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गुरुदेव श्रीमद् विजयराजेन्द्रसूरिश्वरजी

गुरुदेव श्रीमद् विजयराजेन्द्रसूरिश्वरजी जन्मस्थान एवं माता-पिता-परिवार ‘श्रीराजेन्द्रसुरिरास’ एवं श्री राजेन्द्रगुणमंजरी के अनुसार, वर्तमान राजस्थान प्रदेश के भरतपुर शहर में दहीवाली गली में पारिख परिवार के ओसवंशी श्रेष्ठि ऋषभदास रहते थे, आपकी धर्मपत्नी का नाम केशरबाई था, जिसे अपनी कुक्षि में श्री राजेन्द्र सुरि जैसे व्यक्तित्व को धारण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। श्रेष्ठि रुषभदास जी की तीन संतानें थीं, दो पुत्र : बड़े पुत्र का नाम माणिकचन्द एवं छोटे पुत्र का नाम रतनचन्द था एवं एक कन्या थी, जिसका नाम प्रेमा था, छोटा पुत्र रतनचन्द आगे चलकर आचार्य श्रीमद् विजय राजेन्द्र सूरि नाम से प्रख्यात हुए। वंश : पारेख परिवार की उत्पत्ति आचार्य श्रीमद् विजय यतीन्द्रसुरि के अनुसार, वि.सं. ११९० में आचार्यदेव श्री जिनदत्तसुरि महाराज के उपदेश से राठौड़ वंशीय राजा खरहत्थ ने जैन धर्म स्वीकार किया, उनके तृतीय पुत्र भेंसाशाह के पांच पुत्र थे, उनमें तीसरे पुत्र पासुजी आहेड्नगर (वर्तमान आयड-उदयपुर) के राजा चंद्रसेन के राजमान्य जौहरी थे, उन्होंने विदेशी व्यापारी के हीरे की परीक्षा करके बताया कि यह हीरा जिसके पास रहेगा, उसकी ध्Eाी मर जायेगी, ऐसी सत्य परीक्षा करने से राजा पासु जी के साथ ‘पारखी’ शब्द का अपभ्रंश ‘पारिख’ शब्द बना। पारिख पासुजी के वंशज वहाँ से मारवाड़, गुजरात, मालवा, उत्तरप्रदेश आदि जगह व्यापार हेतु गये, उन्हीं में से दो भाइयों के परिवार में से एक परिवार भरतपुर आकर बस गया था, जन्म को लेकर ऐसा उल्लेख प्राप्त होता है कि आचार्य श्री के जन्म के पहले एक रात्रि में उनकी माता केशरबाई ने स्वप्न में देखा कि एक तरुण व्यक्ति ने प्रोज्ज्वल कांति से चमकता हुआ रत्न केशरबाई को दिया – ‘गर्भाधानेड्थ साडद्क्षीत स्वप्ने रत्नं महोत्तम्म’निकट के स्वप्नशाध्Eाी ने स्वप्न का फल भविष्य में पुत्ररत्न की प्राप्ति होना बताया। जन्म समय – आचार्य श्रीमद्विजय यतीन्द्र सुरी के अनुसार, वि.सं. १८८३ पौष सुदि सप्तमी, गुरुवार, तदनुसार ३ दिसम्बर सन् १८२७ को माता केशरबाई ने देदीप्यमान पुत्ररत्न को जन्म दिया। पूर्वोक्त स्वप्न के अनुसार माता-पिता एवं परिवार ने मिलकर नवजात पुत्र का नाम ‘रत्नराज’ रखा। व्यावहारिक शिक्षा – आचार्य श्रीमद्विजय यतीन्द्र सुरी एवं मुनि गुलाबविजय के अनुसार योग्य उम्र  में पाठशाला में प्रविष्ट हुए, मेधावी रत्नराज ने केवल १० वर्ष की अल्पायु में ही समस्त व्यावहारिक शिक्षा अर्जित की, साथ ही धार्मिक अध्ययन में विशेष रुचि होने से धार्मिक अध्ययन में प्रगति की। अल्प समय में ही प्रकरण और तात्विक ग्रंथों का अध्ययन कर लिया। तीव्र क्षयोपशम के कारण प्रखरबुद्धि बालक रत्नराज १३ वर्ष की छोटी सी उम्र में अतिशीघ्र विद्या एवं कला में प्रवीण हो गए, श्री राजेन्द्रसूरि रास के अनुसार उसी समय विक्रम संवत् १८९३ में भरतपुर में अकाल पड़ने से कार्यवश माता-पिता के साथ आये रत्नराज का उदयपुर में आचार्य श्री प्रमोदसुरि जी के प्रथम दर्शन एवं परिचय हुआ, उसी समय उन्होंने रत्नराज की योग्यता देखकर ऋषभदास जी ने रत्नराज की याचना की लेकिन ऋषभदास ने कहा कि अभी तो बालक है, आगे किसी अवसर पर, जब यह बड़ा होगा और उसकी भावना होगी, तब देखा जायेगा।’ यात्रा एवं विवाह विचार – जीवन के व्यापार-व्यवहार के शुभारंभ हेतु मांगलिक स्वरुप तीर्थयात्रा कराने का परिवार में विचार हुआ। माता-पिता की आज्ञा लेकर  बड़े भाई माणेकचंद के साथ धुलेवानाथ – केशरियाजी तीर्थ की पैदल यात्रा करने हेतु प्रयाण किया, पहले भरतपुर से उदयपुर आये, वहाँ से अन्यत्र यात्रियों के साथ केशरियाजी की यात्रा प्रारंभ की, तब रास्ते में पहाड़ियों के बीच आदिवासी भीलों ने हमला कर दिया, उस समय रत्नराज ने यात्रियों की रक्षा की। साथ ही नवकार मंत्र के जाप के बल पर जयपुर के पास अंब ग्राम निवासी शेठ शोभागमलजी की पुत्री रमा को व्यंतर के उपद्रव से मुक्ति भी दिलायी, सभी के साथ केशरियाजी की यात्रा कर वहाँ से उदयपुर, करेडा पार्श्वनाथ एवं गोडवाड के पंचतीर्थों की यात्रा कर वापस भरतपुर आये। ऐसा उल्लेख प्राप्त होता है कि शेठ सोभागमलजा ने रत्नराज के द्वारा पुत्री रमा को व्यंतर दोष से मुक्त किये जाने के कारण रमा की सगाई रत्नराज के साथ करने हेतु बात की थी, लेकिन वैराग्यवृत्ति रत्नराज ने इसके लिए इंकार कर दिया।

आचार्य श्री नानालालजी म. सा. की संक्षिप्त जीवनी

अग्नि का छोटा-सा कण भी वृहत्काय घास के ढेर को क्षण भर में भस्मसात् कर देता है और अमृत का एक लघुकाय बिन्दु अथवा आज की भाषा में होम्योपैथिक की एक छोटी-सी पुड़िया भी अमूल्य जीवनदाता बन जाती है।हिरोशिमा ओर नागासाकी की वह दर्द भरी कहानी हम भूले नहीं हों तो सहज जान सकते हैं कि एक छोटा-सा अणु-परमाणु कितना भयंकर प्रलय ढा सकता है, ठीक वैसे ही जीवन के प्रवाह में संख्यातीत घटनाओं में से कभी-कभी एकाध साधारण-सी घटना सम्पूर्ण जीवन-क्रम को आन्दोलित कर सर्वतोभावेन परिवर्तन का निमित्त बन जाती है।श्रद्धेय चरितनायक के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ, आपके सोये हुए देवत्व को अपेक्षा थी किसी ऐसे निमित्त की, जो उपादान का सहयोगी बन, उसे पूर्णता कह प्रदान करे, उस समय तक आप तथाकथित धार्मिक अनुष्ठानों से सर्वथा अपरिचित थे और जितनी मात्रा में परिचय प्राप्त हुआ, वह अत्यन्त अल्प था, अत: आपका गहन चिन्तन उचित सामाधान के अभाव में उन सब क्रियाओं में रूचि नहीं लेता था, इसके विपरीत आप धर्म क्रियाओं को ढकोसला समझते थे और साधु-सन्तों के प्रति भी आपके मन में कुछ विपरित ही धारणा थी, फिर भी आपकी सोच से निसर्ग भवभीरू एवं नैतिक प्रवृति सदैव आपको आरम्भ प्रवृत्तियों से बचाए रहती थी, एक उपदेश पर की बेर में कीट होते हैं, अत्यंत बाल्यकाल में तुरन्त बेर खाने का त्याग कर लेना, आपकी भवभीरूता का प्रबल प्रमाण है।एक समय की घटना है, आपके बड़े भाई साहब मिठूलालजी, जो कुछ व्यवसाय के साथ-साथ अपनी निजी भूमि पर कृषकों से कृषि का कार्य करवाया करते और कृषि की देख-भाल किया करते थे, उन्होंने आपसे कहा ‘‘कुंए का ऊपरी भाग अधिक पानी बरसने से कारण ढह गया है, अत: उसके पुन: निर्माण के लिये चूने की आवश्यकता होगी, अत: तुम चूना पड़वाने की व्यवस्था करो।”बौद्धिक प्रतिभा एवं कर्त्तव्य क्षमता में बड़े भाईसाहब से आप अधिक कुशल थे, फिर भी आप उनको पिता की तरह हृदय से सम्मान करते थे और यथासाध्य उनकी आज्ञाओं का पूर्णरूपेण पालन करने का प्रयास करते थे, अत: आपके लिये यह आवश्यक हो गया कि कृप के पुनः निर्माण के लिए सामग्री जुटाई जाए, उसके लिये आपने पत्थर फुड़वाए, कुछ हरे वृक्ष भी कटवाए और चूना तैयार करवाकर कूप- निर्माण का कार्य सम्पन्न करा दिया।आपका व्यावसायिक दौर क्रमशः विकासोन्मुख होता रहा और आप अपनी पारिवारिक एवं सामाजिक समस्याओं के समुचित समाधान में सफलता प्राप्त करते जा रहे थे, पर नियति को आपके लिए कुछ अन्य ही इष्ट था, वह आपको इस परिवार के लघुतम घेरे से बहुत दूर विराटता की ओर ले जाना चाहती थी, जिसकी भूमिका तो नियति आप से पूर्व ही निर्मित कर दी थी जो आपको मिल गया आपको गांव से करीब आठ मील दूर ‘‘भादसोड़ा’’ ग्राम में।बात असल में यों बनी- होनहार बिरवान के होत चीकने पात’’’ के अनुसार एक प्रसंग आ गया, आपकी एक अग्रजा भगिनी थी श्रीमती मोतीबाई जिनका पाणिग्रहण भादसोड़ा निवासी सवाईलालजी साहब लोढ़ा से हुआ था।प्रसंग उस समय का है जब मेवाड़ी मुनि चौथमलजी म.सा. का चातुर्मासिक वर्षावास सम्वत् १६६४ में भादसोड़ा में था, आपकी (आचार्य देव की) बहिन श्रीमती मोतीबाई ने (पंचोले) पांच दिन तक निराहार रहने का तपश्चरण किया, तत्कालीन प्रचलित परिपाटी के अनुसार तपस्विनी बहिन के लिये ऐसे प्रसंगों पर उसके पितृगृह से वस्त्रादि (पोशाक) भेजे जाते थे, तदनुसार आपके लिए भी यह आवश्यक हो गया कि भादसोड़ा बहिन के लिये अपने परिवार से पोशाक आदि उचित सामग्री पहुँचाई जाये, चूँकि ऐसे पावन अनुष्ठान प्राय: गृह-प्रमुखों के करकमलों द्वारा ही सम्पन्न हुआ करते थे, साथ ही आप इस प्रकार की धार्मिक अनुष्ठानों की क्रियाओं से अपरिचित भी थे और आपकी इनमें रूचि भी नहीं थी, अत: अपने अग्रज श्रीमान मिठूलालजी उस समय किसी अन्य कार्य में व्यस्त थे, अत: वे नहीं जा सके, फलस्वरूप आपको ही उपर्युक्त प्रसंग पर जाने का आदेश मिला, आप उचित साधन-सामग्री लेकर इच्छा नहीं होते हुए भी अश्वारूढ़ हो चल पड़े अपने गन्तव्य की ओर…चिरस्थायी गन्तव्यवास्तव में यह आपका चिरस्थायी गन्तव्य की ओर ही गमन था, प्रकृति आपको किसी अलौकिक गन्तव्य की प्रेरणा के लिए ही यहां तक खींच लाई थी। भादसोड़ा अपनी बहिन के यहां पहुंच कर यथायोग्य व्यवहार के साथ रात्रि-विश्राम वहीं पर किया, साथ में लाई हुई सामग्री भेंट कर प्रात:काल पुन: लौटने की तैयारी करने लगे, किन्तु आपके बहनोईजी ने किसी तरह समझाया कि अभी पर्युषणों के दिन चल रहे हैं और कल तो संवत्सरी महापर्व है, कल का दिन पवित्र धार्मिक अनुष्ठानों में व्यतीत होना चाहिए, किसी भी प्रकार सवारी आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए और आप आज ही घोड़े को परेशान करना चाह रहे हैं, इस प्रकार कुछ मान-मनुहार के पश्चात् आपको अनिच्छापूर्वक वहां रूक जाना पड़ा।मेवाड़ी मुनि श्री चौथमलजी म. सा. का चातुर्मास था, अत: समस्त जैन समाज उनके पर्युषण प्रवचनों का लाभ लेने पहुंच रहा था, ‘जिनाग्ाम’ के चरित नायक को भी बहनोईजी आग्रहपूर्वक प्रवचन-स्थल से कुछ दूर बैठ कर प्रवचन श्रवण करने लगे, प्रवचन कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, फिर भी लोक-लज्जा से बैठे रहे। व्याख्यान समाप्ति के प्रसंग पर मुनिश्री ने कहा कि कल एक ऐसी बात सुनाऊंगा जिससे संसार की दशा का ज्ञान होगा, हमारे चरित नायक को कहानी रूपी बातें सुनने का अधिक शौक था, अत: सोचा कि कल की कहानी सुन लेनी चाहिए, तदनुसार दूसरे दिन भी प्रवचन में गये, जब कुछ रस आने लगा, तो उठकर कुछ आगे समीप जाकर बैठ गए।सांवत्सरिक प्रवचन होने के कारण प्रवचन का विषय वैराग्योत्पादक एवं धार्मिक अनुष्ठानों के प्रति पे्ररणाप्रद था, संसार की असारता एवं हिंसाकारी आरम्भिक प्रवृत्तियों के निषेध पर बल दिया जा रहा था, चूंकि तत्कालीन वातावरण के अनुसार ग्रामीण सभ्यता में पलने वाले अधिकांश जैन धर्मावलम्बी भी कृषि कार्य किया एवं करवाया करते थे, अत: उनको उद्वोधन देने हेतु मुनिश्री तत्कालीन भाषा-शैली के माध्यम से कह रहे थे, ‘‘बड़े-बड़े वृक्ष कटवाने से बहुत पाप लगता है क्योंकि इस क्रिया से असंख्य अथवा अनन्त वनस्पति कायिक जीवों की हिंसा तो होती ही है, साथ ही अनेक तदाश्रित पशु-पक्षी आदि (चलते-फिरते) प्राणियों की भी हिंसा होती है, हिंसा, असत्य, चोरी आदि पाप-वृत्तियों में रत रहने वाला व्यक्ति मर कर दुर्गति में जाता है, कभी कुछ पुण्य कर्मों से मानव तन भी प्राप्त कर लेता है तो कभी पूरी इन्द्रियाँ नहीं मिलती अर्थात् बहरा, गूंगा, लंगड़ा आदि विकलांग बन जाता है, तो कभी दर-दर का भिखारी बन जाता है और उचित धार्मिक वातावरण मिलना भी कठिन हो जाता है, इसी शृ्रंखला में महाराजश्री ने फरमाया-यह हृास काल है अत: पंचम एवं षष्ठम आरक (काल विशेष) में इन्द्रिय शक्ति, शारीरिक संगठन आदि क्षीण होते जाएंगे, यहां तक कि छठे आरे में उत्पन्न होने वाला मानव तो बहुत लघुकाय अर्थात् एक हस्त प्रमाण ऊँचाई वाला होगा, बहुत लघु वय में पितृ-पद भोक्ता बन जायेगा, २० वर्ष की उम्र तक को वृद्ध बन १०-१२ संतान का पिता बन जायेगा, इस प्रकार औरों का आद्योपान्त विस्तृत विवेचन किया, प्रवचन तत्कालिन भावप्रवाही, हृदयग्राही एवं वैराग्योत्पादक था, किन्तु यथा ‘‘आम्र वृक्ष पर आने वाली सभी मंजरियाँ फलवती नहीं होती’’ठीक उसी प्रकार उपदेष्टा वाणी सभी श्रोताओं के सुप्त मानस को जागृत कर दें, यह आवश्यक नहीं, कोई विशिष्ट श्रोता ही उस वाणी को कर्ण-कुम्हारों तक ही सीमित न रखकर हृदय-तन्त्री तक पहुँच पाता है और उनमें भी कोई विरल ही उसे सर्वतोभावेन जीवन परिवर्तन का आधार बना लेता है, उन विरल चेतनाओं में ही श्रद्धेय चरितनायक भी रहे हैं, जिन्होंने प्रवचन के एक-एक शब्द को एकाग्रतापूर्वक सुना एवं उसे मन-मस्तिष्क पर नियोजित कर लिया, व्याख्यान श्रवण करते समय तक उसका नूतन परिवर्तनकारी कोई स्थायी प्रभाव आप पर नहीं पड़ा। प्रवचन समाप्ति पर अन्य श्रोताओं की तरह आप भी अन्यमनस्कवत् चलते बने, बहन के निवास स्थान पर पहुँचे और अपना अश्व सजाने लगे, बहन एवं बहनोईजी आदि ने बहुत निषेध किया एवम् समझाया कि आज संवत्सरी महापर्व है, आज सवारी आदि नहीं करनी चाहिए, कल प्रात: होते ही चले जाना, किन्तु अपनी धुन के पक्के चरितनायक पर उसका कोई प्रभाव नहीं हुआ, आप अश्वारूढ़ हो चल पड़े एक अदभुत गन्तव्य की ओर, चूँकि उस समय आपकी मातुश्री अपने एक भाई, जो भदेसर में रहते थे, के यहाँ थी, आपने अपनी मातेश्वरी से मिलने हेतु भदेसर की ओर प्रयाण किया, जो भादसोड़ा से लगभग दस मील पड़ता है, उस समय तक आपकी धार्मिक आस्था सुदृढ़ नहीं हुई थी अत: आपने उस रोज संवत्सरी होने से लोक लज्जावश भोजन नहीं किया, किन्तु उपवास-व्रत का प्रत्याख्यान भी नहीं लिया।चिन्तन का मंथनश्रद्धेय आचार्य देव में अपने शैशव काल से ही चिन्तन की प्रवृत्ति रही है, आप जीवन की किसी भी सामान्य-असामान्य घटना की गहराई में पहुँचने का प्रयास करते और चिन्तन के मन्थन से निष्कर्ष का नवनीत निकाल लेते, वातावरण कुछ ऐसा ही मिला, एकान्त विजन, सुरम्य वनस्थली, वन की नीरवता को भंग करने वाला पक्षियों का कलरव, जो मानव को सतत् चिन्तन के लिए उत्प्रेरित करता है, के मध्य सजग-चेता चरित नायक अश्वारूढ़ हो चले जा रहे थे, वन की मन्द बयार चतुर्दिग् भाद्रपदिय हरियाली की रम्य छटा एवं शांत वातावरण (जो आचार्यश्री का सदा से ही चिन्तन-क्षेत्र रहा है) का समुचित सुयोग पाकर आचार्य देव के चिन्तन ने एक नूतन अंगड़ाई ली, प्रवचन में अनुश्रुत विषय पर गम्भीर चिन्तन के साथ मन्थन होने लगा, जो कुछ श्रवण किया, उसमें से जितना मानस- पटल पर अंकित रहा, उसी पर धारा प्रवाही चिन्तन चला, जिसने आपकी आपेक्षिक सुषुप्त चेतना को एक झटके के साथ उद्वेलित कर दिया, बिजली की चमक के सदृश आपको एक दिव्य प्रकाश की अनुभूति हुई, चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश पैâल गया। तात्पर्य यह है कि ज्ञान की एक दिव्य रश्मि का प्रकाश आपके अन्त:करण में प्रस्फुटित हुआ, जिसने आपकी समग्र चेतना को एकाएक आलोकित कर दिया, आनंद से भर दिया, तथाकथित धर्म विद्रोही मन, धर्माभिमुख बन धर्म की गहनता एवं सूक्ष्मता के परीक्षण में तत्पर बनने लगा।

