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गुरुदेव श्रीमद् विजयराजेन्द्रसूरिश्वरजी

गुरुदेव श्रीमद् विजयराजेन्द्रसूरिश्वरजी जन्मस्थान एवं माता-पिता-परिवार ‘श्रीराजेन्द्रसुरिरास’ एवं श्री राजेन्द्रगुणमंजरी के अनुसार, वर्तमान राजस्थान प्रदेश के भरतपुर शहर में दहीवाली गली में पारिख परिवार के ओसवंशी श्रेष्ठि ऋषभदास रहते थे, आपकी धर्मपत्नी का नाम केशरबाई था, जिसे अपनी कुक्षि में श्री राजेन्द्र सुरि जैसे व्यक्तित्व को धारण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। श्रेष्ठि रुषभदास जी की तीन संतानें थीं, दो पुत्र : बड़े पुत्र का नाम माणिकचन्द एवं छोटे पुत्र का नाम रतनचन्द था एवं एक कन्या थी, जिसका नाम प्रेमा था, छोटा पुत्र रतनचन्द आगे चलकर आचार्य श्रीमद् विजय राजेन्द्र सूरि नाम से प्रख्यात हुए। वंश : पारेख परिवार की उत्पत्ति आचार्य श्रीमद् विजय यतीन्द्रसुरि के अनुसार, वि.सं. ११९० में आचार्यदेव श्री जिनदत्तसुरि महाराज के उपदेश से राठौड़ वंशीय राजा खरहत्थ ने जैन धर्म स्वीकार किया, उनके तृतीय पुत्र भेंसाशाह के पांच पुत्र थे, उनमें तीसरे पुत्र पासुजी आहेड्नगर (वर्तमान आयड-उदयपुर) के राजा चंद्रसेन के राजमान्य जौहरी थे, उन्होंने विदेशी व्यापारी के हीरे की परीक्षा करके बताया कि यह हीरा जिसके पास रहेगा, उसकी ध्Eाी मर जायेगी, ऐसी सत्य परीक्षा करने से राजा पासु जी के साथ ‘पारखी’ शब्द का अपभ्रंश ‘पारिख’ शब्द बना। पारिख पासुजी के वंशज वहाँ से मारवाड़, गुजरात, मालवा, उत्तरप्रदेश आदि जगह व्यापार हेतु गये, उन्हीं में से दो भाइयों के परिवार में से एक परिवार भरतपुर आकर बस गया था, जन्म को लेकर ऐसा उल्लेख प्राप्त होता है कि आचार्य श्री के जन्म के पहले एक रात्रि में उनकी माता केशरबाई ने स्वप्न में देखा कि एक तरुण व्यक्ति ने प्रोज्ज्वल कांति से चमकता हुआ रत्न केशरबाई को दिया – ‘गर्भाधानेड्थ साडद्क्षीत स्वप्ने रत्नं महोत्तम्म’निकट के स्वप्नशाध्Eाी ने स्वप्न का फल भविष्य में पुत्ररत्न की प्राप्ति होना बताया। जन्म समय – आचार्य श्रीमद्विजय यतीन्द्र सुरी के अनुसार, वि.सं. १८८३ पौष सुदि सप्तमी, गुरुवार, तदनुसार ३ दिसम्बर सन् १८२७ को माता केशरबाई ने देदीप्यमान पुत्ररत्न को जन्म दिया। पूर्वोक्त स्वप्न के अनुसार माता-पिता एवं परिवार ने मिलकर नवजात पुत्र का नाम ‘रत्नराज’ रखा। व्यावहारिक शिक्षा – आचार्य श्रीमद्विजय यतीन्द्र सुरी एवं मुनि गुलाबविजय के अनुसार योग्य उम्र  में पाठशाला में प्रविष्ट हुए, मेधावी रत्नराज ने केवल १० वर्ष की अल्पायु में ही समस्त व्यावहारिक शिक्षा अर्जित की, साथ ही धार्मिक अध्ययन में विशेष रुचि होने से धार्मिक अध्ययन में प्रगति की। अल्प समय में ही प्रकरण और तात्विक ग्रंथों का अध्ययन कर लिया। तीव्र क्षयोपशम के कारण प्रखरबुद्धि बालक रत्नराज १३ वर्ष की छोटी सी उम्र में अतिशीघ्र विद्या एवं कला में प्रवीण हो गए, श्री राजेन्द्रसूरि रास के अनुसार उसी समय विक्रम संवत् १८९३ में भरतपुर में अकाल पड़ने से कार्यवश माता-पिता के साथ आये रत्नराज का उदयपुर में आचार्य श्री प्रमोदसुरि जी के प्रथम दर्शन एवं परिचय हुआ, उसी समय उन्होंने रत्नराज की योग्यता देखकर ऋषभदास जी ने रत्नराज की याचना की लेकिन ऋषभदास ने कहा कि अभी तो बालक है, आगे किसी अवसर पर, जब यह बड़ा होगा और उसकी भावना होगी, तब देखा जायेगा।’ यात्रा एवं विवाह विचार – जीवन के व्यापार-व्यवहार के शुभारंभ हेतु मांगलिक स्वरुप तीर्थयात्रा कराने का परिवार में विचार हुआ। माता-पिता की आज्ञा लेकर  बड़े भाई माणेकचंद के साथ धुलेवानाथ – केशरियाजी तीर्थ की पैदल यात्रा करने हेतु प्रयाण किया, पहले भरतपुर से उदयपुर आये, वहाँ से अन्यत्र यात्रियों के साथ केशरियाजी की यात्रा प्रारंभ की, तब रास्ते में पहाड़ियों के बीच आदिवासी भीलों ने हमला कर दिया, उस समय रत्नराज ने यात्रियों की रक्षा की। साथ ही नवकार मंत्र के जाप के बल पर जयपुर के पास अंब ग्राम निवासी शेठ शोभागमलजी की पुत्री रमा को व्यंतर के उपद्रव से मुक्ति भी दिलायी, सभी के साथ केशरियाजी की यात्रा कर वहाँ से उदयपुर, करेडा पार्श्वनाथ एवं गोडवाड के पंचतीर्थों की यात्रा कर वापस भरतपुर आये। ऐसा उल्लेख प्राप्त होता है कि शेठ सोभागमलजा ने रत्नराज के द्वारा पुत्री रमा को व्यंतर दोष से मुक्त किये जाने के कारण रमा की सगाई रत्नराज के साथ करने हेतु बात की थी, लेकिन वैराग्यवृत्ति रत्नराज ने इसके लिए इंकार कर दिया।

