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तेरापंथ के संस्थापकआचार्य भिक्षुजन्म पर्व १९ जुलाई (तिथिनुसार)

तेरापंथ के प्रवर्तक आचार्य भिक्षु श्रमण परंपरा के महान संवाहक थे, उनका जन्म वि. स. १७८३ आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी को कंटालिया (मारवाड़) में हुआ, पिता का नाम शाह बल्लुजी तथा माता का नाम दीपा बाई था, जाति ओसवाल तथा वंश सकलेचा था। आचार्य भिक्षु का जन्म-नाम भीखण था, प्रारंभ से ही वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे, तत्कालीन परंपरा के अनुसार छोटी उम्र में ही उनका विवाह हो गया, वैवाहिक जीवन से बंध जाने पर भी उनका जीवन वैराग्य भावना से ओतप्रोत था। धार्मिकता उनकी रगरग में रमी थी, पत्नी भी उन्हें धार्मिक विचारों वाली मिली, पति-पत्नी दोनों ही दिक्षा लेने के उद्यत हुए, किंतु नियति को शायद यह मान्य नहीं था, कुछ वर्षों के बाद पत्नी का देहावसान हो गया। भीखणजी अकेले ही दिक्षा लेने को उद्यत हुए, पर माता ने दीक्षा की अनुमति नहीं दी। तत्कालीन स्थानकवासी संप्रदाय के आचार्य श्री रघुनाथ जी के समझाने पर माता ने कहा ‘महाराज’ मैं इसे दीक्षा की अनुमति कैसे दे सकती हूं क्योंकि जब यह गर्भ में था तब मैंने सिंह का स्वप्न देखा था, उस स्वप्न के अनुसार यह बड़ा होकर किसी देश का राजा बनेगा और सिंह जैसी प्रकृति होगी। आचार्य रघुनाथ जी ने कहा बाई यह तो बहुत अच्छी बात है। राजा तो एक देश में पुजा जाता है, तेरा बेटा तो साधु बन कर सारे जगत का पुज्य बनेगा और सिंह की तरह गुंजेगा, इस प्रकार आचार्य रघुनाथ जी के समझाने पर माता ने सहर्ष दिक्षा की अनुमति दे दी। वि.स. १८०८ मार्गशीर्ष कृष्णा बारस को भीखणजी ने आचार्य रघुनाथजी के पास दीक्षा ग्रहण की। संत भीखण जी की दृष्टि पैनी और मेधा सूक्ष्मग्राही थी, तत्व की गहराई में बैठना स्वाभाविक बात थी, थोड़े ही वर्षों में वे जैन शास्त्रों के पारगामी पंडित बन गए।  वि.स.१८१५ के आस-पास संत भीखणजी के मस्तिष्क में साधु वर्ग के आचार-विचार संबन्धी शिथिलता के प्रति एक क्रांति की भावना पैदा हुई, उन्होंने अपने क्रांति पूर्ण विचारों को आचार्य रघुनाथजी के सामने रखा, दो वर्ष तक विचार विमर्श होता रहा, जब कोई संतोषजनक निर्णय नहीं हुआ तब विचार भेद के कारण वि.स. १८१७ चैत्र शुक्ला नवमी को कुछ साधुओं सहित बगड़ी (मारवाड़) में उनसे पृथक हो गये, उनकी धर्म क्रांति का विरोध हुआ, चूंकि उस समय पुज्य रघुनाथ जी का प्रभाव प्रबल था, इसलिए लोगों ने भीखणजी का असहयोग किया, ठहरने के लिए स्थान नहीं दिया, वहां से विहार किया। गांव के बाहर आये कि तेज आंधी आ गई, व्याघ्र स्थिति वाली कहावत घटित हो गई। पीछे गांव में जगह नहीं, आगे आंधी ने रास्ता रोक लिया, इसलिए उन्होंने पहला पड़ाव गांव के बाहर शमशान में जैतसिंहजी की छतरियों में किया, आज भी वे छतरीयां विद्यमान है।  संघ बहिष्कार के साथ ही आचार्य भीक्षु पर जैसे विरोधों के पहाड़ टूट पड़े, पर वे लोह पुरूष थे। विरोधों के सामने झुकना उन्होंने सिखा नहीं था, वे सत्य के महान उपासक थे। सत्य के लिए प्राण न्यौछावर करने के लिए वे तत्पर रहते थे, उन्हीं के मुख से निकले हुए शब्द ‘आत्मा राकारज सारस्यां मर पुरा देस्यां’, सत्य के प्रति आगद्य संपूर्ण के सुचक हैं। वे महान आत्मबलि थे जीवन में सुध-साधुता को प्रतिष्ठित करना चाहते थे। वि. स. १८१७ आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को केलवा (मेवाड़) में बारह साथियों सहित उन्होंने शास्त्र सम्मत दीक्षा ग्रहण की, यही तेरापंथ स्थापना का प्रथम दिन था, इसी दिन आचार्य भीक्षु के नेतृत्व में एक सुसंगठित साधु संघ का सूत्रपात हुआ जो संघ ‘तेरापंथ’ के नाम से प्रख्यात है। वि.स.१८१७ से लेकर वि.स. १८३१ तक पन्द्रह वर्ष का जीवन आचार्य भीक्षु का संघर्षमय रहा, यहां तक कहा जाता है कि उन्हें पांच वर्ष पेट भर आहार ही नहीं मिलता, कभी मिला तो कभी नहीं मिलता, इस महान संघर्ष की स्थति में आचार्य भीक्षु ने कठोर साधना, तपस्या, शास्त्रों का गंभीर अध्यन एवं संघ की भावी रूप रेखा पर चिंतन किया।  वि.स. १८३२ में आचार्य भिक्षु ने अपने प्रमुख शिष्य भारमल जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, उसी समय संघीय मर्यादाओं का भी निर्माण किया गया, उन्होंने पहला मर्यादा पत्र इसी वर्ष मार्ग शीर्ष कृष्णा सप्तमी को लिखा, उसके बाद समय-समय पर नई मर्यादाओं के निर्माण से संघ को सुदृढ करते रहे, उन्होंने अन्तिम मर्यादा पत्र लिखा स. १८५९ की शुक्ला सप्तमी को, एक आचार्य में संघ की शक्ति को केन्द्रित कर उन्होंने सुदृढ संगठन की नीव डाली, इससे अपने-अपने शिष्य बनाने की परंपरा का विच्छेद हो गया। भावी आचार्य के चुनाव का दायित्व भी उन्होंने वर्तमान आचार्य को सौपा। आज तेरापंथ धर्म संघ अनुशासित मर्यादित और व्यवस्थित धर्म संघ है, इसका श्रेय आचार्य भिक्षु कृत इन्हीं मर्यादाओं को जाता है। आचार्य भिक्षु ने अपने मौलिक चिंतन के आधार पर नये मूल्यों की स्थापना की। हिंसा व दान-दया संबंधी उनकी व्याख्या सर्वथा वैज्ञानिक कही जा सकती है। आचार्य भिक्षु की अहिंसा सार्वभौमिक क्षमता पर आधारित थी, बड़ों के लिए छोटों की हिंसा और पंचेन्द्रिय जीवों की सुरक्षा के लिए एकेन्द्रिय प्राणीयों का हनन आचार्य भिक्षु की दृष्टि में आगम सम्मत नहीं था। अध्यात्म व व्यवहार की भूमिका भी उनकी भिन्न थी, उन्होंने कभी किसी भी प्रसंग पर एक तुला से तोलने का प्रयत्न नहीं किया, उनके अभिमत से व्यवहार व अध्यात्म को सर्वत्र एक कर देना, घी और तम्बाकू के सम्मिश्रण जैसा अनुपादाय था। दान-दया के विषय में लौकिक एवं लौकतर भेद रेखा प्रस्तुत कर आचार्य भिक्षु ने जैन समाज में प्रचलित मान्यता के समक्ष नया चिंतन प्रस्तुत किया, उस समय समाजिक सम्मान का मापदण्ड दान-दया पर अवलंबित था। सर्वगोपलब्धि और पुण्योपलब्धि की मान्यताएं भी दान-दया के साथ जुड़ी हुई थी। आचार्य ने लौकिक दान-दया की व्यवस्था को कर्तव्य व सहयोग बता कर मौलिक सत्य का उद्घाटन किया। साध्य साधना के विषय में भी उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था, उनके अभिनत से सुध साधना के द्वारा ही सुध साध्य की प्राप्ती सम्भव है, उन्होंने कहा रक्त से सना वस्त्र कभी रक्त से शुद्ध नहीं होता, वैसे ही हिंसा प्रधान प्रवृत्ति कभी अध्यात्म के पावन लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकती।  आचार्य भिक्षु एक कुशल विधिवक्ता होने के साथ-साथ एक सहज कवि और महान साहित्यकार भी थे। आचार्य भिक्षु की साहित्य रचना का प्रमुख विषय सुध आचार का प्रतिपादन, तत्व दर्शन का विश्लेषण एवं धर्म संघ की मौलिक मर्यादाओं का निरूपण था, उनकी रचनाओं में प्राचीन वैराग्य में आख्यान भी निसद्ध था। आचार्य भिक्षु ने कभी कवि बनने का प्रयत्न नहीं किया और न कभी उन्होंने भाषा शास्त्र, छंद शास्त्र, अलंकार शास्त्र एवं रस शास्त्र का प्रशिक्षण प्राप्त किया पर उनके द्वारा रचे गये पदयों में रस, अनुप्रयास और अलंकारों के प्रयोग पाठक को मुग्ध कर देते हैं। आचार्य भिक्षु के साहित्य को पढ़ कर आधुनिक विद्वान उन्हें हिगल ओर काण्ट की तुला से बोलते हैं।  आचार्य भिक्षु जब तक जिए, ज्योर्तिमय बनकर जिए, उनके जीवन का हर पृष्ठ पुरुषार्थ की गौरवमयी गाथाओं से भरा पड़ा है।  आचार्य भिक्षु के शासन काल में ४९ साधु और ५६ साध्वियां दीक्षित हुई। वि.स. १८६० भाद्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन सिरियारी (मारवाड़) में उन्होंने समाधि मरण प्राप्त किया, उस समय उनकी आयु ७७ वर्ष की थी। 

श्वेताम्बर तेरापंथ (संक्षिप्त इतिहास)