आचार्य ऋषभचन्द्र सूरि​

जावरा: दादा गुरूदेव के पाट परम्परा के अष्टम पट्टधर वर्तमान गच्छाधिपति श्रीमोहनखेडा तीर्थ विकास प्रेरक मानव सेवा के मसीहा, आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. आदि ठाणा का ऐतिहासिक मंगलमय प्रवेश, आचार्य पाट गादी पर विराजित होने के लिए हुआ।आचार्यश्री का सामैया सहित विशाल चल समारोह पहाडिया रोड स्थित चार बंगला लुक्कड परिवार के निवास से प्रारंभ हुआ, जो नगर के प्रमुख मार्गों से होता हुआ पिपली बाजार स्थित आचार्य पाट परम्परा की गादी स्थल पर पहुंचा, इस चल समारोह में आगामी १५ जनवरी २०२० को श्री मोहनखेडा महातीर्थ में होने वाली दीक्षा के मुमुक्षु अजय नाहर का वर्षीदान का वरघोडा भी निकाला गया, जिसमें मुमुक्षु ने अपने दोनों हाथों से दिल खोलकर वर्षीदान किया, स्मरण रहे आज से तीन वर्ष पूर्व आचार्यश्री को जावरा श्रीसंघ के द्वारा आचार्य पद प्राप्त होने से पूर्व श्रीसंघ ने काम्बली ओढा कर आचार्य पद ग्रहण करने के लिए विनती की थी, विदित हो कि यहां पर दादा गुरूदेव श्रीमद्विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की पाट परम्परा के सात आचार्य पूर्व में इस पाट पर विराजित होकर धर्मदेशणा जैन समाज को दे चुके हैं।आचार्यश्री ने पाट पर विराजित होकर अपने धर्म संदेश में कहा कि धर्म उत्कृष्ट मंगल है ऐसे धर्म को धारण करने वाले व्यक्ति को देवता भी नमन करते हैं। १५० वर्षों बाद १५१वें वर्ष में मुझे इस पाट पर बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, गुरूदेव की असीम कृपा है साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविकाओं की मेरे प्रति निष्टा बनी हुई है तभी मैं पाट गादी पर बैठने के लायक बना हॅू। आचार्य श्री ने कहा कि इस पाट गादी से मुझे उर्जा मिलेगी, मैं शरीर से पीड़ित जरूर हँू पर मन से पीड़ित नहीं हूँ, जीवन हमेशा परिवर्तनशील है समय सबके साथ न्याय करता हैं, व्यक्ति को कभी भी विपरित परिस्थिति में नहीं घबराना चाहिए, मेरे जीवन में भी कई विपरित परिस्थितियां आई थी पर दादा गुरूदेव की कृपा से मुझे समय-समय पर समाधान मिला है मेरे द्वारा शताब्दी महोत्सव में सभी आचार्य, भगवंत एवं साधु-साध्वी को एकमंच पर लाने का प्रयास किया गया, उसमें मुझे सफलता मिली, उसकी सभा भी जावरा दादावाडी में आचार्य हेमेन्द्रसूरीश्वरजी की निश्रा में हुई थी, हमारे श्रावकों का मन एक है, सभी श्रावक-श्राविका दादा गुरूदेव राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के प्रति निष्ठावान है, हमने सभी आचार्यों को विनती की थी सभी ने स्वीकार भी किया एवं हमने सामूहिक चातुर्मास भी श्री मोहनखेडा महातीर्थ में संवत्सरी प्रतिक्रमण के साथ किया, शताब्दी महोत्सव पूरे देश में विख्यात भी हुआ। जावरा की पाटगादी पर क्रियोद्धार दिवस का १५०वां वर्ष मनाने की मेरी बहुत भावना थी पर अनुकूल परिस्थितियां नहीं बन पाई, इस वजह से मैं नहीं आ पाया और हमने श्री मोहनखेडा महातीर्थ में १५०वें वर्ष पर दादा गुरूदेव को तपांजली अर्पित करने के उद्देश्य से ८०० से अधिक वर्षीतप की आराधना करवाकर दादा गुरूदेव को तपांजली अर्पित की, जिसमें हमारे मुनि भगवंत साध्वी वृन्द एवं समाज के श्रावक- श्राविकाओं ने वर्षीतप की आराधना की। मोक्ष प्राप्ति के लिए देव की जरूरत नहीं होती, मोक्ष प्राप्ति के लिए सामायिक प्रतिक्रमण ही अमृत क्रिया है। पाट गादी पर जावरा श्रीसंघ का बहुत योगदान है। आचार्य श्री ने घोषणा करते हुए कहा कि जावरा नगर में महिलाआें को पर्यूषण पर्व में प्रतिक्रमण करने में बहुत दिक्कत होती है इसके लिए जावरा श्रीसंघ बायो का उपाश्रय जब भी बनाएगा, उसमें श्री मोहनखेडा महातीर्थ की ओर से एक करोड़ आठ लाख रू. का सहयोग प्रदान किया जाएगा। वरिष्ठ साध्वी श्री संघवणश्रीजी म.सा. ने अपने संयम काल में खूब सेवा की है उन्हें उनको हमारे पूर्वाचार्यों ने सेवाभावी की पदवी से अलंकृत किया था, ने आज साध्वीश्री को शासन ज्योति पद से अलंकृत गया था, दादावाडी मंदिर को भी ५० वर्ष पूर्ण हो चुके हैं मेरी यह भावना है कि २०२३ तक इसका भी पूर्ण नवीनीकरण किया जाये। जावरा संघ एकता व भव्यता के लिए जाना जाता है, इस अवसर पर बांसवाडा, मंदसौर, इन्दौर, राजगढ, नागदा, नीमच, रतलाम, खाचरौद, झाबुआ, बदनावर, नागदा जं, बडनगर सहित ५० से अधिक श्रीसंघों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम में आचार्य श्री ऋषभचन्द्र सूरीश्वर म.सा. को प्रथम बार पाट पर विराजित होने के पश्चात् प्रथम गुरूचरण पूजा का लाभ जावरा निवासी मेघराजजी चम्पालालजी लोढा पूर्व राज्यसभा सांसद को प्राप्त हुआ। आचार्य श्री को सकल जैन श्रीसंघ जावरा की ओर से काम्बली ओढाई गई, तत्पश्चात् बांसवाडा निवासी चन्दूलाल दलीचंद सेठिया परिवार द्वारा काम्बली ओढाई गई। श्री आदिनाथ राजेन्द्र जैन श्वेताम्बर पेढी ट्रस्ट श्री मोहनखेडा तीर्थ की ओर से ट्रस्टी बाबुलाल खेमसरा, मेघराज जैन, संजय सर्राफ, आनंदीलाल अम्बोर, तीर्थ के प्रबंधक प्रितेश जैन आदि ने ट्रस्ट की ओर से काम्बली ओढाई। राजगढ श्रीसंघ से दिलीप भंडारी, नरेन्द्र भंडारी पार्षद, दिलीप नाहर, सुनील बाफना आदि ने आचार्यश्री को काम्बली ओढाई, इस अवसर पर जावरा श्रींसंघ अध्यक्ष ज्ञानचंद चोपड़ा, कोषाध्यक्ष विनोद बरमेचा, राजमल लुंक्कड, कन्हैयालाल संघवी, धर्मचन्द्र चपलोद, पदम नाहटा, कमल नाहटा, देवेन्द्र मूणोत, प्रकाश चौरडिया, प्रकाश संघवी व्ाâाकू, माणक चपलोद, भंवर आंचलिया, राजेश वरमेचा, राकेश पोखरना, सुभाष डुंगरवाल, अनिल चोपडा, पारस ओस्तवाल, अभय सुराणा, पुखराज कोचेट्टा, सुनील कोठारी, अनिल कोठारी, पवन पाटनी, पवन कलशधर, प्रदीप चैधरी, संजय तलेसरा, अनीस ओरा, विभोर जैन, अर्पित तलेसरा, महावीर चैरडिया, अंकित लुक्कड आदि उपस्थित थे।

श्री महाश्रमणजी

दक्षिण के काशी गिने जाने वाले श्रवणबेलगोला में श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य श्री महाश्रमणजी का अहिंसा यात्री के साथ भव्य स्वागत किया गया, इस अवसर पर श्रवणबेलगोला के प.पू. श्री चारूकिर्तीजी म.सा. ने भव्य स्वागत किया, पदयात्रा करते हुए आचार्य श्री जब अपने धवल सेना के साथ भव्य बाहुबली की प्रतिमा देखकर गदगद हो गये, इस अवसर पर दिगम्बर समाज के अनेक लोग उपस्थित थे, अपना लम्बा समय गुरूदेव ने यहां बिताया और खुले मन से सराहना की, गुरूदेव के पगलिया के कारण हजारों की संख्या में जो लोग उपस्थित थे, उनमें हर्षोल्लास दिखाई दे रहा था। विदित हो कि हजारों किलोमीटर दूर से पद्विहार करते हुए गुरूदेव महाश्रमण यहां पधारे थे।

श्री जाखोड़ा तीर्थ​

तीर्थाधिराज : श्री शान्तिनाथ भगवान, पद्मासनस्थ, प्रवालवर्ण, लगभग ३५ सेमी., श्वेताम्बर मंदिर।तीर्थस्थल : राजस्थान प्रांत के पाली मारवाड़ जिले में जवाई बांध रेल्वे स्टेशन से १० किमी, फालना से १८ किमी दूर है, सिरोही-साण्डेराव सड़क मार्ग पर शिवगंज से ९ किमी तथा सुमेरपुर से ७ किमी दूर जाखोड़ा गांव के पहाड़ी की ओट में यह तीर्थ स्थित है।प्राचीनता : ऐसा कहा जाता है कि इस प्रभु प्रतिमा की अंजनशलाका आचार्य श्री मानतुंग सूरीश्वरजी के सुहस्ते हुई थी, विक्रम की पन्द्रहवीं शताब्दी में श्री मेघ कवि द्वारा रचित तीर्थमाला में इस तीर्थ का वर्णन है, प्रतिमाजी के परिकर पर वि.सं. १५०४ का लेख उत्कीर्ण है, इसके अनुसार सं. १५०४ में श्री यक्षपुरी नगर में तपागच्छीय श्री सोमसुन्दरजी के शिष्य श्री जयचन्द्रसूरिजी ने मूलनायक श्री पार्श्वनाथ प्रभु की मूर्ति के परिकर की प्रतिष्ठा की, लेकिन इस परिकर के बारे में यह मान्यता है कि किसी अन्य मंदिर से श्री पार्श्वनाथ प्रभु का यह परिकर लाकर यहां लगाया गया है, प्रभु दर्शन मात्र से पांचों इन्द्रियों के विषय प्रतिकूल से अनुकूल बन जाये, मनोहर मुख मण्डल ने जैसे जन्म जन्म के दु:ख हर लिये हो, ऐसे शान्तिनाथ प्रभु की कलात्मक परिकर युक्‍त प्रतिमा, चन्द्र से शीतल, सूर्य से तेजस्वी अहर्निश उदयांकर है।विशिष्टता : यह तीर्थ प्राचीन होने के साथ साथ चमत्कारिक क्षेत्र भी है, यहां पर पानी की बड़ी भारी विकट समस्या थी, पथरीली भूमि-में पानी मिलने की संभावना भी नहीं थी, एक दिन अधिष्ठायक देव ने कोलीवाड़ा के चान्दाजी को स्वप्न में मंदिर के निकट पानी होने का संकेत दिया, तदनुसार खुदवाने पर विपुल मात्रा में मीठा व स्वास्थ्यवर्धक पानी प्राप्त हुआ, जैन-जैनेतर और भी अनेक तरह के चमत्कारों का वर्णन करते हैं, यहां प्रतिवर्ष माघ शुक्ला पंचमी को ध्वजा तथा कार्तिक पूर्णिमा व चैत्री पूर्णिमा को मेले का आयोजन होता है तब हजारों यात्री दर्शनार्थ आते हैं।अन्य मन्दिर : वर्तमान में इसके अतिरिक्त एक श्री आदिनाथ प्रभु का मंदिर भी है।कला व सौन्दर्य : प्रभु प्रतिमा की कला आकर्षक एवं दर्शनीय है।सुविधाएं : तीर्थ पर ठहरने के लिये प्राचीन शैली की विशाल धर्मशाला है तथा भोजनशाला की सुविधा उपलब्ध है।ती

पार्श्व तीर्थ नगपुरा

छत्तीसगढ़ राज्य के दुर्ग जिला में जैन धर्मावलम्बियों का विश्व प्रसिद्ध श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ असंख्य श्रद्धालुओं के आस्था का केन्द्र है, यहाँ मूलनायक तीर्थपति २३ वें तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ प्रभु प्रतिष्ठित हैं। भूगर्भ से प्राप्त करीब २७५० वर्ष प्राचीन श्री उवसग्गहरं पार्श्व प्रभु की प्रतिमा अत्यंत ही मनोहारी है, एक सौ आठ पार्श्वनाथ यात्रा क्रम में यह तीर्थ पूज्यनीय एवं वंदनीय है। लगभग ४०-४५ वर्ष पूर्व दुर्ग के वरिष्ठ पत्रकार श्री रावलमल जैन ‘मीण’ के संयोजन में इस तीर्थ की संरचना एवं विकास का कार्य शुरू हुआ। देशभर के लाखों श्रद्धालुओं के सहयोग से बहुत ही कम समय में तीर्थ संकुल विशाल श्री उवसग्गहरं पार्श्व जिनालय सहित ९ शिखर युक्त भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। सन् १९९५ में माघसुद ६ (षष्ठी) ५ फरवरी को तीर्थोंद्धार-जीर्णोद्धार मार्गदर्शक तीर्थ प्रतिष्ठाचार्य प.पू. आचार्य भगवंत श्रीमद्विजय राजयश सूरीश्वरजी म.सा. के वरद हस्ते इस तीर्थ की प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई, इस तीर्थ में प्रतिष्ठित लोटस टेम्पल, तीर्थंकर उद्यान, शाश्वत जिन मंदिर, मेरुपर्वत, श्री मणिभद्रवीर जी मंदिर, पद्मावती देवीजी मंदिर, चरित्र गुरुमंदिर, दादावाडी में प्रतिमाएं तीर्थ भक्तों की यात्रा में सहायक बनते हैं। प्रवास में आने वाले तीर्थ यात्रियों के लिए आवास हेतु सर्वसुविधायुक्त अतिथिगृह, सात्विकता से भरपूर भोजनशाला है। यहाँ देशभर से लाखों श्रद्धालु यात्रार्थ पधारते हैं। मूलनायक श्री उवसग्गहरं पार्श्व प्रभु की आभामंडल की प्रतिमा १०० मीटर दूरी तक प्रभावित करता है जो अन्यत्र कहीं नहीं है। तीर्थ में प्रतिदिन सुबह १०८ वासक्षेप पूजा, वर्धमान शक्रस्तव से महाभिषेक होता है, वर्ष में माघ सुद ५,६ को प्रतिष्ठा सालगिरह (ध्वजारोहण) तथा पोस बदी ९, १०, ११ को श्री पार्श्व प्रभु जन्म-दीक्षा कल्याणक महोत्सव का आयोजन होता है। परिसर में वर्धमान गुरूकूल एवं प्राकृतिक चिकित्सा की व्यवस्था है