आचार्य श्री नानालालजी म. सा. की संक्षिप्त जीवनी

अग्नि का छोटा-सा कण भी वृहत्काय घास के ढेर को क्षण भर में भस्मसात् कर देता है और अमृत का एक लघुकाय बिन्दु अथवा आज की भाषा में होम्योपैथिक की एक छोटी-सी पुड़िया भी अमूल्य जीवनदाता बन जाती है।हिरोशिमा ओर नागासाकी की वह दर्द भरी कहानी हम भूले नहीं हों तो सहज जान सकते हैं कि एक छोटा-सा अणु-परमाणु कितना भयंकर प्रलय ढा सकता है, ठीक वैसे ही जीवन के प्रवाह में संख्यातीत घटनाओं में से कभी-कभी एकाध साधारण-सी घटना सम्पूर्ण जीवन-क्रम को आन्दोलित कर सर्वतोभावेन परिवर्तन का निमित्त बन जाती है।श्रद्धेय चरितनायक के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ, आपके सोये हुए देवत्व को अपेक्षा थी किसी ऐसे निमित्त की, जो उपादान का सहयोगी बन, उसे पूर्णता कह प्रदान करे, उस समय तक आप तथाकथित धार्मिक अनुष्ठानों से सर्वथा अपरिचित थे और जितनी मात्रा में परिचय प्राप्त हुआ, वह अत्यन्त अल्प था, अत: आपका गहन चिन्तन उचित सामाधान के अभाव में उन सब क्रियाओं में रूचि नहीं लेता था, इसके विपरीत आप धर्म क्रियाओं को ढकोसला समझते थे और साधु-सन्तों के प्रति भी आपके मन में कुछ विपरित ही धारणा थी, फिर भी आपकी सोच से निसर्ग भवभीरू एवं नैतिक प्रवृति सदैव आपको आरम्भ प्रवृत्तियों से बचाए रहती थी, एक उपदेश पर की बेर में कीट होते हैं, अत्यंत बाल्यकाल में तुरन्त बेर खाने का त्याग कर लेना, आपकी भवभीरूता का प्रबल प्रमाण है।एक समय की घटना है, आपके बड़े भाई साहब मिठूलालजी, जो कुछ व्यवसाय के साथ-साथ अपनी निजी भूमि पर कृषकों से कृषि का कार्य करवाया करते और कृषि की देख-भाल किया करते थे, उन्होंने आपसे कहा ‘‘कुंए का ऊपरी भाग अधिक पानी बरसने से कारण ढह गया है, अत: उसके पुन: निर्माण के लिये चूने की आवश्यकता होगी, अत: तुम चूना पड़वाने की व्यवस्था करो।”बौद्धिक प्रतिभा एवं कर्त्तव्य क्षमता में बड़े भाईसाहब से आप अधिक कुशल थे, फिर भी आप उनको पिता की तरह हृदय से सम्मान करते थे और यथासाध्य उनकी आज्ञाओं का पूर्णरूपेण पालन करने का प्रयास करते थे, अत: आपके लिये यह आवश्यक हो गया कि कृप के पुनः निर्माण के लिए सामग्री जुटाई जाए, उसके लिये आपने पत्थर फुड़वाए, कुछ हरे वृक्ष भी कटवाए और चूना तैयार करवाकर कूप- निर्माण का कार्य सम्पन्न करा दिया।आपका व्यावसायिक दौर क्रमशः विकासोन्मुख होता रहा और आप अपनी पारिवारिक एवं सामाजिक समस्याओं के समुचित समाधान में सफलता प्राप्त करते जा रहे थे, पर नियति को आपके लिए कुछ अन्य ही इष्ट था, वह आपको इस परिवार के लघुतम घेरे से बहुत दूर विराटता की ओर ले जाना चाहती थी, जिसकी भूमिका तो नियति आप से पूर्व ही निर्मित कर दी थी जो आपको मिल गया आपको गांव से करीब आठ मील दूर ‘‘भादसोड़ा’’ ग्राम में।बात असल में यों बनी- होनहार बिरवान के होत चीकने पात’’’ के अनुसार एक प्रसंग आ गया, आपकी एक अग्रजा भगिनी थी श्रीमती मोतीबाई जिनका पाणिग्रहण भादसोड़ा निवासी सवाईलालजी साहब लोढ़ा से हुआ था।प्रसंग उस समय का है जब मेवाड़ी मुनि चौथमलजी म.