समीक्षा-फरवरी-२०२१

जय जिनेन्द्र ! जिनागम
भारत को ‘भारत’ ही बोला जाए अभियान का पूर्ण समर्थन करती हूँ

-गीता जैन,

विधायिका मीरा-भायंदर,
जिला ठाणे,महाराष्ट्र,
भारत

१० फरवरी से २१ फरवरी २०२१ तक प्रस्तावित ‘भारत सम्मान दीपोमय यात्रा' में उपस्थिति के लिए विधायिक गीता जैन को निवेदन पत्र देते हुए बिजय कुमार जैन

दिनांक ५ जनवरी २०२१ को ‘मैं भारत हूँ संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बिजय कुमार जैन, प्रचार संयोजक विनोद जी माहेश्वरी व भारत को भारत ही बोला जाए के पूर्ण समर्थक डॉ जगन्नाथ चह्वाण ने भारत का एक राज्य महाराष्ट्र स्थित ठाणे जिला के मीरा भायंदर की वर्तमान विधायिका श्रीमती गीता जैन जी से उनके निवास स्थल पर सद्भाव पूर्ण मुलाकात की।

वरिष्ठ पत्रकार व संपादक बिजय कुमार जैन द्वारा संपादित मैं भारत हूँ’, ‘जिनागम' और ‘मेरा राजस्थान' पत्रिकाओं की भेंट लेते हुए विधायिका गीता जैन के साथ हैं डॉ. जगन्नाथ चह्वाण

मुलाकात में ‘भारत को भारत ही बोला जाए’ के बारे में विस्तृत जानकारी के साथ अभियान के बारे में बताया गया कि १० फरवरी से २१ फरवरी २०२१ तक विभिन्न कार्यक्रमों के साथ दिल्ली में ‘भारत सम्मान दीपोमय यात्रा’ का आयोजन किया जा रहा है।

विधायिका गीता जी ने कहा कि मैं पूर्ण समर्थन करती हूं कि भारत को ‘भारत’ ही बोला जाना चाहिए, इंडिया तो अंग्रेजों द्वारा किया गया एक घिनौना षड्यंत्र है।

‘मैं भारत हूँ’ परिवार द्वारा किया जा रहा अभियान ‘भारत को भारत ही बोला जाए’ का पूर्ण समर्थन करती हूं और होने वाले ‘भारत सम्मान दीपोमय यात्रा’ में शामिल होने का वचन भी देती हूँ, इतना जरूर कहूँगी कि लगातार १० दिन तो ‘भारत सम्मान दीपोमय यात्रा’ में, मैं शामिल नहीं हो सकती, कारण यह है कि मेरे क्षेत्र में बहुत से सामाजिक कार्य होते हैं साथ ही गीता जी ने यह भी कहा कि मैं ‘भारत सम्मान दीपोमय यात्रा’ में उपस्थिति देने के साथ अपने सभी मित्रों से भी कहूंगी कि आज से अभी से इंडिया नाम का उल्लेख ना करते हुए ‘भारत’ का ही उल्लेख करें, क्योंकि मेरे अपने देश का नाम केवल ‘भारत’ ही होना चाहिए।

मनोहर जी ‘जैन एकता’ के संदर्भ में कहते हैं कि हम सभी भगवान महावीर के ही अनुयायी हैं और हमारा णमोकार मंत्र एक ही है। समाज में ‘जैन एकता’ की आवश्यकता है क्योंकि जहां संगठन होता है वहीं मजबूती होती है, समाज को मजबूत करने के लिए ‘जैन एकता’ की आवश्यकता है। जैन समाज में देखा जा रहा है की श्रावकों में कोई भेद नहीं, गुरु भगवंतों में कहीं-कहीं आग्रह के कारण व्यवधान है अगर सभी ‘जैन एकता’ को प्राथमिकता दें तो समाधान संभव है, इस दिशा में कई गुरुभगवंत प्रयास भी कर रहे हैं, जिनमें आचार्य श्री महाश्रमण जी ने संवत्सरी एक ही समय हो और यह सफल भी हो रहा है।

मनोहर गोखरू जैन
व्यवसायी व समाजसेवी
गंगापुर निवासी-मुंबई प्रवासी
भ्रमणध्वनि ९८२१८१२००८

आज तेरापंथ समाज व स्थानकवासी समाज एक ही समय पर संवत्सरी मनाता है, सभी पंथों के लिए यह सूचनात्मक विषय है। एक विनम्र अनुरोध है कि एक संकल्प सभी आचार्य भगवंत लें, पहले जैन धर्म व उसकी एकता, फिर सम्प्रदाय तो जैन धर्म पूरे विश्व में अलग पहचान बना लेगा।

