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जैन धर्म की मान्यताएँ, विशेषताएँ और चातुर्मास (Beliefs, Characteristics and Chaturmas of Jainism in hindi)

जैन धर्म की मान्यताएँ, विशेषताएँ और चातुर्मास (Beliefs, Characteristics and Chaturmas of Jainism in hindi)जैन धर्म किसी एक धार्मिक पुस्तक या शास्त्र पर निर्भर नहीं है, इस धर्म में ‘विवेक’ ही धर्म है जैन धर्म में ज्ञान प्राप्ति सर्वोपरि है और दर्शन मीमांसा धर्माचरण से पहले आवश्यक है देश, काल और भाव के अनुसार ज्ञान दर्शन से विवेचन कर, उचित-अनुचित, अच्छे-बुरे का निर्णय करना और धर्म का रास्ता तय करना आत्मा और जीव तथा शरीर अलग-अलग हैं, आत्मा बुरे कर्मों का क्षय कर शुद्ध-बुद्ध परमात्मा स्वरुप बन सकता है, यही जैन धर्म दर्शन का सार है, आधार है जैन दर्शन में प्रत्येक जीवन आत्मा को अपने-अपने कर्मफल अच्छे-बुरे स्वतंत्र रुप में भोगने पड़ते हैं, यहाँ परमात्मा को, कर्मों को क्षय कर आत्मा स्वरुप प्राप्त किया जा सकता है जिनवाणी में किसी व्यक्ति की स्तुति नहीं है, बल्कि समस्त आत्मागत गुणों का महत्व दिया गया है, जिनधर्म गुणों का उपासक है।हमारे बाहर कोई हमारा शत्रु नहीं है, शत्रु हमारे अंदर है, काम क्रोध, राग-द्वेष आदि विकार ही आत्मा के शत्रु हैं, हम राग और द्वेष को जीत कर अविचल निर्मल वीतरागी बन सकते हैंज्ञान और दर्शन के सभी दरवाजे खुले हैं। अनेकान्तवाद के अनुसार कोई दूसरा धर्म पन्थ भी सही हो सकता है क्योंकि सत्य सीमित या एकान्तिक नहीं हैअन्य धर्मों की तुलना में जैन धर्म में अपरिग्रह पर अधिक जोर दिया है, आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह और उनके प्रति मोह आसक्ति वर्जित हैजैन धर्म में नगर और नारी को समान स्थान दिया गया है, श्रावक-श्राविका, श्रमण-श्रमणियों के रुप में बराबर स्थान तथा नारी को भी मुक्ति पाने का अधिकारी माना गया है जैन धर्म, जैन दर्शन के अनुसार जन्म, जाति, रंग, लिंग का कोई भेदभाव नहीं, मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से पहचाना जाना चाहिए, जैन दर्शन, जैन धर्म, जैन आचार निवृत्ति परक है, इसमें त्याग और तपस्या, अनासक्ति और अपरिग्रह पर बड़ा जोर है, प्रवृत्ति सूचक कर्मों से उच्चौत्तर आत्माओं को दूर रहने की सलाह दी गई है जैन धर्म में रुढ़िवादिता नहीं है, चूंकि एक किसी गुरु, तीर्थंकर, आचार्य या संत को ही सर्वोपरि नहीं माना गया है, समयानुसार विवेकमुक्त बदलाव मुख्य सिद्धांतों की अवहेलना किये बिना मान्य किया गया हैकिसी तरह के प्रलोभन से जैनमत में धर्म परिवर्तन के कोई नियम नहीं है, स्वत: जिन धर्म संयत आचरण करने पर व्यक्ति जिनोपासक बन सकता है जल, अग्नि, वायु, वनस्पति, आकाश, पृथ्वी, ६ प्रकार के जीवों की रक्षा का संकल्प लेना तथा जीवन यापन के लिए आवश्यकता से कम, उपयुक्त साधनों का प्रयोग करना, यतनापूर्वक पाप रहित जीवन जीना ‘जैन धर्म’ का मुख्य सिद्धांत है जैन धर्म में कोई देव भाषा नहीं है, भगवान महावीर के अनुसार जन भाषा में धार्मिक क्रियाएँ और ज्ञान प्राप्ति की जानी चाहिए, सामान्य जन भाषा भगवान महावीर के समय में प्राकृत और पाली थी, लेकिन आज ये भाषायें भी जन भाषायें नहीं रही, अत: अपने क्षेत्र की भाषा में चिंतन, मनन और धर्म आराधना होनी चाहिए, यही भगवान महावीर के उद्घोष का सार है, हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषा या अन्य कोई भी भाषा प्रयोग में ली जा सकती है‘‘जियो और जीने दो’’ ‘‘परस्परोपग्रह जीवनाम्’’ दयाभाव युक्त और उसी के तहत जीवों के जीने में सहयोग करना अहिंसा का व्यवहारिक रुप है जैन धर्म के सिद्धांतों की वैज्ञानिक प्रामाणिकता एक के बाद एक स्वयंसिद्ध है, जैसे वनस्पति में जीव है, जीव और जीवाणु है, पानी, भोजन, हवा में जीव है, यह सब बातें वैज्ञानिक सिद्ध कर चुके हैं, इससे सिद्ध होता है कि जैनाचार्य और जैन दर्शन द्वारा प्रदत्त ज्ञान अंधविश््वासों से मुक्त व सच्चा है। जैन श्रमण, साधु, साध्वी भ्रमण करते रहते हैं, एक स्थान पर नहीं रहते, मठ नहीं बनाते, आश्रम नहीं बनाते, पैसा कौड़ी अपने नाम से संग्रह नहीं करते।जैन धर्म में गृहस्थों के लिए, श्रावक-श्राविका के लिए, सन्त-साध्वी के लिए अलग-अलग आचार मर्यादायें तय की गई हैं अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह यह पाँच महाव्रत हैं, शाकाहारी भोजन हो, नशा-मुक्त जीवन हो, शिकार और जुए से दूर रहें, झूठ और चोरी का व्यवहार न करें, व्यभिचार मुक्त जीवन जीएं मुक्ति का मार्ग अहिंसा, तप दान और शील के द्वारा बताया गया है, किसी से वैर न हो, सभी प्राणियों से प्रेम हो, इन मर्यादाओं के पालन के लिए विवेक प्राप्ति हेतु ज्ञान दर्शन स्वाध्याय के द्वारा प्राप्त करना हमारा आवश्यक कर्तव्य है जैन दर्शन सत्यनिवेषी है, सत्य ही धर्म है, परिस्थितिवश विवेक से सत्य को ढूंढना और उचित-अनुचित, धर्म- अधर्म, पाप-पुण्य का निर्णय करना, ये मुख्य शिक्षाएँ हैं।-डॉ रिखब चन्द जैन(चेयरमैन टी.टी. ग्रुप) जैन धर्म की मान्यताएँ, विशेषताएँ और चातुर्मास (Beliefs, Characteristics and Chaturmas of Jainism in hindi)

सभी पर्वों का राजा है पर्युषण पर्व (Paryushan festival is the king of all festivals)