श्वेताम्बर तेरापंथ जैन धर्म में श्वेताम्बर संघ की एक शाखा है, इसका उद्भव विक्रम संवत् १८१७ (सन् १७६०) में हुआ, इसका प्रवर्तन मुनि भीखण (भिक्षु स्वामी) ने किया था जो कालान्तर में आचार्य भिक्षु कहलाये, वे मूलतः स्थानकवासी संघ के सदस्य और आचार्य रघुनाथ जी के शिष्य थे। आचार्य संत भीखण जी ने जब आत्मकल्याण की भावना से प्रेरित होकर शिथिलता का बहिष्कार किया था, तब उनके सामने नया संघ स्थापित करने की बात नहीं थी, परंतु जैनधर्म के मूल तत्वों का प्रचार एवं साधुसंघ में आई हुई शिथिलता को दूर करना था, उस ध्येय में वे कष्टों की परवाह न करते हुए अपने मार्ग पर अडिग रहे। संस्था के नामकरण के बारे में भी उन्होंने कभी नहीं सोचा था, फिर भी संस्था का नाम ‘तेरापंथ’ हो ही गया, इसका कारण निम्नोक्त घटना है: जोधपुर में एक बार आचार्य भिक्षु के सिद्धांतों को मानने वाले १३ श्रावक एक दुकान में बैठकर सामायिक कर रहे थे, उधर से वहाँ के तत्कालीन दीवान फतेहसिंह जी सिंधी गुजरे, तो देखा श्रावक यहाँ सामायिक क्यों कर रहे हैं? उन्होंने इसका कारण पूछा, उत्त्तर में श्रावकों ने बताया श्रीमान् हमारे संत भीखण जी ने स्थानकों को छोड़ दिया है, वे कहते है, एक घर को छोड़कर गाँव-गाँव में स्थानक बनवाना साधुओं के लिये उचित नहीं है, हम भी उनके विचारों से सहमत हैं, इसलिये यहाँ सामायिक कर रहे है। दीवान जी के आग्रह पर उन्होंने सारा विवरण सुनाया, उस समय वहाँ एक सेवक जाति का कवि खड़ा सारी घटना सुन रहा था, उसने तत्काल १३ की संख्या को ध्यान में लेकर एक दोहा कह डाला-  आप आपरौ गिलो करै, ते आप आपरो मंत। सुणज्यो रे शहर रा लाका, ऐ तेरापंथी संत  बस यही घटना ‘तेरापंथ’ के नाम का कारण बनी, जब स्वामी जी को इस बात का पता चला कि हमारा नाम ‘तेरापंथी’ पड़ गया है तो उन्होंने तत्काल आसन छोड़कर भगवान को नमस्कार करते हुए इस शब्द का अर्थ किया– हे भगवान यह तेरा पंथ है।  हमने तेरा अर्थात् तुम्हारा पंथ स्वीकार किया है, अतः तेरा पंथी है। आचार्य संत भीखण जी ने सर्वप्रथम साधु संस्था को संगठित करने के लिये एक मर्यादा पत्र लिखा- (१) सभी साधु-साध्वियाँ एक ही आचार्य की आज्ञा में रहे। (२) वर्तमान आचार्य ही भावी आचार्य का निर्वाचन करें। (३) कोई भी साधु अनुशासन का भंग न करें। (४) अनुशासन भंग करने पर संघ से तत्काल बहिष्कृत कर दिया जाए। (५) कोई भी साधु अलग शिष्य न बनाए। (६) दीक्षा देने का अधिकार केवल आचार्य को ही हो। (७) आचार्य जहाँ कहें, वहाँ मुनि विहार या चातुर्मास करें, अपनी इच्छानुसार ना करें। (८) आचार्य के प्रति निष्ठाभाव रखें, आदि। इन्हीं मर्यादाओं के आधार पर आज २५९ वर्षों से तेरापंथ श्रमणसंघ अपने संगठन को कायम रखते हुए अपने ग्यारहवें आचार्य श्री महाश्रमणजी के नेतृत्व में लोककल्याणकारी प्रवृत्तियों में महत्वपूर्ण भाग अदा कर रहा है। संघव्यवस्था : तेरापंथ संघ में इस समय ६५१ साधु-साध्वियाँ हैं, इनके संचालन का भार वर्तमान में आचार्य श्री महाश्रमण पर है, वे ही इनके विहार, चातुर्मास आदि के स्थानों का निर्धारण करते हैं। प्रायः साधु और साध्वियाँ क्रमशः ३-३ व ५-५ के वर्ग रूप में विभक्त किए होते हैं, प्रत्येक वर्ग में आचार्य द्वारा निर्धारित एक अग्रणी होता है, प्रत्येक वर्ग को ‘सिंघाड़ा’ कहा जाता है। ये सिंघाड़े पदयात्रा करते हुए भारत के विभिन्न भागों, राजस्थान, पंजाब, गुजरात, सौराष्ट्र, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्यभारत, बिहार, बंगाल आदि में अहिंसा आदि का प्रचार करते रहते हैं। वर्ष भर में एक बार माघ शुक्ला सप्तमी को सारा संघ जहाँ आचार्य होते है, वहाँ एकत्रित होते हैं और आगामी वर्ष भर का कार्यक्रम आचार्य वहीं निर्धारित कर देते हैं और चातुर्मास तक सभी सिंघाड़े अपने-अपने स्थान पर पहुँच जाते हैं।  आचारसंहिता: तेरापंथी जैन साधु जैन सिद्धांतानुसार अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि पाँच महाव्रतों का पालन करते हैं। (१) उनके उपाश्रय, मठ आदि नहीं होते। (२) वे किसी भी परिस्थिति में रात्रिभोजन नहीं कर सकते। (३) वे अपने लिये खरीदे गए या बनाए गए भोजन, पानी व औषध आदि का सेवन नहीं करते। पदयात्रा उनका जीवनव्रत है। विचार पद्धतिः (१) संसार में सभी प्राणी जीवन चाहते है, मरना कोई नहीं चाहता अतः किसी की हिंसा करना पाप हैं। (२) मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, अतः उसकी रक्षा के लिये अन्य कुछ प्राणियों का वध सामाजिक क्षेत्र में मान्य होने पर भी धार्मिक क्षेत्र में मान्य नहीं हो सकता क्योंकि धर्म मानवतावाद को मानकर नहीं चलता।  (३) धर्म जोर जबरदस्ती में नहीं, हृदय परिवर्तन कर देने में हैं। (४) धर्म पैसों से नहीं खरीदा जा सकता, वह तो आत्मा की सत्प्रवृत्तियों में स्थित है। (५) जहाँ हिंसा है, वहाँ धर्म नहीं हो सकता।  (६) धर्म त्याग में है, भोग में नहीं।  (७) हर जाति और हर वर्ग का मनुष्य धर्म करने का अधिकारी है. धर्म में जाति और वर्ग का भेद नहीं होता। (८) गुणयुक्त पुरुष ही बंदनीय है, केवल वेश नहीं। (९) धर्म सारे ही कर्तव्य है पर सारे कर्तव्य धर्म नहीं, क्योंकि एक सैनिक के लिये युद्ध करना कर्तव्य हो सकता है पर आध्यात्मिक धर्म नहीं। दीक्षापद्धति: दीक्षार्थी उपदेश या अपने जन्म के संस्कारों से प्रेरणा पाकर जब आचार्यश्री के पास दीक्षा की प्रार्थना करता है तो उसके आचरण, ज्ञान्ा, वैराग्य आदि की कठोर परीक्षा ली जाती है, किसी-किसी की परीक्षा में तो पाँच सात वर्ष तक बीत जाते हैं, जो परीक्षा में उत्तीर्ण होता है, उसे ही दीक्षित किया जाता है। दीक्षा हजारों नागरिकों के बीच माता-पिता आदि पारिवारिक जनों की सहर्ष मौखिक और लिखित स्वीकृति, जिसमें कौटुंबिक तथा अन्य कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के हस्ताक्षर हों, के पश्चात् दी जाती है। तपश्चर्या : तपश्चर्या के क्षेत्र में भी तेरापंथ श्रमण संघ किसी से पीछे नहीं है। एक दिन आहार और एक दिन निराहार, इस प्रकार आजीवन तपश्चर्या करनेवाले तो संघ में अनेक साधु-साध्वियों है। पाँच, सात, आठ, दिन की तपस्या तो साधारण सी बात मानी जाती है। संघ में ऊंची से ऊंची १०८ दिन की तपस्या हो चुकी है, इन तपस्याओं में केवल पानी के सिवाय और कुछ नहीं लिया जाता है। उबली हुई छाछ (तक्र) का निथरा हुआ पानी पीकर तो चार, छः, नौ महीने (२७२ दिन) तक की तपस्या हो चुकी है। शिक्षाप्रणाली: तेरापंथ की शिक्षाप्रणाली भी प्राचीन गुरु परंपरा के आधार पर चलती है। सारे संघ में कोई भी वैतनिक पंडित नहीं रहता, स्वयं आचार्य ही सबको अध्ययन कराते हैं और फिर वे शिक्षित साधु-साध्वियों अपने से छोटों को, इसी परंपरा के आधार पर परीक्षाएं होती है, जिनमें व्याकरण, न्याय, दर्शन, कोश, आगम आदि का अध्ययन होता है। शिक्षा के साथ कला का भी विकास हुआ है। साधुचर्या के उपयोगी उपकरण बड़े कलापूर्ण ढंग से संपन्न किए जाते हैं, जिन्हें देखने से ही पता चल सकता है। हस्तलिपि का कौशल भी बहुत समुद्रत है। आज इस मुद्रणप्रधान युग में नौ इंच लंबे व चार इंच चौड़े पन्ने पर ८० हजार अक्षरों को बिना ऐनक के लिखना और वह भी डिग्री की कलम से, सचमुच आश्चर्यजनक घटना है, इसी प्रकार चित्र, धातु रहित प्लास्टिक के ऐनक, दूरवीक्षण मंत्र, आई ग्लास आदि भी बड़े कलापूर्ण ढंग से अपने हाथों से बना लेते हैं। साहित्यसर्जन साहित्यसर्जन के बारे में भी तेरापंथ श्रमण संघ अपना स्थान रखता है, विहार क्षेत्र अधिकांश राजस्थान में रहा, इसीलिये आचार्य श्री तुलसी के पहले की रचना राजस्थानी भाषा में हैं। तेरापंथ के आद्य प्रवर्तक आचार्य श्री भीखण जी ने अपने जीवनकाल में ३८,००० पद्यों की रगना की है जो आज ‘भिक्षु ग्रंथ रत्नाकर’ नाम से सुरक्षित है, तेरापंथ के चतुर्थ आचार्य श्री जयाचार्य ने भी विपुल साहित्य रचा है, उसका परिमाण लगभग तीन या साढ़े तीन लाख श्लोकों के बीच है, जिसमें सबसे बड़ो उनकी रचना है –भगवतीसूत्र का पद्यमय राजस्थानी भाषा में अनुवाद। इसकी श्लोक रचना करीब ८०,००० है, यह ग्रंथ राजस्थानी भाष का सबसे बड़ा ग्रंथ माना जाता है। तेरापंथ में संस्कृत का विकास अष्टमाचार्य कालुगणों के काल में हुआ, उनके समय में संस्कृत का वृहत् व्याकरण, भिक्षुशब्दानुशासन, लघु व्याकरण, कालकौमुदी व अन्य अनेक काव्यों की रचना हुई, नवम आचार्य श्री तुलसीगणी के काल में संस्कृत के साथ-साथ ‘हिंदी’ का भी द्रुत गति से विकास हुआ, स्वयं आचार्यश्री ने मिथुन्यायकर्णिका, जैनसिद्धांतदीपिका, कर्तव्यषदिवंशिका आदि ग्रंथों को संस्कृत में रचना की है और उनके शिष्यों ने भी अनेक सुंदर काव्यग्रंथों का निर्माण किया है, कई संतों ने हिंदी जगत् को भी अनेक पुस्तकें दी हैं, जिनमें जैन दर्शन के मौलिक तत्त्व, तेरापंथ का इतिहास, विजययात्रा, आचार्य श्री तुलसी, अहिंसा और उसके विचारक, तेरापंथ, अणुव्रत दर्शन, अणुव्रत, जीवनदर्शन, आचार्य भिक्षु और महात्मा गांधी, दर्शन और विज्ञान, अणु से पूर्ण की ओर आदि है, आजकल आचार्यश्री के सानिध्य में जैनागमों का हिंदी अनुवाद, बृहत् जैनागम शब्दकोश व आगमों के मूग पाठों का संपादन आदि कार्य चल रहे हैं।  तेरापंथ में ११ आचार्यों की गौरवशाली परम्पराः १ आचार्य श्री भिक्षु जी २ आचार्य श्री भारीमल जी ३ आचार्य श्री रायचन्द जी ४ आचार्य श्री जीतमल जी ५ आचार्य श्री मघराज जी ६ आचार्य श्री माणकलाल जी ७ आचार्य श्री डालचन्द जी ८ आचार्य श्री कालूराम जी ९ आचार्य श्री तुलसी जी १० आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी ११ आचार्य श्री महाश्रमण (वर्तमान आचार्य) जी