आचार्य महाश्रमण

जिसमें आसमान को छूने का जज्बा होता है, जमीन भी उसकी हो जाती है, वस्तुत: जो व्यक्ति कुछ होने की तमन्ना रखता है, कुछ कर गुजरने का हौसला रखता है, वह एक दिन अवश्य ही अपने भाग्य, बुद्धि और परिश्रम के बलबुते पर जनमानस के मानचित्र पर सफल व्यक्तित्व के रूप में उभर जाता है। विलक्षण कर्त्तृत्व और विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी आचार्य महाश्रमण का जन्म वि.सं. २०१९ वैशाख शुक्ला ९ (१३ मई १९६२) रविवार को सरदाशहर में हुआ।सरदारशहर राजस्थान का एक प्रमुख क्षेत्र है। गांधी विद्या मंदिर की स्थापना के बाद यह नगर राजस्थान के शैक्षणिक मानचित्र पर उभरकर आ गया, यहां अनेक आकर्षक दर्शनीय स्थल हैं। सरदारशहर तेरापंथ धर्मसंघ के अनेक ऐतिहासिक प्रसंगों का केन्द्र-बिन्दु रहा है, यहां की आबादी एक लाख से भी ज्यादा है।पारिवारिक पृष्ठभूमि : सरदारशहर में दूगड़ जाति के परिवार सबसे अधिक है, अनेक गांवों से आकर यहां बसने वाले दूगड़ परिवारों में एक परिवार है श्रीमान झूमरमलजी दूगड़ का, उनके पूर्वज ‘मेहरी’ गांव से आकर बसे थे इसलिए वे मेहरी वाले ‘दूगड़’ कहलाने लगे। श्री झूमरमलजी दूगड़ के दस सन्तानें हुई-सात पुत्र और तीन पुत्रियां, उस समय ‘माता’ (चेचक) एक असाध्य बीमारी थी, उस लाइलाज बीमारी से ग्रस्त एक पुत्र और एक पुत्री का अल्पवय में ही स्वर्गवास हो गया। श्री झूमरमलजी जोरहाट (असम) में रहते थे, उनका हार्डवेयर का व्यवसाय था, वे सहज, सरल, शांत स्वभावी और ईमानदार व्यक्ति थे। पन्द्रह-बीस मिनट तक नमस्कार-महामंत्र का जप करना उनका नित्यक्रम था। मानव जीवन की मूल्यवत्ता को समझने वाली और उसे निपुणता से जीने वाली श्रीमती नेमादेवी दूगड़ विवेक-सम्पन्न, व्यवहार-कुशल और समझदार महिला थी, वे अपने दायित्व के प्रति पूर्ण जागरूक थी। संघ और संघपति के प्रति उनमें गहरी श्रद्धा थी, उनका भाषा-विवेक गजब का था। जीवन के सन्ध्याकाल में उनको पक्षाघात हो गया, उस समय अनेक लोग उनसे मिलने आते, एक दिन एक भाई ने पूछा-‘माजी! आपको तो बहुत गर्व होता होगा कि मेरा बेटा युवाचार्य है।’ उन्होंने तत्काल कहा- ‘मैं इस बात का गर्व नहीं करती कि बेटा युवाचार्य है पर मुझे इस बात का गौरव अवश्य है कि बेटासंघ की सेवा कर रहा है।’ बातें बचपन की : मोहन बचपन से ही प्रतिभा सम्पन्न था, उसमें गहरी सूझबूझ ग्रहणशीलता और प्रशासनिक योग्यता प्रारंभ से ही थी, उसने जैसे ही अपनी उम्र के पांच वर्ष संपन्न किए, राजेन्द्र विद्यालय में प्रवेश किया। लगभग साढ़े पांच वर्ष तक इसी स्कूल में अध्ययन किया, उस समय स्कूल के प्रधानाध्यापक श्री रेवतमलजी भाटी थे। मोहन ने स्कूल जाने से पहले ही वर्णमाला और कुछ पहाड़े सीख लिए थे। तीसरी, चौथी और पांचवीं कक्षा में वह कक्षा-प्रतिनिधि (मोनिटर) के रूप में निर्वाचित हुआ, तीनों कक्षाओं में गणित और सामान्य विज्ञान में विशेष योग्यता प्राप्त की और कक्षा तीसरी और पाचवीं में प्रथम स्थान भी प्राप्त किया। तीसरी कक्षा में खेलकूद/सांस्कृतिक प्रतियोगिता के अंतर्गत उपस्थिति में भी प्रथम स्थान प्राप्त किया, अनेक धार्मिक व अन्य प्रतियोगिताओं में भी वह प्राय: प्रथम रहता, मोहन अपनी कक्षा के दो-तीन मेधावी छात्रों में से एक था, वह अध्ययन में होशियार था तो लड़ाई-झगड़े में भी कम नहीं था, मोहन बचपन से बहुत चंचल था। घर में अनेक बच्चे थे। भाई-भतीजों के साथ लड़ाई-झगड़ा चलता रहता। छुट्टियों के दिनों में तो उसका अधिकांश समय खेलकूद में ही व्यतीत होता। कभी-कभी जब माँ परेशान होकर बच्चों को पकड़ने के लिए उठती तक मोहन का छोटा भाई तो घर से बाहर दौड़ जाता और मोहन पकड़ा जाता। मां जैसे ही चपत लगाने लगती, मोहन कहता- ‘माँ! आपके ही हाथों में लगेगी।’ यह सुनते ही माँ का हाथ वहीं रूक जाता और वह मार खाने से बच जाता। मोहन की खेलने में भी अच्छी रूचि थी। कबड्डी, कांच के गोले, सतोलिया, छुपाछुपी आदि उसके प्रिय खेल थे। खेलकुद प्रतियोगिताओं में वह प्राय:भाग लेता था। मन बदल गया : एक बार श्री झूमलजी जोरहाट से गोदरेज कम्पनी के आठ-दस ताले लेकर आए। मोहन को वे ताले अच्छे लगे, उसने उनमें से दो ताले चुरा लिए, फिर सोचा, अभी इनका उपयोग करूंगा तो पकड़ा जाऊँगा और मुझे डांट भी पड़ेगी, जब मैं थोड़ा बड़ा हो जाऊँगा तब इन तालों को काम में लूंगा, अपनी ताखी (दिवार में स्थित छोटी अलमारी) को लगाऊँगा। वह तालों को छुपाने के लिए घर के पिछवाड़े में गया, जहां बाखल (मिट्टी युक्त खुली जगह) थी। मोहन ने वहां एक गढ्ढा खोदा और उसमें उन दोनों तालों को रखकर ऊपर मिट्टी डाल दी।कुछ देर बाद मां ने देखा कि दो ताले कम कैसे हो गए? वह इधर-उधर ताले खोजने लगी। मां को इस प्रकार खोजते देखकर मोहन का मन बदल गया, उसने सोचा-ताले चुराकर मैंने अच्छा नहीं किया, वह तत्काल मां के पास गया और पूछा- ‘माँ! क्या खोज रही हो?’माँ- ‘मोहन! अभी तुम्हारे पिताजी कुछ ताले लेकर आए थे, उसमें से दो ताले नहीं मिल रहे हैं, उन्हीं को खोज रही हूं।’मोहन -‘माँ! मैं भी खोजता हूं, शायद कहीं मिल जाएं।’यों कहकर मोहन सीधा बाखल में गया, उस गढ्ढे की मिट्टी को हटाया और दोनों ताले लाकर माँ को दिखाते हुए पूछा- ‘माँ! क्या ये ही ताले हैं?’मां- ‘हां मोहन! ये ही हैं।’ इस प्रकार मोहन खोजी सिद्ध हो गया। सत्य साबित हुई : मोहन के जन्म के दो-तीन साल बाद ही पिता श्री झूमरमलजी अस्वस्थ हो गए, उनकी किडनी एवं लीवर ठीक से कार्य नहीं कर रही थी, वे मधुमेह रोग से भी आक्रान्त थे, उनके पेट में पानी भर जाता और पैरों में सूजन आ जाती। चिकित्सा के लिए उन्हें रतनगढ़ ले जाया गया। मोहन भी साथ था, उसने एक दिन भोजन करते हुए सहजभाव से कहा- ‘माँ! पिताजी का कितना ही इलाज करा लो, ठीक तो होंगे नहीं।’मां ने डांटते हुए कहा- ‘मोहन! ऐसी अशुभ बात क्यों बोलता है?’आखिर मोहन की बात सत्य साबित हो गई। कुछ दिनों बाद झूमरमलजी का स्वर्गवास हो गया, उस समय मोहन मात्र सात वर्ष का था। इक्यावन वर्ष की अवस्था में ही झूमरमलजी का चले जाना परिवार के लिए एक अपूरणीय क्षति थी किन्तु मां और बड़े भाई ने सुजानमलजी ने बड़े साहस और धैर्य के साथ पिता के रिक्त स्थान को भरने का प्रयास किया। ऐसे बढ़ा आकर्षण : दूगड़ परिवार का पुरूष वर्ग-साधु-साध्वियों से सम्पर्क बहुत कम रखता था। पर्व दिनों में या जब पूज्यप्रवर का प्रवास सरदारशहर में होता तो कभी-कभी दर्शन करने जाया करता था, किन्तु परिवार में सात्त्विकता, शालीनता और संस्कार-संपन्नता बरकरार थी, इस परिवार के महिला-वर्ग में साधु-साध्वियों के प्रति आकर्षण था। व्याख्यान सुनना और दर्शन-उपासना करना उनका प्राय: नियमित क्रम था।माँ व्याख्यान सुनकर घर लौटती तब तक तो शिकायतों का अंबार-सा लग जाता। मां की अनुपस्थिति में घर में शांति रह सके इसलिए वे बच्चों से कहती- ‘तुम सब मेरे साथ सन्तों के स्थान पर चला करो।’ संतों के पास जाने का नाम सुनते ही सब इधर-उधर दौड़ जाते, एक दिन परेशान होकर मां ने कहा- ‘मोहन! तुम मेरे साथ व्याख्यान सुनने चला करो।’ मोहन चपल तो था पर आज्ञाकारी भी था। वह मां के साथ साधुओं के स्थान पर पहुंचा, उन दिनों सरदारशहर में मुनिश्री दुलीचन्दजी ‘दिनकर’ का प्रवास था, उनके साथ मुनिश्री पानमलजी (गंगाशहर) थे, जो बच्चों को कहानियां सुनाया करते थे। माँ ने मोहन को मुनिश्री पानमलजी के पास बिठाया और स्वयं व्याख्यान सुनने चली गई। मोहन को कहानियों में रस आने लगा, अब वह हमेशा अपनी इच्छा से मां के साथ सन्तों के पास आने लगा। बस, यहीं से मोहन का साधु-साध्वियों के पास जाने का क्रम शुरू हो गया। घर का आकर्षण धीरे-धीरे कम होने लगा और सन्तों के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा, अब तक जो आनन्द खेलकूद और लड़ाई-झगड़े में आता था, अब वह सन्तों की उपासना करने और उनसे कुछ सीखने में आने लगा।तेरापंथ दर्शन मनीषी मंत्री मुनिश्री सुमेरमलजी (लाडनूं) का विक्रम संवत २०३०-३१ का चतुर्मास सरदारशहर में हुआ। मुनिश्री तेरापंथ इतिहास के अच्छे ज्ञाता हैं, उनका तत्त्वज्ञान पर अच्छा अधिकार है, उन्होंने ज्योतिषविद्या में भी दक्षता प्राप्त की थी, उनका व्याख्यान कर्णप्रिय और ज्ञानवर्धक होता था, मुनिश्री सुमेरमलजी का सरदारशहर प्रवास मोहन के लिए वरदान सिद्ध हुआ, उसका अधिकांश समय सन्तों के स्थान पर ही व्यतीत होने लगा।सफलता का द्वार : जो व्यक्ति समय के मूल्य को पहचानता है और समय पर अपना कार्य करता है, सफलता उसके द्वार पर दस्तक देती है। यद्यपि मोहन ने समय-प्रबन्धन का कभी प्रशिक्षण नहीं लिया, फिर भी वह योजनाबद्ध तरीके से अपना कार्य करता था, उसने अपनी दिनचर्या निर्धारित कर ली, उस दिनचर्या का अतिक्रमण उसे बिलकुल पसन्द नहीं था, कदाचित् किसी कारणवश एक मिनट भी दिनचर्या सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पहले शुरू होती और प्रहर रात्रि बीतने के बाद संपन्न होती। दिनरात के चौदह-पन्द्रह घंटे या कुछ कम/अधिक समय उसके सेवा, स्वाध्याय, अध्ययन, कंठस्थ आदि में बीत जाते।उसकी दिनचर्या की एक तालिका कुछ इस प्रकार है- शयन-प्रहर रात्रि के बाद : मुनिश्री सुमेरमलजी के साथ मुनिश्री सोहनलालजी (चाड़वास), मुनिश्री पूनमचंदजी (श्रीडूंगरगढ़), मुनिश्री रोशनलालजी (सरदारशहर) थे। मोहन मुनिश्री सोहनलालजी के निर्देशन में अध्ययनरत रहा। विद्यार्थियों को सिखाने-पढ़ाने में मुनिश्री सोहनलालजी की कला बेजोड़ थी, वे केवल सिखाते ही नहीं थे, वैराग्य के संस्कार भी देते थे, वे हमारे धर्मसंघ के एक श्रेष्ठ कलाकार, स्वाध्यायशील और आचारनिष्ठ सन्त थे, उन्होंने मोहन को तत्त्वज्ञान के अनेक थोकड़े कंठस्थ करा दिए, जैसे-पचीस बोल, तेरहद्वार, बासठिया, बावन-बोल, गतागत, पाना की चर्चा, लघुदण्डक तथा थोकड़ों में अन्तिम थोकड़ा माना जाने वाला ‘गमा’ भी कंठस्थ करा दिया, उन्होंने आचार्य भिक्षु के ‘दान-दया’ के सिद्धांत से भी मोहन को अवगत कराया। मोहन घंटोंघंटों तक मुनिश्री सोहनलालजी के पास अध्ययन करता, कंठस्थ ज्ञान का पुनरावर्तन करता और तात्त्विक चर्चा करता। मोहन का उनके प्रति लगाव जैसा हो गया, जब कभी वे अस्वस्थ हो जाते तो मोहन का किसी भी कार्य में मन नहीं लगता और तो क्या, भोजन करने में भी मन नहीं लगता, जब वह खाना खाने घर आता तब मां से कहता- ‘मां! आज जल्दी खाना डाल दो, मुझे अभी वापस जाना है, आज हमारे ‘बापजी’ ठीक नहीं है।’मुनिश्री रोशनलालजी वैरागियों के परिवार वालों से संपर्क करने तथा वैरागियों की देखभाल रखने में बड़े दक्ष थे, मोहन उनके संपर्क में भी बहुत रहा, वे गोचरी के लिए पधारते तब मोहन प्राय: उनके साथ रहता, रास्ते में सेवा करता।मुनिजन मोहन को यदा-कदा दीक्षा लेने के लिए प्रेरित करते रहते। मुनिश्री सुमेरमलजी ने भी मोहन को कई बार दीक्षा लेने के लिए कहा पर मोहन हमेशा एक अच्छा श्रावक की बात कहता रहा।जल उठा दीप : वि.सं. २०३० भाद्रव शुक्ला षष्ठी। अष्टमाचार्य पूज्य कालूगणी का महाप्रयाण दिवस। मुनिश्री सुमेरमलजी ने कहा –‘मोहन! आज तुम्हें एक निर्णय कर लेना चाहिए कि गृहस्थ जीवन में रहना है या साधु बनना है।’ मुनिश्री के निर्देशानुसार मोहन गधैयाजी के नोहरे में एकान्त स्थान में जाकर बैठ गया। सर्वप्रथम पूज्य कालूगणी की माला फेरी, फिर चिन्तन करने लगा – ‘मेरे सामने दो मार्ग हैं – एक साधुत्व का और दूसरा गृहस्थ का।साधु मार्ग में सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास, केशलुंचन, पादविहार आदि स्थिति-जनित कष्ट हो सकते हैं। दूसरी ओर गृहस्थ जीवन में भी अनेक प्रकार की चिन्ताएं आदमी को सताती रहती हैं, जैसे- व्यापार में घाटा लग जाना, सन्तान का अनुकूल न होना, पति-पत्नी में से किसी एक का छोटी अवस्था में चले जाना, अन्य अनेक पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाना आदि, जब दोनों ओर कष्ट हैं तो मुझे कौन सा मार्ग स्वीकार करना चाहिए?तभी दिमाग में एक बात बिजली-सी कौंध गई कि कष्ट तो दोनों तरफ हैं, जहां साधु जीवन के कष्ट मुझे मोक्ष की ओर ले जाने वाले होंगे, वहीं गृहस्थ-जीवन के कष्ट मुझे अधोगति की ओर ले जा सकते हैं, यदि मैं जागरूकतापूर्वक संयम का पालन करुंगा तो मुझे पन्द्रह भवों में मुक्ति मिल जाएगी।’ बस, भीतर में जल उठे इस चिन्तन के दीप ने मोहन को साधु बनने के लिए कृतसंकल्प बना दिया, उसने वहीं बैठे-बैठे जीवन-पर्यन्त शादी करने का त्याग कर दिया।आज्ञा प्राप्ति के प्रयत्न : मनुष्य के जीवन में ज्वारभाटे जैसा उतार-चढ़ाव आता रहता है जो व्यक्ति ज्वार को पकड़ लेता है, वह सौभाग्य की ड्योढी पर पहुंच जाता है और जो चूक जाता है, वह भाटे के दलदल में फंस जाता है। मोहन ने अपने भीतर उठते ज्वार को पकड़ा और सौभाग्य की ड्योढी पर पहुंच गया। मोहन के जीवन का वह एक Turning Point था, उसने भावुकता में बहकर कोई निर्णय नहीं किया। बहुत चिन्तन-मनन के बाद उसने अपने जीवन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निर्णय किया कि मुझे ‘साधु’ बनना है। तेरापंथ की दीक्षा मात्र स्वयं की इच्छा से ही नहीं हो सकती, परिवार की स्वीकृति भी अनिवार्य होती है। मोहन ने स्वीकृति-प्राप्ति के लिए प्रयास प्रारंभ किया। पिताश्री झूमरमलजी दूगड़ का तो स्वर्गवास हो चुका था। मोहन ने मां से कहा- ‘मां! मुझे दीक्षा लेनी है इसलिए आपकी आज्ञा चाहिए।’ मां ने कहा- ‘मोहन! मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगी, सुजानमल जो कहेगा वही होगा।’उस समय श्री सुजानमलजी दूगड़ परिवार के मुखिया एवं संरक्षक थे, वे एक समझदार, निर्णयक्षम और प्रामाणिकतानिष्ठ व्यक्ति हैं। परिवार में उनका अच्छा अनुशासन है, उस समय सुजानमलजी जोरहाट गए हुए थे, मोहन ने उनके नाम एक लम्बा-चौड़ा पत्र लिखा, जिसमें दीक्षा के लिए अनुमति मांगी गई। सुजानमलजी ने प्रत्युत्तर में लिखा – ‘दिक्षा के बारे में मैं अभी कुछ नहीं कह सकता, सरदारशहर आने पर ही बात हो सकेगी।’ मार्गशीर्ष महीने में वे सरदारशहर आए। घर में दीक्षा के संदर्भ में बात हुई, तब सुजानमलजी ने साफ इनकार कर दिया, जब मोहन को स्वीकृति नहीं मिली तो उसने अनुमति नहीं मिलने तक तीव्र द्रव्य से अधिक खाने का त्याग कर दिया, यह क्रम कई दिनों तक चला किन्तु आज्ञा नहीं मिली, तब एक दिन मोहन ने साहस बटोरकर कहा – ‘भाईजी! यदि आप मुझे दीक्षा के लिए स्वीकृति नहीं देंगे तो मैं आपके घर में नहीं रहूंगा।’सुजानमलजी – ‘घर से बाहर जाने पर भी तुम्हें दीक्षा तो मिलेगी नहीं।’मोहन – ‘कोई बात नहीं।’सुजानमलजी – ‘फिर तू खाना कहां खाएगा?’मोहन – ‘मैं घरों से मांग-मांगकर भोजन कर लूंगा किन्तु आपके घर में नहीं रहूंगा।’ यह कहकर मोहन घर से चला गया, उसके जाने के बाद माँ ने कहा- ‘सुजान! कहीं भावावेश में आकर मोहन कोई गलत काम कर लेगा तो हमेशा के लिए हमारी आंखों से ओझल हो जाएगा, इससे तो अच्छा है कि तुम उसे दीक्षा की आज्ञा दे दो ताकि वह हमारी आंखों के सामने तो रहेगा।’ विनीत पुत्र ने मां की आज्ञा को शिरोधार्य किया, जब सायंकाल सूर्यास्त से कुछ समय पहले मोहन अपनी पुस्तकें, आसन आदि लेने के लिए घर आया तब मां ने कहा – ‘मोहन! ऐसा करने से दीक्षा की आज्ञा नहीं मिलेगी, पहले खाना खा लो फिर भाईजी से अच्छी तरह बात कर लेना।’ मोहन ने भी मां की आज्ञा को शिरोधार्य किया। खाना खाने के बाद भाईजी से बातचीत की। भाईजी ने कहा -‘आषाढ़ महीने के बाद जब तुम्हारी इच्छा हो, मैं दीक्षा दिलाने के लिए तैयार हूं।’ मोहन को आज्ञा मिल गई। मां की आज्ञा तो भाईजी की अनुमति में ही निहित थी, उस दिन मोहन की प्रसन्नता का कोई पार नहीं था, वह तत्काल मुनिश्री के पास गया और सारी बात निवेदित की, उन दिनों मोहन ने पूज्य गुरूदेव तुलसी को एक पत्र लिखा, वह अविकल रूप में इस प्रकार हैपरमपूज्य परमपिता मेरे ह्रदयदेव युगप्रधान आचार्यश्री तुलसी के चरणों में कोटि-कोटि वन्दना।गुरूदेव! पहली म्हारा भाईजी दीक्षा लेणै वास्तै मनै स्वीकृति कोनी दी, अब आपकी कृपा तथा सन्तां की प्रेरणा स्यूं मां और भाईजी कुछ महीना ठहरकर दीक्षा लेणै की स्वीकृति दे दी है। गुरूदेव! मैं आपकी कृपा स्यूं तथा मुनिश्री सोहनलालजी की कृपा तथा मेहनत स्यूं इण चौमासै में कई थोकड़ा सीख्या हूं, जिकामें-पाना कर चरचा, तेरहद्वार, लघुदण्डक, गतागत, बावनबोल, बासठियो, अल्पाबोहत, विचारबोध, जैन तत्त्व प्रदेश (प्रथम भाग), कर्म प्रकृति पहली सीखी हूं।गुरूदेव! आपकै श्री चरणां में म्हारी आ ही प्रार्थना है कि बीच का चार-पांच महीना ८की म्हारै अन्तराय है, आ पूरी हुंता ही गुरूदेव मनै जल्दी स्यूं जल्दी दीक्षा दिरासी। आपका सुविनीत शिष्य मोहनप्रसंगोपात्त एक दिन : मुनिश्री सुमेरमलजी ने दीक्षा का मुहूर्त देखा और वैशाख महीना श्रेष्ठ बताया, किन्तु भाईजी की स्वीकृति तो आषाढ़ महीने के बाद के लिए प्राप्त थी। मुनिश्री ने उनसे कहा- आपको दीक्षा तो देनी ही है फिर आषाढ़ के बाद दें या वैशाख में दें, क्या फर्क पड़ेगा? मात्र दो-तीन महीनों के लिए अच्छे मुहूर्त को क्यों टाला जाए? तब सुजानमलजी ने कहा – ‘गुरूदेव और आप जब उचित समझें, इसको दीक्षा दे सकते हैं, मेरी ओर से स्वीकृति है।’मोहन के साथ हीरालाल बैद, बजरंग बरड़िया और तेजकरण दूगड़ भी वैरागी थे। मोहनलाल और हीरालाल को तो परिवार की ओर से अनुमति मिल गई किन्तु बजरंग और तेजकरण को पारिवारिक स्वीकृति नहीं मिली, वे साधु तो नहीं बने किन्तु आज वे अच्छे श्रावक अवश्य हैं।मोहन का परीक्षण किया गया, वह हर परीक्षा में स्वर्ण की भांति खरा उतरा, उस समय गुरूदेव तुलसी का प्रवास अणुव्रत-भवन, दिल्ली में था। मर्यादामहोत्सव का अवसर था, मोहन अपने परिवार के साथ गुरूदर्शन के लिए दिल्ली पहुंचा। वि.सं. २०३० माघ शुक्ला अष्टमी को प्रवचन के समय उसने एक वक्तव्य दिया, वह इस प्रकार है- अपनी बात : ‘परमाराध्य प्रात: स्मरणीय ह्रदयसम्राट युगप्रधान आचार्यश्री के श्रीचरणों में कोटी-कोटी वन्दना! उपस्थित साधु-साध्वीवृंद! बुजुर्गों! माताओं!आप लोग सोच रहे होंगे यह बच्चा क्यों खड़ा हुआ है? क्या कहने जा रहा है और क्या चाहता है? मेरी चाह भौतिक नहीं, आध्यात्मिक है। मेरा कथन उपदेश नहीं, निवेदन है। प्रार्थना है वह भी किसी भौतिक वस्तु के लिए नहीं, चारित्र के लिए है। साधु बनने की आकांक्षा मन में लेकर ही मैं आज यहां खड़ा हुआ हूं। आप लोग सोच रहे होंगे कि यह बच्चा है, यह साधुत्व को क्या समझेगा? जब मैं ऐसी बात किसी से सुनता हूं तो मुझे उसकी बुद्धि पर तरस आता है, ह्रदय करूणा से भर जाता है। सोचता हूं इन लोगों ने धर्म को समझा या नहीं, आत्मा को जाना या नहीं। अगर जाना है तो केवल मेरे शरीर से ही मेरा अंकन क्यों करते हैं? साधुत्व आत्मा की वस्तु है या शरीर की? याद रखें, धर्म आत्मा की वस्तु है, क्या मेरी आत्मा आपसे छोटी है? क्या कोई आत्मवादी ऐसा कह सकता है? शरीर से ही जो व्यक्ति छोटे-बड़े का अंकन करते हैं वे केवल हाड़-मांस और चमड़ी देखने वाले हैं।एक कहानी मुझे याद आती है, जो मैंने सन्तों से ही सुनी थी। अष्टावक्रजी को आत्मचर्या के लिए राज्यसभा से निमंत्रण मिला। निश्चित समय पर अष्टावक्रजी राज्यसभा में पहुंचे, सभाभवन पण्डितों से भरा हुआ था, ज्योंही अष्टावक्रजी ने सभाभवन में प्रवेश किया, पण्डित लोग उनके शरीर को देखकर खिलखिलाकर हंस पड़े। आठ जगह से उनका शरीर टेढ़ा-मेढ़ा था। सारा भवन हंसी से गूंज उठा। अष्टावक्रजी ने राजा से कहा- ‘राजन्! यहां पण्डित कौन है? ये सब तो चमार ही चमार हैं, किससे चर्चा करुं?’ विस्मितमना राजा ने कहा -‘अष्टावक्र! ऐसे कैसे बोल रहे हो? सब सामने पण्डित ही पण्डित बैठे हैं।’अष्टावक्र- ‘पण्डित कहां है राजन्! पण्डित लोग आत्म चर्चा में लीन रहते हैं और चमार लोग चमड़ी तथा हड्डियों की परिक्षा में लीन रहते हैं, ये सब मेरे शरीर को देखकर हंस रहे हैं इसलिए पंडित कहां हैं? हंसने वाले पण्डितों पर चपत-सी लग गई।अब आपसे ही पूछूं -‘जो मेरे को छोटा बतलाते हैं, उन्हें क्या कहूं? आप सोचते होंगे, यह साधुत्व के नियम कैसे निभाएगा? अतिमुक्तक मुनि ने कैसे निभाया था? गजसुकुमाल मुनि ने कैसे कष्ट सहे? परीषह आत्मबल से ही सहा जाता है।’ अस्तु, पूज्य गुरूदेव! मेरी ओर ध्यान दें, इस बच्चे का भविष्य आपकी दृष्टिपर निर्भर है, कृपा करके प्रतिक्रमण सीखने का आदेश तो अभी फरमाएं।प्रवचन के दौरान पूज्य गुरूदेव ने मोहन से ऐसे प्रश्न पूछे- ‘बोलो वैरागीजी!आश्रव किसे कहते हैं?’ प्रवचन-संपन्नता के बाद गुरूदेव अणुव्रत-भवन में ऊपर पधार रहे थे, प्रथम मंजिल की सीढ़ियों के बीच पूज्यप्रवर कुछ क्षण रूके और वहीं मोहन को प्रतिक्रमण सीखने का आदेश फरमा दिया। मोहन का रोम-रोम खिल उठा, वह अपने परिवार के साथ पुन: सरदारशहर आ गया। परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञ के महाप्रयाण के साथ धर्मसंघ का सर्वोच्च नेतृत्व स्वाभाविक रूप से मेरे में समाविष्ट हो गया, आज दीक्षा दिल्ली में या सरदारशहर में :प्रतिक्रमण आदेश के बाद पूज्यप्रवर ने चिन्तन किया कि दीक्षा कहां हो, दिल्ली में या सरदारशहर में? उन दिनों ट्रेनों की हड़ताल चल रही थी और मोहन की अवस्था भी छोटी थी। मात्र बारह वर्ष के बालक की दीक्षा दिल्ली शहर में होना आलोचना का विषय बन सकता था। मोहन के परिवार की भी यही इच्छा थी कि दीक्षा सरदारशहर में ही हो, इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए आचार्यवर ने फरमाया – ‘मोहनलाल और हीरालालकी दीक्षा वि.सं. २०३१ वैशाख शुक्ला चतुर्दशी को सरदारशहर में ही शिष्य मुनि सुमेर (लाडनूं) के सानिध्य में हो सकेगी।दीक्षा-तिथि की घोषणा के बाद घर में मोहन का विशेष ध्यान रखा जाता, उसकी इच्छापूर्ति का प्रयास किया जाता। मोहन की मौसी श्रीमती झूमादेवी नखत कोलकाता में रहती थी, वह मोहन के लिए घड़ी लेकर आई। मोहन को घड़ी का बहुत शौक था, वह अपने हाथ पर घड़ी बांधकर सबको बार-बार दिखाता, उस समय तक बच्चों के हाथ पर घड़ी बंधी हुई बहुत कम देखने को मिलती थी। दीक्षा के बाद भी कई दिनों तक घड़ी देखने के लिए मोहन अपने हाथ को देखता, फिर याद आता कि अब मैं साधु बन गया हूँ।सौभाग्य की सौगात : वि.सं. २०३१ वैशाख शुक्ला चतुवर्दशी (५ मई १९७४) का सुप्रभात मोहन के लिए सौभाग्य की सौगात लेकर आया, वह प्रात: लगभग चार बजे ही मुनिश्री के पास पहुंच गया। मुनिश्री ने फरमाया- ‘मोहन! आज इतनी जल्दी आ गया?’ मोहन ने कहा – ‘मुनिप्रवर! आज तो मेरे लिए सोने का सूरज उगा है, मैं बहुत सौभाग्यशाली हूं कि आज मुझे आपके करकमलों से दीक्षित होने का सुअवसर मिलेगा।’गधैयाजी का नोहरा! हजारों लोगों की उपस्थिति। लम्बे व भव्य जूलूस के साथ दोनों वैरागी श्री समवसरण में पहुंचे, अनेक लोगों ने उनके भावी जीवन के प्रति मंगल भावनाएं व्यक्त कीं।मोहन के ज्येष्ठ भ्राता अमरचन्दजी दूगड़ ने आज्ञा पत्र का वाचन किया। मोहन ने भी छोटा-सा वक्तव्य दिया। कार्यक्रम के दौरान गुरूदेव तुलसी द्वारा प्रदत्त संदेश का वाचन किया गया, उसका कुछ अंश इस प्रकार है- ‘जैन मुनि की चर्या कठिन है, यह बात सही है। तेरापंथी जैन मुनियों की चर्या और अधिक कठिन है, इस चर्या में पांच महाव्रतों की स्वीकृति के साथ जीवनभर गुरू के चरणों में समर्पित रहना, प्रत्येक काम उनके निर्देश से करना, संघीय व्यवस्थाओं का ह्रदय से पालन करना आदि ऐसे विधान हैं जो व्यक्ति को चारों ओर से थाम लेते हैं, फिर भी उसमें रम जाने के बाद वे कठिनाइयां सहज बन जाती हैं, आनन्दप्रद लगने लगती हैं।दीक्षा-संस्कार का कार्यक्रम प्राय: आचार्यश्री के सान्निध्य में होता है, कभी कभी विशेष परिस्थितियों में आचार्य की आज्ञा से अन्यत्र भी ऐसे कार्यक्रम हो सकते हैं, अभी-अभी सरदारशहर में दीक्षा-संस्कार का एक कार्यक्रम होने वाला है, उसमें दीक्षित होने वाले बालक मोहनलाल और हीरालाल अपने आपको मुनिचर्या के लिए समर्पित कर रहे हैं, यद्यपि इन बालकों की अवस्था बहुत अधिक नहीं है पर इनके संस्कारों की परिपक्वता और विचारों की दृढ़ता उल्लेखनीय है। पारिवारिक लोगों ने अपनी ओर से इनकी कसौटी की और ये उत्तीर्ण हो गए, मैंने भी इनको परखा, मुझे इनके जीवन में आध्यात्मिक चेतना का स्फुरण परिलक्षित हुआ, मैं इनसे कहना चाहूंगा कि ये एक बार दो क्षण रूककर सोचें, मु़डकर देखें, साधु जीवन की कठिनाइयों के साथ अपना आत्मबल तोल लें, इनके आत्मबल, आत्मविश्वास और आत्मबोध की समन्विति में ही साधना की चरितार्थता है। इनकी दीक्षा दिल्ली में संभावित थी किंतु यातायात संबंधी अत्यधिक कठिनाइयों के कारण सरदारशहर में ही दीक्षा देने को निर्णय लिया गया, वहां शिष्य मुनि सुमेर ‘लाडनूं’ के सान्निध्य में ये दोनों किशोर अपनी मंजिल की ओर पदन्यास करेंगे, तेरापंथ धर्मसंघ में मुनि रूप में दीक्षित होंगे, जिन प्रबल मनोभावों के साथ ये अध्यात्मविकास के लिए संयमी साधकों का पथ चुन रहे हैं, उस पर उतने ही प्रबल उत्साह के साथ बढ़ते रहेंगे, ऐसा विश्वास है, मैं इन दोनों किशोरों के प्रति अपनी शुभकामना व्यक्त करता हूँ तथा अपना आशीर्वाद देता हूँ कि ये ज्ञान, दर्शन, चारित्र की त्रिवेणी में निष्णात होते हुए संसार का मार्गदर्शन करें। जीवन परिवर्तन के साथ इनके नाम भी परिवर्तित हो जाएं, इस दृष्टि से मैं मोहनलाल को मुनि मुदितकुमार और हीरालाल को मुनि हेमंतकुमार नाम से संबोधित करते हुए एक बार फिर उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ।मुनिश्री सुमेरमलजी ने पूज्यप्रवर की अनुमति से दोनों बालकों को दीक्षा प्रदान की, फिर दीक्षा विधि के अनुसार चोटी के अवशिष्ट केशों का लुंचन किया, तत्पश्चात नामकरण संस्कार संपन्न हुआ। मुनि मुदितकुमारजी सरदारशहर के इक्कीसवें संत थे। सरदारशहर प्रारंभ से ही उर्वरा भूमि रही है। तृतीय आचार्यश्री रायचंदजी स्वामी के शासनकाल से लेकर आज तक यानी सन् २०१० तक यहां के लगभग ढाई सौ साधु-साध्वियों व समणियों की दीक्षाएं हो चुकी हैं। भविष्यवाणी रेखाशास्री की : दीक्षा से कुछ दिन पूर्व सरदारशहर के कार्यकर्ता रेखाशास्री अध्यापक छगनजी मिश्रा को मुनिश्री सुमेरमलजी के पास लेकर आए, उन्होंने मुनिश्री के हाथ और पैर की रेखाएं देखीं और कहा- आप दो बालकों को छह महीने के भीतर-भीतर दीक्षा देंगे, उसी समय उन्होंने मोहन के भी हाथ व पैर कीरेखाएं देखीं और कहा- यह बालक आपकी (मुनिश्री की) विद्यमानता में ही धर्मसंघ में सर्वोपरि स्थान प्राप्त करेगा, दोनों ही भविष्यवाणी शत प्रतिशत सच हो गई।