युवाओं के संदर्भ में आपका कहना है कि युवा ही समाज व देश भविष्य हैं, आज का युवा वर्ग प्रबुद्ध है, उन्हें उचित मार्गदर्शन मिलना बहुत जरूरी है। हमारा धर्म केवल परंपराओं तक ही सीमित है जिस कारण युवा वर्ग धर्म से दूर होता जा रहा है। आज का युवा समाज धर्म में फैले क्रिया कांड तक सीमित नहीं रहना चाहता, आज के संदर्भ में प्रेक्षा ध्यान जैसे प्रयोग व धर्म को वैज्ञानिक रूप से व उसका प्रायोगिक प्रशिक्षण दें तो युवा पीढ़ी निश्चित रुप से धर्म से जुड़ेगी। तेरापंथ समाज में ४४००० युवाओं का एक संगठन है जो अपने विकास के साथ-साथ समाज व देश की प्रगति में भी अपना विशेष योगदान दे रहे हैं। आज के युवाओं को धर्म के तत्व को समझाया जाए व समाज के प्रति जागरूकता निर्माण करने के लिए विभिन्न संदर्भों में, सामाजिक कार्यक्रमों में प्रतिभागी बनाया जाए, तभी आज का युवा अपने धर्म और समाज से जुड़ा रहेगा।

भारत को ‘भारत’ ही बोला जाए विषय पर मनोहर जी का कहना है कि भारतीय संस्कृति बहुत ही प्राचीन हैं, ‘भारत’ नाम इतिहास में प्रसिद्ध है। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती के नाम पर इस देश का नाम ‘भारत’ रखा गया था, इंडिया तो विदेशी शासकों द्वारा दिया गया है, हमारे देश का मूल नाम ‘भारत’ ही है और यही रहना चाहिए। हम जब अपने देश को ‘भारत’ बोलेंगे तो ही विश्व भी वही बोलेगा।

६० वर्षीय मनोहर जी मूलत राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित गंगापुर के निवासी हैं। आपका जन्म व प्रारंभिक शिक्षा यहीं संपन्न हुई, तत्पश्चात उच्च शिक्षा हेतु आपका मुंबई आना हुआ। वर्तमान में पूरी तरह से समाज सेवा में सक्रिय हैं। तेरापंथ समिति मुंबई के संरक्षक के रूप में कार्यरत हैं। वर्ष २०२३ में मुंबई में होने वाले महाश्रमण जी के चातुर्मास में विशेष रूप से सक्रिय हैं। आप तेरापंथ सभा के कार्याध्यक्ष भी रहे हैं, साथ ही जीतो, भारत जैन महामंडल जैसी सामाजिक संस्था में भी विशेष पदों पर कार्यरत हैं।

"भारत को ‘भारत’ ही बोला जाए का आव्हान करने वाले संपादक बिजय कुमार जी समर्पित व्यक्तित्व के धनी है"

निर्मल कुमार जी का जन्म ८ जुलाई १९३० को असम के तिनसुकिया में पिता हरकचंद जैन सेठी के घर आंगन में हुआ। आपकी प्रारंभिक शिक्षा यहीं संपन्न हुई, तत्पश्चात बीकॉम स्नातक की शिक्षा सेंट जेवियर्स कॉलेज कोलकाता विश्वविद्यालय से ग्रहण की। शिक्षा ग्रहण करने के बाद असम में अपनी क्षमता के बल पर एक छोटे पैमाने पर उद्योग शुरू कर एक सफल औद्योगिक घराना खड़ा करने वाले निर्मल कुमार सेठी जैन व्यवसाय छोड़कर समाजसेवा के काम में पूरी तरह से संलग्न हुए। इससे पहले उन्होंने असम के तिनसुकिया, सिलचर और उत्तर प्रदेश के बिलारी, सीतापुर, लखनऊ, गोरखपुर, गुवाहाटी और दिल्ली में औद्योगिक प्रतिष्ठानों का सफलतापूर्वक संचालन किया। जैन धर्म की अमूल्य धरोहरों, मूर्तियों, पांडुलिपियों और मंदिरों के जीर्णोद्धार को श्री निर्मल कुमार सेठी जैन अपने जीवन का अंतिम उद्देश्य मानते हैं।

निर्मल कुमार सेठी जैन
अध्यक्ष दिगम्बर जैन महासभा दिल्ली निवासी भ्रमणध्वनि ९८९१०२९७१७

निर्मल जी ने देश के ६०० से अधिक जैन मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया है, जिसमें उत्तर कर्नाटक के शुरूआती दिनों प्राचीन जैन मंदिर शामिल हैं, इसी तरह उन्होंने प्राचीन एक पत्रिका के प्रकाशन की बहाली भी करायी है। आज समूचा देश जैन धरोहरों, मंदिरों और पांडुलिपियों को संरक्षित करने में उनके इस ऐतिहासिक योगदान को स्वीकार करता है।

