ज्योतिर्मय निर्वाण दिवस

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साधक के जीवन के लिए निर्वाण पर्व तथा उत्सवों का महत्वपूर्ण स्थान है। भारत के प्राचीन इतिहास में अनेक पर्वों के वर्णन हैं, जीवन के हर-अंग के साथ कोई-न-कोई पर्व है विकास के लिये, निर्माण के लिये हर पर्व महान है। भारतवर्ष की महान संस्कृति एवं उज्ज्वल परंपरा में ‘दीपावली’ का महत्वपूर्ण स्थान है। दीपमाला में सिर्फ एक ही ज्योतिर्मय दीप नहीं, दीपों की अवलियां पंक्तियां है, एक के बाद एक क्रम बद्ध दीप-प्रज्वलित हैं, इसलिये दीपमाला और दीपावली एक ही है, दीपावली ज्योति का पर्व है, प्रकाश का पर्व है, इस ज्योतिपर्व के साथ इतिहास की महत्त्वपूर्ण कड़ियां-स्वर्णिम श्रृंखलाएं जुड़ी हुई हैं।

‘‘चलते-चलते राह है बढ़ते-बढ़ते ज्ञान तपते-तपते सूर्य है महावीर महान’’

एक ज्योतिर्मय-व्यक्तित्व, जो इतिहास का चमकता-दमकता अद्भुत रत्न-चिंतामणि इस पर्व के साथ-संबंधित है, वह है श्रमण-भगवान महावीर- वह महान-विशाल एवं विराट आत्मा अनंत-ज्योतिर्मय-आत्मा, जिसका हर गुण (ज्ञान, दर्शन, चरित्र, वीर्य-सुख, शांति एवं आनंद) अनंत है। भ.महावीर के लिए अर्थात् जिनका आचरण ही दूसरों के लिये राह/मार्ग संदेश-बना उस प्रायोगिक अनुभव से जिन्होंने आत्मज्ञान से विश्वविज्ञान को प्राप्त किया, ऐसे जीवात्मा रूपी कमल को विकसित करने वाले ज्ञान-सूर्य भगवान महावीर हैं।

वत्र्तमान-अवसर्पिणि काल की चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर महावीर हैं, वे अपने युग के युगदृष्टा-युगवीर, युगपुरूष थे, वे सर्वोत्तम धर्म नेता थे। अहिंसा और सत्य के संस्थापक थे, अनंत तेजस संपन्न आध्यात्मिक पुरूष थे, अपूर्व-सहनशील, क्षमाशील एवं घोर तपस्वी थे, वे क्रांतिकारी, समाज सुधारक, जन-जन के हितैषी, प्राणी मात्र के प्रिय-विश्व के कर्णधार, सत्य-पथ प्रदर्शक थे, उन्होंने हमें-अहिंसा के द्वारा संपूर्ण प्राणी जगत से प्रेम करना सिखाया था, उनकी अहिंसा मनुष्य मात्र तक ही सीमित नहीं थी, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, सकल जीवधारियों के प्रति उन्होंने अहिंसापूर्ण, दयापूर्ण-व्यवहार करने का मार्ग दर्शाया, वे आत्मदर्शी और आत्मजयी थे, क्षमावीर और धैर्यवान थे, समदर्शी और सहिष्णु थे, प्रेम और सत्य के प्रेमी थे, करूणा की मुर्ति थे, उनके समवरण में सभी धर्मों, मतो, संप्रदायों के लोग-एक-साथ उठते-बैठते थे।अमृतवर्षी प्रवचनों से सबके शुष्क-हृदय को शीतल करते थे, उन्होंने लोगों को समझाया कि कर्म से व्यक्ति ब्राह्मण होता है, कर्म से क्षत्रिय होता है, कर्म से वैश्य या क्षुद्र होता है, जन्म से कोई ब्राह्मण या शुद्ध नहीं होता, जन्म से कोई बड़ा या छोटा नहीं होता, आज सारा समाज धर्म और संप्रदाय को लेकर अशांत है, हिंसक बना हुआ है, विषमता बढती जा रही है, मनुष्य न्युट्रोन जैसे भयानक सर्वनाशक हथियार बना रहा है जो सबके लिये घातक है।