ऐतिहासिक क्षण… महानगरी मुंबई की धरा हुई धन्य

दीक्षा महोत्सव: ४४ दीक्षार्थियों का संयम मार्ग पर प्रयाण, ६५० साधु-साध्वियों की मौजूदगी में हजारों लोग हुए साक्षी माया-मोह की नगरी में छूटा मोह का जाल मुंबई: सांसारिक जीवन को छोड़ जैन समाज के ४४ दीक्षार्थियों ने संयम मार्ग पर प्रयाण किया, बोरीवली के चीकूवाड़ी ग्राउंड में बनाई गई दीक्षा नगरी ६५० से ज्यादा साधु-साध्वियों की मौजूदगी में हजारों लोग सामूहिक दीक्षा के साक्षी बने, दीक्षा नगरी में इतनी भीड़ जुटी की समारोह के लिए बनाया गया विशाल मंडप छोटा पड़ गया, समाज के लोग दीक्षा महोत्सव देख सकें, इसके लिए मंडप को खोलना पड़ा, इसके साथ ही फाल्गुन सुदी सप्तमी,१३ मार्च का दिन मोह-माया की नगरी के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अंकित हो गया, नौ मार्च से शुरू हुआ दीक्षा महोत्सव का समापन हुआ।सामूहिक दीक्षा कार्यक्रम के तहत सबसे पहले योगतिलक सूरिश्वर के प्रथम शिष्य आर्यातिलक विजय म.सा.जिन शासन के युवराज समान उपाध्याय पद पर आरूढ़ किया गया, वे सूरिशांति समुदाय के प्रथम उपाध्याय बने चीकूवाड़ी ग्राउंड में बने प्रवज्या परिणय वाटिका में श्रावकों का आगमन शुरू हो गया था, सामूहिक दीक्षा के लिए बनाया गया विशाल मंडप पूरी तरह से ज्यादा लोगों की मौजूदगी में ४४ दीक्षा महोत्सव पूरी भव्यता के साथ संपन्न हुआ। गाजे-बाजे के साथ मंडप प्रवेश इससे पहले ४४ मुमुक्षुओं, सूरिराम और सूरिशांति समुदाय के १५ आचार्यों और ६५० श्रमण-श्रमणी का सुबह पांच बजे दीक्षा मंडप में गाजे-बाजे के साथ प्रवेश हुआ, सुबह ६.४० बजे दीक्षा विधि शुरू हुई, जबकि रजोहरण की विधि ८.०४ बजे हुई, दोपहर बाद ३.३० बजे दीक्षा विधि संपन्न हुई। यह हस्तियां हुईं शामिल शामूहिक दीक्षा में विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा, योगेश सागर, प्रवीण शाह, भरत शाह, पृथ्वीराज कोठारी, किशोर खाबिया, दिनेश भाई, निमेश कंपाणी आदि लोग शामिल हुए। होली चातुर्मास पर जैन धर्म के आचार्य एवं संतों का मिलन अनादि जैन धर्म में एकता बनी रहे सुभाष ओसवाल जैन समाज रत्न व हिंदी प्रेमी मंचस्थ मूर्तिपूजक सम्प्रदाय के विश्व विख्यात राष्ट्रसंत जैनाचार्य श्रीमद पद्म सागर सूरिश्वर जी महाराज एवं पूज्य गुरूदेव श्री सुदर्शन लाल जी महाराज के सुशिश्य आगमज्ञाता योगिराज युवा प्रेरक श्री अरूण मुनि जी महाराज का न्यू फ्रैण्ड्स कॉलोनी साउथ दिल्ली श्री संघ में मंगल मिलन एवं संयुक्त धर्मसभा का दृश्य। दिल्ली: सुप्रसिद्ध जैन संत पूज्य गुरूदेव श्री सुदर्शन लाल जी महाराज के सुशिष्य आगमज्ञाता योगिराज युवा प्रेरक श्री अरूण मुनि जी महाराज ने न्यू फ्रैण्ड्स कॉलोनी श्री संघ की पुरजोर विनती को मान देते हुए वर्ष २०१९ की होली चातुर्मास का सौभाग्य प्रदान किया, श्री संघ के असीम पुण्योदय से मूर्तिपूजक सम्प्रदाय के विश्वविख्यात राष्ट्रसंत जैनाचार्य श्रीमद पद्म सागर सूरिश्वर जी महाराज का भी मंगल पदार्पण हुआ।वैसे तो हमारे क्षेत्र में निरन्तर साधु-संतों का आवागमन बना रहता है, लेकिन दो महान मुनिराजों के मिलन सोने पर सुहागा वाली कहावत को सार्थक कर गया। आगमज्ञाता योगिराज युवा प्रेरक श्री अरूण मुनि जी महाराज ने स्थानक भवन की सीढ़ियों से उतरकर गुरूदेव की अगवानी की। दोनों पूजनीय मुनिराज अपनी-अपनी मर्यादा के अनुसार ऐसे मिले, जैसे इनका धर्म से इतर भी अन्य कोई पुरातन नाता हो। गुरूदेवों के मिलन तक सभी श्रद्धालु भक्त जनों की नजरें इस दुर्लभ दृश्य को अपलक निहारती रही।बुधवार २० मार्च २०१९ को लगभग दो घण्टे तक चले प्रवचन कार्यक्रम में हॉल का कोना-कोना जनमेदिनी से भरा हुआ था, जो प्रायः देखने में बहुत कम आता है, गुरूदेव श्री जी ने अपने उद्बोधन से सुस्त नसों में रवानगी की ताजगी भरते हुए ‘ओपन हार्ट सर्जरी’ विषय की सविस्तार व्याख्या करते हुए बताया कि आधुनिकता की चकाचौंध में उन्मत्त प्राणियों के प्रत्येक तर्क का मुँह बन्द था। अहिंसा प्रधान आडम्बर रहित व संवर सहित धर्म को पाकर हमें इसकी सार्थकता का अहसास करना चाहिए। गुरूदेव की खुली ललकार ने श्रद्धालु भक्तजनों को अपने में मौजूद कमियों को देखने पर मजबूर कर दिया। बड़े ही पुण्य से मिले अपने को निहारने के इस पर्व की आराधना में गुरूदेव ने कोई कसर नहीं छोड़ी। मूर्तिपूजक सम्प्रदाय के विश्व विख्यात राष्ट्रसंत जैनाचार्य श्रीमद पद्म सागर सूरिश्वर जी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए न्यू फ्रैण्ड्स कॉलोनी साउथ दिल्ली श्री संघ के अध्यक्ष समाजरत्न श्री सुभाष ओसवाल जैन एवं उनकी सहधर्मिणी श्रीमती नीलम ओसवाल जैन। राष्ट्रसंत जैनाचार्य श्रीमद पद्म सागर सूरिश्वर जी महाराज ने बहुत ही सारगर्भित उद्बोधन दिया, जिसमें बेचैनी, द्वेश एवं आक्रोष के साम्राज्य को गिराने के बड़े ही अनमोल सूत्र बताये, हमारा मन धर्म में नहीं लगता, हमारे सतत् धर्म करने बावजूद भी हमें अभी तक सफलता नहीं मिली, इत्यादि प्रश्नों के उत्तरों से परिपूर्ण उद्बोधन देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया, आचार्य श्री जी के मंगलपाठ से सभा का समापन हुआ।दो सम्प्रदायों के मिलन में कट्टरता का कोई अंश नहीं मिला, आज हम कट्टरता का इस कदर समर्थन कर देते हैं कि हमारी सामाजिक एकता ही विखण्डित होने लग जाती है, लेकिन इस मिलन में हमें ऐसा कुछ नहीं मिला, दोनों मुनिराजों की परस्पर वार्ता भी हुई। कार्यक्रम के संयोजक महेश जैन ने राष्ट्रसंत जैनाचार्य श्रीमद पद्मसागर सूरिश्वर जी महाराज एवं आगमज्ञाता योगिराज युवाप्रेरक श्री अरूण मुनि जी महाराज के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सेवा के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त जैन संस्था ‘जीतो’ की स्थापना आचार्य पद्मसागर जी महाराज की प्रेरणा से ही हुई है।सभा का संचालन करते हुए साउथ दिल्ली श्री संघ के अध्यक्ष, जैन एकता और समन्वय के सहयोगी समाजरत्न सुभाष ओसवाल जैन ने कहा कि यह हमारे साउथ दिल्ली जैन समाज का परम सौभाग्य है कि ऐसी महान परम्पराओं के दो महान संतों ने स्नेहमय मंगल मिलन हेतु हमारे क्षेत्र को अवसर देकर कृतार्थ किया, हमने मिलन तो अनेक देखे पर इस मिलन की छटा ही निराली रही, साथ ही गुरूदेवों के मंगल मिलन ने हमें यह प्रेरणा दी है कि हमें अपनी कुण्ठाओं के दायरे से बाहर निकलना चाहिए, ताकि इस अनादि जैन धर्म की एकता बनी रहे।कार्यक्रम को नव्य-भव्य व ऐतिहासिक रूप से सफल बनाने में नवनीत जैन, अशोक लोढ़ा, राजकुमार जैन (पटियाला वाले) एवं महेश संगीता जैन, नीलम ओसवाल आदि का भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ। श्रवणबेलगोला जैन तीर्थ श्रवणबेलगोला मंदिर कर्नाटक राज्य के हसन में स्थित एक प्रसिद्ध जैन तीर्थ है, यह तीर्थ मैसूर से ८४ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, यहॉं का मुख्य आकर्षण गोमतेश्वर बाहुबलि स्तम्भ है, यह तीर्थ श्रवणबेलगोला गांव के पास तलहटी से १७८.४२ मीटर उँचे पर्वत पर स्थित है, जिसे विन्ध्यगिरी पर्वत कहते हैं। मान्यता है कि यहॉं स्थित चेमते पर बनी प्रतिमा काफी वर्षों से पुरानी है। यह इंद्रचिरि पर्वत पर ५८-८ फीट ऊँची पत्थर से बनी मूर्ति है, यहॉं स्थापित गोमतेश्वर की प्रतिमा के लिए यह मान्यता है कि इस मूर्ति से शक्ति साधुत्व, बलय तथा उदारवादी भावनाओं का अद्भुत प्रदर्शन होता है।यह तीर्थ चन्द्रबेत और इन्द्रबेत नामक पहाड़ियों के बीच स्थित है, प्राचीनकाल में यह स्थान जैन धर्म एवं संस्कृति का महान् केन्द्र था, जैन अनुश्रुति के अनुसार मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त ने अपने राज्य का परित्याग कर अंतिम दिन मैसूर के श्रवणबेलगोला में व्यतीत किए, यहां के गंग शासक रचमल्ल के शासनकाल में चामुण्डराय नामक मंत्री ने लगभग ९८३ ई. में बाहुबलि (गोमट) की विशालकाय जैन मूर्ति का निर्माण करवाया था, यह प्रतिमा विद्यगिरी नामक पहाड़ से भी दिखाई देती है।श्रवणबेलगोला में गोमतेश्वर द्वार के बाईं ओर एक पाषाण पर शक सं. ११०२ का एक लेख कन्नड़ भाषा में है, इसके अनुसार ऋषभ के दो पुत्र भरत और बाहुबलि थे। ऋषभदेव जंगल चले जाने के बाद राज्याधिकारी के लिए बाहुबलि और भरत में युद्ध हुआ। बाहुबलि ने युद्ध में भरत को परास्त कर दिया, लेकिन इस घटना के बाद उनके नाम में भी विरक्ति भाव जागृत हुआ और उन्होंने भरत को राजपाट लेने को कहा, तब वे खुद घोर तपश्चरण में लीन हो गए, तपस्या के पश्चात उनको यहीं पर केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था।श्री गंगरस राजा के प्रधान श्री चामुण्डराय की माता विक्रम संवत् में श्री बाहुबलि भगवान् के दर्शन के लिए पोदनपुर जा रही थी, उन्होंने विन्ध्यगिरी पर्वत के सम्मुख स्थित चन्द्रगिरी पर्वत पर विश्राम किया, यहीं उन्हें स्वप्न में अदृश्य रूप से विन्ध्यगिरी पर्वत पर श्री बाहुबली भगवान् की मूर्ति स्थापित करने की प्रेरणा मिली, तुरंत ही प्रधान ने निर्णय लेकर उत्साह पूर्वक अपनी अमूल्य धन राशि का सदुपयोग कर इस तीर्थ की स्थापना की, जिसे हजार वर्ष से ज्यादा हुए हैं।भरत ने बाहुबलि के सम्मान में पोदनपुर में ५२५ धनुष की बाहुबलि की मूर्ति प्रतिष्ठित की। यहां महामस्ताभिषेक पूजा १२ वर्षों में एक बार होती है, इस अवसर पर सारे भारत से लाखों यात्री यहां आते हैं। विमान द्वारा पुष्पदृष्टि की जाती है। मूर्ति को केसर, घी, दूध, दही, सोने के सिक्कों तथा अन्य वस्तुओं से नहलाया जाता है। कुछ वर्षो पूर्व तक मैसूर महाराजा के हाथों प्रथम पूजा होती थी। लगभग दो हजार वर्ष पूर्व उत्तर भारत में बारह वर्षीय अकाल पड़ा, तब आचार्य भद्रबाहु स्वामी अनेक मुनियों के साथ आकर विन्ध्यगिरी के सम्मुख पर्वत पर ठहरे थे, उनके साथ सम्राट चंद्रगुप्त भी थे। सम्राट तपस्या करते हुए यहीं पर स्वर्ग सिधारे, इसलिए इस पर्वत का नाम चन्द्रगिरी पड़ा।विन्ध्यागिरी पर्वत पर सात मंदिर हैं। सामने चंद्रगिरी पर्वत पर चौदह मंदिर हैं, जिनमें श्री आदीश्वर भगवान् का मंदिर सबसे पुरातन है, यहां भद्रबाहु स्वामी की चरण पादुकाएं हैं। चंद्रगिरी पर्वत पर स्थित जमीन में आधी गढ़ी मूर्ति को श्री आदीश्वर भगवान के पुत्र भरत चक्रवर्ती का बताया जाता है। श्रवणबेलगोला गांव में सात मंदिरों में से एक मंदिर में ‘जैन मठ’ स्थापित है। श्रीचारूकीर्ति स्वामीजी भट्टाचार्य यहां विराजते हैं तथा नवरत्नों की सत्रह प्रतिमाओं का दिव्य दर्शन कराया जाता है।श्री बाहुबलि भगवान् की इतनी प्राचीन मूर्ति होते हुए भी ऐसा लगता है जैसे अभी-अभी बनकर तैयार हुई हो, इस भव्य प्रतिमा का सौम्य, शांत, गंभीर रूप बरबस मन को भक्तिभाव की ओर खींच लेता है। कला की दृष्टि से भारतीय शिल्प कला का एक सर्वोत्कृष्ठ उदाहरण है। मंदिर के निकट का दृश्य अत्यन्त मनोहर है। विन्ध्यगिरी व चन्द्रगिरी पर्वतों के बीच विशाल जलकुंड की अपनी एक विशिष्ट शोभा है।श्रवणबेलगोला के नजदीक के रेलवे स्टेशन में अरसीकरे ६४ कि.मी. हासन ५१ कि.मी. और मन्दगिरी १६ कि. मी. की दूरी पर है। निकट का गांव चन्नरायपट्टणम लगभग १३ कि.मी. दूर है, इन स्थानों से बस व टैक्सी की व्यवस्था है। बैंगलोर से बस द्वारा करीब १५० कि.मी. तथा मैसूर से ८० कि. मी. दूर है। तलहटी तक पक्की सड़क है, इसी पहाड़ के पत्थर को काटकर सुंदर सीढ़ियों बनवायी गयी हैं। तलहटी से ऊपर मंदिर तक लगभग ६५० सीढ़ियों हैं। तलहटी गांव के निकट ही है। ठहरने के लिए तलहटी में धर्मशाला, अतिथिगृह व हॉल हैं जहां पर पानी, बिजली, व भोजनशाला की सुविधाएं उपलब्ध हैं। -कोमल कुमार जैन चेयरमैन, ड्यूक फैशन्स (इंडिया) लि. एफ.सी.पी.‘जीतो’ जैन कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष पारस मोदी द्वारा जैन महासतियों को दर्शन वंदन जैन काँन्फ्रेंस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पारस मोदी जैन गुरु गणेश नगर औरंगाबाद में आराध्य गुरुदेव प.पू. श्री गणेशलालजी मसा एवं प पू श्री मिश्रीलाल मसा के पावन समाधीस्थल पर पहुँच कर यहाँ विराजित महासती प.पू. श्री किरणसुधाजी मसा. आदी ठाणा के दर्शन वंदन कर धर्मचर्चा की एवं प.पू. प्रग्याजी मसा. की स्वास्थ्य की जानकारी लेकर सुखसाता पुछते हुए स्वास्थ्य हेतु मंगलकामना की..बाद में उन्होंने श्री संघ कार्यालय में समाज के श्रावकों से चर्चा-विमर्श किया, श्री संघ की ओर से आपका सम्मान अध्यक्ष झुंबरलाल पगारीया, मंत्री ताराचंद बाफना किया, इस अवसर पर जैन काँन्फ्रेंस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तनसुख झाबंड, वरिष्ठ कार्यकारिणी सदस्य मिठालाल कांकरीया, मदनलाल लोढा, चंद्रकांत चोरडीया, कन्हैयालाल रुणवाल, डाँ प्रकाश झाबंड आदी उपस्थित थे। जैन काँन्फ्रेंस में औरंगाबाद में अनेक पदाधिकारी सेवारत हैं! जैन काँन्फ्रेंस के विभिन्न कार्य तथा सामाजिक धार्मिक उपक्रम की जानकारी श्री पारस मोदी ने देकर मार्गदर्शन किया। प्रकाश कोचेटा अमृता फडणवीस ने ‘जितो उड़ान २०१९’ ट्रेड फेयर का उद्घाटन किया मुंबई: जैन इंटरनेशनल ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (जितो) १२वां स्थापना दिवस मनाने के लिए जितो मुंबई जोन, उसके ११ जितो चेप्टर और उसके सदस्यों ने मिलकर ‘जितो उड़ान २०१९’ का आयोजन किया। ३ दिन का यह ट्रेड फेयर और बिजनेस कॉन्क्लेव १५ से १७ मार्च २०१९ के दौरान मुंबई-गोरेगांव के नेस्को संकुल के दो लाख वर्गफीट क्षेत्र में आयोजित किया गया था। शुक्रवार १५ मार्च को श्रीमती अमृता देवेन्द्र फडणवीस के करकमलों द्वारा इस फेयर का उद्घाटन हुआ।