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जैन समाज की आन बान शान चातुर्मास पर्व है महान

‘चातुर्मास’ के ४ महीनें भारत के चारों दिशाओं में धर्म की गंगा बहती है, हर श्रावक श्राविकाएं अपने-अपने गुरु के चरणों में समर्पित होकर धर्म ध्यान से आत्मसात हो रहे हैं, धर्म के नियमों का प्रत्याख्यान हो रहा है, जीवन संबल बन रहा है, हर कोई ‘णमोकार मंत्र’ व ‘मांगलिक’ के स्वरों से खुशहाल हो रहा है। ४ महीनों का सानिध्य गुरु-भगवंतों का मिलने वाला है, जिसका हम सभी को विशेष लाभ उठाना भी चाहिए। ‘जैन एकता’ का गुरु-भगवंतों से आशीर्वाद लेना चाहिए, ताकि हम भले ही किसी भी पंथ से हों, वह रहें क्योंकि पंथ तो सभी आमनाय हैं, अब हम सभी जैन बनें, ताकि हम अपने गुरु-भगवंतों के विहार में मिलकर सेवा कर सकें, साथ ही अपने पावन ‘तीर्थों’ की सुरक्षा भी कर सकें, क्योंकि एकता में शक्ति छिपी होती है। मैंने पिछले २८ साल पहले विश्व की एकमात्र घोषित ‘जैन एकता’ के लिए प्रयासरत ‘जिनागम’ पत्रिका के माध्यम से ‘जैन एकता’ का बिगुल बजाया था। मैं यह नहीं कहता हूं कि ‘जैन एकता’ की शुरुआत मैंने ही की थी, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है ‘जैन एकता’ के लिए आज से लगभग १२० वर्षों पहले ‘भारत जैन महामंडल’ की स्थापना हुई थी और भी कई संस्थाएं एकता के लिए प्रयास कर रही हैं, पर मेरा यह कहना है कि हर संस्था जो जैन एकता के लिए कार्य कर रही हैं, वह सभी एकमंच पर आएं और मिलकर उदारता पूर्वक ‘जैन एकता’ का प्रयास करें, तभी ‘जैन एकता’ का प्रयास सफल हो सकता है। ‘चातुर्मास’ पर्व ४ महीनों का हमें मिला है, सभी गुरु-भगवंतों के सानिध्य में ‘भारत’ के हर महानगरों में ‘जैन एकता’ का बिगुल बजाएं। युवाओं के हाथों संस्थाओं की कमान दें, विश्वास
दिलाता हूं ‘जैन एकता’ का अभियान सफल होकर रहेगा। ‘भारत को केवल ‘भारत’ ही बोला जाए’ INDIA नहीं, एक दिन यह अभियान भी सफल जरूर होगा, जैनों के साथ जैनेत्तरों का भी साथ मिल रहा है, हर कोई कहने लगा है कि १ दिन विश्व में भी भारत को केवल भारत ही बोला जाएगा, बस भारतीय संविधान में INDIA को विलुप्त करवाने की देर भर है।
जय जिनेंद्र!