निर्मल कुमार जी ३ जनवरी १९८१ से श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन (धर्म संरक्षिणी) महासभा का नेतृत्व कर रहे हैं। ८३ साल के बाबू निर्मल जी जैन समाज की आर्थिक रूप से कमजोर लड़कियों की शादी में सहयोग नियमित
रूप से करते हैं। उनके नेतृत्व में श्री भारत वर्षीय दिगम्बर जैन (श्रुत संवर्धिनी) महासभा ने १५०० से अधिक आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की है। जैन समाज ने तो उन्हें अनगिनत सम्मानों, पुरस्कारों से नवाजा ही है, इसके अलावा भारतीय अल्पसंख्यक आयोग ने उन्हें लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से भी सम्मानित किया है। निर्मल जी ने भारतीय संस्कृति से संबंधित कई ग्रंथों का प्रकाशन किया है।

सुदूर असम के गांवों तक हिंदी माध्यम के कई स्कूल और कॉलेज स्थापित कर समाज में शिक्षा और हिन्दी भाषा के प्रसार को बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन (धर्म संरक्षिणी) महासभा, श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन (तीर्थ संरक्षिणी) महासभा, श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन (श्रुत संवर्धिनी) महासभा, श्री दिगम्बर जैन कुंडलपुर, वैशाली तीर्थ क्षेत्र कमेटी, श्री गोपाल दिगम्बर जैन सिद्धांत संस्कृत महाविद्यालय मुरैना के अध्यक्ष पद पर सेवारत हैं। श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा चैरिटेबल ट्रस्ट के १९८८ से ट्रस्टी के रूप में सेवारत हैं। गोमटेश्वर भगवान श्री बाहुबली स्वामी महामस्तकाभिषेक महोत्सव समिति २००६ श्रवणबेलगोला के स्वागताध्यक्ष रहे, वर्तमान में ट्रस्टी के रूप में सेवारत है। श्री दिगम्बर जैन अयोध्या तीर्थ क्षेत्र कमेटी रायगंज अयोध्या के संरक्षक के रूप में भी कार्यरत हैं, इस संस्था में दस-बारह वर्षों तक अध्यक्ष पद पर कार्यरत थे। आरएमपी डिग्री कॉलेज सीतापुर उत्तर प्रदेश में मंत्री के रूप में सेवारत हैं। जैन धर्म से जुड़े विचारों को आपने मूर्त रूप में प्रस्तुत किया है। शोध एवं पत्रिकाओ ‘जैन गजट’ (भारत का सर्वाधिक प्राचीन साप्ताहिक), प्राचीन तीर्थ जीर्णोंद्धार (मासिक), श्रुत संवर्धिनी (मासिक), जैन महिलादर्श (मासिक) जैसी विभिन्न धार्मिक पुरातात्विक शैक्षिक पत्र-पत्रिकाएं आपके सम्पादकीय के द्वारा ही प्रकाशित होती हैं।

जैन धर्म और जैन समाज के प्रति समर्पित भावना व कार्य के पुरस्कार हेतु श्री चारुकृति भट्ठारक महास्वामी द्वारा ४ जनवरी २००६ को श्रवणबेलगोला कर्नाटक में ‘श्रावक रत्नमणी’ की उपाधि से सम्मानित किया गया है। भारत को सिर्फ ‘भारत’ ही बोला जाए विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि सर्वविदित है हमारे देश का नाम ‘भारत’ कैसे पड़ा। आदिनाथ भगवान के ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती के नाम पर ही इस देश का नाम ‘भारत’ रखा गया था। आचार्य विद्यासागर जी द्वारा इसका आव्हान किया जा रहा है। भारत को भारत बोले जाने के लिए सर्वप्रथम हमारा जो इतिहास है उसको उजागर करना होगा, उसका प्रचार-प्रसार होगा तो ही सभी को ज्ञात होगा कि हमारे देश का वास्तविक नाम तो ‘भारत’ है और ‘भारत’ ही रहना चाहिए।

‘जिनागम’ पत्रिका के संपादक बिजय कुमार जैन जी को मैं कई वर्षों से जानता हूं वे कार्य के प्रति समर्पित व्यक्तित्व के धनी हैं। ‘हिंदी’ भाषा को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाने के लिए उनका प्रयास सराहनीय है। ‘जिनागम’ पत्रिका में जैन पुरातत्व के विषय की भी सामग्री प्रस्तुत की जानी चाहिए।