श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ में गुरुसप्तमी महापर्व पर उमड़ा आस्था का सैलाब दादा गुरुदेव श्रीमद्विजय राजेन्द्रसूरीष्वरजी म.सा. के १९७ वीं जन्म जयंती एवं ११७ वीं पुण्यतिथि मनाई गई

श्री आदिनाथ राजेन्द्र जैन श्वेताम्बर पेढ़ी (ट्रस्ट) श्री मोहनखेडा महातीर्थ के तत्वाधान में दादा गुरुदेव श्रीमद्विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की १९७ वीं जन्म जयंती एवं ११७ वीं पुण्यतिथि पंचान्हिका महोत्सव १५ से १९ जनवरी तक बड़े ही हर्षोल्लास एवं पूजा अर्चना के साथ मनाया गया। मोहनखेड़ा महातीर्थ परिसर को विद्युत सज्जा के साथ सजाया गया, पुरे जिन मंदिर परिसर व दादा गुरुदेव के समाधि मंदिर परिसर को पुष्प सज्जा व विद्युत सज्जा के साथ सजाया गया। गुरु सप्तमी के अवसर पर श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ में आने वाले सभी गुरुभक्तों को आवास, भोजन, यातायात, पार्किंग आदि की सभी सुविधाएं प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी ट्रस्ट मण्डल के द्वारा उपलब्ध कराई गई, साथ ही प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष निःशुल्क चाय एवं नास्ते के स्टाल भी लगाये गये। पुरे देश भर से हजारों गुरुभक्त अपनी श्रद्धा, आस्था और विश्वास को लेकर दादा गुरुदेव के चरणों में अपना शीष झुकाने के लिये गुरु सप्तमी महापर्व पर पधारे जिसमें मुम्बई, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, राजस्थान, मध्यप्रदेष, मालवांचल, उत्तरांचल सहित कई प्रदेशों के गुरुभक्त श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ पर दादा गुरुदेव श्रीमद्विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. दर्शन वंदन पूजन के लिये मोहनखेड़ा पहुंचें, जनजन की आस्था के केन्द्र श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ पर कई राजनैतिक हस्तियों का भी आगमन महापर्व गुरुसप्तमी पर हुआ। पौष सुदी पंचमी से निरंतर सभी गुरुभक्त शत्रुंजयावतार प्रभु श्री आदिनाथ भगवान व दादा गुरुदेव श्रीमद्विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की वाशक्षेप पूजा व केशर पूजा के लिये लम्बी-लम्बी कतारों में लगकर अपनी पूजा अर्चना के लिये इंतजार करते देखे गये, कहा जाता है कि दादा गुरुदेव के दरबार में जो भी भक्त अपनी झोली फेलाकर आता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, अपनी झोली भरकर ही आनन्द की अनुभुति के साथ अपने आत्म कल्याण की कामना करता है। गुरु सप्तमी महामहोत्सव के अवसर पर प्रातः ५ बजे से दादा गुरुदेव की १९७ वीं जन्म जयंती पर दादा गुरुदेव का पालना द्वारोघटन के साथ लाभार्थी परिवार के द्वारा झुलाया गया, तत्पश्चात् वासक्षेप पूजा, अभिषेक, प्रक्षाल, ब्रास, केसर, फुल, आंगी पूजा आदि के साथ दोपहर में दादा गुरुदेव की गुरुपद महापूजन का आयोजन हुआ। गुरुगुणानुवाद सभा का आयोजन धर्मसभा मण्डप में किया गया। श्री आदिनाथ राजेन्द्र जैन श्वेताम्बर पेढ़ी ट्रस्ट श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ द्वारा गुरु सप्तमी महापर्व पर आये हुए सभी गुरुभक्तों के लिये स्वामीभक्ति का आयोजन भी किया गया। रात्रि में दादा गुरुदेव की महाआरती लाभार्थी परिवार द्वारा उतारी गई। रात्रि में आरती पश्चात् रंगारंग भक्तिभावना का आयोजन रखा गया। तीर्थ पर विराजित आचार्य श्री ने दादा गुरुदेव के जीवन चरित्र पर व्याख्यान माला के तहत प्रवचन वाणी का श्रवण कराया। मंगलवार की रात्रि में चढ़ावों की जाजम के साथ रंगारंग भक्ति भावना का आयोजन संगीतकार नरेन्द्र वाणीगोता एण्ड पार्टी द्वारा पेढ़ी ट्रस्ट के तत्वाधान में किया गया।

तीर्थंकर महावीर के ८ कल्याणकारी संदेश

तीर्थंकर महावीर ने मानव-मात्र के लिए आठ कल्याणकारी सन्देशों का प्रतिपादन किया, जो इस प्रकार है:तीर्थंकर महावीर ने लोगों को कहा कि अपने अन्दर सुनने का अभ्यास उत्पन्न करो, सुनने से पाप-पुण्य की, धर्म-अधर्म की तथा सत्य-असत्य की ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त होती है। वास्तविक और यथार्थ के दर्शन होते हैं तथा मनुष्य यथोचित ढंग से जीने की कला सीखता है, इसके द्वारा मन में बैठी अनेक प्रकार की भ्राँतियों का भी निवारण होता है।जो सुना है, उसे याद रखो- अपने अन्दर सुने हुए को याद रखने की प्रवृत्ति का विकास करो, कभी भी कोई बात एक कान से सुनकर दूसरे कान से मत निकालो, जिस प्रकार छलनी जल से परिपूर्ण कर देने के बाद क्षण-भर में ही रिक्त हो जाती है, उसी प्रकार जीवन में प्रमुख तथ्यों को अपने कानों से श्रवण करके भूलो मत, यदि कोई मनुष्य सत्संग अथवा विद्या मन्दिर में सुना हुआ पाठ स्मरण नहीं रखेगा तो वह अपने जीवन में कभी भी उन्नति नहीं कर सकेगा।नए दोष-कर्म को रोको- नवीन दोषों से स्वयं को बचाते रहो। भ्रष्टाचार और पापाचार के भयंकर दलदल से स्वयं को दूर रखो। बुराई के फल से सदैव बचकर रहने वाला मनुष्य ही बुराई से अछुता रहता है और सदैव निर्भयता से जीवन यापन करता है।पुराने पाप कर्मों को तप से नष्ट करो- जो पाप कर्म अथवा रंग-बिरंगी गलतियाँ अतीत में हो चुकी हैं, उनसे छुटकारा पाने के लिए तप-साधना श्रेयस्कर है। तप-साधना पूर्व संचित पाप कर्मों को नष्ट करने के लिए सघन पश्चाताप करना एक सर्वश्रेष्ठ साधन है।ज्ञान की शिक्षा प्रदान करो- इस संसार में जो मनुष्य ज्ञान के प्रकाश से वंचित हैं, उन्हें ज्ञान की शिक्षा देना बहुत बड़ा कल्याणकारी कार्य है, उन्हें ज्ञान का प्रकाश देकर उनमें अज्ञान का निवारण करना अत्यन्त पुनीत कर्म है।जिसका कोई नहीं, उसके बनो- इस संसार में जो अनाथ हैं उन्हें सहारा दो, उनकी रक्षा करो और उन्हें इस बात का विश्वास दिलाओ कि वे बेसहारा नहीं है, ऐसे मनुष्यों को अन्न दो और वस्त्र दो, सदैव इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यदि हम किसी की सहायता करेंगे तो समय आने पर कोई हमारी सहायता करने वाला भी अवश्य होगा, स्मरण रखो कि यदि आज हमारी सहायता करने वाला कोई नहीं है तो हमने भी कभी किसी की सहायता ना की होगी।ग्लानिरहित सेवाभाव अपनाओ- हमें सेवा-भाव ग्लानिरहित होकर करना चाहिए, यदि सेवक सेवा करने वाले व्यक्ति से घृणा करता है तो उसकी सेवा करने का कोई औचित्य नहीं है, नर-सेवा को नारायण सेवा समझना ही सच्ची सेवा भावना है।निष्पक्ष निर्णय करो- द्वन्द्व दु:ख और अशान्ति का मूल है, द्वन्द्व को शीघ्र-से-शीघ्र समाप्त कर देना चाहिए, द्वन्द्वात्मक स्थिति में निर्णय करने वाले को निष्पक्ष रहना चाहिए, पक्षपात सत्य को असत्य और असत्य को सत्य में बदल देता है इस कारण द्वन्द्व समाप्त होने के बजाय बढ़ता चला जाता है। तीर्थंकर महावीर के इन आठ सन्देशों को अपने जीवन में उतारकर मनुष्य अपना ही नहीं दूसरों का भी कल्याण करता है।