पश्चिम बंगाल के इतिहास में प्रथम बार ‘भारतीय सांस्कृतिक समागम-भारतम्’ का आयोजन

मैं भारत हूँ फाउंडेशन’ के तत्वावधान में २८ जून को कोलकाता अलीपुर स्थित धन्यधान्यो ऑडिटोरियम में भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक समरसता को समर्पित एक भव्य कार्यक्रम ‘भारतीय सांस्कृतिक समागम-भारतम्’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य संकल्प ‘भारत को इंडिया नहीं, भारत कहा जाए’ तथा ‘गौमाता को राष्ट्रमाता का सम्मान मिले’ रहा, इस भव्य आयोजन में कोलकाता सहित पश्चिम बंगाल के मारवाड़ी समाज की विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों और हजारों लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम के माध्यम से देशभर में ‘भारत को भारत कहें’ राष्ट्रीय संकल्प को जन- जन तक पहुंचाने का आह्वान किया गया, साथ ही समाज में प्यार बढ़े, व्यवहार बढ़े और व्यापार बढ़े का संदेश भी दिया गया। ‘मैं भारत हूँ फाउंडेशन’ राष्ट्रीय अध्यक्ष बिजय कुमार जैन मुंबई, राष्ट्रीय महामंत्री शोभा सादानी, राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष निशा लढ्ढा, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुशीला पुगलिया, राष्ट्रीय सांस्कृतिक
मंत्री रवि जैन, राष्ट्रीय सांस्कृतिक मंत्री वर्षा मूँधड़ा, अंतर्राष्ट्रीय संयोजक अरूण मूँधड़ा व अन्य पदाधिकारियों की भी उपस्थिति रही। आयोजकों के अनुसार, कोलकाता के इतिहास में पहली बार इतने व्यापक स्तर पर भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभक्ति, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक विरासत को समर्पित इस प्रकार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति, इतिहास, आध्यात्मिकता और राष्ट्र गौरव पर आधारित एवं आकर्षक नृत्य नाटिकाओं सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने दर्शकों का मन मोह लिया। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में विक्रम समय की धारा में अडिग हमारी परंपरा, विचारों की स्वतंत्रता एवं भारत गौरव का अभिनंदन, महर्षि दधीचि के त्याग, तपस्या और बलिदान, राजस्थान की धड़कन घूमर, श्री अजमेढ़ देवजी महाराज
की वीरगाथा, शिव आराधना, सेवा भाव और संस्कार, गौमाता बने राष्ट्रमाता, राजस्थानी लोक संस्कृति, तथा जहाँ समानता, वहाँ समृद्धि-महाराजा अग्रसेन जी का संदेश जैसी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को भारतीय सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराया। कार्यक्रम का विशेष आकर्षण तीर्थंकर महावीर के जियो और जीने दो के संदेश पर आधारित प्रस्तुति रही, जिसमें आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और महावीर इंटेलिजेंस के बीच के अंतर को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया, इसके अलावा एक कदम भारत के नाम, हर धड़कन राष्ट्र के संग’ विषय पर प्रस्तुति दी गई। बिड़ला हाई स्कूल के विद्यार्थियों
द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी दर्शकों ने खूब सराहा। सरावगी उद्योग, मंतुराम, कंस्ट्रक्शन्स, गुरुजी ठंडाई, लीड स्टोन ग्रुप, जीवो जतन जन कल्याण ट्रस्ट, सीकर नागरिक परिषद, श्री दाधीच परिषद कोलकाता, कोरोना स्टील इंडस्टरीज प्राइवेट लिमिटेड, नीमकाथाना अचल नागरिक संघ, श्री विशुद्धनंद सरस्वती मारवाड़ी अस्पताल, टमकोर परिषद, रतनगढ़ नागरिक परिषद, नवलगढ़ नागरिक समिति, गंगाशहर नागरिक परिषद, सन्मार्ग, अहिंसा क्रांति न्यूज, सहित अनेक संस्थाओं एवं मीडिया साझेदारों का महत्वपूर्ण सहयोग रहा