सभी पर्वों का राजा है पर्युषण पर्व (Paryushan festival is the king of all festivals)दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है। जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे। वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है। जैन धर्म में कुल २४ तीर्थंकर हुए हैं। तीर्थंकर अर्‍हंतों में से ही होते हैं। जैन संस्कृति में जितने भी पर्व व त्योहार मनाए जाते हैं, लगभग सभी में तप एवं साधना का विशेष महत्व है। जैनों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है पर्युषण पर्व। पर्युषण पर्व का शाब्दिक अर्थ है आत्मा में अवस्थित होना। पर्युषण का एक अर्थ है कर्मों का नाश करना। कर्मरूपी शत्रुओं का नाश होगा तभी आत्मा अपने स्वरूप में अवस्थित होगी अतः यह पर्युषण पर्व आत्मा का आत्मा में निवास करने की प्रेरणा देता है। यह सभी पर्वों का राजा है, इसे आत्मशोधन का पर्व भी कहा गया है, जिसमें तप कर कर्मों की निर्जरा कर अपनी काया को निर्मल बनाया जा सकता है। पर्युषण पर्व को आध्यात्मिक दिवाली की भी संज्ञा दी गई है, जिस तरह दिवाली पर व्यापारी अपने संपूर्ण वर्ष का आय व्यय का पूरा हिसाब करते हैं, गृहस्थ अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं, ठीक उसी तरह पर्युषण पर्व के आने पर जैन धर्म को मानने वाले लोग अपने वर्ष भर के पुण्य पाप का पूरा हिसाब करते हैं, वे अपनी आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल की साफ-सफाई करते हैं। पर्युषण महापर्व मात्र जैनों का पर्व नहीं है, यह एक सार्वभौम पर्व है, पूरे विश्व के लिए यह एक उत्तम और उत्कृष्ट पर्व है, क्योंकि इसमें आत्मा की उपासना की जाती है। संपूर्ण संसार में यही एक ऐसा उत्सव या पर्व है जिसमें आत्मरत होकर व्यक्ति आत्मार्थी बनता है व अलौकिक, आध्यात्मिक आनंद के शिखर पर आरोहण करता हुआ मोक्षगामी होने का सद्प्रयास करता है। पर्युषण आत्म जागरण का संदेश देता है और हमारी सोई हुई आत्मा को जगाता है। यह आत्मा द्वारा आत्मा को पहचानने की शक्ति देता है। पर्युषण पर्व जैन धर्मावलंबियों का आध्यात्मिक त्योहार है। पर्व शुरू होने के साथ ही ऐसा लगता है मानो किसी ने दस धर्मों की माला बना दी हो, यह पर्व मैत्री और शांति का पर्व है। जैन धर्मावलंबी भाद्रपद मास में पर्युषण पर्व मनाते हैं। श्वेताम्बर संप्रदाय के पर्युषण ८ दिन चलते हैं, उसके बाद दिगम्बर संप्रदाय वाले १० दिन तक पर्युषण मनाते हैं, उन्हें वे दसलक्षण के नाम से भी संबोधित करते हैं, यह पर्व अपने आप में ही क्षमा का पर्व है, इसलिए जिस किसी से भी आपका बैरभाव है, उससे शुद्ध हृदय से क्षमा मांग कर मैत्रीपूर्ण व्यवहार करें।भारतीय संस्कृति का मूल आधार तप, त्याग और संयम हैं, संसार के सारे तीर्थ जिस प्रकार समुद्र में समाहित हो जाते हैं, उसी प्रकार दुनिया भर के संयम, सदाचार एवं शील ब्रह्मचर्य में समाहित हो जाते हैं। मानव की सोई हुई अन्तः चेतना को जागृत करने, आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार, सामाजिक सद्भावना एवं सर्व धर्म समभाव के कथन को बल प्रदान करने के लिए पर्यूषण पर्व मनाया जाता है, साथ ही यह पर्व सिखाता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति में ज्ञान व भक्ति के साथ सद्भावना का होना भी अनिवार्य है, जैन धर्म में दस दिवसीय पर्युषण पर्व एक ऐसा पर्व है जो उत्तम क्षमा से प्रारंभ होता है और क्षमा वाणी पर ही उसका समापन होता है। क्षमा वाणी शब्द का सीधा अर्थ है कि व्यक्ति और उसकी वाणी में क्रोध, बैर, अभिमान, कपट व लोभ न हो।दशलक्षण पर्व, जैन धर्म का प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण पर्व है। दशलक्षण पर्व संयम और आत्मशुद्धि का संदेश देता है। दशलक्षण पर्व साल में तीन बार मनाया जाता है लेकिन मुख्य रूप से यह पर्व भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से लेकर चतुर्दशी तक मनाया जाता है। दशलक्षण पर्व में जैन धर्म के जातक अपने मुख्य दस लक्षणों को जागृत करने की कोशिश करते हैं। जैन धर्मानुसार दस लक्षणों का पालन करने से मनुष्य को इस संसार से मुक्ति मिल सकती है। संयम और आत्मशुद्धि के इस पवित्र त्यौहार पर श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक व्रत-उपवास रखते हैं। मंदिरों को भव्यतापूर्वक सजाते हैं तथा भगवान महावीर का अभिषेक कर विशाल शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं, इस दौरान जैन व्रती कठिन नियमों का पालन भी करते हैं जैसे बाहर का खाना पूर्णतः वर्जित होता है, दिन में केवल एक समय ही भोजन करना आदि। पर्युषण पर्व की समाप्ति पर जैन धर्मावलंबी अपने यहां पर क्षमा की विजय पताका फहराते हैं और फिर उसी मार्ग पर चलकर अपने अगले भव को सुधारने का प्रयत्न करते हैं। आइए! हम सभी अपने राग-द्वेष और कषायों को त्याग कर भगवान महावीर के दिखाए मार्ग पर चलकर विश्व में अहिंसा और शांति का ध्वज फैलाएं। क्षमा करें और कराएं साथ ही भारत को ‘भारत’ ही बोलें। सभी पर्वों का राजा है पर्युषण पर्व  (Paryushan festival is the king of all festivals)

क्षमावणी पर्व -गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी (Ganini Shri Gyanmati Mataji)

क्षमावणी पर्व -गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी (Ganini Shri Gyanmati Mataji)दशलक्षण पर्व का प्रारम्भ भी क्षमाधर्म से होता है और समापन भी क्षमाधर्म पर्व से किया जाता है। दस दिन धर्मों की पूजा करके, जाप्य करके जो परिणाम निर्मल किये जाते है और दश धर्मों का उपदेश श्रवण कर जो आत्म शोधन होता है उसी के फलस्वरूप सभी श्रावक-श्राविकायें किसी भी निमित्त परस्पर में होने वाली मनो-मलिनता को दूर कर आपस में क्षमा मांगते हैं, क्योंकि यह क्रोध कषाय प्रत्यक्ष में ही अग्नि के समान भयंकर है।क्रोध आते ही मनुष्य का चेहरा लाल हो जाता है, होंठ काँपने लगते हैं, मुखमुद्रा विकृत और भयंकर हो जाती है, किन्तु प्रसन्नता में मुख मुद्रा सौम्य, सुन्दर दिखती है, चेहरे पर शांति दिखती है, वास्तव में शांत भाव का आश्रय लेने वाले महामुनियों को देखकर जन्मजात बैरी ऐसे क्रूर पशुगण भी क्रूरता छोड़ देते हैं। यथा- सारंगी सिंहशावं स्पृशति सुतधिया नंदिया व्याघ्र पोतं। मार्जारी हंसबालं प्रणयपरवशा केकिकांता भुजंगीम।।वैराण्याजन्मजातान्यपि गलितमदा जंतवोऽन्ये त्यजंति।श्रित्वा साम्यैकरूढं प्रशमितकलुषं योगिनं क्षीणमोहम।। हरिणी सिंह के बच्चे को पुत्र की बुद्धि से स्पर्श करती है, गाय व्याघ्र के बच्चे को दूध पिलाती है, बिल्ली हंसों के बच्चों को प्रीति से पालन करती है एवं मयूरी सर्पों को प्यार करने लगती है, इस प्रकार से जन्मजात भी बैर को क्रूर जंतुगण छोड़ देते हैं, कब? जबकि वे पापों को शान्त करने वाले मोहरहित और समताभाव में परिणत ऐसे योगियों का आश्रय पा लेते हैं अर्थात् ऐसे महामुनियों के प्रभाव से हिंसक पशु अपनी द्वेष भावना छोड़कर आपस में प्रीति करने लगते हैं, ऐसी शांत भावना का अभ्यास इस क्षमा के अवलंबन से ही होता है।क्रोध कषाय को दूर कर इस क्षमाभाव को हृदय में धारण करने के लिये भगवान् पार्श्वनाथ का चरित्र, श्री संजयंत मुनि का चरित्र और तुंकारी की कथायें पढ़नी चाहिये तथा क्षमाशील साधु पुरुषों का आदर्श जीवन देखना चाहिये। आचार्य शांतिसागर जी आदि साधुओं ने इस युग में भी उपसर्ग करने वालों पर क्षमाभाव धारण कर प्राचीन आदर्श प्रस्तुत किया, बहुत से श्रावक भी क्षमा करके-कराके अपने में अपूर्व आनंद का अनुभव करते हैं, अत: हृदय से क्षमा करना तथा दूसरों से क्षमा का निवेदन करना ही ‘क्षमावणी पर्व’ है।क्षमावणी पर्व -गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी (Ganini Shri Gyanmati Mataji)