सा. का चातुर्मासिक वर्षावास सम्वत् १६६४ में भादसोड़ा में था, आपकी (आचार्य देव की) बहिन श्रीमती मोतीबाई ने (पंचोले) पांच दिन तक निराहार रहने का तपश्चरण किया, तत्कालीन प्रचलित परिपाटी के अनुसार तपस्विनी बहिन के लिये ऐसे प्रसंगों पर उसके पितृगृह से वस्त्रादि (पोशाक) भेजे जाते थे, तदनुसार आपके लिए भी यह आवश्यक हो गया कि भादसोड़ा बहिन के लिये अपने परिवार से पोशाक आदि उचित सामग्री पहुँचाई जाये, चूँकि ऐसे पावन अनुष्ठान प्राय: गृह-प्रमुखों के करकमलों द्वारा ही सम्पन्न हुआ करते थे, साथ ही आप इस प्रकार की धार्मिक अनुष्ठानों की क्रियाओं से अपरिचित भी थे और आपकी इनमें रूचि भी नहीं थी, अत: अपने अग्रज श्रीमान मिठूलालजी उस समय किसी अन्य कार्य में व्यस्त थे, अत: वे नहीं जा सके, फलस्वरूप आपको ही उपर्युक्त प्रसंग पर जाने का आदेश मिला, आप उचित साधन-सामग्री लेकर इच्छा नहीं होते हुए भी अश्वारूढ़ हो चल पड़े अपने गन्तव्य की ओर…चिरस्थायी गन्तव्यवास्तव में यह आपका चिरस्थायी गन्तव्य की ओर ही गमन था, प्रकृति आपको किसी अलौकिक गन्तव्य की प्रेरणा के लिए ही यहां तक खींच लाई थी। भादसोड़ा अपनी बहिन के यहां पहुंच कर यथायोग्य व्यवहार के साथ रात्रि-विश्राम वहीं पर किया, साथ में लाई हुई सामग्री भेंट कर प्रात:काल पुन: लौटने की तैयारी करने लगे, किन्तु आपके बहनोईजी ने किसी तरह समझाया कि अभी पर्युषणों के दिन चल रहे हैं और कल तो संवत्सरी महापर्व है, कल का दिन पवित्र धार्मिक अनुष्ठानों में व्यतीत होना चाहिए, किसी भी प्रकार सवारी आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए और आप आज ही घोड़े को परेशान करना चाह रहे हैं, इस प्रकार कुछ मान-मनुहार के पश्चात् आपको अनिच्छापूर्वक वहां रूक जाना पड़ा।मेवाड़ी मुनि श्री चौथमलजी म. सा. का चातुर्मास था, अत: समस्त जैन समाज उनके पर्युषण प्रवचनों का लाभ लेने पहुंच रहा था, ‘जिनाग्ाम’ के चरित नायक को भी बहनोईजी आग्रहपूर्वक प्रवचन-स्थल से कुछ दूर बैठ कर प्रवचन श्रवण करने लगे, प्रवचन कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, फिर भी लोक-लज्जा से बैठे रहे। व्याख्यान समाप्ति के प्रसंग पर मुनिश्री ने कहा कि कल एक ऐसी बात सुनाऊंगा जिससे संसार की दशा का ज्ञान होगा, हमारे चरित नायक को कहानी रूपी बातें सुनने का अधिक शौक था, अत: सोचा कि कल की कहानी सुन लेनी चाहिए, तदनुसार दूसरे दिन भी प्रवचन में गये, जब कुछ रस आने लगा, तो उठकर कुछ आगे समीप जाकर बैठ गए।सांवत्सरिक प्रवचन होने के कारण प्रवचन का विषय वैराग्योत्पादक एवं धार्मिक अनुष्ठानों के प्रति पे्ररणाप्रद था, संसार की असारता एवं हिंसाकारी आरम्भिक प्रवृत्तियों के निषेध पर बल दिया जा रहा था, चूंकि तत्कालीन वातावरण के अनुसार ग्रामीण सभ्यता में पलने वाले अधिकांश जैन धर्मावलम्बी भी कृषि कार्य किया एवं करवाया करते थे, अत: उनको उद्वोधन देने हेतु मुनिश्री तत्कालीन भाषा-शैली के माध्यम से कह रहे थे, ‘‘बड़े-बड़े वृक्ष कटवाने से बहुत पाप लगता है क्योंकि इस क्रिया से असंख्य अथवा अनन्त वनस्पति कायिक जीवों की हिंसा तो होती ही है, साथ ही अनेक तदाश्रित पशु-पक्षी आदि (चलते-फिरते) प्राणियों की भी हिंसा होती है, हिंसा, असत्य, चोरी आदि पाप-वृत्तियों में रत रहने वाला व्यक्ति मर कर दुर्गति में जाता है, कभी कुछ पुण्य कर्मों से मानव तन भी प्राप्त कर लेता है तो कभी पूरी इन्द्रियाँ नहीं मिलती अर्थात् बहरा, गूंगा, लंगड़ा आदि विकलांग बन जाता है, तो कभी दर-दर का भिखारी बन जाता है और उचित धार्मिक वातावरण मिलना भी कठिन हो जाता है, इसी शृ्रंखला में महाराजश्री ने फरमाया-यह हृास काल है अत: पंचम एवं षष्ठम आरक (काल विशेष) में इन्द्रिय शक्ति, शारीरिक संगठन आदि क्षीण होते जाएंगे, यहां तक कि छठे आरे में उत्पन्न होने वाला मानव तो बहुत लघुकाय अर्थात् एक हस्त प्रमाण ऊँचाई वाला होगा, बहुत लघु वय में पितृ-पद भोक्ता बन जायेगा, २० वर्ष की उम्र तक को वृद्ध बन १०-१२ संतान का पिता बन जायेगा, इस प्रकार औरों का आद्योपान्त विस्तृत विवेचन किया, प्रवचन तत्कालिन भावप्रवाही, हृदयग्राही एवं वैराग्योत्पादक था, किन्तु यथा ‘‘आम्र वृक्ष पर आने वाली सभी मंजरियाँ फलवती नहीं होती’’ठीक उसी प्रकार उपदेष्टा वाणी सभी श्रोताओं के सुप्त मानस को जागृत कर दें, यह