें, इस बच्चे का भविष्य आपकी दृष्टि
पर निर्भर है, कृपा करके प्रतिक्रमण सीखने का आदेश तो अभी फरमाएं।
प्रवचन के दौरान पूज्य गुरूदेव ने मोहन से ऐसे प्रश्न पूछे- ‘बोलो वैरागीजी!
आश्रव किसे कहते हैं?’ प्रवचन-संपन्नता के बाद गुरूदेव अणुव्रत-भवन में ऊपर पधार रहे थे, प्रथम मंजिल की सीढ़ियों के बीच पूज्यप्रवर कुछ क्षण रूके और वहीं मोहन को प्रतिक्रमण सीखने का आदेश फरमा दिया। मोहन का रोम-रोम खिल उठा, वह अपने परिवार के साथ पुन: सरदारशहर आ गया।

परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञ के महाप्रयाण के साथ धर्मसंघ का सर्वोच्च नेतृत्व स्वाभाविक रूप से मेरे में समाविष्ट हो गया, आज दीक्षा दिल्ली में या सरदारशहर में :
प्रतिक्रमण आदेश के बाद पूज्यप्रवर ने चिन्तन किया कि दीक्षा कहां हो, दिल्ली में या सरदारशहर में? उन दिनों ट्रेनों की हड़ताल चल रही थी और मोहन की अवस्था भी छोटी थी। मात्र बारह वर्ष के बालक की दीक्षा दिल्ली शहर में होना आलोचना का विषय बन सकता था। मोहन के परिवार की भी यही इच्छा थी कि दीक्षा सरदारशहर में ही हो, इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए आचार्यवर ने फरमाया – ‘मोहनलाल और हीरालाल
की दीक्षा वि.सं. २०३१ वैशाख शुक्ला चतुर्दशी को सरदारशहर में ही शिष्य मुनि सुमेर (लाडनूं) के सानिध्य में हो सकेगी।
दीक्षा-तिथि की घोषणा के बाद घर में मोहन का विशेष ध्यान रखा जाता, उसकी इच्छापूर्ति का प्रयास किया जाता। मोहन की मौसी श्रीमती झूमादेवी नखत कोलकाता में रहती थी, वह मोहन के लिए घड़ी लेकर आई। मोहन को घड़ी का बहुत शौक था, वह अपने हाथ पर घड़ी बांधकर सबको बार-बार दिखाता, उस समय तक बच्चों के हाथ पर घड़ी बंधी हुई बहुत कम देखने को मिलती थी। दीक्षा के बाद भी कई दिनों तक घड़ी देखने के लिए मोहन अपने हाथ को देखता, फिर याद आता कि अब मैं साधु बन गया हूँ।
सौभाग्य की सौगात : वि.सं. २०३१ वैशाख शुक्ला चतुवर्दशी (५ मई १९७४) का सुप्रभात मोहन के लिए सौभाग्य की सौगात लेकर आया, वह प्रात: लगभग चार बजे ही मुनिश्री के पास पहुंच गया। मुनिश्री ने फरमाया- ‘मोहन! आज इतनी जल्दी आ गया?’ मोहन ने कहा – ‘मुनिप्रवर! आज तो मेरे लिए सोने का सूरज उगा है, मैं बहुत सौभाग्यशाली हूं कि आज मुझे आपके करकमलों से दीक्षित होने का सुअवसर मिलेगा।’
गधैयाजी का नोहरा! हजारों लोगों की उपस्थिति। लम्बे व भव्य जूलूस के साथ दोनों वैरागी श्री समवसरण में पहुंचे, अनेक लोगों ने उनके भावी जीवन के प्रति मंगल भावनाएं व्यक्त कीं।
मोहन के ज्येष्ठ भ्राता अमरचन्दजी दूगड़ ने आज्ञा पत्र का वाचन किया। मोहन ने भी छोटा-सा वक्तव्य दिया। कार्यक्रम के दौरान गुरूदेव तुलसी द्वारा प्रदत्त संदेश का वाचन किया गया, उसका कुछ अंश इस प्रकार है-