नागदा श्रीसंघ के आंगणिया में पधारे गुरूवर (Guruvar arrived in the courtyard of Nagda Srisangh)

चातुर्मासिक भव्य मंगल प्रवेश नागदा श्रीसंघ के आंगणिया में पधारे गुरूवर (Guruvar arrived in the courtyard of Nagda Srisangh)राजगढ़: श्री श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन श्रीसंघ नागदा जं. के तत्वावधान में वर्ष २०२१ में होने वाले चातुर्मास के अंतर्गत प.पू. श्रीमद्विजय हेमेन्द्रसूरिश्वरजी म.सा. के शिष्यरत्न एवं प.पू. श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्र सूरिश्वरजी म.सा. के आज्ञानुवर्ति मुनिराज श्री चन्द्रयशविजयजी म.सा. एवं मुनिश्री जिनभद्रविजयजी म.सा. का मंगल प्रवेश चंबल सागर मार्ग स्थित पुरानी नगर पालिका से रविवार को प्रातः ९ बजे प्रारम्भ हुआ, जिसकी अगवानी श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन श्रीसंघ एवं आत्मोद्धारक चातुर्मास समिति २०२१ के सदस्यों द्वारा की गई।सर्वप्रथम बैण्ड की धुन पर हाथ में मंगल कलश लिये महिलाओं ने मुनिश्री की भव्य सामैयापूर्वक अगवानी की, जिसका लाभ सरदारमलजी विमलचंदजी नागदा परिवार ने लिया। जुलूस भव्य वरघोड़े के रूप में महात्मा गांधी मार्ग स्थित चन्द्रप्रभु राजेन्द्रसूरि जैन मन्दिर होते हुए जवाहर मार्ग, शांतिनाथ जिनालय, रामसहाय मार्ग, सुभाष मार्ग होते हुए स्थानीय कृषि उपज मण्डी समिति प्रांगण में भव्य धर्मसभा के रूप में परिवर्तित हुआ, जहां पर मुनिश्री को चावल से बदाने का लाभ ऋषभजी सुभाषजी नागदा परिवार एवं प्रथम गवली करने का लाभ कमलेशजी दर्शनजी नागदा परिवार ने लिया। मंगल प्रवेश की पूर्व संध्या पर आयोजित महिला सांझी गीत एवं मेहन्दी का कार्यक्रम पार्श्वप्रधान पाठशाला भवन में रखा गया, जिसका लाभ प्रमोदकुमार सुनीलकुमार कोठारी परिवार द्वारा लिया गया।धर्मसभा का हुआ आयोजन: स्थानीय कृषि उपज मण्डी समिति प्रांगण में प्रातः ११ बजे प्रारम्भ हुई धर्मसभा में सर्वप्रथम मोहनखेड़ा तीर्थ से पधारे संगीतकार देवेश जैन ने संगीतमय गुरूवन्दन श्रीसंघ की गरिमामय उपस्थिति में किया गया, उसके पश्चात् मोहनखेड़ा तीर्थ पेढ़ी ट्रस्ट के मेनेजिंग ट्रस्टी सुजानमल सेठ, श्री राजहर्ष हेमेन्द्र ट्रस्ट नाकोडा के महामंत्री रमेश हरण, श्रीसंघ अध्यक्ष हेमन्त कांकरिया, श्रीसंघ संरक्षक भंवरलाल बोहरा, श्रीसंघ सचिव मनीष सालेचा व्होरा, चातुर्मास समिति अध्यक्ष रितेश नागदा, चातुर्मास समिति सचिव राजेश गेलड़ा, चातुर्मास संयोजक सुनील कोठारी एवं बाहर के श्रीसंघों से पधारे अध्यक्षगण ने भगवान एवं गुरूदेव के चित्र पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्वलन का कार्यक्रम सम्पन्न किया। स्वागत उद्बोधन देते हुए श्रीसंध के पूर्व अध्यक्ष सुनील वागरेचा ने लगातार २१ वर्षो से होते आ रहे चातुर्मास के आयोजनों के इतिहास पर प्रकाश डाला। स्वागत गीत श्रीमती रेखादेवी शाह(मुम्बई) ने प्रस्तुत किया। मुनिश्री की अगवानी करते हुए स्थानीय नगर पुलिस अधीक्षक मनोज रत्नाकर एवं अनुविभागीय अधिकारी आशुतोष गोस्वामी ने सभी समाजजनों को चातुर्मास में कोरोना गाइडलाईन का पालन करने का संदेश दिया। कार्यक्रम में क्षेत्रीय सांसद अनिल फिरोजिया, विधायक दिलिपसिंह गुर्जर, पूर्व विधायक दिलिप सिंह शेखावत, लालसिंह राणावत, सुल्तानसिंह शेखावत, गोपाल यादव, विजय पोरवाल, प्रकाश जैन आदि नेतागण मौजूद थे। संपूर्ण कार्यक्रम का संचालन आत्मोद्धारक चातुर्मास समिति उपाध्यक्ष सोनव वागरेचा ने किया। आभार हर्षित नागदा व चातुर्मास समिति कोषाध्यक्ष निलेश चौधरी ने माना।धर्मसभा के पश्चात् मुर्तिपूजक श्रीसंघ के स्वामीवात्सल्य का आयोजन भी किया गया एवं मंगल प्रवेश के पूर्व आयोजित नवकारसी का लाभ निलेश चौधरी मित्र मण्डल द्वारा लिया गया।आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का मार्ग है सिद्धितप: सिद्धितप से तन की शुद्धि, मन की विशुद्धि एवं आत्मा की समृद्धि बढ़ती है तथा यही सिद्धि तप का मार्ग हमें आत्मा को परमात्मा से जुड़ने के लिये अग्रसर करता है। उक्त संदेश देते हुए मुनिराज चन्द्रयशविजयजी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए चातुर्मास में होने वाले विभिन्न तप, आराधनाओं, धार्मिक अनुष्ठानों, महापुजन आदि के महत्व को समझाते हुए समाजजनों से अधिक से अधिक धर्मआराधनाओं मे जुड़ने की प्रेरणा दी।कई महानगरों के गुरूभक्त थे मौजूद : मीडिया प्रभारी ब्रजेश बोहरा, यश गेलड़ा एवं सौरभ नागदा ने संयुक्त रूप से बताया कि प्रवेश की पूर्व संध्या से ही नगर में गुरूभक्तों का आगमन शुरू हो चुका था। मुम्बई, भिवण्डी, चैन्नई, विजयवाड़ा, भिनमाल, राजगढ़, रतलाम, जावरा, इन्दौर, बिरमावल, खाचरौद, बदनावर आदि कई शहरों से गुरूभक्त सैकड़ों की तादाद में मुनिश्री की अगवानी करने हेतु पहुंचे। कार्यक्रम में मुनिश्री को काम्बली ओढ़ाने का लाभ मन्नालालजी सुभाषजी नागदा परिवार, चातुर्मासिक कलश स्थापना का लाभ रेखादेवी कांतिलालजी शाह (मुम्बई), चातुर्मासिक अखण्ड दीपक का लाभ प्रकाशदेवी नाथुलालजी संघवी परिवार (रतलाम) एवं आचार्यश्री के पट पर गुरूपुजा करने का लाभ सुरेशजी कबदी परिवार (विजयवाड़ा) द्वारा लिया गया।- संतोष लोढ़ा जैननागदा श्रीसंघ के आंगणिया में पधारे गुरूवर (Guruvar arrived in the courtyard of Nagda Srisangh)

आत्मिक-आध्यत्मिक उत्थान का अवसर चार्तुमास (Chaturmas, the occasion of spiritual )