आवश्यक नहीं, कोई विशिष्ट श्रोता ही उस वाणी को कर्ण-कुम्हारों तक ही सीमित न रखकर हृदय-तन्त्री तक पहुँच पाता है और उनमें भी कोई विरल ही उसे सर्वतोभावेन जीवन परिवर्तन का आधार बना लेता है, उन विरल चेतनाओं में ही श्रद्धेय चरितनायक भी रहे हैं, जिन्होंने प्रवचन के एक-एक शब्द को एकाग्रतापूर्वक सुना एवं उसे मन-मस्तिष्क पर नियोजित कर लिया, व्याख्यान श्रवण करते समय तक उसका नूतन परिवर्तनकारी कोई स्थायी प्रभाव आप पर नहीं पड़ा। प्रवचन समाप्ति पर अन्य श्रोताओं की तरह आप भी अन्यमनस्कवत् चलते बने, बहन के निवास स्थान पर पहुँचे और अपना अश्व सजाने लगे, बहन एवं बहनोईजी आदि ने बहुत निषेध किया एवम् समझाया कि आज संवत्सरी महापर्व है, आज सवारी आदि नहीं करनी चाहिए, कल प्रात: होते ही चले जाना, किन्तु अपनी धुन के पक्के चरितनायक पर उसका कोई प्रभाव नहीं हुआ, आप अश्वारूढ़ हो चल पड़े एक अदभुत गन्तव्य की ओर, चूँकि उस समय आपकी मातुश्री अपने एक भाई, जो भदेसर में रहते थे, के यहाँ थी, आपने अपनी मातेश्वरी से मिलने हेतु भदेसर की ओर प्रयाण किया, जो भादसोड़ा से लगभग दस मील पड़ता है, उस समय तक आपकी धार्मिक आस्था सुदृढ़ नहीं हुई थी अत: आपने उस रोज संवत्सरी होने से लोक लज्जावश भोजन नहीं किया, किन्तु उपवास-व्रत का प्रत्याख्यान भी नहीं लिया।चिन्तन का मंथनश्रद्धेय आचार्य देव में अपने शैशव काल से ही चिन्तन की प्रवृत्ति रही है, आप जीवन की किसी भी सामान्य-असामान्य घटना की गहराई में पहुँचने का प्रयास करते और चिन्तन के मन्थन से निष्कर्ष का नवनीत निकाल लेते, वातावरण कुछ ऐसा ही मिला, एकान्त विजन, सुरम्य वनस्थली, वन की नीरवता को भंग करने वाला पक्षियों का कलरव, जो मानव को सतत् चिन्तन के लिए उत्प्रेरित करता है, के मध्य सजग-चेता चरित नायक अश्वारूढ़ हो चले जा रहे थे, वन की मन्द बयार चतुर्दिग् भाद्रपदिय हरियाली की रम्य छटा एवं शांत वातावरण (जो आचार्यश्री का सदा से ही चिन्तन-क्षेत्र रहा है) का समुचित सुयोग पाकर आचार्य देव के चिन्तन ने एक नूतन अंगड़ाई ली, प्रवचन में अनुश्रुत विषय पर गम्भीर चिन्तन के साथ मन्थन होने लगा, जो कुछ श्रवण किया, उसमें से जितना मानस- पटल पर अंकित रहा, उसी पर धारा प्रवाही चिन्तन चला, जिसने आपकी आपेक्षिक सुषुप्त चेतना को एक झटके के साथ उद्वेलित कर दिया, बिजली की चमक के सदृश आपको एक दिव्य प्रकाश की अनुभूति हुई, चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश पैâल गया। तात्पर्य यह है कि ज्ञान की एक दिव्य रश्मि का प्रकाश आपके अन्त:करण में प्रस्फुटित हुआ, जिसने आपकी समग्र चेतना को एकाएक आलोकित कर दिया, आनंद से भर दिया, तथाकथित धर्म विद्रोही मन, धर्माभिमुख बन धर्म की गहनता एवं सूक्ष्मता के परीक्षण में तत्पर बनने लगा।

आचार्य ऋषभचन्द्र सूरि​

जावरा: दादा गुरूदेव के पाट परम्परा के अष्टम पट्टधर वर्तमान गच्छाधिपति श्रीमोहनखेडा तीर्थ विकास प्रेरक मानव सेवा के मसीहा, आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. आदि ठाणा का ऐतिहासिक मंगलमय प्रवेश, आचार्य पाट गादी पर विराजित होने के लिए हुआ।आचार्यश्री का सामैया सहित विशाल चल समारोह पहाडिया रोड स्थित चार बंगला लुक्कड परिवार के निवास से प्रारंभ हुआ, जो नगर के प्रमुख मार्गों से होता हुआ पिपली बाजार स्थित आचार्य पाट परम्परा की गादी स्थल पर पहुंचा, इस चल समारोह में आगामी १५ जनवरी २०२० को श्री मोहनखेडा महातीर्थ में होने वाली दीक्षा के मुमुक्षु अजय नाहर का वर्षीदान का वरघोडा भी निकाला गया, जिसमें मुमुक्षु ने अपने दोनों हाथों से दिल खोलकर वर्षीदान किया, स्मरण रहे आज से तीन वर्ष पूर्व आचार्यश्री को जावरा श्रीसंघ के द्वारा आचार्य पद प्राप्त होने से पूर्व श्रीसंघ ने काम्बली ओढा कर आचार्य पद ग्रहण करने के लिए विनती की थी, विदित हो कि यहां पर दादा गुरूदेव श्रीमद्विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की पाट परम्परा के सात आचार्य पूर्व में इस पाट पर विराजित होकर धर्मदेशणा जैन समाज को दे चुके हैं।