जैन धर्म की मान्यताएँ, विशेषताएँ और चातुर्मास

´ जैन धर्म किसी एक धार्मिक पुस्तक या शास्त्र पर निर्भर नहीं है, इस सकता है धर्म में ‘विवेक’ ही धर्म है
´ जल, अग्नि, वायु, वनस्पति, आकाश, पृथ्वी, ६ प्रकार के जीवों की  जैन धर्म में ज्ञान प्राप्ति सर्वोपरि है और दर्शन मीमांसा धर्माचरण से
रक्षा का संकल्प लेना तथा जीवन यापन के लिए आवश्यकता से कम, पहले आवश्यक है उपयुक्त साधनों का प्रयोग करना, यतनापूर्वक पाप रहित जीवन जीना देश, काल और भाव के अनुसार ज्ञान दर्शन से विवेचन
‘जैन धर्म’ का मुख्य सिद्धांत है
कर, उचित-अनुचित, अच्छे-बुरे का निर्णय करना और
´ जैन धर्म में कोई देव भाषा नहीं है, भगवान महावीर
धर्म का रास्ता तय करना
के अनुसार जन भाषा में धार्मिक क्रियाएँ और ज्ञान
´ आत्मा और जीव तथा शरीर अलग-अलग हैं,
´
प्राप्ति की जानी चाहिए, सामान्य जन भाषा भगवान
आत्मा बुरे कर्मों का क्षय कर शुद्ध-बुद्ध परमात्मा
महावीर के समय में प्राकृत और पाली थी, लेकिन
स्वरुप बन सकता है, यही जैन धर्म दर्शन का सार
आज ये भाषायें भी जन भाषायें नहीं रही, अत: अपने
है, आधार है
क्षेत्र की भाषा में चिंतन, मनन और धर्म आराधना होनी
´ जैन दर्शन में प्रत्येक जीवन आत्मा को अपने-अपने
´
चाहिए, यही भगवान महावीर के उद्घोष का सार है,
कर्मफल अच्छे-बुरे स्वतंत्र रुप में भोगने पड़ते हैं, यहाँ
हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषा या अन्य कोई भी भाषा प्रयोग में
परमात्मा को, कर्मों को क्षय कर आत्मा स्वरुप प्राप्त किया
ली जा सकती है
जा सकता है
´ ‘‘जियो और जीने दो’’ ‘‘परस्परोपग्रह जीवनाम्’’
´
´ जिनवाणी में किसी व्यक्ति की स्तुति नहीं है,
´
दयाभाव युक्त और उसी के तहत जीवों के जीने में
बल्कि समस्त आत्मागत गुणों का महत्व दिया
सहयोग करना अहिंसा का व्यवहारिक रुप है
गया है, जिनधर्म गुणों का उपासक है।
´ जैन धर्म के सिद्धांतों की
´
´ हमारे बाहर कोई हमारा शत्रु नहीं है, शत्रु
´
वैज्ञानिक प्रामाणिकता एक के बाद एक
हमारे अंदर है, काम क्रोध, राग-द्वेष आदि
स्वयंसिद्ध है, जैसे वनस्पति में जीव है, जीव
विकार ही आत्मा के शत्रु हैं, हम राग और
और जीवाणु है, पानी, भोजन, हवा में जीव
द्वेष को जीत कर अविचल निर्मल वीतरागी
है, यह सब बातें वैज्ञानिक सिद्ध कर चुके हैं,
बन सकते हैं
इससे सिद्ध होता है कि जैनाचार्य और जैन दर्शन
´ ज्ञान और दर्शन के सभी दरवाजे खुले हैं।
´
द्वारा प्रदत्त ज्ञान अंधविश््वासों से मुक्त व सच्चा है।
अनेकान्तवाद के अनुसार कोई दूसरा धर्म पन्थ भी सही हो
´ जैन श्रमण, साधु, साध्वी भ्रमण करते रहते हैं, एक
´
सकता है क्योंकि सत्य सीमित या एकान्तिक नहीं है
स्थान पर नहीं रहते, मठ नहीं बनाते, आश्रम नहीं बनाते,
´ अन्य धर्मों की तुलना में जैन धर्म में अपरिग्रह पर अधिक जोर दिया
´
पैसा कौड़ी अपने नाम से संग्रह नहीं करते।
है, आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह और उनके प्रति मोह
´ जैन धर्म में गृहस्थों के लिए, श्रावक-श्राविका के लिए, सन्त-साध्वी
´
आसक्ति वर्जित है
के लिए अलग-अलग आचार मर्यादायें तय की गई हैं
´ जैन धर्म में नगर और नारी को समान स्थान दिया गया है, श्रावक-
´
´ अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह यह पाँच महाव्रत हैं,
´
श्राविका, श्रमण-श्रमणियों के रुप में बराबर स्थान तथा नारी को भी मुक्ति
शाकाहारी भोजन हो, नशा-मुक्त जीवन हो, शिकार और जुए से दूर रहें,
पाने का अधिकारी माना गया है
झूठ और चोरी का व्यवहार न करें, व्यभिचार मुक्त जीवन जीएं
´ जैन धर्म, जैन दर्शन के अनुसार जन्म, जाति, रंग, लिंग का कोई
´
´ मुक्ति का मार्ग अहिंसा, तप दान और शील के द्वारा बताया गया
´
भेदभाव नहीं, मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से पहचाना जाना चाहिए,
है, किसी से वैर न हो, सभी प्राणियों से प्रेम हो,
´ जैन दर्शन, जैन धर्म, जैन आचार निवृत्ति परक है, इसमें त्याग और
´
इन मर्यादाओं के पालन के लिए विवेक प्राप्ति हेतु
तपस्या, अनासक्ति और अपरिग्रह पर बड़ा जोर है, प्रवृत्ति सूचक कर्मों से
ज्ञान दर्शन स्वाध्याय के द्वारा प्राप्त करना हमारा
उच्चौत्तर आत्माओं को दूर रहने की सलाह दी गई है
आवश्यक कर्तव्य है
´ जैन धर्म में रुढ़िवादिता नहीं है, चूंकि एक किसी गुरु, तीर्थंकर,
´
´ जैन दर्शन सत्यनिवेषी है, सत्य ही धर्म है,
´
आचार्य या संत को ही सर्वोपरि नहीं माना गया है, समयानुसार विवेकमुक्त
परिस्थितिवश विवेक से सत्य को ढूंढना और
बदलाव मुख्य सिद्धांतों की अवहेलना किये बिना मान्य किया गया है
उचित-अनुचित, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य का निर्णय
´ किसी तरह के प्रलोभन से जैनमत में धर्म परिवर्तन के कोई नियम
´
करना, ये मुख्य शिक्षाएँ हैं।