जितो मुंबई जोन के चेयरमैन हितेश दोशी जैन ने समस्त जैन समाज की एकमात्र ने पत्रिका कहा कि देश-विदेश के उद्योगपतियों, बिजनेसमैनों, प्रोफेशनल्स, उत्पादकों, रीयल एस्टेट डेवलपरों, रिटेलरों, व्यापारियों, वितरकों और स्टार्ट-अप्स वेंचर के लिए उनके उत्पाद और सेवा प्रदर्शित करने हेतु यह श्रेष्ठतम मंच है, जहॉ जेम-ज्वेलरी, रीयल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन के लिए, फैशन वेयर क्लोदिंग तथा स्टार्ट-अप्स के लिए खास पेविलियन लगाई गई थी। जितो इनोवेशन एंड इक़्यूबेशन फाउंडेशन और जितो (जेआईआईएफ-जितो) ने पात्र स्टार्ट अप्स के लिए १० लाख यूएस डालर के फंड का प्रावधान किया है। स्टार्ट-अप्स के लिए खास ५० स्टॉल आबंटित किए गए थे जहॉ जॉब फेयर भी आयोजित किया गया था।युवाओं को नौकरी का उत्तम अवसर प्रदान करने के लिए जितो ने टाइम्स एसेन्ट के साथ सहयोग किया था।यहां विभिन्न विषयों पर सेमिनार, परिसंवाद आदि का आयोजन किया गया था। जितो एपेक्स ने पुलवामा शहीदों के लिए ३.०६ करोड़ रू. का दान दिया गया। ‘जितो उड़ान २०१९’ में फॉरेन कॉन्स्युलेट पेविलियन, युथ एंट्रिप्युनरशिप समिट, जेबीएन ट्रेड मिटिंग्स, सीईओ कान्कलेव और प्रोफेशनल फोरम है, जहॉ जैन एनजीओ के लिए खास पेविलियन है, जहां एनजीओ अपनी प्रवृत्तियां दर्शाकर, मुलाकातियों के साथ बातचीत कर अपनी प्रवृत्तियों के लिए जरूरी समर्थन प्राप्त कर सकेंगे। जैन इंटरनेशनल ट्रेड आर्ग (जितो) जैन बिजनेसमैनों, उद्योगपतियों, नॉलेज वर्करों, प्रोफेशनलों का प्रतिनिधित्व करनेवाली अंतरराष्ट्रीय संस्था है।‘जितो’ की स्थापना २००७ में हुई थी। भारत में ‘जितो’ के ६९ चेप्टर और ११ अंतरराष्ट्रीय चेप्टर हैं, उसकी सदस्य संख्या ९००० सदस्यों की है। श्री मिथिला तीर्थ खोज व पुर्नस्थापना जैन धर्म एवं परम्परा में धर्म को प्ररूपित करने वाले महामानव को तीर्थंकर कहा जाता है, जिन्होंने पूर्ण ज्ञान अर्थात् कैवल्य प्राप्त कर तीर्थ की स्थापना की है। जैन परम्परा में २४ तीर्थंकर हुए हैं, जिनमें सर्वप्रथम प्रभु श्री ऋषभदेव स्वामी थे, जिनके पुत्र व प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर इस उपमहाद्वीप का नाम ‘भरत खण्ड’ पड़ा।अंतिम २४वें तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी हुए हैं, तीर्थंकर के च्यवन, गर्भ प्रवेश, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान तथा मोक्षप्राप्ति की भूमि को कल्याणक भूमि एवं जिस तिथि को ये कल्याणक हुए, उसे कल्याणक तिथि कहा जाता है।जैन धर्म के १९वें तीर्थंकर श्री मल्लिनाथ जी व २१वें तीर्थंकर श्री नमिनाथ जी के च्यवन, गर्भ अवतरण, जन्म, दीक्षा व केवलज्ञान भूमि श्री मिथिला तीर्थ है। दोनों तीर्थंकरों के ४-४ कल्याणक भूमि होने से मिथिला ८ कल्याणक भूमि तीर्थ कहलाता है, मिथिला तीर्थ वर्तमान का सीतामढ़ी शहर है। पूर्व में यह क्षेत्र विदेह नामक जनपद, तिरहुत देश व जगई के नाम से भी जाना जाता था, वर्तमान बिहार प्राचीन काल से मगध, अंग देश एवं त्रीभुक्ति क्षेत्र को मिलाकर एक प्रदेश था, वर्तमान तिरहुत वही त्रीभुक्ति है, इसका मुख्य भाग मिथिला है, प्राचीन वैशाली भी मिथिला का प्रभाव क्षेत्र था। जैन धर्म की सोलह सतियों में से एक सती माता सीता जानकी का भी जन्म स्थान सीतामढ़ी है। जनकपुर के राजा जनक को भयंकर दुष्काल से निजात पाने के लिए एक महर्षि ने खेत में हल चलाने को कहा था। राजा ने इसी स्थान सीतामढ़ी पूर्व में सारा क्षेत्र मिथिलांचल के नाम से जाना जाता था, हल चलाया गया व वहीं खेत में घड़े में उन्हें सीता मिली, इस कारण यह वैष्णव तीर्थ भी है, जानकी के पिता जनक को विदेह व सीता को वैदेही भी कहा जाता है, अद्भुत संयोग है कि देह में रहकर विदेह की साधना जैन धर्म का दर्शन भी है।१९वें तीर्थंकर श्री मल्लिनाथ जी:- फाल्गुन-शुक्ला चतुर्थी को अश्विनी नक्षत्र से चन्द्रमा का योग होने पर मिथिला नगर के महाराजा कुंभ की महारानी प्रभावती के गर्भ में परमात्मा मल्लिनाथ के जीव का अवतरण हुआ। मार्गशीर्ष-शुक्ल ११ को अश्विनी नक्षत्र में चन्द्रमा का योग होने पर और उच्च स्थान पर रहे हुए ग्रहों के समय, आधी रात में माता प्रभावती ने सभी शुभ लक्षणों से युक्त तीर्थंकर पद को प्राप्त होने वाली पुत्री को जन्म दिया।दिगम्बर पुत्र के रूप में मानते हैं, कारण वे स्री को मोक्ष का अधिकारी नहीं मानते। पौष शुक्ल एकादशी को अश्विनी नक्षत्र में, दिन के पूर्व-भाग में तेले के तप सहित मल्लि ने स्वयं पंच-मुष्टि लोच किया और नमस्कार कर स्वयं सामायिक चारित्र, दीक्षा/संन्यास/प्रवज्या, ग्रहण किया, उसी दिन शाम को उन्हें मिथिला में ही अशोक वृक्ष के नीचे केवलज्ञान एवं केवलदर्शन पूर्ण ज्ञान/बोधि भी प्राप्त हुआ। श्री सम्मेतशिखर पर्वत पर चैत्र-शुक्ल ४, भरणी नक्षत्र में श्री मल्लिनाथ जी मोक्ष पधारे।२१वें तीर्थंकर नमिनाथ जी-अश्विनी-पूर्णिमा की रात्रि में अश्विनी-नक्षत्र में मिथिला नगर के महाराजा विजयसेन की महारानी वप्रा की कुक्षि में परमात्मा नमिनाथ का जीव उत्पन्न हुआ।श्रावण-कृष्णा अष्टमी की रात्रि को अश्विनी-नक्षत्र में माता वप्रा को पुत्र की प्राप्ति हुई। आषाढ़-कृष्णा नवमी को अश्विनी-नक्षत्र में, दिन के अंतिम पहर में, बेले के तप सहित कई राजाओं के साथ नमि कुमार ने प्रवज्या स्वीकार की। मार्गशीष-शुक्ला एकादशी के दिन अश्विनी-नक्षत्र में घातीकर्मों को नष्ट कर मिथिला में ही बकुल वृक्ष के नीचे उन्हें केवलज्ञान-केवलदर्शन प्राप्त किया। श्री सम्मेतशिखर पर्वत पर वैशाख-कृष्णा दशमी को अश्विनी-नक्षत्र के योग में, प्रभु नमि समस्त कर्मों का अंत कर के मोक्ष सिधारे।श्री मिथिला तीर्थ के कुछ अति महत्वपूर्ण प्रसंग:- २४वें तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी के जीवन काल के २५, २६, २७, ३६, ३९, व ४० वां चातुर्मास अर्थात् कुल ६ चातुर्मास मिथिला में हुए, यहाँ श्री महावीर प्रभु के अष्टम गणधर अकम्पित का जन्म हुआ था, यहाँ जुगबाहु-पयणरेहा के पुत्र नमी नामक महाराजा वलयचूड़ियों के शब्द से और सौधर्मेन्द्र परीक्षित वैराग्य निश्चय वाले हुए। पूर्व में यहाँ मल्लिनाथ चैत्य में वैरफट्या देवी, कुबेर यक्ष एवं नमिनाथ चैत्य में गंधारी देवी और भृकुटि यक्ष आराधक जनों के विघ्न हरण करते थे।यहाँ ही लक्ष्मीगृह चैत्य में आर्य महागिरि के शिष्य कौणिन्य गोत्रीय अश्वमित्रा श्री वीर-निर्वाण के दो सौ बीस वर्ष बीतने पर अणुप्रवाद पूर्व में रही हुई नैपुणिका वस्तु को पढ़ते हुए प्रवचन-स्थविरों द्वारा अनेकान्तिक युक्तियों से समझाकर मना करने पर भी वह उत्सूत्र प्ररूपणा कर चतुर्थ निह्नव हुआ, यहाँ जनकसुता महासती सीता की जन्मभूमि का स्थान विशाल वट विटपी प्रसिद्ध है, यहाँ श्री राम-सीता का विवाह-स्थान साकल्लकुण्ड नाम से लोकरूढ़ है और पाताललिंग संभवतः नेपाल स्थित जलेश्वर शिवलिंग आदि अनेक लौकिक तीर्थ भी विद्यमान हैं। करीब १२५ वर्ष पूर्व काल के प्रभाव से मिथिला जैन तीर्थ का विच्छेद हो गया और यह तीर्थ गुमनामी के घेरे में आ गया। पुनः खोज व पुनस्र्थापना में निम्नलिखित प्रामाणिक सन्दर्भ सहायक बने। प्रमाणिक सन्दर्भों को शब्दशः लिखा गया है ताकि प्रामाणिकता बनी रहे।श्री मिथिला तीर्थ खोज हेतु आधारित सन्दर्भ श्री जिनप्रभसूरि रचित-‘विविध् तीर्थ-कल्प’ विक्रम सम्वत् १३६४-१३८९ का यात्रा वर्णन अनुवादक/लेखक-अगरचन्द भंवरलाल नाहटा, प्रकाशक-श्री जैन श्वेताम्बर नाकोड़ा पाश्र्वनाथ तीर्थ, मेवानगर वाया बालोतरा, संस्करण १९७८, ‘श्री तीर्थ माला अमोलकरत्न’-श्री शीतलप्रसाद छाजेड़ जौहरी काशी बनारस द्वारा प्रकाशित, सन् १८९३, पृष्ठ २, ५, व ३० पद्ध ‘खण्डहरों का वैभव’ द्वितीय संस्करण १९५८, लेखकमुनि कान्तिसागर, प्रकाशन-भारतीय ज्ञानपीठ दुर्गाकुण्ड रोड, काशी पृष्ठ १४८ पर श्री मिथिला तीर्थ के बारे में उल्लेख है। ‘कुशल निर्देश’ मासिक पत्रिका सितम्बर, १९७७ में प्रकाशित में आलेख-‘मिथिला तीर्थ कैसे विच्छेद हुआ?’ लेखक- भंवरलाल नाहटा, पृष्ठ १९ व २० में श्री मिथिला तीर्थ का उल्लेख है।‘चम्पापुरी तीर्थ’, लेखक भंवरलाल नाहटा, प्रकाशन: वीर निर्वाण सम्वत: २५०१ पृष्ठ १३, १५ में श्री मिथिला तीर्थ का विस्तृत उल्लेख है।‘प्राचीन तीर्थ माला-संग्रह’ अमृतलाल छगनलाल अनोपचंद नरसिंहदास से श्री यशोविजय जी जैन ग्रंथमाला, भावनगर द्वारा गुजराती में प्रकाशित वि.सं. १९७८, सन् १९२१में पृष्ठ संख्या २६ व २७. ‘जैन तीर्थों नो इतिहास’ गुजराती में प्रकाशित पृष्ठ ५४०, ५४१ व ५४२. ‘श्री चारित्र स्मारक ग्रंथ माला १७’ जैन तीर्थों के नक्शों के साथ।प्रकाशक: मफतलाल माणेकलाल, बोड़ी बाजार, वीरमगांव, गुजरात काठियावाड़।मौलिकता को बनाये रखने के लिये संदर्भित ग्रंथों के आलेखों को शब्दशः प्रस्तुत किया गया है, उपरोक्त स्पष्ट प्रमाणों के आधार पर करीब १०० वर्षों पश्चात् श्री मिथिला तीर्थ की खोज शुरू हुई। खोज में निम्नलिखित उपरोक्त प्रामाणिक संदर्भ सहयोगी बने। १९९३ से अपने बाबासा ‘साहित्य वाचस्पति’ भंवरलालजी नाहटा की प्रेरणा से व पिताजी श्रेष्ठिवर्य श्री हरखचन्दजी नाहटा द्वारा इस तीर्थ पुनस्र्थापना हेतु देखे गए स्वप्न को पूरा करने के लिये ललित कुमार नाहटा द्वारा खोज आरम्भ हुयी, पूर्व में खोज का केन्द्र जनकपुर, नेपाल रहा, जिसमें श्री हुलासचन्दजी गोलछा के नेतृत्व में काठमाण्डू जैन संघ का योगदान रहा। ‘जैन कल्याणक तीर्थ न्यास’ का पंजीयन २४ मई, २००६ को ही करा लिया गया था। सन् २००६ के अन्त में कुछ पुख्ता व स्पष्ट प्रमाण मिले कि विच्छेदित श्री मिथिला तीर्थ सीतामढ़ी, बिहार-भारत में था, तब सीतामढ़ी में भूमि प्राप्ति हेतु प्रयास अशोक कुमार जैन के द्वारा शुरू हुआ व श्री शिवकुमारजी अग्रवाल के सहयोग से भूमि का चयन किया गया। श्रीमती रफक्खमणिदेवी नाहटा ने १७/०४/२००७ को भूमि क्रय कर अपने ७०वें जन्म दिवस ६ जुलाई, २००७ को न्यास को भेंट कर दी गई।कहा जायेगा कि १४ साल की लाख कोशिशों के उपरान्त भी जब तक हम सही जगह नहीं पहुँचे, हमें ज़मीन नहीं मिली व जैसे ही सही स्थान सीतामढ़ी पहुँचे, दूसरी-तीसरी यात्रा में ही जगह उपलब्ध् हो गयी। यह स्पष्ट संकेत है कि अधिष्ठायक देव शासन देव ने जगह उपलब्ध् नहीं होने दी व सही जगह पहुँचते ही बिना देरी के जगह उपलब्ध् करवा दी।जगह का चयन करते वक्त विशेष सावधानी बरती गयी थी कि यात्रियों को पूर्ण सुरक्षा मिले व सहजता व सुगमता से उस जगह पर पहुँच भी सके, इस कारण जगह की कीमत भी बहुत अधिक देनी पड़ी। राष्ट्रीय राजमार्ग पर भूमि है व अच्छी बस्ती व अच्छे लोगों के साथ लगती भूमि है।‘श्री मिथिला तीर्थ’ की पुनस्र्थापना स्व-द्रव्य से एक ही परिवार-श्री हरख चन्द नाहटा परिवार द्वारा हुई। ज़मीन क्रय से लेकर जिनालय, धर्मशाला व प्रतिष्ठा का सम्पूर्ण लाभ नाहटा परिवार ने लिया। भाग्यशाली हैं कि हमें कल्याणक तीर्थ पुनस्र्थापना का सम्पूर्ण लाभ मिला। धन्य हैं वे जिन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसमें अपनी सेवाएँ दी, हमने इस बात का विशेष ध्यान रखा कि यह परमात्मा का कल्याणक तीर्थ है एवं परमात्मा गच्छातीत होते हैं, इसलिये अपनी व्यक्तिगत आस्थाओं से उपर उठ कर किसी भी गच्छ या समुदाय की छाप नहीं लगने दी।मन्दिर के अन्दर किसी तरह का पट्ट नहीं लगने दिया अर्थात् मन्दिर में गये तो आप व आपका सम्बन्ध् सीधे परमात्मा से होगा, बीच में कोई व्यवधान या नाम प्रलोभन नहीं। प्रतिमा भी एक ही-जिनका कल्याणक तीर्थ उनकी ही एकमात्र प्रतिमा अर्थात् श्री शीतलनाथ जी की, ताकि मन में एकाग्रता बनी रहे।प्रतिमा की साइज़ २७’’ की है। न्यासीगण से पूछा गया कि कल्याणक तीर्थ के अनुसार क्या प्रतिमा छोटी नहीं तो उत्तर मिला कि कल्याणक तीर्थ है, तभी २७’’ की है अन्यथा २१’’ की प्रतिमा एक आदर्श साइज़ की प्रतिमा होती है। २७’’ से अधिक होने पर प्रक्षाल करते वक्त अशातना की संभावना बहुत प्रबल रहती है, कारण प्रक्षाल का पानी प्रक्षाल करने वाले के अंग पर साधारण रूप में पड़ता ही है, प्रश्नकर्ता तर्क संगत उत्तर सुन संतुष्ट हुये। श्री मिथिला तीर्थ की पुनस्र्थापना हेतु भूमि पूजन १ फरवरी, २००८ को हुआ व इसके उपरान्त भूमि में मिट्टी भरवा कर राष्ट्रीय राजमार्ग के बराबर लाया गया। तीर्थ का शिलान्यास २५ जून, २०१४ को हुआ। तीर्थ का निर्माण कार्य आनन्दजी कल्याणजी पेढ़ी के अध्यक्ष सेठ श्री श्रेणिक भाई के सुझाव, मन्दिर निर्माण के मार्गदर्शक सत्येन्द्र कुमार कोचर के निर्देशन व श्री पंकज कुमार अग्रवाल एवं श्री नारायण अग्रवाल की देख-रेख में शुरू हुआ। मन्दिर शिल्पश्री हुक्मेश्वर सोमपुरा, तीर्थ वास्तु सलाहकार ई.पी. रेड्डी रहे। मूर्तियों व चरणों के शिल्पकार श्री सत्यनारायण शर्मा, जयपुर हैं। धर्मशाला के आर्किटेक्ट श्री सुधीर गुप्ता हैं।श्रेष्ठिवर्य श्री हरखचन्दजी रुक्खमणिदेवी नाहटा परिवार ने मन्दिर, प्रतिमायें व धर्मशाला का सम्पूर्ण निर्माण का लाभ लिया। दोनों परमात्मा की प्रतिमाओं की अंजनशलाका अध्यात्मयोगी श्री महेन्द्रसागर जी म.सा. के हस्ते १२ मई, २०१४ को श्री भद्दिलपुर तीर्थ की अंजनशलाका प्रतिष्ठा के शुभ अवसर पर हुई। २३ फरवरी, २०१५ को विधिकारक श्री हर्षद भाई शाह अकोला वालों के मार्गदर्शन में दोनों प्रतिमाओं की चल प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई। प्रतिष्ठा मुहूर्त प्रदाता पूज्य उपाध्याय श्री विमलसेन जी म.सा. ने प्रदान किया।वर्तमान में सुविधाजनक २७ कमरों की धर्मशाला, भोजनशाला, कार्यालय व कर्मचारी आवास हैं। भोजनशाला अभी शुरू नहीं हुई है, तीर्थ यात्रियों का आवागमन शुरू है।तीर्थ का पताः श्री मिथिला जैन तीर्थ, श्री जैन श्वेताम्बर कल्याणक तीर्थ न्यास, ‘हरखमणि भवन’, मल्लि-नमि मार्ग, शंकर चौक, डूमरा, सीतामढ़ी, बिहार, भारत-८४३३०१, भ्रमणध्वनि: ७०७९०७२०००, ७०७९१७२००० – ललित कुमार नाहटा जैन