आचार्यश्री ने पाट पर विराजित होकर अपने धर्म संदेश में कहा कि धर्म उत्कृष्ट मंगल है ऐसे धर्म को धारण करने वाले व्यक्ति को देवता भी नमन करते हैं। १५० वर्षों बाद १५१वें वर्ष में मुझे इस पाट पर बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, गुरूदेव की असीम कृपा है साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविकाओं की मेरे प्रति निष्टा बनी हुई है तभी मैं पाट गादी पर बैठने के लायक बना हॅू। आचार्य श्री ने कहा कि इस पाट गादी से मुझे उर्जा मिलेगी, मैं शरीर से पीड़ित जरूर हँू पर मन से पीड़ित नहीं हूँ, जीवन हमेशा परिवर्तनशील है समय सबके साथ न्याय करता हैं, व्यक्ति को कभी भी विपरित परिस्थिति में नहीं घबराना चाहिए, मेरे जीवन में भी कई विपरित परिस्थितियां आई थी पर दादा गुरूदेव की कृपा से मुझे समय-समय पर समाधान मिला है मेरे द्वारा शताब्दी महोत्सव में सभी आचार्य, भगवंत एवं साधु-साध्वी को एकमंच पर लाने का प्रयास किया गया, उसमें मुझे सफलता मिली, उसकी सभा भी जावरा दादावाडी में आचार्य हेमेन्द्रसूरीश्वरजी की निश्रा में हुई थी, हमारे श्रावकों का मन एक है, सभी श्रावक-श्राविका दादा गुरूदेव राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के प्रति निष्ठावान है, हमने सभी आचार्यों को विनती की थी सभी ने स्वीकार भी किया एवं हमने सामूहिक चातुर्मास भी श्री मोहनखेडा महातीर्थ में संवत्सरी प्रतिक्रमण के साथ किया, शताब्दी महोत्सव पूरे देश में विख्यात भी हुआ। जावरा की पाटगादी पर क्रियोद्धार दिवस का १५०वां वर्ष मनाने की मेरी बहुत भावना थी पर अनुकूल परिस्थितियां नहीं बन पाई, इस वजह से मैं नहीं आ पाया और हमने श्री मोहनखेडा महातीर्थ में १५०वें वर्ष पर दादा गुरूदेव को तपांजली अर्पित करने के उद्देश्य से ८०० से अधिक वर्षीतप की आराधना करवाकर दादा गुरूदेव को तपांजली अर्पित की, जिसमें हमारे मुनि भगवंत साध्वी वृन्द एवं समाज के श्रावक- श्राविकाओं ने वर्षीतप की आराधना की। मोक्ष प्राप्ति के लिए देव की जरूरत नहीं होती, मोक्ष प्राप्ति के लिए सामायिक प्रतिक्रमण ही अमृत क्रिया है। पाट गादी पर जावरा श्रीसंघ का बहुत योगदान है। आचार्य श्री ने घोषणा करते हुए कहा कि जावरा नगर में महिलाआें को पर्यूषण पर्व में प्रतिक्रमण करने में बहुत दिक्कत होती है इसके लिए जावरा श्रीसंघ बायो का उपाश्रय जब भी बनाएगा, उसमें श्री मोहनखेडा महातीर्थ की ओर से एक करोड़ आठ लाख रू. का सहयोग प्रदान किया जाएगा। वरिष्ठ साध्वी श्री संघवणश्रीजी म.सा. ने अपने संयम काल में खूब सेवा की है उन्हें उनको हमारे पूर्वाचार्यों ने सेवाभावी की पदवी से अलंकृत किया था, ने आज साध्वीश्री को शासन ज्योति पद से अलंकृत गया था, दादावाडी मंदिर को भी ५० वर्ष पूर्ण हो चुके हैं मेरी यह भावना है कि २०२३ तक इसका भी पूर्ण नवीनीकरण किया जाये। जावरा संघ एकता व भव्यता के लिए जाना जाता है, इस अवसर पर बांसवाडा, मंदसौर, इन्दौर, राजगढ, नागदा, नीमच, रतलाम, खाचरौद, झाबुआ, बदनावर, नागदा जं, बडनगर सहित ५० से अधिक श्रीसंघों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम में आचार्य श्री ऋषभचन्द्र सूरीश्वर म.सा. को प्रथम बार पाट पर विराजित होने के पश्चात् प्रथम गुरूचरण पूजा का लाभ जावरा निवासी मेघराजजी चम्पालालजी लोढा पूर्व राज्यसभा सांसद को प्राप्त हुआ। आचार्य श्री को सकल जैन श्रीसंघ जावरा की ओर से काम्बली ओढाई गई, तत्पश्चात् बांसवाडा निवासी चन्दूलाल दलीचंद सेठिया परिवार द्वारा काम्बली ओढाई गई। श्री आदिनाथ राजेन्द्र जैन श्वेताम्बर पेढी ट्रस्ट श्री मोहनखेडा तीर्थ की ओर से ट्रस्टी बाबुलाल खेमसरा, मेघराज जैन, संजय सर्राफ, आनंदीलाल अम्बोर, तीर्थ के प्रबंधक प्रितेश जैन आदि ने ट्रस्ट की ओर से काम्बली ओढाई। राजगढ श्रीसंघ से दिलीप भंडारी, नरेन्द्र भंडारी पार्षद, दिलीप नाहर, सुनील बाफना आदि