तीर्थंकर महावीर निर्वाण पर्व पर खास प्रस्तुति
निर्वाण प्राप्ति का ध्रुव मार्ग

तीर्थंकर महावीर ने पावापुरी से मोक्ष प्राप्त किया, महावीर की आत्मा कार्तिक की चौदस को पूर्ण निर्मल पर्याय रुप से परिणित हुई और महावीर, सिद्धपद को प्राप्त हुए। पावापुरी में इन्द्रों तथा राजा-महाराजाओं ने निर्वाण-महोत्सव मनाया था, उसी दीपावली तथा नूतनवर्ष का आज दिवस है। भगवान पावापुरी स्वभाव ऊध्र्वगमन कर ऊपर सिद्धालय में विराज रहे हैं, ऐसी दशा भगवान को पावापुरी में प्रगट हुई, इसलिए पावापुरी भी तीर्थधाम बना, हम सम्मेदशिखर की यात्रा के समय पावापुरी की यात्रा करने गये, तब वहाँ भगवान का अभिषेक किया था, वहाँ सरोवर के बीच में – जहाँ से भगवान मोक्ष पधारे वहाँ भगवान के चरण कमल हैं। तीर्थंकरों का द्रव्य त्रिकाल मंगलरुप है तथा जो जीव, केवलज्ञान प्राप्त करने वाला है, उसका द्रव्य भी त्रिकाल मंगलरुप है।भगवान की आत्मा त्रिकाल मंगलस्वरुप है, उनका द्रव्य तो त्रिकाल मंगलरुप है ही, वे जहाँ से मोक्ष को प्राप्त हुए, वह क्षेत्र भी मंगल है, मोक्ष प्राप्त किया, इसलिए आज का काल भी मंगलरुप है और भगवान के केवल ज्ञानादिरुप भाव भी मंगलरुप हैं, इस प्रकार भगवान महावीर परमात्मा द्रव्य-क्षेत्र-काल और भाव से मंगलरुप है, भगवान के मोक्ष प्राप्त करने पर यहाँ भरतक्षेत्र में तीर्थंकर का विरह हुआ, भगवान का स्मरण कर भगवान के भक्त कहते हैं कि-हे नाथ! आपने चैतन्य स्वभाव में अन्तर्मुख होकर आत्मा की मुक्तदशा साथ ली और दिव्यवाणी द्वारा हमें उसी आत्मा का उपदेश दिया, ऐसे स्मरण द्वारा श्रद्धा-ज्ञान की निर्मलता करे, वह मंगलरुप है, जहाँ ऐसी निर्मलदशा प्रगट हो, वह मंगल क्षेत्र है, श्रद्धा-ज्ञान का जो भाव है, वह मंगल भाव है और आत्मा स्वयं मंगलरुप है, भगवान का मोक्षकल्याणक मनाने के बाद इन्द्र और देव नन्दीश्वर द्वीप में जाकर वहाँ आठ दिन तक उत्सव मनाते हैं।भगवान के निर्वाण का दिवस पर ‘अष्टप्राभृत’ में भी निर्वाण की ही गाथा पढ़ी जा रही है, निर्वाण किस प्रकार तथा वैâसे पुरुष का होता है, वह बात शीलप्राभृत की ११-१२ वीं गाथा में कहते हैं-णाणेव दंसणेव य तवेण, चरिएण सम्मसहिएणहोहदि परिणिव्वाणं, जीवाणं चरित्तसुद्धाणंसीलं रक्खंताणं दंसणसुद्धाण दिढचरित्ताणंअत्थि धुवं णिव्वाणं विसएसु विरत्तचित्ताणंउपयोग को अन्तर्मुख करके, धर्मी जीव, चैतन्य के शान्तरस का अनुभव करते हैं, जिस प्रकार कुएँ की गहराई में से पानी खींचते हैं, उसी प्रकार सम्यक् आत्मस्वभावरुप कारण परमात्मा को ध्येय रुप से पकड़ कर, उसमें गहराई तक उपयोग को उतारने से पूर्ण शुद्धता होती है और इसी रीति से निर्वाण होता है। निर्वाण कोई बाह्य वस्तु नहीं है, किन्तु आत्मा की पर्याय परमशुद्ध हो गयी तथा विकार से छुट गयी, उसी का नाम निर्वाण है।भगवान का मनुष्य शरीर था अथवा वङ्काऋषभ नाराचसंहनन था, इसलिए निर्वाण हुआ ऐसा नहीं है, किन्तु सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्याचारित्र और सम्य तप से भगवान ने मुक्ति प्राप्त की है, आज भगवान महावीर का शासन चल रहा है, भगवान अपने परम आनन्द में तृप्त हो रहे हैं… अतीन्द्रिय आनन्द का अनुभव कर रहे हैं, ऐसी निर्वाण दशा का आज मंगल दिवस है और यह निर्वाण के उपाय की गाथा भी मंगल है, इस प्रकार दीपावली मंगलमय है।जिसने चैतन्य में ही उपयोग लगाकर उसे बाह्य ध्येय से विमुख किया है, अर्थात् विषयों से विरक्त होकर चैतन्य के आनन्द-रस का स्वाद लेता है, आनन्दानुभव को उग्र बनाकर स्वाद में लेता है, ऐसा पुरुष नियमपूर्वक ध्रुवरुप से निर्वाण को प्राप्त होता है।देखो, यह निर्वाण का ध्रुवमार्ग! अन्तर्मुख होकर जिसने ऐसा मार्ग प्रगट किया, वह वहाँ से लौटता नहीं है… ध्रुवरुप से निर्वाण को प्राप्त करता है, जो जीव, दर्शन शुद्धि पूर्वक दृढ़ चारित्र द्वारा चैतन्य में एकाग्र होता है, उसे बाह्य विषयों से विरक्ति हो जाती है, उसी का नाम शील है और ऐसा शीलवान जीव अवश्य मोक्ष प्राप्त करता है।चैतन्यध्येय से च्युत होकर जिसने पर को ध्येय बनाया है, उस जीव के शील की रक्षा नहीं है, उसकी दर्शनशुद्धि नहीं है, उसके उपयोग में राग के एकतारुपी विषयों का ही सेवन है, जिसने चैतन्य स्वभाव की रुचि प्रगट की है और राग की रुचि छोड़ी है, उसे चैतन्य ध्येय से बाह्य विषयों का ध्येय छूट जाता है- ऐसा शील निर्वाणमार्ग में प्रधान है, इस प्रकार से दो गाथाओं में तो दर्शनशुद्धि के उपरान्त चारित्र की बात कह कर साक्षात् निर्वाण मार्ग का कथन किया गया है।अब, एक दूसरी बात कहते हैं- किन्हीं ज्ञानी धर्मात्मा को कदाचित् विषयों से विरक्ति न हुई हो अर्थात् चारित्रदशा की स्थिरता प्रगट न हुई हो, किन्तु श्रद्धा बराबर है तथा मार्ग तो विषयों की विरक्ति रुप ही है, इस प्रकार यथार्थ प्रतिप्रादन करते हैं तो उस ज्ञानी को मार्ग की प्राप्ति कही जाती है, सम्यग्मार्ग का स्वयं को भान है और उसी की भली-भाँति प्रतिपादन करते हैं, किन्तु अभी विषयों से विरक्ति रुप मुनिदशा आदि नहीं है।अस्थिरता है तो भी वे ज्ञानी धर्मात्मा मोक्षमार्ग के साधक हैं, वे मंगलरुप हैं, उन्हें इष्टमार्ग की प्राप्ति है और यथार्थ मार्ग दर्शाने वाले हैं, इसलिए उनके द्वारा दूसरों को भी सम्यकमार्ग की प्राप्ति होती है, किन्तु जो जीव, विषयों के राग को लाभ मानता है, उसे तो सम्यग्मार्ग की श्रद्धा ही नहीं है, वह तो उन्मार्ग पर है तथा उन्मार्ग को बतलाने वाला है। धर्मात्मा को राग होता है, किन्तु उसे वे बन्ध का ही कारण जानते हैं, इसलिए राग होने पर भी उनकी श्रद्धा में विपरीतता नहीं है, उन्हें मार्ग की प्राप्ति है और उनसे दूसरे जीव भी मार्ग प्राप्त कर सवेंâगे, सत्मार्ग को प्राप्त जीव ही सत्मार्ग की प्राप्ति में निमित्तरुप होते हैं।अज्ञानी, राग को स्वयं लाभ मानता है और दूसरों को भी मनवाता है, इसलिए वह स्वयं मार्ग से भ्रष्ट है और उसके निकट धर्म मार्ग की प्राप्ति नहीं हो सकती। अहा! चैतन्य के श्रद्धा-ज्ञान तथा उसमें लीनता रुप वीतरागता किंचित् कर्तव्य नहीं है। राग का एक कण भी मोक्ष को रोकनेवाला है, वह मोक्ष का साधन वैâसे हो सकता है? ऐसे ज्ञानी को श्रद्धा है। ज्ञानी जहाँ पुण्यभाव को भी छोड़ने योग्य मानते हैं, वहाँ वे पाप में स्वच्छन्तापूर्वक वैâसे बरतेगें? चारित्र दशारहित हो तो भी सम्यग्दृष्टि मोक्षमार्ग में ही है, क्योंकि उन्हें वीतराग चारित्र की भावना है और राग की भावना नहीं है। श्रद्धा में वे सारे जगत् से विरक्त हैं, ज्ञान-वैराग्य की अद्भुत शक्ति उनको प्रगट हुई है, अन्तर में चैतन्य को ध्येय बनाकर राग से भिन्नता का भान हुआ है- ऐसे भान बिना कोई राग से लाभ माने तथा उसका प्ररुपण करे तो वह उन्मार्ग में हैं, उसके ज्ञान का विकास निरर्थक है, भगवान के मार्ग को उसने नहीं जाना है, भगवान किस प्रकार मोक्ष को प्राप्त हुए- उसकी उसे खबर नहीं है। अस्थिरता के कारण सम्यक्त्वी के विषय न छूटे तथापि उनका ज्ञान नहीं बिगड़ता, दृष्टि के विषय में शुद्ध चैतन्य स्वभाव को पकड़ा है, वह कभी नहीं छूटता, उस ध्येय के आश्रम से वे सम्यक मार्ग बरतते हैं, मोक्ष के माणिक स्तम्भ उनके आत्मा में जम गये हैं… वीर प्रभु के मंगलमार्ग पर चलकर वे भी मुक्ति को साथ रहे हैं। पूर्णतारुप परिनिर्वाण, मंगलरुप है और उसके प्रारम्भ रुप सम्यक्त्व भी मंगलरुप है, इस साध्य और साधक दोनों की बात दीपावली के मांगलिक में आयी है।

मैं भारत हूँ फाउंडेशन द्वारा ऐतिहासिक कार्यक्रम का आयोजन
हम सभी जानते हैं की किसी भी इंसान के संवैधानिक नाम
२ नहीं हो सकते, तो हमारे देश के २ नाम क्‍यों?