आत्मिक-आध्यत्मिक उत्थान का अवसर चार्तुमास (Chaturmas, the occasion of spiritual )आत्मिक-आध्यत्मिक उत्थान का अवसर चार्तुमास (Chaturmas, the occasion of spiritual ) वर्षाकाल के चार महीनों को चार्तुमास के नाम से जाना जाता है। चार्तुमास का समय आषाढी पुनम से लेकर कार्तिक पूनम तक होता है। इसका प्रारंभ आषाढ़ी १४से हो जाता है। प्रत्येक तीन वर्षों के पश्चात् चार्तुमास चार महीनों की जगह पांच महीनों का हो जाता है। इस वर्ष चार्तुमास १८ जुलाई से आरंभ होने जा रहा है। बरसात के मौसम में अत्यधिक सुक्ष्म जीवों की उत्पति होती हैं और उससे सारी धरती आकीर्ण हो जाती है। आवागमन या विहार करने से उन जीवों का घात हो सकता है अतः अहिंसा धर्म का सुक्ष्मता से पालन करने वाले सभी साधु-संत अपने शिष्यों सहित एक ही स्थान पर निवास करते है, वर्षायोग की स्थापना करते है। भारत में जैन साधु-साध्वी ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों के साधु-संत भी इस क्रिया का पालन करते हैं तथा इस अवधि में ईश्वर का ध्यान करते हुये जीवदया, करुणा, सेवा, साधर्मिक भक्ति, व्रत, उपवास, परोपकार आदि प्रशस्त कार्यों को करते हैं तथा अपने भक्तों को करने की प्रेरणा देते हैं।वैसे तो साधु की गति सदैव नदी की निर्मल धारा की तरह होती है – सदैव चलते जाओ, बहते जाओ, लेकिन लोगों के अंदर धर्म की भावना प्रबल हो इसलिए परोपकारी गुरु चार मास एक जगह रुकते हैं तथा हमें धर्म की बारीकियां समझाते हैं और सद्मार्ग पर चलने की सीख देते हैं। साधु एक जगह से चलते हैं और दुसरी जगह पहुंचते हैं इस चलने और पहुंचने के बीच एक बड़ी घटना घट जाती है कि यह जहां से चलते हैं, वहां सब सूना-सूना हो जाता है और जहां पहुंचते हैं, वहां सब सोना ही सोना हो जाता हैं। (यह सोना (कनक) भौतिक नहीं बल्कि गुरु वाणी से हमारी आत्मा शुद्ध सोना बनने की प्रिव््रञ्ज्या की ओर अग्रसर हो जाती है) सदगुरु ही हमें ईश्वर तक पहुंचने का सही मार्ग दिखलाते हैं। चार महिनों में इनके उपदेशों का एक अंश भी हम ग्रहण कर लें तो हमारा जन्म सुधर सकता है, प्रेक्षा की एक किरण ही सोते हुए को जगाने का कार्य कर जाती है। कवि दादू दयाल कहते हैः- ‘दादू इस संसार में, ये द्वै रतन अमोल।एक साई एक संतजन, इनका मोल न तोल।।’ जैन धर्म में आकाश, वायु, पृथ्वी और जलसहित वनस्पति को सजीवमान ते हुए इन्हें हमारे वास्तविक जीवन संरक्षक के रुप में माना गया है। जिन शास्त्रों में जलको दूषित नहीं करने तथा उसका उपयोग जरुरत के हिसाब से कम से कम करने की व्याख्या है। (फव्वारे की जगह बाल्टी मग का प्रयोग करें, नल को खुला न छोड़ें, पानी में भी जीव हैं उनकी रक्षा करें। अनावश्यक लाईट का उपयोग न करें, अग्नि के जीवों की सुरक्षा करें।हिंदू धर्म में कहा जाता है कि चार्तुमास के वक्त भगवान् श्री विष्णु क्षीरसागर में शेषशय्या पर योगनिद्रा में शयन करते हैं, इसलिये इन महीनों में शादी-विवाह, गृहनिर्माण यज्ञ आदि कार्य नहीं किये जाते, ये चार मास तप-तपस्या, जप के लिये उपर्युक्त हैैं, अधिकतर हमारे धार्मिक त्यौहार इन्हीं महीनों के बीच में आते हैं। राखी, जैनों का महापर्व- पर्युषण, क्षमा-चापना दिवस, गणेश उत्सव, नवरात्रि, दशहरा, दीपावली आदि पर्व चार्तुमास के दौरान बड़े पैमाने पर हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते हंै। अधिकतर लोग श्रावण मास का व्रत, उपवास रखते है। वही इसलाम धर्म में भी रमजान के महीने में एक माह का व्रत रखने का प्रवधान है। पांचो वक्त की नमाज पढ़ना, दान देना, अपने पापों का प्रयश्चित करना, एक सच्चा मुसलमान ‘कुरान' में लिखे गये नियमों का पालन करता है।हमारे धर्म में व्यक्ति की नहीं व्यक्तित्व की पूजा-उपासना होती है, जो हमें यही संदेश देती हैं कि आप भी परमात्मा के पद को प्रप्त कर सकते हैं इसके लिये आपको अपना आचार-विचार उच्च कोटि का रखना होगा, इसका पालन करने में कठिनाइयां भी आती हैं, पर धर्म में छूट या शैथिल्यता के लिये जगह नहीं है। इन धार्मिक महीनों में जितना ज्यादा हो सके नियमों का पालन करना चाहिये दान-ध्यान, तप-तपस्या, सत्संग अधिक से अधिक करना चाहिये, जैनधर्मालंबियों को रात्रि भोजन का त्याग, दोनों समय प्रितव््रञ्ज्मण करना तथा व्याख्यान सुनने चाहिये।इस तरह से चार्तुमास के अंतर्गत हमें अपनी भौतिक सुख-सुविधायों से युक्ती स्त्रीयाओं का त्याग कर आत्मिक स्तर की क्रियाओं को मांजना होगा, तपाना होगा। शारीरिक व्रत के साथ-साथ मानसिक व्रत भी करना होगा, तभी हर तरह से हम आध्यात्मिक,आत्मिक उन्नति कर पायेंगे। चार्तुमास में देवशयन का रुपक हमें बाह्यमुखी वृतियों से हटकर अंतर्मुखी बनने का संदेश देता है। जीवन का सच्चा सुख परिधि से केन्द्र में जाने में है, अंतर जागरण करो और जीवन को धर्ममय बनाओ। कहते हैं चार्तुमास में बालटी में एक-दो बिल्वपत्र डालकर मन में ‘ॐ नमः शिवाय' का मंत्र ४-५ बार बोलकर स्नान करें तो विशेष लाभ होता है, उससे शरीर का वायु दोष दूर होता है और स्वास्थ्य स्वस्थ रहता है। याद आती है एक कहानी मुगल बादशाह अकबर ने दरबारियों से पूछा – बारह में से चार गये तो कितने बचे? सबने कहा ‘आठ', पर बीरबल चुप रहा – बादशाह ने बीरबल से जवाब मांगा-बीरबल ने उत्तर दिया ‘शून्य'। अकबर ने पूछा कैसे? बीरबल बोला, अगर बारह महीनों में से बरसात के चार महीने निकल गये तो न फसल होगी न जीवनयापन, तब सिर्फ शून्य ही बचेगा, और आध्यात्मिक स्तर पर धर्म ध्यान के यह चार महीने निकल गये तब भी बचा ‘शून्य', इन चार महीनों में साधु-संत एक जगह रहकर धर्म की देशना देते है। मनुष्य को उचित मार्ग समझाते हैं, अगर यह चार महीने हमने प्रमाद में गंवा दिये तो हमारे जीवन में भी बचा सिर्फ ‘शून्य', अगर चातुर्मास के यह चार महीने न हों तो भौतिक और आध्यत्मिक दोनों सृष्टियों से मनुष्य के लिये क्या बचेगा? सोचकर देखिये सिर्फ ‘शून्य'। सावधान- आध्यात्मिकता में डूबने के लिये बुढापे का इंतजार मत कीजिये, कब यह प्रण तन छोड़ देंगे हमें पता नहीं, पल-पल का सदुपयोग करके इस शून्य का हम धार्मिकी स्त्रीयाओं पीछे लगाकर, उसे अमूल्य बना दें और अपने जीवन बैंक को जीते जी और मृत्यु पर्यंत भी मालामाल कर दें। ‘इस जीने का गर्व क्या, कहां देह की प्रीत बात कहत ढर जात है, बालु की सी भीत’इसलिये उठिये-जागिये ओर प्रभु के प्रित पूर्ण समर्पित हो जाइये, किसी कवि ने बड़ी सुंदर बात कही है :-‘प्रभुता को ही सब मरै, प्रभु को मरै न कोयजो कोई प्रभु को मरे तो प्रभुता दासी होय’ अपने जीवन को सार्थक बनाइये और इसकी शुरुआत इसी चातुर्मास से शुरु कर दिजिए। -मंजू लोढा, मुंबई आत्मिक-आध्यत्मिक उत्थान का अवसर चार्तुमास (Chaturmas, the occasion of spiritual )