पूर्वजन्म प्रभू ऋषभदेव का जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर

वैसे तो संसार का प्रत्येक प्राणी अनादि काल से जन्म-मरण भोगता आ रहा है लेकिन सार्थक वही जन्म होता है जिसमें जीव ने संसार परित्त (सीमीत) किया, उसी क्रम में प्रभु ऋषभ का जीव भी कई भव पूर्व जम्बूद्वीप के पश्चिम विदेह की क्षिति प्रतिष्ठित नगरी के प्रसन्नचन्द्र राजा के राज्य में धन्ना सार्थवाह था, एक बार व्यापार के लिए बसंतपुर जाने का निश्चय करके, धन्ना ने राजाज्ञा पूर्वक नगर में घोषणा कराई कि यदि उनके साथ कोई चलना चाहे तो यथायोग्य पूर्ण सहयोग दिया जायेगा, इस घोषणा की जानकारी तंत्र विराजित आचार्य धर्मघोष को भी मिली। बंसतपुर की ओर विहार करने का निर्णय करके सार्थवाद से आज्ञा लेकर साथ में विहार कर दिया। रास्ते में वर्षाकाल से मार्ग अवरूद्ध हो जाने से सुरक्षित स्थान देखकर सार्थ को वहीं रूकने का आदेश दिया। धन्ना सार्थवाह के मुनीम मणिभ्रद ने आचार्य धर्मघोष व उनके शिष्यों को भी अपने झोपड़े में ठहरने की व्यवस्था कर दी, लेकिन वर्षा का क्रम इतना लंबा हो गया, जिससे साथ की, सारी खाद्य सामग्री समाप्त हो गई। लोग कंद मूल खाकर समय निकालने लगे।धन्ना सार्थवाह को जब इस स्थिति का पता चला तो वह विचार में पड़ गया कि ऐसी स्थिति में मुनिराजों को आहार कैसे प्राप्त हो रहा होगा। चिंतातुर स्थिति में वह सीधा चलकर मुनियों के पास आया और पश्चाताप करता हुआ आहार ग्रहण करने की प्रार्थना करने लगा। सार्थवाह को पश्चाताप करते देख आचार्य श्री के निर्देशानुसार एक शिष्य भिक्षाटन करते हुए उसके आवास पहुँच गया, अपने आवास में मुनिराज को आते देख हर्ष विभोर होते हुए साधुओं के योग्य आहार खोजने लगा लेकिन अन्य सामग्री को अप्रासुक देख चिंतित होते हुए उसकी दृष्टि पास में पड़े (प्रासुक) घी के घड़े पर पड़ी और बड़े प्रमुदित भाव से मुनिराज को ग्रहण करने का आग्रह करने लगा। मुनिराज ने झोली में से पात्र निकाला।सार्थवाह उत्कृष्ट भाव से पात्र में घी बहराने लगा, उसी समय एक देव ने उसकी उत्कृष्ट भावों की परीक्षा हेतु मुनिराज की दृष्टि बांध ली। मुनिराज का पात्र घी से भर, घी बाहर बहने लगा, फिर भी मना नहीं कर सके। सार्थवाह उत्कृष्ट भाव से बहराता ही रहा जिसके फलस्वरूप उन्हीं उत्कृष्ट परिणामों से उसने सम्यक्त्व की प्राप्ति की, वहां की आयु पूर्ण कर तीसरे भव में सौधर्म कल्प में देव बना।आयु पूर्णकर चौथे भव में महाविदेह की गन्धिलावती विजय के गान्धार देश की गंध समृद्धि नगरी के शतबल नामक विद्याधर राजा की चन्द्रकांता रानी की कुक्षि से पुत्र रूप में पैदा हुआ, जिसका नाम `महाबल’ रखा गया। यौवनास्था में उसका विवाह सम्पन्न कर राजा शतबल ने महाबल का राज्याभिषेक कर दीक्षा ग्रहण कर ली।महाबल राजा अपने एक बाल साथी व चार प्रधानों के साथ नर्तकी द्वारा किये जा रहे नृत्य में आसक्त हो रहे थे, एक बार की बात है, इधर स्वयंबुद्ध नामक मंत्री, जिसे यह ज्ञात हो चुका था कि जंघाचरण मुनि द्वारा महाबल की सिर्फ एक माह की उम्र शेष है, ने राजा के समक्ष यह बात निवेदित कर दी, इससे प्रतिबोधित होकर राजा महाबल उत्कृष्ट भाव से संयम ग्रहण करके २२ दिन के अनशन पूर्वक देह त्याग कर ५ वें भव में दुसरे देवलोक में श्रीप्रभ विमान के स्वामी ललितांग देव बने, इनकी प्रधान देवी स्वयंप्रभा थी।ज्ञानी महापुरूषों से मुनि महाबल के देवयोनि में जन्मादि विषयक रहस्य जानकर स्वयं बुद्ध मंत्री ने भी सिद्धाचार्य के पास दीक्षा ग्रहण कर ली। उत्कृष्ट आराधना के साथ आयु पूर्ण कर मुनि स्वयंबुद्ध ईशानकल्प में देव बना, इधर ललितांग देव व स्वयं प्रभादेवी वहां की आयु पुर्ण करके महाविदेह क्षेत्र की पुष्पकलावती विजय में लोहार्दगल नगर के राजा स्वर्ण जंग की महारानी लक्ष्मी की कुक्षि से वङ्काजंग नाम के पुत्र व श्रीमती नामक पुत्री के रूप में उत्पन्न हुये।यौवनावस्था में श्रीमती ने एक देव विमान को देखा, उसे देखकर जातिस्मरण ज्ञान के माध्यम से वह अपने पूर्वभव के पति का स्मरण करने लगी। पूर्वभव के पति की गहरी स्मृतियों के फलस्वरूप उसने यह प्रतिज्ञा धारण कर ली कि जब तक वे उसे नहीं मिलेंगे तब तक वह किसी से नहीं बोलेगी, यह बात उसकी पंडिता नामक दासी ने जान ली। श्रीमती की सहायता करने हेतु दासी ने इशान कल्प के ललितांग देव के विमान का कुछ त्रुटिपूर्ण चित्र बनाकर राजपथ पर टांग दिया, जिसे देखते ही वज्रजंग को भी जातिस्मरण ज्ञान हो गया और उसने उस चित्र में रही त्रुटि को दूर कर दिया, यह बात उनके पिता सवर्ण जंग को मालूम हुई तब उन्होंने दोनों की शादी कर दी। कुछ समय पश्चात् श्रीमती ने एक पुत्र को जन्म दिया, धीरे-धीरे पुत्र युवावस्था को प्राप्त होने लगा, उसको युवा होते देख रात्रि को दोनों ने उसको राज्य सौंप कर दीक्षा ग्रहण करने का विचार किया, उधर उसी रात्रि को पुत्र ने राज्य लोभ में विषाक्त धुँआ उनके महल में छोड़ दिया, फलत: दोनों ने शुभ परिणामों से अपनी आयु पूर्ण कर ७ वें भव में ३ पल्योपम की स्थिति वाले कुरूक्षेत्र के युगलिक रूप से जन्म लिया, वहां की आयु पूर्ण करके दोनों ८ वें भव में सौधर्म देवलोक में देव बने, वहां की आयु पूर्णकर ९ वें भव में वज्रजंग का जीव जंबूद्वीप के महाविदेह में क्षिति प्रतिष्ठित नगर के सुविधि वैद्य के यहां जीवानंद नामक पुत्र रूप में जन्म लिया और श्रीमती का जीव इसी नगर में श्रेष्ठि ईश्वरदत्त के पुत्र रूप में उत्पन्न हुआ जिसका नाम राव रखा गया, इसी काल में राजा ईशानचंद की रानी कनकवती के भी एक पुत्र हुआ, जिसका नाम महीधर रखा गया। राजा के मंत्री सुवासीर की पत्नी लक्ष्मी के सुबुद्धि नाम का पुत्र हुआ। सागरदत्त सार्थवाह की पत्नी अभागी के पुर्णचंद्र व धनश्रेष्ठि की पत्नी शीलवती के गुणकर पुत्र हुआ, पूर्वभव की प्रीति से सब में परस्पर मित्रता हो गई। यौवनवय में जीवानंद प्रसिद्ध वैद्य बन गया।एक दिन सभी मित्रों ने जंगल में घूमते हुए एक मुनि को ध्यानस्थ देखा। मुनि का शरीर भयंकर व्याधि से ग्रस्त था, इसे देखकर परस्पर उपचार का चिंतन करने लगे। वैद्य जीवानंद बोला-“भैया इनके उपचार हेतु अन्य औषध तो मेरे पास है पर रत्न कंबल और गोशीर्ष चंदन की आवश्यकता है। पांचोें मित्रों ने बाजार में खोज की तो एक श्रेष्ठी के यहां दोनों वस्तुएँ मिल गई। मुनिराज के उपचार की बात सुनकर सेठ ने दोनों चीजें बिना मूल्य लिये ही दे दी और खुद भी सेवा में जुट गया। उपचार करने पर मुनि पूर्णत: नीरोगी हो गये, तत्पश्चात् मुनि के उपदेश से प्रभावित होकर सभी मित्रों ने उनसे संयम ग्रहण कर लिया और वे सब अनशनपूर्वक आयु पूर्ण कर दसवें भव में अच्युत कल्प के इन्द्र के सामानिक देव हुए, वहां से जीवानंद का जीव ११वें भव में जंबू द्वीप के महाविदेह क्षेत्र में पुण्डरीकिणी नगरी के वज्रसेन राजा की धारिणी रानी के गर्भ से १४ स्वप्न के साथ पुत्र रूप में उत्पन्न हुआ, जिसका नाम वज्रनाभ रखा गया, शेष पांचों ने उनके लघुभ्राता रूप में जन्म लिया।वज्रनाभ के युवा होने पर वज्रसेन राजा ने उसका राज्याभिषेक कर स्वयं ने दीक्षा ग्रहण की और केवलज्ञान प्राप्त किया। वज्रनाभ सम्राट बना। छोटे भाई बाहु, सुबाहु, पीठ और महापीठ नामक मांडलिक राजा बनें। सुयश चक्रवर्ती का सारथी बना। पिता वज्रसेन के उपदेश से प्रतिबोधित हो छहों ने संयम ग्रहण किया। वज्रनाथ ने बीस बोला की आराधना से तीर्थंकर गोत्र का उपार्जन किया और अपने साथियों के साथ आयु पूर्णकर सर्वार्थ सिद्ध नामक विमान में देव बनें। विगत चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर संप्रति के निर्वाण होने के बाद १८ कोड़ाकोड़ी सागरोपम के बीतने पर भरत क्षेत्र में तीसरे आरे के ८४ लाख पूर्व ३ वर्ष साढ़े आठ महीने शेष रहने पर, सर्वार्थ सिद्ध विमान का आयु पूर्ण कर आषाढ़ कृष्ण चतुर्दशी को उत्तराषाढ़ा नक्षत्र से चंद्र का योग होते ही प्रभु ऋषभदेव का जीव वहां से चलकर नाभि कुलकर की पत्नी मरूदेवी के गर्भ में आया, माता मरूदेवी ने हाथी वृषभादि १४ दिव्य स्वप्न देखे।गर्भ में आने के ठीक नौ महीने साढ़े सात रात्रि व्यतीत होने पर चैत्र कृष्णा अष्टमी की रात्रि को उत्तराषाढ़ा नक्षत्र से चंद्रमा का योग होने पर प्रभू ने युगलरूप से जन्म लिया। ५६ दिक्कुमारियोें व शक्रेन्द्र आदि ६४ इन्द्रों ने जन्मोत्सव मनाया, यथासमय इनका नाम ऋषभ रखा गया। इन्द्र द्वारा प्रदत्त ‘इक्षु’ चूसने से इक्ष्वाकु कुल प्रचलित हुआ, अन्य युगलिकों द्वारा ‘काश’ का रस ग्रहण करने से काश्यप गोत्र चल पड़ा, जो आज भी जारी है। विश्वस्तर पर बने रहने के लिए ‘ग्लोबल एक्स्पो’ उपयुक्त पुणे : मॅनेजमेंट क्षेत्र में टीम वर्क तथा टीम बिल्डिंग बहुत महत्वपूर्ण है, विश्वस्तर पर अपनी पहचान बनाने के लिए ग्लोबल एक्सपो जैसे उपक्रमों की जरुरत है, अच्छा व्यवस्थापक बनने के लिए विद्यार्थियों को इस उपक्रम की मदद होगी, चिकित्सक प्रवृत्ती का विकास, प्रदर्शन कौशल्य, विद्यार्थियों की संगठन भावना, कौशल और व्यवस्थापन को बढावा देने के लिए ऐसे एक्सपो महत्वपूर्ण रहेंगे। वैश्विक बाजार के लिए तैयार रहने में यह मददगार होगा, इसी बात को ध्यान में लेकर सूर्यदत्ता द्वारा नियमित रूप से विविध कार्यशाला, सेमिनार और तज्ञ मार्गदर्शन का आयोजन किया जाता है, ऐसा प्रतिपादन सूर्यदत्ता ग्रुप ऑफ इन्स्टिट्यूट के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. संजय बी. चोरडिया ने कहा।