रायपुर: लोग कहते हैं और हम सभी भारतीयों को बताया भी गया है कि इंडिया का मतलब ‘भारत’ होता है, ‘भारत’ का मतलब इंडिया होता है, क्या कभी नाम का अनुवाद हो सकता है, जब नाम का अनुवाद नहीं हो सकता तो इंडिया का मतलब भारत या भारत का मतलब इंडिया कैसे हो सकता है? हमारे देश का नाम भी एक ही रहना चाहिए केवल ‘भारत’।क्योंकि हजारों सालों से हमारे देश का नाम भारत’ ही रहा है, हमने लगभग ढाई सौ साल गुलामी की दास्तॉ सही और अपने आप को इंडियन कहने के लिए मजबूर रहे, पर आज हम स्वतंत्र हैं और हम चाहते हैं कि हम भारतीय बने रहें, क्योंकि पुराणों व वेदों में हमारे देश के नाम का उल्लेख ‘भारत’ ही मिलता है।पिछले १५ सालों से लगातार हमारा प्रयास रहा है कि पूरी दुनिया अपने देश को एक ही नाम से पुकारें केवल ‘भारत’।‘मैं भारत हूं फाउंडेशन’ एक अंतरराष्ट्रीय संस्थान है, संस्थान ने विश्व के कोने-कोने में फैले भारतीयों को बताने का प्रयास किया है कि नाम का कभी अनुवाद नहीं होता, भारत को केवल ‘भारत’ ही बोला जाना चाहिए और इसमें आंशिक सफलता भी मिली है। संस्थान ने भारत का ही एक राज्य ‘उत्तर प्रदेश’ के हर गलियों में ‘रथ यात्रा’ निकाली। भारत की राजधानी ‘दिल्ली’ में जन-जन तक अभियान को पहुंचाने के लिए भारत मां के रथ के साथ लोगों से संपर्क किया। दिल्‍ली के सुप्रीम कोर्ट के प्रांगण में अधिवक्ताओं के बीच कार्यक्रम किया। दिल्‍ली में स्थापित जनपथ में बाबा साहेब अंबेडकर इंटरनेशनल सभागार में विशाल कार्यक्रम किया, जिसमें कई राजनीतिक दलों के शिरोधार्य उपस्थित हुए। भारत की जितनी भी सामाजिक संस्थाएं हैं उनसे संपर्क किया गया। देश के कोने-कोने में रहने वाले भारतीयों से सोशल मीडिया व युवा छात्र-छात्राओं से संबंध स्थापित कर पूछा गया कि देश का नाम एक ही कैसे हो केवल ‘भारत’, क्योंकि हजारों सालों से हमारे देश का नाम ‘भारत’ ही रहा है यह वैदिक पुराणों में भी हमें लिखा मिलता है।‘भारत’ को केवल ‘भारत’ ही बोला जाए’ अभियान को आंशिक सफलता भी मिली है लेकिन जब तक भारतीय संविधान के अनुच्छेद क्रमांक १ में, जहां ‘इंडिया देट इज भारत’ लिखा है वहां ‘भारत ईज भारत’ नहीं लिखा जाएगा तब तक हम भारतीय चैन से नहीं बैठेंगे।‘मैं भारत हूं फाउंडेशन’ के पदाधिकारीयों ने भारत के केंद्रीय सरकार,सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल आदि से संपर्क कर निवेदन किया है। दिनांक ८ अक्टूबर २०२३ को ‘मैं भारत हूं फाउंडेशन’ के पदाधिकारी भारत का एक राज्य छत्तीसगढ की राजधानी ‘रायपुर’ में स्थापित वृंदावन सभागार में आप सबके समक्ष निवेदन लेकर आए हैं की छत्तीसगढ़ की राजधानी का हर बच्चा, युवा, बुजुर्ग, महिला-पुरुष जब भी किसी का अभिवादन करें ‘जय भारत’ से ही करें।हमें पूरा विश्वास है कि आप सभी का साथ हमें मिलेगा और आप अपने क्षेत्र में इस अभियान का उल्लेख जरूर करेंगे और जन जन तक यह बात पहुंचाने में साथ देंगे, क्योंकि हम सभी भारतीय हैं, भारत के रहने वाले हैं और हमारे देश का नाम एक ही रहे केवल ‘भारत’।कार्यक्रम में उपस्थित राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष श्रीमती निशा लढ्ढा ने अपने गरिमामयी उद्बोधन से सभागार में उपस्थित छत्तीसगढ वासियों को संबोधित किया। छत्तीसगढ के संयोजक वैâलाश रारा ने सभी का परिचय कराया और कहा कि जब तक ‘भारत को केवल भारत नहीं बोला जाएगा’ मैं चावल ग्रहण नहीं करâंगा। मंच का संचालन चिर-परिचित मंच संचालिका ‘मैं भारत हूँ फाउंडेशन’ की राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष ने अपनी गरिमामयी वाणी से संचालित कर रही थीं। उपस्थित मंचासीन वैâलाश रारा रायपुर- छत्तीसगढ संयोजक (मैं भारत हूँ फाउंडेशन), प्रो. रमेन्द्रनाथ मिश्रा रायपुर- अध्यक्ष इतिहास विभाग (Rएन्न्), गिरीश पंकज रायपुर- वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार, बिजय कुमार जैन मुंबई- राष्ट्रीय अध्यक्ष (मैं भारत हूँ फाउंडेशन), प्रदीप जैन रायपुर- सम्पादक दैनिक विश्व परिवार, सुरेन्द्र पाटनी रायपुर- प्रदेश अध्यक्ष भाजपा (र्‍उध् प्रकोष्ठ), राजकुमार राठी रायपुर- महामंत्री अंतर्राष्ट्रीय वैश्य महासम्मेलन ने अपने उद्बोधन दिए। जय भारत! -मैंभाहूँ

उत्तम क्षमा ही है महापर्व

जैन धर्म में दशलक्षण पर्व मनाया जाता है, यदि इन दसलक्षणों को जीवन में अपना लिया जाए तो मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है, इसमें पहला है- ‘उत्तम क्षमा’!मुनि महाराज ने जीवन भर इन गुणों को अपनाया है, कई अपशब्द सुनने के बाद भी मुनि महाराज प्रतिक्रिया नहीं देते, सामने वाले को क्षमा कर देते हैं। करीब सौ साल से भी अधिक समय की बात है, सन्‌ा १९०० में भारत में ब्रिटिश सरकार का शासन था, उस समय जीवन अभी की तरह आसान नहीं हुआ करता था। उस समय आचार्यश्री शान्ति सागर जी महाराज महान संत के रूप में जाने जाते थे, उसी कालावधि में शान्ति सागर जी विहार करते हुए धौलपुर के राजखेड़ा शहर पहुंचे, वहां पर उन्होंने तीन दिन तक प्रवचन दिया। बहुत से लोग उनका प्रवचन सुनने आते थे। चौथे दिन उन्हें विहार करने का विचार आया, तो वहां के श्रावकों ने उन्हें वहीं रुकने की प्रार्थना की, तब महाराज श्री ने श्रोताओं का निवेदन स्वीकार कर लिया। पांचवें दिन आचार्य श्री आहार करने के लिए जल्दी निकल गए, आहार करने के बाद वे सामायिक करने का विचार कर रहे थे, तभी उन्हें आकाश में काले बादल दिखाई दिए, उन्हें यह संकेत सही नहीं लगे, उन्होंने अंदर कक्ष में बैठकर सामायिक की।महाराज श्री ने ध्यान मग्न होकर सभी जीवों के प्रति समता का भाव रखने की प्रार्थना की, उसी समय अचानक ५०० से ज्यादा लोग वहां हथियार के साथ पहुंचे। श्रावकों के साथ मारपीट करने लगे। कुछ बदमाश आचार्य श्री के ध्यान कक्ष तक जाने वाले थे, तभी कुछ श्रावकों ने रोकने का प्रयास किया, तो उन्हें हाथ-पैरों में चोटें पहुंचाई गई, फिर वहां पुलिस पहुंची, जो लोग आचार्यश्री को नुकसान पहुंचाने आए थे, उनके मुखिया को पकड़ लिया गया, उस समय आचार्यश्री ध्यान में तल्लीन थे। पुलिस अधिकारी आचार्यश्री के दर्शन की इच्छा के साथ जब उनके कमरे में गए, तो पुलिस अधिकारियों ने तय किया इतने शांत मन वाले मुनि पर आक्रमण करने वालों को कड़ी सजा देनी चाहिए। आचार्यश्री को जब पता चला कि पुलिस ने बदमाशों को कड़ी सजा देने का निर्णय लिया है, तो आचार्यश्री ने प्रतिज्ञा ले ली, जब तक उन बदमाशों को छोड़ा नहीं जाता, तब तक वे अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे।पुलिस अधिकारियों ने कहा- इन बदमाशों के प्रति दया भाव रखना उचित नहीं हैं। आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? तब आचार्यश्री ने जवाब दिया, मेरे मन में इन लोगों के प्रति बिलकुल भी नफरत का भाव नहीं है, हमारी वजह से आप इन लोगों को सजा दे रहे हैं, यह देखकर आहार करना हमारे लिए संभव नहीं है।ऐसा सुनकर पुलिस वाले आश्चर्यचकित रह गए कि कोई इतना उदार हृदय वाला और दयावान कैसे हो सकता है, इस बात पर पुलिस ने सभी को बिना सजा दिए ही छोड़ दिया, जो लोग हमला करने आए थे, उन्हें भी बेहद पछतावा हुआ।अगर हम अपने आसपास देखें, तो कई लोग छोटी-बड़ी गलतियों के लिए माफ कर देते है, हमें भी अपने जीवन में ‘क्षमा’ का भाव अपनाना चाहिए, अपने शत्रु के प्रति भी मन में नफरत के भाव नहीं लाने चाहिए।