पर्यावरण और जैन सिद्धांत (Environment and Jainism in hindi )

पर्यावरण और जैन सिद्धांत (Environment and Jainism in hindi )पर्यावरण और जैन सिद्धांत (Environment and Jainism in hindi ) : पर्यावरण हमारे जीवन का महत्व पूर्ण तत्व है, ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की और मुक्त हाथों से हमें प्रकृतिक संपदाआें का खजाना प्रदान किया, लेकिन मनुष्य ने अपनी लालसा और लालच में आकर इन अमूल्य संपदाओं के साथ खिलवाड़ किया, यही वजह हैं कि हमें प्रकृतिक आपदाओं से निरंतर लड़ना पड़ रहा है। अति वर्षा, सुखा, भुकंप, भू संखलन, बर्फ का पिघलना, अतिगर्मी-सर्दी सुनामी आदि का सामना कर ना पड़ रहा है और हजारों मनुष्यों को एक साथ जान-माल से हाथ धोना पड़ रहा है। अगर हम आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित संसार देना चाहते हैं तो जरुरी है पर्यावरण की रक्षा, संरक्षण, संवर्धन जैन पद्धति से अगर जीवन को जिया जाये तो यह कोई मुश्किल कार्य नहीं।भगवान महावीर इस युग के सबसे बड़े और पहले वैज्ञानिक हैं, उनका हर उपदेश विज्ञान की भाषा है, हर सूत्र न मात्र आत्म शुद्धि का सोपान है बल्कि शारीरिक स्वस्थता, पारिवारिक आनंद, निरोगी काया, शुद्ध विचार, प्रकृति से प्रेम, सामाजिक जीवन या पन, त्याग, परोपकार निश्चित जीवन इत्यादि अनेकों लाभ हम उनके सिद्धांतों से प्राप्त कर सकते हैं।अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह तथा बह्मचर्य जैन धर्म के इन पांचमूल सुत्रों में प्रकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के संदेश निहित है। अहिंसा- प्रणा मात्र के प्रित प्रेम का प्रतीक है और पेड़ों में भी प्रण है, इसलिए इन्हें काटिये मत, इनकी सुरक्षा करें। पेड़ों में देवताओं का वास होता है, यह हमें शुद्ध हवा, फल-फूल-छाया तो देते ही हैं साथ ही इनकी लकिड़यां भी मनुष्य का जीवन-यापन करती हैं।जैन धर्म में आकाश, वायु, पृथ्वी और जलसहित वनस्पति को सजीवमान ते हुए इन्हें हमारे वास्तविक जीवन संरक्षक के रुप में माना गया है। जिन शास्त्रों में जलको दूषित नहीं करने तथा उसका उपयोग जरुरत के हिसाब से कम से कम करने की व्याख्या है। (फव्वारे की जगह बाल्टी मग का प्रयोग करें, नल को खुला न छोड़ें, पानी में भी जीव हैं उनकी रक्षा करें। अनावश्यक लाईट का उपयोग न करें, अग्नि के जीवों की सुरक्षा करें।जैन धर्म में चार्तुमास की परंपरा भी पर्यावरण संरक्षण का ही स्वरुप है, चार्तुमास के दौरान हमारे साधु-संत विहार नहीं करते ताकि हरितिमा, पोधों एवं सूक्ष्म जीवों का संरक्षण हो सके। हजारों वर्षों से हमारे तीर्थंकरों ने हमें जीवन जीने की ऐसी पद्धति बतलाई है, उससे हम अधिक से अधिक प्रकृति के करी बरहकर, स्वस्थ व प्रसन्न जीवन जी सकें। हमारे सभी तीर्थ करों को ‘केवल ज्ञान' की प्रप्ति किसी न किसी वृक्ष के नीचे रह कर प्राप्त की है। पीपल वट, अशोक वृक्ष हमारे धार्मिक जीवन के महत्वपूर्ण अंग है। हिंदू संस्कृति में भी ऋषी-मुनि जंगलों में रहकर प्रकृति की सुरक्षा के साथ ज्ञान की प्रप्ति करते थे।याद आती है एक कहानी, एक बार एक राजा भेष बदल कर प्रजा के दुःख-सुख जानने के लिये अपने राज्य में भ्रमण करता है, एक दिन उसने देखा एक८० साल की बुिढ़या माई ‘अखरोट का’ पौधा रोप रही थी, राजने विचार किया यह पौधा जब तक बड़ा होगा, इस पर फल लगेंगे तब तक तो यह माई जीवित नहीं रहेगी, यह निरर्थक ही पेड़ लगा रही है, व्यर्थ परिश्रम कर रही है यह सोचकर राजा को दुःख हुआ, वह इस बुिढ़या के पास जाकर यह बात कहते हैं, तब वह बुिढ़या बहुत ही सुंदर जवाब देती हे, ‘‘पथिक-अब तक मैंने दुसरों के लगाये गये पेड़ों से खुब फल खाये है, अब मेरी बारी हैं, जीवन खत्म हो जाये उससे पहले मैं दो-चार पेड़ लगाना चाहती हूं ताकि मेरे लगाये पेडों से दूसरे लोग भी लाभ उठा सकें, पेट भर सकें'' यह उत्तर सुनकर राजा गदगद हो गया और बोला ‘जिस देश में आप जैसे परोपकार का भाव रखनेवाले नागरिक है वह देश हमेशा हरा-भरा-खुशहाल रहेगा। अगर हम एक हरी-भरी वसुंधरा के संग सुखी जीवन जीना चाहते हैं तो हमें जैन धर्म के सिद्धांतों का पालन करना होगा और प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में पांच पेड़ों को लगाने का संकल्प लेना होगा। पर्यावरण और जैन सिद्धांत (Environment and Jainism in hindi )

जैन धर्म है अति प्राचीन धर्म (Jainism is very ancient religion)