ने आचार्यश्री को काम्बली ओढाई, इस अवसर पर जावरा श्रींसंघ अध्यक्ष ज्ञानचंद चोपड़ा, कोषाध्यक्ष विनोद बरमेचा, राजमल लुंक्कड, कन्हैयालाल संघवी, धर्मचन्द्र चपलोद, पदम नाहटा, कमल नाहटा, देवेन्द्र मूणोत, प्रकाश चौरडिया, प्रकाश संघवी व्ाâाकू, माणक चपलोद, भंवर आंचलिया, राजेश वरमेचा, राकेश पोखरना, सुभाष डुंगरवाल, अनिल चोपडा, पारस ओस्तवाल, अभय सुराणा, पुखराज कोचेट्टा, सुनील कोठारी, अनिल कोठारी, पवन पाटनी, पवन कलशधर, प्रदीप चैधरी, संजय तलेसरा, अनीस ओरा, विभोर जैन, अर्पित तलेसरा, महावीर चैरडिया, अंकित लुक्कड आदि उपस्थित थे।

श्री महाश्रमणजी

दक्षिण के काशी गिने जाने वाले श्रवणबेलगोला में श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य श्री महाश्रमणजी का अहिंसा यात्री के साथ भव्य स्वागत किया गया, इस अवसर पर श्रवणबेलगोला के प.पू. श्री चारूकिर्तीजी म.सा. ने भव्य स्वागत किया, पदयात्रा करते हुए आचार्य श्री जब अपने धवल सेना के साथ भव्य बाहुबली की प्रतिमा देखकर गदगद हो गये, इस अवसर पर दिगम्बर समाज के अनेक लोग उपस्थित थे, अपना लम्बा समय गुरूदेव ने यहां बिताया और खुले मन से सराहना की, गुरूदेव के पगलिया के कारण हजारों की संख्या में जो लोग उपस्थित थे, उनमें हर्षोल्लास दिखाई दे रहा था। विदित हो कि हजारों किलोमीटर दूर से पद्विहार करते हुए गुरूदेव महाश्रमण यहां पधारे थे।

श्री जाखोड़ा तीर्थ​

तीर्थाधिराज : श्री शान्तिनाथ भगवान, पद्मासनस्थ, प्रवालवर्ण, लगभग ३५ सेमी., श्वेताम्बर मंदिर।तीर्थस्थल : राजस्थान प्रांत के पाली मारवाड़ जिले में जवाई बांध रेल्वे स्टेशन से १० किमी, फालना से १८ किमी दूर है, सिरोही-साण्डेराव सड़क मार्ग पर शिवगंज से ९ किमी तथा सुमेरपुर से ७ किमी दूर जाखोड़ा गांव के पहाड़ी की ओट में यह तीर्थ स्थित है।प्राचीनता : ऐसा कहा जाता है कि इस प्रभु प्रतिमा की अंजनशलाका आचार्य श्री मानतुंग सूरीश्वरजी के सुहस्ते हुई थी, विक्रम की पन्द्रहवीं शताब्दी में श्री मेघ कवि द्वारा रचित तीर्थमाला में इस तीर्थ का वर्णन है, प्रतिमाजी के परिकर पर वि.सं. १५०४ का लेख उत्कीर्ण है, इसके अनुसार सं. १५०४ में श्री यक्षपुरी नगर में तपागच्छीय श्री सोमसुन्दरजी के शिष्य श्री जयचन्द्रसूरिजी ने मूलनायक श्री पार्श्वनाथ प्रभु की मूर्ति के परिकर की प्रतिष्ठा की, लेकिन इस परिकर के बारे में यह मान्यता है कि किसी अन्य मंदिर से श्री पार्श्वनाथ प्रभु का यह परिकर लाकर यहां लगाया गया है, प्रभु दर्शन मात्र से पांचों इन्द्रियों के विषय प्रतिकूल से अनुकूल बन जाये, मनोहर मुख मण्डल ने जैसे जन्म जन्म के दु:ख हर लिये हो, ऐसे शान्तिनाथ प्रभु की कलात्मक परिकर युक्‍त प्रतिमा, चन्द्र से शीतल, सूर्य से तेजस्वी अहर्निश उदयांकर है।विशिष्टता : यह तीर्थ प्राचीन होने के साथ साथ चमत्कारिक क्षेत्र भी है, यहां पर पानी की बड़ी भारी विकट समस्या थी, पथरीली भूमि-में पानी मिलने की संभावना भी नहीं थी, एक दिन अधिष्ठायक देव ने कोलीवाड़ा के चान्दाजी को स्वप्न में मंदिर के निकट पानी होने का संकेत दिया, तदनुसार खुदवाने पर विपुल मात्रा में मीठा व स्वास्थ्यवर्धक पानी प्राप्त हुआ, जैन-जैनेतर और भी अनेक तरह के चमत्कारों का वर्णन करते हैं, यहां प्रतिवर्ष माघ शुक्ला पंचमी को ध्वजा तथा कार्तिक पूर्णिमा व चैत्री पूर्णिमा को मेले का आयोजन होता है तब हजारों यात्री दर्शनार्थ आते हैं।अन्य मन्दिर : वर्तमान में इसके अतिरिक्त एक श्री आदिनाथ प्रभु का मंदिर भी है।कला व सौन्दर्य : प्रभु प्रतिमा की कला आकर्षक एवं दर्शनीय है।सुविधाएं : तीर्थ पर ठहरने के लिये प्राचीन शैली की विशाल धर्मशाला है तथा भोजनशाला की सुविधा उपलब्ध है।ती

पार्श्व तीर्थ नगपुरा