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज जी की जीवन-गाथा

भारत-भू पर सुधारस की वर्षा करने वाले अनेक महापुरुष और संत कवि जन्म ले चुके हैं, उनकी साधना और कथनी-करनी की एकता ने सारे विश्व को ज्ञान रूपी आलोक से आलोकित किया है, इन स्थितप्रज्ञ पुरुषों ने अपनी जीवनानुभव की वाणी से त्रस्त और विघटित समाज को एक नवीन संबल प्रदान किया है, जिसने राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और संस्कृतिक क्षेत्रों में क्रांतिक परिवर्तन किये हैं, भगवान राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, ईसा, हजरत मुहम्मदौर आध्यत्मिक साधना के शिखर पुरुष आचार्य कुन्दकुन्द, पूज्यपाद, मुनि योगिन्दु, शंकराचार्य, संत कबीर, दादू, नानक, बनारसीदास, द्यानतराय तथा महात्मा गाँधी जैसे महामना साधकों की अपनी आत्म-साधना के बल पर स्वतंत्रता और समता के जीवन-मूल्य प्रस्तुत कर सम्पूर्ण मानवता को एक सूत्र में बाँधा है, उनके त्याग और संयम में, सिद्धांतों और वाणियों से आज भी सुख शांति की सुगन्ध सुवासित हो रही है, जीवन में आस्था और विश्वास, चरित्र और निर्मल ज्ञान तथा अहिंसा एवं निर्बेर की भावना को बल देने वाले इन महापुरुषों, साधकों, संत कवियों के क्रम में संतकवि दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज वर्तमान में शिखर पुरुष हैं, जिनकी ओज और माधुर्यपूर्ण वाणी में ऋजुता, व्यक्तित्व में समता, जीने में संयम की त्रिवेणी है। जीवन-मूल्यों को प्रतिस्ठित करने वाले बाल ब्रह्मचारी श्री विद्यासागर जी स्वभाव से सरल और सब जीवों के प्रति मित्रवत व्यवहार के संपोषक हैं, इसी के कारण उनके व्यक्तित्व में विश्व-बन्धुत्व की, मानवता की सौंधी-सुगन्ध विद्यमान है।आश्विन शरदपूर्णिमा संवत २००३ तदनुसार १० अक्टूबर १९४६ को कर्नाटक प्रांत के बेलगाम जिले के सुप्रसिद्ध सदलगा ग्राम में श्रेष्ठी श्री मलप्पा पारसप्पा जी अष्टगे एवं श्रीमती श्रीमतीजी के घर जन्में इस बालक का नाम ‘विद्याधर’ रखा गया। धार्मिक विचारों से ओतप्रोत, संवेदनशील सदह्य्दस्थ मल्लपा जी नित्य जिनेन्द्र दर्शन एवं पूजन के पश्चात ही भोजनादि आवश्यक करते थे। साधु-सत्संगति करने से परिवार में संयम, अनुशासन, रीति-नीति की चर्या का ही परिपालन होता था।आप माता-पिता की द्वितीय संतान हो कर भी अद्वितीय संतान रहे। बड़े भाई श्री महावीर प्रसाद स्वस्थ परम्परा का निर्वहन करते हुए सात्विक पूर्वक सदह्य्दस्थ जीवन-यापन कर रहे हैं। माता-पिता, दो छोटे भाई अनंतनाथ तथा शांतिनाथ एवं बहिनें शांता व सुवर्णा भी आपसे प्रेरणा पाकर घर-गृहस्थी के जंजाल से मुक्त हो कर जीवन-कल्याण हेतु जैनेश्वरी दीक्षा ले कर आत्म-साधनारत हुए। धन्य है वह परिवार जिसमें सात सदस्य सांसारिक प्रपंचों को छोड़ कर मुक्ति-मार्ग पर चल रहे हैं, इतिहास में ऐसी अनोखी घटना का उदाहरण बिरले ही दिखता है।विद्याधर का बाल्यकाल घर तथा गाँव वालों के मन को जीतने वाली आश्चर्यकारी घटनाओं से युक्त रहा है। खेलकूद के स्थान पर स्वयं या माता-पिता के साथ मन्दिर जाना, धर्म-प्रवचन सुनना, शुद्ध सात्विक आहार करना, मुनि आज्ञा से संस्कृत के कठिन सूत्र एवं पदों को कंठस्थ करना आदि अनेक घटनाएँ मानो भविष्य में आध्यात्म मार्ग पर चलने का संकेत दे रही थी। आप पढाई हो या गृहकार्य, सभी को अनुशासित और क्रमबद्ध तौर पर पूर्ण करते, बचपन से ही मुनि-चर्या को देखने, उसे स्वयं आचरित करने की भावना से ही बावडी में स्नान के साथ पानी में तैरने के बहाने आसन और ध्यान लगाना, मन्दिर में राजित मूर्ति के दर्शन के समय उसमें छिपी विराटता को जानने का प्रयास करना, बिच्छू के काटने पर भी असीम दर्द को हँसते हुए पी जाना, परंतु धार्मिक-चर्या में अंतर ना आने देना, उनके संकल्पवान पथ पर आगे बढने के संकेत थे।गाँव की पाठशाला में मातृभाषा कन्नड में अध्ययन प्रारम्भ कर समीपस्थ ग्राम बेडकीहाल में हाई स्कूल की नवमी कक्षा तक अध्ययन पूर्ण किया। चाहे गणित के सूत्र हों या भूगोल के नक्शे, पल भर में कड़ी मेहनत और लगन से उसे पूर्ण करते थे। उन्होंने शिक्षा को संस्कार और चरित्र की आधारशिला माना और गुरुकुल व्यवस्थानुसार शिक्षा को ग्रहण किया, तभी तो आज तक गुरुशिष्य-परम्परा के विकास में वे सतत शिक्षा दे रहे हैं।वास्तविक शिक्षा तो ब्रह्मचारी अवस्था में तथा पुन: मुनि विद्यासागर के रूप में गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी के सात्निध्य में पूरी हुई, तभी वे प्रकृत, अपभ्रंस, संस्कृत, कन्नड, मराठी, अंग्रेजी, हिन्दी तथा बंग्ला जैसी अनेक भाषाओं के ज्ञाता और व्याकरण, छन्दशास्त्र, न्याय, दर्शन, साहित्य और अध्यात्म के प्रकाण्ड विद्वान आचार्य बने। आचार्य विद्यासागर मात्र दिवस काल में ही चलने वाले नग्नपाद पदयात्री हैं। राग, द्वेष, मोह आदि से दूर इन्द्रियजित, नदी की तरह प्रवाहमान, पक्षियों की तरह स्वच्छन्द, निर्मल, स्वाधीन, चट्टान की तरह अविचल रहते हैं। कविता की तरह रम्य, उद्प्रेरक, उदात्त, ज्ञेय और सुकोमल व्यक्तित्व के धनी आचार्य विद्यासागर भौतिक कोलाहलों से दूर, जगत मोहिनी से असंपृकत तपस्वी हैं।आपके सुदर्शन व्यक्तित्व को संवेदनशीलता, कमलवत उज्जवल एवं विशाल नेत्र, सम्मुन्नत ललाट, सुदीर्घ कर्ण, अजान बाहु, सुडौल नासिका, तप्त स्वर्ण-सा गौरवर्ण, चम्पकीय आभा से युक्त कपोल, माधुर्य और दीप्ति सन्युक्त मुख, लम्बी सुन्दर अंगुलियाँ, पाटलवर्ण की हथेलिय्ााँ, सुगठित चरण आदि और अधिक मंडित कर देते हैं। वे ज्ञानी, मनोज्ञ तथा वाम्मी साधु हैं, हाँ प्रज्ञा, प्रतिभा और तपस्या की जीवंत-मूर्ति।बाल्यकाल में खेलकूद में शतरंज खेलना, शिक्षाप्रद फिल्में देखना, मन्दिर के प्रति आस्था रखना, तकली कातना, गिल्ली-डंडा खेलना, महापुरुषों और शहीद पुरुषों के तैलचित्र बनाना आदि रुचियाँ आपमें विद्यमान थी। नौ वर्ष की उम्र में ही चारित्र चक्रवर्ती आचार्य प्रवर श्री शांतिसागर जी महाराज के शेडवाल ग्राम में दर्शन कर वैराग्य-भावना का उदय आपके हृदय में हो गया था, जो आगे चल कर ब्रह्मचर्यव्रत धारण कर प्रस्फुटित हुआ। २० वर्ष की उम्र, जो की खाने-पीने, भोगोपभोग या संसारिक आनन्द प्राप्त करने की होती है, तब आप साधु- सत्संगति की भावना को हृदय में धारण कर आचार्य श्री देशभूषण महाराज के पास जयपुर (राज.) पहुँचे, वहाँ अब ब्रह्मचारी विद्याधर उपसर्ग और परीषहों को जीतकर ज्ञान, तपस्या और सेवा का पिण्ड/प्रतीक बन कर जन-जन के मन का प्रेरणा स्त्रोत बन गया था।आप संसार की असारता, जीवन के रहस्य और साधना के महत्व को पहचान गये थे, तभी तो हृष्ट-पुष्ट, गोरे चिट्टे, लजीले, युवा विद्याधर की निष्ठा, दृढता और अडिगता के सामने मोह, माया, श्रृंगार आदि घुटने टेक चुके थे। वैराग्य भावना दृढवती हो चली, पदयात्री और करपात्री बनने की भावना से आप गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पास मदनगंज-किशनगढ (अजमेर) राजस्थान पहुँचे। गुरुवर के निकट सम्पर्क में रहकर लगभग वर्ष तक कठोर साधना से परिपक्व हो कर मुनिवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के द्वारा राजस्थान की ऐतिहासक नगरी अजमेर में आषाढ शुक्ल पंचमी, वि.सं. २०२५, रविवार, ३० जून १९६८ ईस्वी को लगभग २२ वर्ष की उम्र में संयम का परिपालन हेतु आपने पिच्छि-कमन्डलु धारण कर संसार की समस्त वाह्य वस्तुओं का परित्याग कर दिया। परिग्रह से अपरिग्रह, असार से सार की ओर बढने वाली यह यात्रा माना आपने अंगारों पर चलकर/बढकर पूर्ण की। विषयोन्मुख वृत्ति, उद्दंडता एवं उच्छृंखलता उत्पन्न करने वाली इस युवावस्था में वैराग्य एवं तपस्या का ऐसा अनुपम उदाहरण मिलना कठिन ही है।ब्रह्मचारी विद्याधर नामधारी, पूज्य मुनि श्री विद्यासागर महाराज का अब धरती ही बिछौना, आकाश ही उडौना और दिशाएँ ही वस्त्र बन गये हैं। दीक्षा के उपरांत गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज की सेवा-सुश्रुषा करते हुए आपकी साधना उत्तरोत्त्र विकसित होती गयी, तब से आज तक आपने प्रति वज्र से कठोर, परंतु दूसरों के प्रति नवनीत से भी मृदु बनकर शीत-ताप एवं वर्षा के गहन झंझावातों में भी आप साधना हेतु अरुक-अथक रूप में प्रवर्तमान हैं। श्रम और अनुशासन, विनय और संयम, तप और त्याग की अग्नि में तपी आपकी साधना गुरु-आज्ञा पालन, सबके प्रति समता की दृष्टि एवं समस्त जीव कल्याण की भावना सतत प्रवाहित होती रहती है।गुरुवर आचार्य श्री ज्ञानसागर जी की वृद्धावस्था एवं साइटिकासे रुग्ण शरीर की सेवा में कडकडाती शीत हो या तमतमाती धूप या हो झुलसाती गृष्म की तपन मुनि विद्यासागर के हाथ गुरुसेवा में अहर्निश तत्पर रहते, आपकी गुरु सेवा अद्वितीय रही, जो देश, समाज और मानव को दिशा बोध देने वाली थी, तभी तो डॉ. पन्नालाल साहित्याचार्य ने लिखा था कि १० लाख की सम्पत्ति पाने वाला पुत्र भी जितनी माँ-बाप की सेवा नहीं कर सकता, उतनी तत्परता एवं तन्मयता पूर्वक आपने अपने गुरुवर की सेवा की, सल्‍लेखना के पहले गुरुवर्य ज्ञानसागर जी महाराज ने आचार्य-पद का त्याग आवश्यक जान कर आपने आचार्य पद मुनि विद्यासागर को देने की इच्छा जाहिर की, परंतु आप इस गुरुत्तर भार को धारण करने किसी भी हालत में तैयार नहीं हुए, तब आचार्य ज्ञानसागर जी ने सम्बोधित कर कहा कि साधक को अंत समय में सभी पद का परित्याग आवश्यक माना गया है, इस समय शरीर की ऐसी अवस्था नहीं है कि मैं अन्यत्र जा कर सल्‍्लेखना धारण कर सकूँ, तुम्हें आज गुरु दक्षिणा अर्पण करनी होगी और उसी के प्रतिफल स्वरूप यह पद ग्रहण करना होगा, गुरु-दक्षिणा की बात सुन कर मुनि विद्यासागर निरुत्तर हो गये, तब धन्य हुई नसीराबाद (अजमेर) राजस्थान की वह घड़ी जब मगसिर कृष्ण द्वितीया, संवत २०२९, बुधवार, २२ नवम्बर, १९७२ ईस्वी को आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने अपने कर कमलों से आचार्य पद पर मुनि श्री विद्यासागर महाराज को संस्कारित कर विराजमान किया, इतना ही नहीं मान मर्दन के उन क्षणों को देख कर सहस्त्रों नेत्रों से आँसूओं की धार बह चली जब आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने मुनि श्री विद्यासागर महाराज को आचार्य पद पर विराजमान किया एवं स्वयं आचार्य पद से नीचे उतर कर सामान्य मुनि के समान नीचे बैठ कर नूतन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के चरणों में नमन कर बोले – ‘हे आचार्य वर! नमोस्तु, यह शरीर रत्नत्रय साधना में शिथिल होता जा रहा है, इन्द्रियाँ अपना सम्यक काम नहीं कर पा रही, अतः आपके श्री चरणों में विधिवत सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण धारण करना चाहता हूँ, कृपया मुझे अनुगृहित करें। आचार्य श्री विद्यासागर जी ने अपने गुरु की अपूर्व सेवा की। पूर्ण निर्मत्व भावपूर्वक आचार्य ज्ञानसागर जी मरुभूमि में वि. सं. २०३० वर्ष की ज्येष्ठ मास की अमावस्या को प्रचंड ग्रीष्म की तपन के बीच ४ दिनों के िनर्जल उपवास पूर्वक नसीराबाद (राज.) में शुक्रवार, जून १९७३ ईस्वी को १० बजकर १० मिनट पर इस नश्वर देह को त्याग कर समाधिमरण को प्राप्त हुए।आचार्य विद्यासागरजी द्वारा रचित रचना-संसार में सर्वाधिक चर्चित ओर महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में ‘मूक माटी’ महाकाव्य ने हिन्दी-साहित्य और हिन्दी सत-सहित्य जगत में आचार्य श्री को काव्य की आत्मा तक पहुँचाया है। – सुशीला पाटनीआर.के. हाऊसमदनगंज- किशनगढ़,राजस्थान, भारत