जैन धर्म है अति प्राचीन धर्म (Jainism is very ancient religion) वैदिक पुराणों के पन्नों सेजैन धर्म है अति प्राचीन धर्म (Jainism is very ancient religion) हमारा यह संसार अनादिकाल से विद्यमान है, इस जगत का न कोई आदि है न कोई अन्त, जैसे यह संसार अनादि निदान है वैसे ही जैन धर्म भी अनादि निधन है, ऋग्वेद के पूर्वकाल में भी जैनधर्म विद्यमान था। इतिहास के विभिन्न काल खंडों में जैन धर्म को विभिन्न नामों से जाना जाता था, कभी यह श्रमण धर्म के नाम से, कभी व्रात्य के नाम से, कभी अर्हत के नाम से, तो कभी लोग इसे निर्ग्रन्थ धर्म के नाम से पहचानते थे, परन्तु महावीर युग से इसे जैन धर्म के नाम से जाना जाने लगा।जैन धर्म की प्राचीनता को वैदिक संस्कृत के प्राचीनतम ग्रंथों, वेदों, पुराणों में प्राप्त कतिपय उल्लेखों ने स्पष्ट कर दिया है, इस सन्दर्भ में प्रसिद्ध दार्शनिक विद्वान डॉ.राधाकृष्ण का कथन उल्लेखनीय है। ‘‘इस बात के प्रमाण पाये जाते हैं कि ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की पूजा होती थी, इसमें कोई सन्देह नहीं है कि जैन धर्म वर्द्धमान और पार्श्वनाथ से पहले प्रचलित था। यजुर्वेद में ऋषभदेव, अजितनाथ और अरिष्टनेमि, इन तीन तीर्थंकरों के नामों का उल्लेख है, भागवत पुराण भी इस बात का समर्थन करता है कि ऋषभदेव जैन धर्म के संस्थापक थे’’प्रो.विरूपाक्ष वाडिया वेदों में जैन तीर्थंकरोें के उल्लेखों को प्रस्तुत करते हुए बताते हैं कि-‘‘प्रकृतिवादी मरीषि ऋषभदेव का परिवार था। मरीचि ऋषि के स्रोत वेद-पुराण आदि ग्रन्थों में है और स्थान-स्थान पर जैन तीर्थंकरों का उल्लेख पाया जाता है, कोई ऐसा कारण नहीं कि हम वैदिक काल में जैन धर्म के अस्तित्व को न मानें। विविध वैदिक ग्रन्थों में-‘श्रमण’ शब्द को विविध रूपों में परिभाषित किया गया है यथा- ‘श्राम्यन्तीत श्रमण: मपस्यन्ते इत्यर्थ’ अर्थात् जो श्रम करता है, कष्ट सहता है, तप करता है वह श्रमण है, श्रीमद भागवद में श्रमण की व्याख्या इस प्रकार की गयी है- ‘‘श्रमण वातरशना, आत्मविद्या विशारदा’’ अर्थात श्रमण दिगम्बर मुनि होते ऊर्ध्वरेता, वात रशना एवं आत्मविद्या में विशारद होते हैं।वैदिक ग्रन्थों में जैन धर्मानुयायियों को अनेक स्थलों पर व्रात्य भी कहा गया है। व्रतों का आचरण करने के कारण वे व्रात्य कहे जाते हैं, ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि वैदिक आर्य व्रात्यों के जब सर्म्पक में आये तो वे उनसे बहुत प्रभावित हुए और उनके सम्मान में, उनकी प्रशंसा में अनेक मंत्रों की रचना भी की, जबकि व्रात्य यज्ञ विरोधि थे। व्रात्यों की यह प्रशंसा ऋग्वेद काल से अथर्वेद काल तक होती रही, श्रमण संस्कृति और वैदिक संस्कृति दोनों मिलकर भारतीय संस्कृति को अपना गरिमामयी योगदान देते हुए मानव जीवन को संवारते हुए पुराण युग तक आ पहुंचे। विष्णुपुराण के रचना काल में वैदिक ऋषियों के भाव बदल गये और वे व्रात्यों की निन्दा करने लगे, संभवत: इसका कारण यह रहा हो कि व्रात्यों की आध्यात्मिक धारा से प्रभावित होकर वैदिक कर्मकांड मूलक विचारधारा अपने मूल रूप को छोड़ कर औपनिषदिक ज्ञान काण्ड की ओर मुड़ने लगी थी, ऐसा स्थिति में अपने मूल रूप को स्थिर रखने के लिए वैदिक ऋषियों की चिन्ता स्वाभाविक थी, अत: इस काल में व्रात्यों को वैदिक अनुयायियों की दृष्टि में गिराने के प्रयत्न किये जाने लगे। साथ ही व्रात्यों को अंग-वंग-कलिंग और मगध राज्य में जाना निषिद्ध घोषित कर दिया गया। पुराणों में ऐसी भी रचनायें होने लगी कि एक राजा रानी को एक व्रात्य (जैन) से केवल बात करने के अपराध का प्रायश्चित अनेक जन्मों तक करना पड़ा, अथवा प्राणों पर संकट आने की दशा में यदि जैन मंदिर में जाकर प्राण रक्षा की संभावना हो सकती हो तो भी जैन मंदिर में प्रवेश करके प्राण रक्षा करने श्रेयस्कर है, इस प्रकार तमाम वैदिक पुराणों और वेदों में श्रमण, व्रात्य, अहित, ऋषभदेव और जैनधर्म इन शब्दों का प्रयोग जगह-जगह पर हुआ है। वैदिक ग्रन्थों में वातरशन, उर्ध्वमन्थी शब्दों का प्रयोग भी श्रमण मुनियों के लिए हुआ है, जहाँ-जहाँ भी इन शब्दों का प्रयोग हुआ है, अत्यन्त सम्मान पूर्ण आशय से हुआ है, अत: विभिन्न वैदिक ग्रन्थों में उक्त चर्चाओं से स्वत: ही सिद्ध हो जाता है कि जैन धर्म अति प्राचीन धर्म है और यह धर्म वैदिक सभ्यता से बहुत पहले ही भारत में फल-फूल रहा था, इतिहासकार भी अब इस बात को स्वीकार करने लगे हैं कि भारत में वैदिक सभ्यता का जब प्रचार-प्रसार हुआ, उससे पहले यहाँ जो सभ्यता थी वह अत्यन्त समृद्ध और समुन्नत थी। जैन धर्म है अति प्राचीन धर्म (Jainism is very ancient religion)

भगवान पार्श्वनाथ जी का अतिशय क्षेत्र कमठाण (Kamthan is the most important area of ​​Lord Parshwanath)