छत्तीसगढ़ राज्य के दुर्ग जिला में जैन धर्मावलम्बियों का विश्व प्रसिद्ध श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ असंख्य श्रद्धालुओं के आस्था का केन्द्र है, यहाँ मूलनायक तीर्थपति २३ वें तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ प्रभु प्रतिष्ठित हैं। भूगर्भ से प्राप्त करीब २७५० वर्ष प्राचीन श्री उवसग्गहरं पार्श्व प्रभु की प्रतिमा अत्यंत ही मनोहारी है, एक सौ आठ पार्श्वनाथ यात्रा क्रम में यह तीर्थ पूज्यनीय एवं वंदनीय है। लगभग ४०-४५ वर्ष पूर्व दुर्ग के वरिष्ठ पत्रकार श्री रावलमल जैन ‘मीण’ के संयोजन में इस तीर्थ की संरचना एवं विकास का कार्य शुरू हुआ। देशभर के लाखों श्रद्धालुओं के सहयोग से बहुत ही कम समय में तीर्थ संकुल विशाल श्री उवसग्गहरं पार्श्व जिनालय सहित ९ शिखर युक्त भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। सन् १९९५ में माघसुद ६ (षष्ठी) ५ फरवरी को तीर्थोंद्धार-जीर्णोद्धार मार्गदर्शक तीर्थ प्रतिष्ठाचार्य प.पू. आचार्य भगवंत श्रीमद्विजय राजयश सूरीश्वरजी म.सा. के वरद हस्ते इस तीर्थ की प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई, इस तीर्थ में प्रतिष्ठित लोटस टेम्पल, तीर्थंकर उद्यान, शाश्वत जिन मंदिर, मेरुपर्वत, श्री मणिभद्रवीर जी मंदिर, पद्मावती देवीजी मंदिर, चरित्र गुरुमंदिर, दादावाडी में प्रतिमाएं तीर्थ भक्तों की यात्रा में सहायक बनते हैं। प्रवास में आने वाले तीर्थ यात्रियों के लिए आवास हेतु सर्वसुविधायुक्त अतिथिगृह, सात्विकता से भरपूर भोजनशाला है। यहाँ देशभर से लाखों श्रद्धालु यात्रार्थ पधारते हैं। मूलनायक श्री उवसग्गहरं पार्श्व प्रभु की आभामंडल की प्रतिमा १०० मीटर दूरी तक प्रभावित करता है जो अन्यत्र कहीं नहीं है। तीर्थ में प्रतिदिन सुबह १०८ वासक्षेप पूजा, वर्धमान शक्रस्तव से महाभिषेक होता है, वर्ष में माघ सुद ५,६ को प्रतिष्ठा सालगिरह (ध्वजारोहण) तथा पोस बदी ९, १०, ११ को श्री पार्श्व प्रभु जन्म-दीक्षा कल्याणक महोत्सव का आयोजन होता है। परिसर में वर्धमान गुरूकूल एवं प्राकृतिक चिकित्सा की व्यवस्था है

आचार्य तुलसी

आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान, गंगाशहर

नैतिकता का शक्तिपीठ आचार्य तुलसी की अजर-अमर स्मृतियां आचार्य तुलसी का महाप्रयाण २३ जून १९९७ आषाढ कृष्णा तृतीया वि.सं. २०५४ को हुआ। आचार्य तुलसी के महाप्रयाण के बाद उनके अन्तिम संस्कार स्थल पर आचार्यश्री महाप्रज्ञ के पावन सान्निध्य में स्मारक हेतु शिलान्यास किया गया। श्रद्धेय आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी ने इस परिसर का नामकरण नैतिकता का शक्तिपीठ किया, जो आज इस रूप में प्रतिष्ठित है। आचार्य तुलसी का समाधि स्थल उनके द्वारा प्रदत्त नैतिक मूल्यों के विकास प्रचार-प्रसार एवं संस्कारों के जागरण की प्रेरणा देता है, इस शक्तिपीठ की स्थापत्य कला अपनी वैशिष्ट्यता लिए हुए है, यह समाधि स्थल श्रद्धालुओं के लिए उपासना और ध्यान-साधना की उपयुक्त तपःस्थली है। आचार्य तुलसी की अन्तिम संस्कार स्थली पर निर्मित इस समाधि स्थल का लोकार्पण १ सितम्बर २००० को हुआ, समाधि स्थल परिसर में ३० हजार वर्गफुट के गोल घेरे में मूल समाधि अवस्थित है, इसके शिखर पर चारों दिशाओं में लगे संगमरमर पर आचार्य तुलसी के विभिन्न मुद्राओं में रेखाचित्र उनकी स्मृति को मुखर कर रहे हैं, उल्लेखनीय यह भी है कि समाधि स्थल की अंतःस्थ भूमि में एक अस्थि-कलश स्थापित है, यह अस्थि-कलश अष्ट धातुओं एवं बहुमूल्य रत्नों की नक्काशी से युक्त सिद्धहस्त शिल्पियों द्वारा निर्मित किया गया है, इनसे जुड़ी दर्शक दीर्घाएं भी विस्तृत हैं, इस पवित्र प्रांगण में भव्य एवं आकर्षक आर्ट गैलरी बनाई गई है, जिसमें आचार्य तुलसी के पूरे जीवन की स्मृतियों को चित्रित किया गया है, यह तुलसी चित्रदीर्घा निश्चय ही दृष्टव्य है। समाधि स्थल में संलग्न एक विशाल अणुव्रत मंच है जो आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के वृह्द आयोजनों के लिए बहुपयोगी है, यह ओपन थिएटर हृदय की विशालता व खुले विचारों की उदारता का परिचायक है। नैतिकता का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए इस मंच का सार्वजनिक उपयोग किया जाता है। ‘नैतिकता का शक्तिपीठ’ को बाहरी आकर्षण एवं सुरम्यता प्रदान करने के लिए परिसर की सीमा में भव्य विशाल उद्यान भी लगाया गया है, यहां सिर्फ तन और मन ही नहीं, आत्मा तक तरंगित हो उठती है। नैतिकता का शक्तिपीठ की स्थापत्य कला के बाहरी परिवेश को देखने एवं नैतिकता के महान् सम्बोधन का श्रद्धा से स्मरण एवं आत्मशान्ति प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में विभिन्न धर्मों के श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों का आगमन निरन्तर जारी रहता है। आचार्य तुलसी की स्मृतियों को चिरस्थायी रखने उनके कल्याणकारी कार्यों एवं अवदानों को प्रचारित-प्रसारित करते हुए नैतिकता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान का गठन किया गया। आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान के सदस्य सम्पूर्ण भारत एवं पड़ोसी देशों में भी है, इस संस्थान के २०५२ आजीवन सदस्य हैं। प्रतिष्ठान आचार्य तुलसी के जीवन, विचार, कला, दर्शन, साहित्य व विधाओं पर शोध एवं तुलसी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को अजर-अमर बनाने के लिए आचार्य तुलसी राजस्थानी साहित्य शोध संस्थान, पुस्तकालय एवं वाचनालय, आचार्य तुलसी साहित्य केन्द्र आदि अनेक महत्वपूर्ण आयाम संचालित किये जा रहे हैं। प्रतिष्ठान द्वारा शक्तिपीठ के ठीक सामने आशीर्वाद अतिथिगृह का भी निर्माण करवाया गया है, इस चार मंजिला भवन में कमरे, डॉरमेंटरी, सुसज्जित हॉल, सत्कार आदि पाकशाला सहित सभी सुविधाजनक व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। यह भवन आध्यात्मिक सामाजिक आयोजनों एवं यात्रियों के लिए बहुत उपयोगी हैं, यहां पधारने वाले यात्रियों के लिए भोजनशाला की भी नियमित व्यवस्था रहती है, अनेक श्रद्धालु प्रतिवर्ष दर्शनार्थ पधारते हैं, उनके लिए यहां सभी अनुकूल सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं। नैतिकता का शक्तिपीठ परिसर में झूले, फव्वारे, आ.तु.फिजियोथैरेपी सेन्टर, प्रेक्षाध्यान कक्ष संचालित किये जा रहे हैं, भ्रमणपथ का निर्माण किया गया है। आचार्य तुलसी की पावन स्मृति में बीकानेर के सबसे बड़े जिला अस्पताल पीबीएम में प्रतिष्ठान के सहयोग से निर्मित आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर चिकित्सा एवं अनुसंधान केन्द्र में नित्य सैकड़ों वैंâसर रोगियों को शारीरिक स्वास्थ्य लाभ के साथ ही उन्हें जीवनमूल्यों की प्रेरणा व प्रेक्षा ध्यान के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है, इस वैंâसर सेंटर में कोबाल्ट कक्ष, पेलिएटिव यूनिट, प्रेक्षा कॉटिज आदि का निर्माण भी करवाया गया है, आचार्य तुलसी की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में यहां बॉनमेरो ट्रीटमेंट यूनिट के निर्माण की प्रक्रिया जारी है। आचार्य तुलसी समाधि स्थल के अलावा गंगाशहर में आचार्य तुलसी के निर्वाण स्थल तेरापंथ भवन, गंगाशहर में जिस कमरे व पट्ट पर अंतिम श्वास ली, उसको दर्शनीय बनाया गया है, यहां आचार्य श्री के चित्र व संदेशों के साथ ही आचार्य तुलसी स्वास्थ्य निकेतन एवं आचार्य तुलसी कम्प्युटर प्रशिक्षण केन्द्र के माध्यम से हजारों लोग प्रतिवर्ष लाभान्वित होते हैं। तेरापंथ भवन से कुछ दूरी पर ‘बोथरा भवन’ स्थित है, जहां आचार्य श्री तुलसी ने अपने जीवन काल की अंतिम रात्रि व्यतीत की थी, इस भवन को आचार्य तुलसी की स्मृति में फोटो गैलरी के रूप में परिवर्तित किया गया है। सभी धर्मों के साधु-संतों के समय-समय पर होने वाले सामान्य समागम से जहां गंगाशहर अपनी आध्यात्मिकता के कारण विख्यात है वहीं आचार्य तुलसी की पुण्यभूमि के गौरव एवं उनकी स्मृति में बने नैतिकता के शक्तिपीठ की स्थापना से इस क्षेत्र की ख्याति में एक नया आयाम जुड़ा है। -जैन लूणकरण छाजेड़ अध्यक्ष आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान गंगाशहर, राजस्थान, भारत