स्थानकवासी संप्रदाय के श्रमण संघ के
आचार्य डॉ. शिवमुनि क्रांतीकारी संतपुरूष हैं

सूरत: भारत की रत्नगर्भा वसुंधरा ने अनेक महापुरुषों को जन्म दिया है, जो युग के साथ बहते नहीं, बल्कि युग को अपने बहाव के साथ ले चलते हैं, ऐसे लोग सच्चे जीवन के धनी होते हैं। उनमें जीवन-चैतन्य होता है, वे स्वयं आगे बढ़ते हैं, जन-जन को आगे बढ़ाते हैं। उनका जीवन साधनामय होता है और जन-जन को वे साधना की पगडंडी पर ले जाते हैं, प्रकाश स्तंभ की तरह उन्हें जीवन पथ का निर्देशन देते हैं एवं प्रेरणास्रोत बनते हैं। आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनिजी महाराज एक ऐसे ही क्रांतिकारी महापुरुष एवं संतपुरुष हैं, जिनका इस वर्ष हीरक जयन्ती महोत्सव वर्ष मनाया जा रहा है, हाल ही में उन्हें इन्दोर-मध्यप्रदेश में एक भव्य समारोह में अध्यात्म ज्योति के अलंकरण से सम्मानित किया गया।आचार्य डॉ. शिव मुनि जी पारसमणि हैं, उनके सानिध्य में हजारों मनुष्यों का जीवन सर्वोत्तम और स्वर्णिम हुआ है, वे युगद्रष्टा एवं युगस्रष्टा धर्माचार्य हैं, उन्होंने युग की समस्याओं को समझा और उनका समाधान प्रदान किया। देश में सांप्रदायिकता, अराजकता, भोगवाद और अंधविश्वास का विष फैलाने वाले धर्माचार्य बहुत हैं। धर्म का यथार्थ स्वरूप बताने वाले आचार्य शिव मुनि जैसे धर्माचार्य कम ही हैं, उन्होंने धर्म के वैज्ञानिक और जीवनोपयोगी स्वरूप का मार्गदर्शन किया, वे प्रगतिशील हैं क्योंकि उन्होंने धर्म के क्षेत्र में नये-नये प्रयोग किये हैं, आप महान परिव्राजक हैं।कठोर चर्या भूख और प्यास से अविचलित रहकर गांव-गांव घूमे, हजारों किलोमीटर की पदयात्रा की, विशाल दृष्टि के धारक हैं, क्योंकि वे सबके होकर ही सबके पास पहुंचे, स्वयं में ज्ञान के सागर विद्यापीठ हैं, क्योंकि अध्ययन, अध्यापन, स्वाध्याय और साहित्य निर्माण उनकी सहज प्रवृत्तियां हैं, आप महान हैं क्योंकि गति महान लक्ष्य की ओर है, सिद्ध हैं, आस्थाशील हैं और विलक्षण हैं, इसलिये जन-जन के लिये पूजनीय हैं।धार्मिक जगत के इतिहास में आचार्य शिव मुनि इन शताब्दियों का एक दुर्लभ व्यक्तित्व हैं, आपकी जीवनगाथा भारतीय चेतना का एक एक अभिनव उन्मेष है। आपके जीवन से आपके दर्शन और मार्गदर्शन से असंख्य लोगों ने शांति एवं संतुलन का अपूर्व अनुभव किया।आपका जन्म ८ सितम्बर १९४२ को भादवा सुदी पंचमी के दिन पंजाब एवं हरियाणा की सीमा पर बसे ‘रानिया’ नामक गांव में, आपके ननिहाल में हुआ। आपके पिता सेठ चिरंजीलाल जैन एवं माता श्रीमती विद्यादेवी जैन एक धार्मिक, संस्कारी, कुलीन एवं संपन्न परिवार के श्रावक-श्राविका थे। धर्म के प्रति यह परिवार ५ पीढ़ियों से समर्पित रहा है। यही कारण है कि पारिवारिक संस्कारों एवं धार्मिक निष्ठा की पृष्ठभूमि में आपने एवं आपकी बहन ने ४७ मई १९७२ को मलोठ मगण्डी में दीक्षा स्वीकार की। आप शिव मुनि बने एवं बहन महासाध्वी निर्मलाजी महाराज के नाम से साधना के पथ पर अग्रसर हुयीं। तृतीय पट्टधर आचार्य श्री देवेन्द्रमुनिजी के देवलोकगमन के पश्चात ९ जून १९९९ को अहमदनगर (महाराष्ट्र) में श्रमण संघ के विधानानुसार आपश्री को श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य के रूप में अभिषिक्त किया गया, इससे पूर्व द्वितीय पट्टथधर आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज ने ३ मई १९८७ को आपको युवाचार्य घोषित किया था। लगभग २०० साधु-साध्वियों तथा लाखों श्रावकों वाले इस विशाल चतुर्विद श्रीसंघ के नेतृत्व का दायित्व आपने संभालने के पश्चात संपूर्ण भारत को अपने नन्हे पांव से नापा।आचार्य बनने के पश्चात आपने श्रमण संघ को नये-नये आयाम दिये।नीतिशास्त्री डब्ल्यू, सी. लूसमोर ने विकसित व्यक्तित्व को तीन भागों में बांटा है- विवेक, पराक्रम और साहचर्य।नीतिशास्त्री ग्रीन ने नैतिक प्रगति के दो लक्षण बतलाए हैं-सामंजस्य और व्यापकता, इनके विकास से मनुष्य आधिकारिक महान बनता है। व्यक्तित्व के विकास के लिए अपने आपको स्वार्थ की सीमा से हटाकर दूसरों से जोड़ देने वाला सचमुच महानता का वरण करता है। आचार्य सम्राट शिव मुनि का व्यक्तित्व इसलिए महान है कि वे पारमार्थिक दृष्टि वाले हैं। श्रेष्ठता और महानता आपकी ओढनी नहीं है, कृत्रिम भी नहीं, बल्कि व्यक्तित्व की सहज पहचान है। पुरुषार्थ की इतिहास परम्परा में इतने बड़े पुरुषार्थी पुरुष का उदाहरण कम ही है, जो अपनी सुख-सुविधाओं को गौण मानकर जन-कल्याण के लिए जीवन जी रहे हैं।अध्यात्म क्रांति के साथ-साथ समाज क्रांति के स्वर और संकल्प भी आपके आस-पास मुखरित होते रहे हैं। संत वही है जो अपने जीवन को स्व परकल्याण में नियोजित कर देता है। आचार्य शिव मुनि साधना के पथ पर अग्रसर होते ही धर्म को क्रियाकांड से निकालकर आत्म-कल्याण और जनकल्याण के पथ पर अग्रसर किया, आपका मानना है कि धर्म न स्वर्ग के प्रलोभन से हो, न नरक के भय से, जिसका उद्देश्य हो जीवन की सहजता और मानवीय आचारसंहिता का धुव्रीकरण, आपने धर्म को अंधविश्वास की काया से मुक्त कर प्रबुद्ध लोकचेतना के साथ जोड़ा। समाज सुधार के क्षेत्र में पिछले बारह वर्षों से आप त्रि-सूत्रीय कार्यक्रम को लेकर सक्रिय हैं, यह त्रि-सूत्रीय कार्यक्रम हैं- व्यसनमुक्त जीवन, जन-जागरण तथा बाल संस्कार इन्हीं तीन मूल्यों पर आदर्श समाज की रचना संभव है, आपने अपने धर्मसंघ के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाते हुए जन-जन को ध्यान का प्रशिक्षण दिया। आप महान ध्यान योगी