भगवान पार्श्वनाथ जी का अतिशय क्षेत्र कमठाण (Kamthan is the most important area of ​​Lord Parshwanath)जैन धर्म भारत वर्ष का अत्यन्त प्राचीन धर्म माना जाता है, क्रिस्त के जन्म से चार सौ साल पहले मौर्य चक्रवर्ती चंद्रगुप्त को कर्नाटक प्रांत का श्रवणबेलगोला में मानसिक शुद्धि के लिए आश्रय देकर जीवन रक्षण किया था, जैन धर्म बाहर के ठाट-बाट से उपर उठकर भीतरी शुद्धि को महत्व देने वाला धर्म है, जैन धर्म ने उत्तर भारत में जन्म लेकर सारे संसार को अहिंसा का संदेश दिया, दक्षिण भारत के कर्नाटक में जैन धर्म का डंका बजा, कर्नाटक का इतिहास इसका गवाह है, जैन धर्म का मूल तत्व अहिंसा का पालन तथा आत्म दर्शन है।कर्नाटक का मुकुट स्थान बीदर जिल्हा धर्म समन्वय का संगम स्थान है, यहाँ अलग-अलग धर्म के मंदिर, गुरुद्वारे, मसजिद, बुद्धस्तूप तथा जैनों के चैत्यालय भी हैं, बीदर जिल्हे के बहुत से गावों में आज भी जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां पाई जाती है। बीदर केन्द्र स्थान से ग्यारह किलोमीटर दूरी पर कमठाण ग्राम के पश्चिम दिशा की ओर भगवान पार्श्वनाथ जी का अति प्राचीन मंदिर हैं, बसवकल्याण तालुके के मिरखल, हुमनाबाद तालुका के केन्द्र स्थान पर पुरातन जैन मंदिर आज भी मौजूद हैं। भाल्की, औराद नगर में भी जैनों के जीर्ण-शीर्ण मंदिर और मूर्तियाँ पाई जाती हैं, बीदर से १८ किलोमीटर की दूर पर स्थित काडवाद ग्राम में सिद्धेश्वर मंदिर के बाहरी प्रांगण में आज भी भगवान महावीर की मूर्ति हमें देखने को मिलती है।कमठाण बीदर जिल्हे का एक बड़ा गाँव है, इस गाँव का इतिहास कर्नाटक के प्राचीन इतिहास से जुड़ा हुआ है। रट्ट वंश के राज्यभार के समय में यह एक बहुत बड़ा खेड़ा गाँव था। कमठाण आज बीदर जिल्हे का एक बड़े गाँव के रूप में जाना जाता है, इस ग्राम के रास्ते में कर्नाटक का बहुत बड़ा पशु वैदिक महाविद्यालय बसा हुआ है, पुरातन काल से इस ऐतिहासिक गाँव में पुरातन विठल मंदिर, वीरशैवों का पुरातन मठ तथा ग्यारहवी शताब्दी के भगवान पार्श्वनाथ जी का मंदिर देखने को मिलता है।११सौ साल पुराना यह पट्टा राज वंश के राज द्वारा निर्मित जैनों के तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथजी के ध्यान मग्न पदमासन की ४१ फीट ऊंची काले पाषाण की नयन मनोहर सुंदर मूर्ति आज भी दर्शनार्थियों को जैन धर्म का अहिंसा संदेश मौन वृत्त से दे रहा है, देखनेवालों को ऐसा प्रतीत होता है कि साक्षात तीर्थंकर मौनव्रत धारण कर तपस्या में जीवंत बैठे हुए हैं। करीब डेढ़ एकर की विशाल पटस्थल पर स्थित यह अतिशय क्षेत्र यात्रियों का यात्रा स्थल बन गया है, इस पुण्य परिसर में ३५ आम के वृक्ष यात्रार्थियों को ठंडी हवा प्रदान कर छांव देने को तत्पर हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार उत्तर दिशा का प्रवेश द्वार बड़ा ही शुभकारी होता हैं, यह जानकर उत्तर दिशा के सड़क और महाद्वार का काम होना बाकी है, पूर्व में भी एक महाद्वार है, मंदिर के सामने ३५ फीट उâंची मानस्तंभ बहुत ही मनमोहक एवं सुंदर है।भगवान पार्श्वनाथजी के गर्भ गृह के नीचे गुफा को अच्छी ढंग से मरम्मत करके वहां पर कांच का सुंदर काम करवाया गया है, यहाँ पर बैठ कर ध्यान करने से मन को शांति मिलती है, ऐसा कहा जाता है। भगवान पार्श्वनाथ जी के गर्भ गृह तथा शिखर में भी बड़े ही सुंदर ढंग से कांच का काम करवाया गया है, यहां पर भगवान पार्श्वनाथजी का प्रतिदिन पंचामृत अभिषेक कराया जाता है, इसके लिए एक शाश्वत पूजा निधि का आयोजन करते हैं, जिसमें करीब ४०० सदस्य हैं, सदस्यता अभियान जारी है, सदस्यता शुल्क ५०१ रु. है, यहां पर पहले जैनों की पाठशाला और छात्रावास था, ऐसा लोग कहते हैं, गुरुकुल में विद्या प्राप्त बहुत से लोग अभी भी बीदर जिल्हे में मिलते हैं, अत: वैसा ही छात्रावास कमठाण अतिशय क्षेत्र परिसर में पुन: स्थापित कर नि:सहाय जैन छात्रों को विद्यादान करने हेतु पंच कमेटी ने निर्णय लेकर ‘श्रुतज्ञान छात्रावास’ नाम से एक छात्रावास निर्माण करने का संकल्प लेकर, उसके लिए स्केच तैयार कराकर इस्टीमेट भी बनवाया है, यहां पर २०० लोगों को बैठने की व्यवस्था वाला एक सुन्दर प्रवचन मंदिर और ५०० व्यक्तियों की क्षमतावाली सभा गृह का निर्माण कार्य भी पूरा हो गया है, अगर दानियों से उदार हस्त से दान मिलता रहा तो यहाँ की पंच कमेटी कुछ ही समय में आधे अधुरे सभी कार्य पूर्ण कर इसे एक प्रेक्षणीय स्थान तथा जैनों का पवित्र यात्रा स्थान बनाने में देर नहीं लगेगी।भगवान पार्श्वनाथजी की मूर्ति १९८९ फरवरी तक जमीन में बनी गुफा में थी, जिसे प. पू. आ. श्री १०८ श्रुतसागर मुनिमहाराज जी ने गुफा के उपरी भाग में एक सुंदर संगमरमरी के वेदी बनवा कर उस पर माघ शुक्ल ५, १९८७ को प्रतिस्थापित करवाया, तबसे इस मूर्ति की प्रभावना और बढ़ गई है, हमेशा यात्रार्थी आकर दर्शन लाभ लेकर जाते हैं, हर साल यहाँ पर माघ शुक्ला ५ से ७ तक तीन दिन बड़े हर्षोल्लास से वार्षिक रथयात्रा महोत्सव मनाया जाता है। आंध्र, महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्यों से हजारों की संख्या में यात्रार्थी इस अवसर पर आकर पुण्य प्राप्ति के भागीदार बनते हैं, बीदर नगर के तथा पूरे जिल्हे के जैन समुदाय एकजुट होकर इस क्षेत्र की उन्नति के लिए रात दिन मेहनत कर रहा है, यहां पर यात्रार्थी और दर्शनार्थियों के सुविधा के लिए विश्रांतिगृह, भोजनगृह, पकवानगृह, शौचालय और पानी की सुविधा की गई है, इस गाँव में जैनों के सिर्फ दो ही परिवार बसे हुए हैं, जो मंदिर वâो यथा संभव स्वच्छ तथा सुव्यवस्थित रखने की पूरी कोशिश कर रहे हैं और पधारे दर्शनार्थियों को यथा योग्य सेवा और जरुरी सहुलियत उपलब्ध कराते हैं। भगवान पार्श्वनाथ जी का अतिशय क्षेत्र कमठाण (Kamthan is the most important area of ​​Lord Parshwanath)

मैं भारत हूँ परिवार द्वारा सुरेश नावंदर पुणे रत्न से सम्मानित (Suresh Navandar honored with Pune Ratna by main bharat hun family)

मैं भारत हूँ परिवार द्वारा सुरेश नावंदर पुणे रत्न से सम्मानित (Suresh Navandar honored with Pune Ratna by main bharat hun family)श्री माहेश्वरी बालाजी मंदिर, कसबा पेठ, तथा महेश सेवा संघ पुणे के भूतपूर्व अध्यक्ष एवं विश्वस्त सुरेश नावंदर को मैं भारत हूँ परिवार द्वारा सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में उत्कृष्ठ सेवा के लिए पुणे रत्न सम्मान दिया गया।‘मैं भारत हूँ’ परिवार की ओर से जूम मिटींग पर ‘भारत को ‘भारत’ कहें वेबिनार में अध्यक्ष ज्येष्ठ पत्रकार बिजय कुमार जैन इस विषय में अपनी भूमिका बतायी। कार्यक्रम के दौरान पुणे रत्न पुरस्कार से २५ लोगों को जूम पर सन्मानित किया गया। प्रमुख रूप से शाकाहार एवं व्यसन मुक्ति आंदोलन के प्रमुख डॉ. कल्याण गंगवाल, ज्येष्ठ समाजसेवी जेठमल दाधीच, संतोष व्यास, जैन कॉन्फरेन्स की महिला अध्यक्षा विमला बाफना, राजेंद्र भट्टड, डॉ. अशोक पगारीया, प्रविण चोरबेले आदि अपने विचार रखे। राष्ट्रीय अध्यक्ष बिजय कुमार जैन करिबन १०० से ज्यादा वेबिनार का आयोजन कर लाखों लोगों को अपने साथ भारत को ‘भारत’ ही बोला जाए, अभियान में जोड़ लिया है। अंत में संगठन मंत्री कानबिहारी अग्रवाल ने आभार प्रदर्शन किया। निशा लड्डा ने सुत्र संचालन किया। सुरेश नावंदर हाल में माहेश्वरी विद्या प्रचारक मंडल के शिष्यवृत्ती समिती के तथा पुणे पश्चिम परिवार प्रतिष्ठान में सदस्य रूप में कार्यरत हैं। मैं भारत हूँ परिवार द्वारा सुरेश नावंदर पुणे रत्न से सम्मानित (Suresh Navandar honored with Pune Ratna by main bharat hun family)

आचार्य महाप्रज्ञ के जीवन का रहस्य (Secrets of the life of Acharya Mahapragya)