‘जैन मुनि की चर्या कठिन है, यह बात सही है। तेरापंथी जैन मुनियों की चर्या और अधिक कठिन है, इस चर्या में पांच महाव्रतों की स्वीकृति के साथ जीवनभर गुरू के चरणों में समर्पित रहना, प्रत्येक काम उनके निर्देश से करना, संघीय व्यवस्थाओं का ह्रदय से पालन करना आदि ऐसे विधान हैं जो व्यक्ति को चारों ओर से थाम लेते हैं, फिर भी उसमें रम जाने के बाद वे कठिनाइयां सहज बन जाती हैं, आनन्दप्रद लगने लगती हैं।
दीक्षा-संस्कार का कार्यक्रम प्राय: आचार्यश्री के सान्निध्य में होता है, कभी कभी विशेष परिस्थितियों में आचार्य की आज्ञा से अन्यत्र भी ऐसे कार्यक्रम हो सकते हैं, अभी-अभी सरदारशहर में दीक्षा-संस्कार का एक कार्यक्रम होने वाला है, उसमें दीक्षित होने वाले बालक मोहनलाल और हीरालाल अपने आपको मुनिचर्या के लिए समर्पित कर रहे हैं, यद्यपि इन बालकों की अवस्था बहुत अधिक नहीं है पर इनके संस्कारों की परिपक्वता और विचारों की दृढ़ता उल्लेखनीय है। पारिवारिक लोगों ने अपनी ओर से इनकी कसौटी की और ये उत्तीर्ण हो गए, मैंने भी इनको परखा, मुझे इनके जीवन में आध्यात्मिक चेतना का स्फुरण परिलक्षित हुआ, मैं इनसे कहना चाहूंगा कि ये एक बार दो क्षण रूककर सोचें, मु़डकर देखें, साधु जीवन की कठिनाइयों के साथ अपना आत्मबल तोल लें, इनके आत्मबल, आत्मविश्वास और आत्मबोध की समन्विति में ही साधना की चरितार्थता है।

इनकी दीक्षा दिल्ली में संभावित थी किंतु यातायात संबंधी अत्यधिक कठिनाइयों के कारण सरदारशहर में ही दीक्षा देने को निर्णय लिया गया, वहां शिष्य मुनि सुमेर ‘लाडनूं’ के सान्निध्य में ये दोनों किशोर अपनी मंजिल की ओर पदन्यास करेंगे, तेरापंथ धर्मसंघ में मुनि रूप में दीक्षित होंगे, जिन प्रबल मनोभावों के साथ ये अध्यात्मविकास के लिए संयमी साधकों का पथ चुन रहे हैं, उस पर उतने ही प्रबल उत्साह के साथ बढ़ते रहेंगे, ऐसा विश्वास है, मैं इन दोनों किशोरों के प्रति अपनी शुभकामना व्यक्त करता हूँ तथा अपना आशीर्वाद देता हूँ कि ये ज्ञान, दर्शन, चारित्र की त्रिवेणी में निष्णात होते हुए संसार का मार्गदर्शन करें। जीवन परिवर्तन के साथ इनके नाम भी परिवर्तित हो जाएं, इस दृष्टि से मैं मोहनलाल को मुनि मुदितकुमार और हीरालाल को मुनि हेमंतकुमार नाम से संबोधित करते हुए एक बार फिर उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ।
मुनिश्री सुमेरमलजी ने पूज्यप्रवर की अनुमति से दोनों बालकों को दीक्षा प्रदान की, फिर दीक्षा विधि के अनुसार चोटी के अवशिष्ट केशों का लुंचन किया, तत्पश्चात नामकरण संस्कार संपन्न हुआ। मुनि मुदितकुमारजी सरदारशहर के इक्कीसवें संत थे। सरदारशहर प्रारंभ से ही उर्वरा भूमि रही है। तृतीय आचार्यश्री रायचंदजी स्वामी के शासनकाल से लेकर आज तक यानी सन् २०१० तक यहां के लगभग ढाई सौ साधु-साध्वियों व समणियों की दीक्षाएं हो चुकी हैं।

भविष्यवाणी रेखाशास्री की : दीक्षा से कुछ दिन पूर्व सरदारशहर के कार्यकर्ता रेखाशास्री अध्यापक छगनजी मिश्रा को मुनिश्री सुमेरमलजी के पास लेकर आए, उन्होंने मुनिश्री के हाथ और पैर की रेखाएं देखीं और कहा- आप दो बालकों को छह महीने के भीतर-भीतर दीक्षा देंगे, उसी समय उन्होंने मोहन के भी हाथ व पैर की
रेखाएं देखीं और कहा- यह बालक आपकी (मुनिश्री की) विद्यमानता में ही धर्मसंघ में सर्वोपरि स्थान प्राप्त करेगा, दोनों ही भविष्यवाणी शत प्रतिशत सच हो गई।