हैं। ध्यान और मुनि ये दो शब्द ऐसे हैं जैसे दीपक की लौ और उसका प्रकाश, सूर्य की किरणें और उसकी उष्मा। साधुत्व की सार्थकता और साधुत्व का बीज आपकी साधना में है जो निरंतर स्वाध्याय और ध्यान में संलग्न रहता है, स्वाध्याय से ज्ञान के द्वार उद्घाटित होते हैं, उसी ज्ञान को स्व की अनुभूतियों पर उतारने का नाम ध्यान है, इसी साधना को आचार्य सम्राट शिव मुनि ने अपने अस्तित्व का अभिन्न अंग बनाया है। स्वयं तो साधना की गहराइयों में उतरते ही हैं, हजारों-हजारों श्रावकों को भी ध्यान की गहराइयों में ले जाते हैं। इस वैज्ञानिक युग में उस धर्म की अपेक्षा है जो पदार्थवादी दृष्टिकोण से उत्पन्न मानसिक तनाव जैसी भयंकर समस्या का समाधान कर सके, पदार्थ से न मिलने वाली सुखानुभूति करा सके। नैतिकता की चेतना जगा सके। आचार्य शिव मुनि जी ने अपने ध्यान के विभिन्न प्रयोगों से धर्म को जीवंत किया है।आचार्य सम्राट शिवमुनि जी का जीवन विलक्षण विविधताओं का समवाय है, आप कुशल प्रवचनकार, ध्यानयोगी, तपस्वी, साहित्यकार और सरल व्यक्तित्व के धनी हैं। सृजनात्मक शक्ति, सकारात्मक चिंतन, स्वच्छ भाव, सघन श्रद्धा, शुभंकर संकल्प, सम्यक‌ पुरुषार्थ, साधनामय जीवन, उन्नत विचार इन सबके समुच्चय से गुम्फित है आपका जीवन। आप महान‌ साधक एवं कठोर तपस्वी संत हैं। लगभग पिछले ४० वर्षों से लगातार एकांतर तप कर रहे हैं। इक्कीसवीं शताब्दी को अपने विलक्षण व्यक्तित्व, अपरिमेय कर्तत्व एवं क्रांतिकारी दृष्टिकोण से प्रभावित करने वाले युगद्रष्टा ऋषि एवं महर्षि हैं, आपकी साधना जितनी अलौकिक हैं, उतने ही अलौकिक हैं आपके अवदान, धर्म को अंधविश्वास एवं कुरीढ़ियों से मुक्त कर जीवन व्यवहार का अंग बनाने का अभिनव प्रयत्न आपने किया है।‘जैन एकता’ की दृष्टि से आपने निरंतर उदारता का परिचय दिया है। जय भारत!

युगपुरूष राष्ट्रसंत प. पू. श्री. आनंदऋषिजी म.सा.
संक्षिप्त परिचय

गुरू आनंद के पुण्य स्मृति पर हम सभी प्रेमी श्रावकगणधार्मिक भावोें के दीप जलायें, भवसागर से तिर जायें…हमने इस युग में चलते-फिरते तीर्थंकर के रूप में गुरूवरजी को देखा है, माना है। हमारे दु:ख, दर्द वो ही पहचाने हैं, उनको हम शीश झुकाकर त्रिवार वंदना कर आशिष चाहते हैं। गुरू आनंद की ज्योति हमें प्रकाश दिलाती है, जीवन जीने की राह दिखाती है। हमारी जीवन नैया मांझी बनकर पार लगाती है। आचार्य सम्राट प.पू. आनंद गुरूवर को पाकर यह धरा भी धन्य हो गयी। हमारे गुरूवर अंबर के भव्य दिवाकर थे। चांद से धवल किर्ती और मिश्री सी मिठी वाणी गुरूवर की थी। मरूस्थल में भी आपने नंदनवन सजाया। राष्ट्रसंत आचार्य सम्राट प.पू. आनंदगुरूवरजी की जन्मभूमि ‘चिंचौडी’ बहुत ही पवित्र पावन हुई है, कण-कण पूजनीय बन गया है। आचार्य भगवन ने समस्त जैनियों को एवम् जैनेत्तर जनता को अपने आचार-विचार प्रवचन द्वारा प्रभावित किया। आप आज भी राष्ट्रसंत की तरह पुजे जाते हैं। आचार्य भगवंत समन्वय में विश्वास करते थे, आपका पुरा जीवन पावन रहा, आप ब्रम्हचारी थे, संयमी पंच महाव्रतधारी महान मानवतावादी महात्मा थे। उच्च वैराग्य भावना से जीवन जीया, कईयों को सार्थक बनाया। जिन शासन की सेवा में हमेशा लगे रहे, आपकी कर्मभूमि हम सभी को बारंबार धर्म की ओर प्रेरित करती है।प्रेरणादायी व्यक्तित्व के धनी थे पूज्य गुरूवर, हजारों आनंद भक्त इस तीर्थ की यात्रा कर, अपने आपको धन्य समझते हैं। गुरूवर में बहुत कुछ करके दिखलाया। आनंदगुरू आज हमारे बीच नहीं हैं, उनकी अमर कहानी, पावन स्मृति आज भी यादगार बनी हुई है, प्रेरणा देती है। आनंद गुरू सदा प्रसन्नता के प्रतिक रहे, आपकी जिन्दगी का हर प्रयास अभय का वरदान रहा, हर प्रकाश हृदय की मुस्कान रही, हर प्रयास विजय का गान रहा।महापुरूष मानव समाज के बगीया में कभी न मुरझाने वाले फुल होते हैं, ऐसे ही महापुरूष थे हमारे गुरू आनंद, हम सभी के जीवन में अपनी मधुर वाणी से आनंद भर देते थे, आपका जीवन ही आनंद से ओत-प्रोत था। दीर्घकाल तपस्या कर जीवन को अत्युच्च शिखर पर पहँुचाया। माँ हुलसा ने आपको बचपन में सुसंस्कार दिये। जीवन की नींव सुदृढ बनायी, बालक नेमीचंद को एक वीर पुरूष बनाना चाहा, पं.रत्नऋषिजी म. की सेवा में तीर्थंकर महावीर के चरणों में समर्पित कर दिया और आप महावीर के अनुयायी बन गये। आनंद ऋषिवरजी ने ज्ञान, धर्म, दर्शन, आगम, काव्य संगीत का गहरा अध्ययन पुरा किया। अज्ञानी लोगों का मार्गदर्शन किया। आपका लोकसंग्रह बहुत विशाल ही था। आप कईयों के केंद्र बिंदु बन गये। समाज संगठन आपका लक्ष्य रहा, संघ को, साधु-वृंद को संगठित करने का महान कार्य किया। जीवन साधना के बल पर शानदार आत्मविकास किया। प.पू. आनंद ऋषिजी श्रमण संघ के प्राण थे। राष्ट्रसंत गुरूदेव के आशीर्वाद एवम् प्रेरणा से अनेकों ने आध्यात्म के अमृत का पान किया। शाश्वत आनंद, अनुपम अनुभुति को प्राप्त किया तथा उन्मत बनें। आनंद गुरूवर भक्तों की भक्ती श्रद्धास्थान, गुणरत्नों की खान, समता के सागर, ध्यानीध्यान थे, आपको सारा जहॉ आज भी याद करता है, आपने पर उपकार में जीवन बिताया, हर मुरझाया फूल खिलाया, आखों में अमृत भरा था, कंचन सी काया थी, गगन जैसा विशाल मन था, शांती के सागर थे। आपकी दृष्टि में अमीर-गरीब सरीखे थे, कोई भेद नहीं था। राष्ट्रसंत आचार्य आनंदऋषि जी हॉस्पीटल एण्ड मेडिकल रिसर्च सेंटर द्वारा नगर (महाराष्ट्र) में अनवरत मानव सेवा यज्ञ कार्यरत है, हजारों मरिजोें को आरोग्य लाभ मिल रहा है, जो की मानव सेवा के पथ पर अग्रसर है।