आचार्य महाप्रज्ञ के जीवन का रहस्य (Secrets of the life of Acharya Mahapragya)अनेकांत का दृष्टिकोण : भाग्य मानूँ या नियति? सबसे पहली बात-मुझे जिन शासन मिला, जिन शासन का अर्थ – अनेकांत का दृष्टिकोण मिला, मैंने अनेकांत को जिया है, यदि अनेकांत का दृष्टिकोण नहीं होता तो शायद कहीं न कहीं दल-दल में पँâस जाता।मुझे प्रसंग याद है कि दिगम्बर समाज के प्रमुख विद्वान वैâलाशचंद्र शास्त्री आए, उस समय पूज्य गुरूदेव कानपुर में प्रवास कर रहे थे। मेरा ग्रंथ ‘जैन दर्शन, मनन और मीमांसा’ प्रकाशित हो चुका था, पंडित वैâलाशचंद्र शास्त्री ने कहा- मुनि नथमलजी ने श्वेताम्बर-दिगम्बर परंपरा के बारे में जो लिखना था, वह लिख दिया, वह हमें अखरा नहीं, चुभा नहीं, जिस समन्वय की शैली से लिखा है, वह हमें बहुत अच्छा लगा।मुझे अनेकांत का दृष्टिकोण मिला, इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ, जिस व्यक्ति को अनेकांत की दृष्टि मिल जाए, अनेकांत की आँख से दुनिया को देखना शुरू करे तो बहुत सारी समस्याओं का समाधान अपने आप हो जाता है।अनुशासन का जीवन : दूसरी बात-मुझे तेरापंथ में दीक्षित होने का अवसर मिला, मैं मानता हूँ – वर्तमान में तेरापंथ में दीक्षित होना परम सौभाग्य है वह इसलिए कि आचार्य भिक्षु ने जो अनुशासन का सूत्र दिया, जो अनुशासन में रहने की कला और निष्ठा दी, वह देवदुर्लभ है, अन्यत्र देखने को नहीं मिलती।मैंने अनुशासन में रहना सीखा, जो अनुशासन में रहता है, वह और आगे बढ़ जाता है, आत्मानुशासन की दिशा में गतिशील बन जाता है। तेरापंथ ने विनम्रता और आत्मानुशासन का जो विकास किया, वह साधु-संस्था के लिए ही नहीं, समस्त समाज के लिए जरूरी है।विनम्रता और आत्मानुशासन : महानता के दो स्त्रोत होते हैं – स्वेच्छाकृत विनम्रता और आत्मानुशासन, जो व्यक्ति महान होना चाहता है अथवा जो महान होने की योजना बनाता है, उसे इन दो बातों को जीना होगा, जो व्यक्ति इस दिशा में आगे बढ़ता है, विनम्र और आत्मानुशासी होता है, अपने आप महानता उसका वरण करती है।मुझे तेरापंथ धर्मसंघ में मुनि बनने का गौरव मिला और उसके साथ मैंने विनम्रता का जीवन जीना शुरू किया, आत्मानुशासन का विकास करने का भी प्रयत्न किया, मुझे याद है – इस विनम्रता ने हर जगह मुझे आगे बढ़ाया, जो बड़े साधु थे, उनका सम्मान करना मैंने कभी एक क्षण के लिए भी विस्मृत नहीं किया, सबका सम्मान किया।आचार्य तुलसी के निकट रहता था, विश्वास था कि जो गुरूदेव से बात करेंगे, उसका काम हो जाएगा, जो भी समस्या आती, मैं उसके समाधान का प्रयत्न करता, मैं छोटा था बड़े-बड़े साधु मुझे कहते, पर मैंने हमेशा उनके प्रति विनम्रता और सम्मान का भाव बनाए रखा, कभी उनको यह अहसास नहीं होने दिया कि कहीं कोई बड़प्पन का लक्षण मुझमें है।मैंने आत्मानुशासन का विकास किया, शासन करना न पड़े, जो स्वयं अपना नियंत्रण स्वयं अपने हाथ में लें, जिसका अर्थ यह माना जाये कि वह व्यक्ति अपने भाग्य की चाबी अपने हाथ में ले लेता है।गुरू का अनुग्रह: मैंने आचार्य भिक्षु को पढ़ा, उनकी जो संयम निष्ठा थी, त्याग और व्रत की निष्ठा थी, उसे पढ़ने से जीवन को समझने का बहुत अवसर मिला, पूज्य गुरूदेव का अनुग्रह था, जब भी कोई प्रसंग आया, मुझे कहा – ‘तुम यह पढ़ो’, शायद आचार्य भिक्षु ने पढ़ने का जितना मुझे अवसर दिया, मैं कह सकता हूँ – तेरापंथ के किसी भी पुराने या नए साधु को पढ़ने का उतना अवसर नहीं मिला होगा, उनकी क्षमाशीलता, उनकी विनम्रता, उनकी सत्यनिष्ठा को समझने और वैसा जीने का भी प्रयत्न किया है मैंने….मुझे आचार्य तुलसी से तो सब कुछ मिला था, उनके पास रहा, जीवन जिया, उन्होंने जो कुछ करना था, किया, इतना किया कि पंडित दलसुख भाई मालवणिया जितनी बार आते, कहते, ‘श्री आचार्य तुलसी और युवाचार्य महाप्रज्ञ-गुरू और शिष्य का ऐसा संबंध पच्चीस सौ वर्षों में कहीं रहा है, हमें खोजना पड़ेगा?’नवीनता के प्रति आकर्षण : अध्ययन का क्षेत्र बढ़ा, सिद्धसेन दिवाकर की जो एक उक्ति थी उसने मुझे बहुत आकृष्ट किया, उनका जो वाक्य पढ़ा, सीखा या अपने हृदय पटल पर लिखा, वह यह है – ‘जो अतीत में हो चुका है, वह सब कुछ हो चुका, ऐसा नहीं है’ सिद्धसेन ने बहुत बड़ी बात लिख दी – ‘मैं केवल अपने अतीत का गीत गाने के लिए नहीं जन्मा हूँ, मैं शायद उस भाषा में न भी बोलूँ, पर मुझे यह प्रेरणा जरूर मिली कि कुछ नया करने का हमेशा अवकाश रहता है, हम सीमा न बाँधें कि सब कुछ हो चुका है, अनंत पर्याय है, आज भी नया करने का अवकाश है। कुछ नया करने की रूचि प्रगाढ़ होती गई, मुझे कुछ नया भी करना चाहिए, कोरे अतीत के गीत गाने से काम नहीं होगा। वर्तमान में भी कुछ करना है – मेरे गीत मत गाओ, कोरे अतीत के गीत मत गाओ, कुछ वर्तमान को भी समझने का प्रयत्न करो।आचार्य हरिभद्र, जिनभद्र, गणि क्षमाश्रमण, आचार्य हेमचंद्र, आचार्य मलयगिरी, आचार्य कुंदकुंद आदि-आदि ऐसे महान आचार्य हुए हैं, जिन्हें पढ़ने पर कोई न कोई नई बात ध्यान में आती गई, मैं उन सबका संकलन और अपने जीवन में प्रयोग करता रहा। योग का संस्कार : दूसरी बात यह थी – जब मैं छोटा था तब गाँव में रहा, टमकोर छोटा-सा गाँव है। पाँच-सात हजार की आबादी वाला गाँव, हम कई बच्चे खेल रहे थे, गाँव में ज्यादा कोई काम तो होता नहीं, पढ़ाई करते नहीं थे, विद्यालय भी नहीं था। सारा दिन खेलकूद करते रहना, रोटी खाना और सो जाना, बस यही क्रम था। मैंने लक्ष्य बनाया था – मुझे अच्छा साधु बनना है और मुझे जिन शासन की, भिक्षु शासन की और मानवता की सेवा में लगना है, काम करना है, जीवन भर यही लक्ष्य रहा, लक्ष्य में कोई अंतर नहीं आया, समस्याएँ आती-रहती हैं, बाधाएँ आती हैं, उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, पर लक्ष्य आपका निश्चित हो तो आप मंजिल तक जरुर पहुँचेगें। आचार्य महाप्रज्ञ के जीवन का रहस्य (Secrets of the life of Acharya Mahapragya)