सूर्यदत्ता इन्स्टिट्यूट्स ऑफ मॅनेजमेंट के छात्रों ने आयोजित किये गए ‘ग्लोबल एक्सपो’ में डॉ. चोरडिया बोल रहे थे, इस एक्सपो द्वारा अलग  अलग देशों के भौगोलिक, राजकीय और आर्थिक जानकारी मिली, छात्र, शिक्षक और अन्य मान्यवरों को जागतिक व्यापार, व्यावसायिक स्थिति, सामाजिक, सांस्कृतिक विशेषता और देश की राजनीतिक नीतियां समझने के लिए इस एक्स्पो से लाभ हुआ। पीजीडीएम और एमबीए के छात्रों ने इसका आयोजन किया था। पांच विद्यार्थियों के एक गुट, ऐसे २३ गुटों में छात्र विभाजित थे, हर एक गुटों ने एक -एक देश चुना और भौगोलिक-राजकीय और आर्थिक जानकारी को प्रदर्शित किया गया था, जिसके लिए सर्च इंजिन, सोशल मीडिया, एक-दूसरे से संवाद और बाजार संशोधन का उपयोग किया गया था। अमेरिका, कॅनाडा, फ्रान्स, संयुक्त अरब अमिरात, रशिया, जर्मनी, नेदरलँड, चीन, इंग्लंड इत्यादि देशों का दर्शन इस एक्सपो में दिखाया गया, इसके लिए पॉवरपॉइंट प्रदर्शन, व्हिडिओ, जानकारी आलेख, चाट्र्स, फ्लैक्स जैसे साधन सामग्री का उपयोग किया गया था, १००० से ज्यादा छात्र, कर्मचारी, अभ्यासगत और उद्योग क्षेत्रों के लोगों ने देकर छात्रों को प्रोत्साहित किया।२३ गुटों ने किये हुए प्रदर्शन की वजह से २३ देशों की जानकारी विस्तार से समझ में आई, इस एक्सपो के दौरान अंतरराष्ट्रीय अतिथियों, सहकारीयों तथा विद्यार्थी सहकारी गुटों ने मुल्यांकन किया। मनोज बर्वे – बीव्हीएमडब्लयू के (जर्मन फेडरेशन एसोसिएशन ऑफ एसएमई) भारत प्रमुख, काझुको बॅरिसिक- जापानी कलाकार और सलाहगार, टॉमियो इसोगई इंडोजापानी रिलेशनशिप के सलाहगार, आशिष जोशी- स्किल्समार्ट वल्र्ड के संचालक, मार्केट रिस्क चेंज मॅनेजमेंट के पुष्कर पानसे आदी एक्सपो को भेंट देकर विद्यार्थियों की प्रशंसा की, एक्सपो के विजेता गुट को ११,००० रुपयों का ईनाम मिला तथा दूसरे, तीसरे, चौथे और पाचवें स्थान के गुटों को क्रमश: ७००० रुपये, ५००० रुपये, ३००० रुपये और १००० रूपयों का इनाम दिया गया। फ्री मल्टी स्पैशलटी कैम्प में ३२५ मरीजों ने लिया लाभ जैन इंन्टरनैशनल ट्रेड आर्गेनाइजेशन (लेडिज़ विंग) लुधियाना चैप्टर द्वारा वर्धमान इंन्टरनैशनल पब्लिक स्कूल ३८ सैक्टर चंडीगढ़ रोड में एक विशाल फ्री मल्टी स्पैशलटी कैम्प का आयोजन मोहन भाई ओसवाल अस्पताल के सहयोग से किया गया। कैम्प का शुभारम्भ महामंत्र नवकार के सामुहिक उच्चारण से शुरू किया गया, यह कैम्प डॉ. तेजिंदर कौर (स्त्री रोग), डॉ. गीति पुरी अरोड़ा (इंट मेडिसिन एंड डायबेटोलॉजी), डॉ. परवीन गुप्ता (ऑर्थो), डॉ. मनिंदर सिंह (पेडेट्रिक्स), डॉ. वैशाली मारिया (डेंटिस्ट) डॉ. जसप्रीत (डायटेटिक्स), राकेश शर्मा एचआर हेड, वीना शर्मा (नर्सिंग हेड) आदि की देख-रेख में चला, कैम्प में लगभग ३२५ मरीजों ने लाभ लिया, जिसमें फ्री चैकअप, फ्री शुगर चैक, फ्री दवाइयां भी दी गई, इस मौके पर जीतो लेडिज विंग की चेयरपर्सन अभिलाष ओसवाल, महामंत्री सोनिया जैन, कोषाध्यक्ष रंजना जैन, उप-प्रधान मंजु ओसवाल, करूणा जैन, ओसवाल जैन, सीरत जैन, एकता जैन, भाणु जैन, कंचन जैन, शालु जैन, श्वेता जैन, अर्चणा जैन, शिवानी जैन, रीचा जैन, मंजू सिंघी, रूबी जैन, रूचिका जैन, मीनू जैन, नीशु जैन, सुची जैन, नमीता जैन, नीतु जैन, नीरा जैन, श्रेया जैन, निधी जैन, रेखा जैन, जीतो लुधियाना चैप्टर के मंत्री राकेश जैन, तरूण जैन एवं वर्धमान स्कूल की प्रिंसिपल डा. अनिमा जैन, मैनेजर संजीव जैन, विजय जैन, अलका जैन, हर्ष जैन, इकबाल सिंह आदि गणमान्य उपस्थित थे। -अभिलाष ओसवाल चेयरपर्सन-लेडिज विंग जीतो के सेवा कार्य अनुमोदनीय अहमदाबाद: रविवार ३ मार्च के रोज समग्र भारतवर्ष की जैन कम्युनिटी की अम्ब्रेला संस्था के अहमदाबाद चैप्टर ने ‘लक्ष्य’ नाम के कार्यक्रम का आयोजन अहमदाबाद के यूनिवर्सिटी कन्वेंशन हॉल में किया, जिसमें २००० से भी ज्यादा लोग उपस्थित रहे, कार्यक्रम के अंतर्गत, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष अमितभाई शाह, बी.जे.पी. गुजरात अध्यक्ष जीतूभाई वाघाणी, नामांकित उद्योगपति सुधीरभाई मेहता (टोरेंट ग्रुप), राजेशभाई अदाणी (अदाणी ग्रुप), भारतीय माइनॉरिटी कमीशन के सदस्य सुनील सिंघी उपस्थित थे, जीतो अहमदाबाद ने अपने कई सारे प्रोजेक्ट्स की घोषणा की।जीतो अहमदाबाद की और से जरूरतमंद जैन परिवारों के लिए सौ करोड़ से भी ज्यादा लागत से ५४० फ्लैट्स बनाये जाएंगे जो जैन परिवारों को काफी किफायती कीमत से दिए जाएंगे।‘जीतो’ अहमदाबाद, शहर के मध्य में एक हॉस्टल का निर्माण भी करेगा जिसमें जैन विद्यार्थी एवं विद्यार्थिनी सुन्दर एवं आध्यात्मिक वातावरण में, सम्पूर्ण आवश्यक सहूलियतों के बिच रह कर, शिक्षा का स्वप्न पूर्ण कर सकेंगे।‘जीतो’ अहमदाबाद ने ‘लक्ष्य’ के इस प्रसंग पर यह भी घोषित किया गया कि जीतो ने कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले में शहीद हुए सिपाही परिवारों के लिए ३.१५ करोड़ की राशि एकत्र की है जो इन परिवारों को दी जाएगी। जन-सेवा के इस शुभ अवसर पर ‘जीतो’ अहमदाबाद के चेयरमैन जिगिषभाई दोशी, जीतो अपैक्स के अध्यक्ष गणपतराज चौधरी, जीतो श्रमण आरोग्यम के चेयरमैन हिमांशु शाह ने ‘जीतो’ के बारे में कई सारी अन्य जानकारी भी दी।इस शुभ प्रसंग पर जीतो के प्रोजेक्ट जो कि प्रतिभा सम्पन्न विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए एवं उन्हें जरुरी सहूलियत प्रदान करने के लिए तैयार किया गया है, इसमें १२ दाताओं ने अपना योगदान घोषित किया एवं जीतो के साधू एवं साध्वी भगवंत की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए बनाये गए श्रमण आरोग्यम में ८ दाताओं ने अपना योगदान घोषित किया, इस शुभ अवसर पुरे भारत भर से जीतो अपैक्स के कई सारे पदाधिकारी भी उपस्थित थे जिन्होंने जैन सेवा कार्यों को अनुमोदन दिया। जीतो के सेवाकार्यों के लिए भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष अमित शाह ने तारीफ की। अमित शाह राष्ट्रिय अध्यक्ष भाजपा जीवन में हेड, हार्ट और हैंड को सदा पवित्र रखें जोधपुर: राष्ट्र-संत चन्द्रप्रभ महाराज ने कहा कि जीवन में तीन चीज को हमेशा पवित्र रखिए – हैड, हार्ट और हेंड। हैड में रखिए निर्मल विचार, हैंड में रखिए ईमानदारी और हार्ट में रखिए करुणा और प्यार, उन्होंने कहा कि अगर आप संसार के एटीएम से प्रेम, शांति और आनंद का धन निकालना चाहते हैं तो उसका पासवर्ड है ध्यान और प्रार्थना। ध्यान आपको खुद से जोड़ेगा और प्रार्थना आपको परमात्मा से, उन्होंने कहा कि उस स्वर्ग को पाने के लिए धर्म की पनाह मत लीजिए, जो मरने के बाद हमें कहीं और स्वर्ग दिखाए, बल्कि धर्म को जीवन में इसलिए अख्तियार कीजिए कि हमारी खुद की धरती स्वर्ग बने। जीवन में ६० साल की उम्र तक तरक्की के लिए हर क्षेत्र में मेहनत का इस्तेमाल कीजिए, पर साठ के बाद स्वयं को मुक्ति की ओर ले जाएँ, याद रखें, आवश्यकताओं को पूरा कीजिए, पर इच्छाओं पर अंकुश लगाइए। आवश्यकताएँ तो फकीर की भी पूरी हो जाती हैं, जबकि इच्छाएँ सम्राट की भी अधूरी रह जाती हैं।संतप्रवर कायलाना रोड स्थित संबोधि धाम में ध्यान योग शिविर के समापन पर आयोजित मंगल मैत्री महोत्सव में भाई-बहनों को संबोधित कर रहे थे, उन्होंने कहा कि महीने में चाहे एक बार ही सही, संतजनों की संगत अवश्य कीजिए। संतों की संगत उस इत्र की तरह होती है, जिसे भले ही बदन पर न लगाएँ, तब भी उसकी महक से दिल अवश्य ही आनंदित होता है, याद रखना, भगवान चित्र में नहीं, चरित्र में निवास करते हैं। चित्र तो गधे का भी सुन्दर हो सकता है, पर चरित्र को सुन्दर बनाने के लिए इंसान का अच्छा होना जरूरी है, उन्होंने कहा कि खान-पान शुद्ध रखिए, इससे आपका खानदान शुद्ध रहेगा।रहन-सहन पवित्र रखिए, इससे आपका चरित्र शुद्ध रहेगा। विचार निर्मल रखिए, इससे आपके संस्कार शुद्ध रहेंगे, आपसे कोई धर्म-कर्म नहीं होता तो कोई बात नहीं, आप कभी किसी की निंदा मत कीजिए, केवल इस एक पुण्य के कारण आपका मरने के बाद देवलोक का इन्द्र बनना तय है, उन्होंने कहा कि सोने से पहले आप किसी की एक गलती को माफ करने का बड़प्पन दिखाइए, भगवान आपके जागने से पहले आपकी १०० गलतियों को माफ करने की उदारता अवश्य दिखाएँगे, यदि कोई आपका दिल दुखाए तो यह सोचकर मन में धैर्य और शांति धारण करें कि पत्थर अक्सर उसी पेड़ पर मारे जाते हैं, जिस पर फल लदे होते हैं, उन्होंने कहा कि आप सच बोलिए, सच बोलने से आज भले ही खतरा हो, पर सत्य एक दिन आपके सम्मान और विश्वास को पहले से सौ गुना अधिक मजबूती से लौटा लाएगा। कोई गाली दे तो आप स्माइल दीजिए, कोई गंदगी करे तो आप सफाई कीजिए, आपके व्यवहार से उसे शर्म महसूस होगी, आपकी अहिंसा उसे सत्य-पथ पर ले आएगी।उन्होंने कहा कि कभी – कभी आँखें बंद करके साँस की गति को धीमी करते हुए दिमाग में चलने वाली तरंगों को शांत करने का अभ्यास कीजिए। मात्र २१ दिन में आप शांति और सहज आनंद के साम्राज्य में प्रवेश पा लेंगे। राष्ट्र-संत चन्द्रप्रभ वर्षीतप के आराधकों की हस्तिनापुर तीर्थ यात्रा राजगढ़: दादा गुरुदेव की पाट परम्परा के अष्टम पट्टधर वर्तमान गच्छाधिपति आचार्य देवेश श्रीमद्विजय ऋषभचंद्रसूरीश्वरजी म. सा. के सदुपदेश से राजगढ़ नगर में ६० आराधक वर्षीतप की आराधना में लीन रहे, इन सभी तपस्वियों को हस्तिनापुर की यात्रा करवाने का लाभ राजगढ़ निवासी शेलेन्द्र कुमार शेतानमल जी जैन परिवार ने प्राप्त किया। आचार्य श्री के मंगलाचरण के बाद मुनिराज पुष्पेंद्रविजयजी म.सा. ने सभी आराधकों को हस्तिनापुर तीर्थ यात्रा क्यों की जाती हैं इसका महत्व विस्तार से बताया। आचार्य श्री ने सभी आराधकों को मांगलिक का श्रवण करवाकर सभी को आशीर्वाद प्रदान किया, इस अवसर पर श्री आदिनाथ राजेन्द्र जैन श्वे. पेढ़ी ट्रस्ट की ओर से मैनेजिंग ट्रस्टी सुजानमल सेठ, महाप्रबन्धक अर्जुनप्रसाद मेहता, सन्तोष चत्तर, सेवंतीलाल मोदी, राजेन्द्र खजांची, दिलीप भंडारी, नरेंद्र भंडारी पार्षद आदि वरिष्ठ समाजजनों ने लाभार्थी श्री शेलेन्द्रकुमार शेतानमल जैन परिवार का ट्रस्ट की ओर से बहुमान किया गया आराधकों को यात्रा के लिये शुभकामना दी गयी।