भगवान-महावीर का परिनिर्वाण-दिवस ज्योतिपर्व मनाते हुए ढाई हजार वर्ष से अधिक हुए, अहिंसा और सह अस्तित्व की ज्योति-परमज्योति में मिल गई, हम दीपावली ज्योति पर्व उस महान-आत्मा की स्मृति में मना रहे हैं। कल्पसूत्र में कहा है निर्वाण के समय भगवान महावीर के अंतिम समवसरण में उपस्थित राजाओं ने यह निर्णय लिया कि भाव-उद्योत्त, भाव प्रकाश, भाव ज्योति हमारे बीच से चली गई है, ऐसे में उस ज्योति के प्रतीक के रूप में द्रव्य उद्योत्त किया जाए, द्रव्य प्रकाश किया जाए, क्योंकि भाव-ज्योति को जगाने की स्मृति के लिये द्रव्य ज्योति एक प्रतीक है। तत्कालीन वे ज्ञान-ज्योति के प्रतीक-रत्न-दीप आज नहीं रहे पर-मिट्टी के दिए आज भी जल रहे हैं, इस प्रकार जैन इतिहास के अनुसार दीपावली को ज्योति-पर्व का रूप-श्रमण-भगवान-महावीर के निर्वाण दिवस से मिला। राजाओं ने रत्न-दीप-प्रज्वलित किये, देवों ने, देवियों ने, अप्सराओं ने, यत्रों ने, गंधर्वों ने रत्नों की ज्योति से पावापुरी के कण-कण को आलोकित कर दिया, जगमगा दिया तब से यह ज्योतिपर्व की परंपरा जन-जीवन में प्रवाहित हो गई, जो आज भी श्रद्धा एवं भक्ति के साथ प्रवाहमान है। पर्यूषण के उपरांत जैनों का दूसरा पवित्र त्यौहार दिवाली है, जैनी दिवाली चार दिनों तक मनाते हैं, मूलत: दिवाली निर्वाण उत्सव है, परंतु इन्द्रभूमि गौतम द्वारा वैâवल्य विभूति की प्राप्ति के उपलक्ष में दिवाली को लक्ष्मी (धन) पूजा का त्यौहार भी माना गया है, एक जैनी के लिये सबसे बड़ी विभूति और महालक्ष्मी केवल ज्ञान की प्राप्ति है। व्यवहार में धन ही लक्ष्मी है, अत: व्यवहाररत जैनों द्वारा आध्यात्म लक्ष्मी को गौण कर भौतिक लक्ष्मी की पूजा का समावेश दिवाली पूजन में किया जाना स्वाभाविक है। अमावस्या की प्रात: नर-नारी मंदिरों में जाकर

श्री महावीराय नम: और श्री केवल ज्ञान लक्ष्मी नम: लिख कर पूजन करने का उल्लेख तिथिवार सहित करते हैं

महावीर निर्वाण पूजा करते हैं और श्रवण करते हैं। कोई-कोई उपवास भी रखते हैं। पूजा में लाडू चढ़ाने की प्रथा है। सायंकाल को मंदिर और घरों में दीपक जलाए जाते हैं तथा बही पूजन किया जाता है, इसके लिये कोई-पुरोहित नहीं बुलाए जाते, सब स्वयं पूजा करते हैं। उच्चासण पर जैन शास्त्र विराजमान करते हैं, जो ज्ञान-लक्ष्मी मानी जाती हैं, आरती की जाती है और बही खाते में इस तरह से ज्योति पर्व के उपलक्ष में मनाया जाने वाला यह महापर्व आध्यात्मिक ज्योति पर्व है, अनंत ज्योतिर्मय ज्ञान-लक्ष्मी की उपासना का पर्व है जो प्रतिवर्ष प्रकाश का संदेश लेकर आता है, यह ज्योति पर्व अन्दर और बाहर की दरिद्रता को तोड़ने के लिये है। प्रभु महावीर और उनके महान-शिष्य गुरू गौतम का पावन स्मरण ही इस पर्व के साथ संबद्ध हैं, आनंद का स्त्रोत है, उनका स्मरण जीवन में परम प्रसन्नता की गंगा बहा देता है, उनके स्मरण मात्र से हमारे इस जीवन का ही नहीं, जन्म-जन्मान्तरों की तकलीफों, बाधाओं, रूकावटों की समाप्ति हो जाती है और ऐसे भाव आते हैं कि जीवन मंगलमय, आनंदमय बन जाता है। अंदर का अंधकार, बाहर के अंधकार को मिटा देता है, जैसे दीपावली के हजारों लाखों दीप-जगमगाकर बाहर के अंधकार को नष्ट कर देते हैं उसी प्रकार हमारा अन्तर्मन भी ज्ञान ज्योति से जगमगा जाए,

‘‘ज्योति-पर्व-पर-ज्योतिर्मय हो, जीवन का कण कण, क्षण-क्षण विघ्न-जाल से मुक्त सर्वथा हो मंगल का नित्य वरण।।

इस शुभ अवसर पर दिल से ऐसे भाव निकलते हैं-क्योंकि आज के पदार्थवादी युग और तनावग्रस्त जीवन तंत्र या समस्त विभिषिकाओं से बचने का एक मात्र रास्ता महावीर की शरण ही है, जिसे हम इस प्रकार से कह सकते हैं-

‘‘मरूस्थल को आग की नहीं, पानी की जरूरत है संसार को वंâजूस की नहीं, कर्ण दानी की जरूरत है भूले-भटके विश्व को फिर से नई राह मिले सचमुच आज महावीर जैसे ज्ञानी की जरूरत है

महावीर निर्वाण दिवस पर उनको नमन करें, उनके द्वारा प्रज्वलित ज्योति को नमन करें और उस ज्योति के आलोक में स्वयं को आलोकित करें, ऐसी भावना ‘जिनागम’ परिवार व्यक्त करता है।