Category: जनवरी-२०१९

भारतीय भाषा अपनाओ अभियान की सफलता के लिए भारतीय भाषा

भारतीय भाषा अपनाओ अभियान आतंकवाद से अधिक खौफ अंग्रेजी का किसी देश को खत्म करने के लिए उसकी भाषा को ही खत्म करना काफी होता है, भाषा खत्म होने के बाद संस्कृति को कैसे बचाओगे? आज भारत में आतंकवाद से ज्यादा खौफ अंग्रेजी का है, यह राय एम.एल. गुप्ता (राष्ट्रीय भाषा समिति, राष्ट्रभाषा विभाग) ने व्यक्त की, मुंबई से निकली भारतीय भाषा सम्मानयात्रा मंगलवार २५ दिसम्बर २०१८ को पुणे पहुंची, महावीर प्रतिष्ठान में पुणेवासियों ने यात्रा का स्वागत किया। महावीर प्रतिष्ठान में आयोजित पत्रकार-वार्ता में उन्होंने ये बातें कहीं, यात्रा के आयोजक वरिष्ठ पत्रकार व सम्पादक बिजय कुमार जैन ने सवाल किया कि हमारे देश में राष्ट्रीय गान, राष्ट्रीय पक्षी और राष्ट्रीय मुद्रा है, तो फिर राष्ट्रीय भाषा क्यों घोषित नहीं की जाती? उन्होंने सरकार से हिंदी को जल्द से जल्द अधिकारिक रूप से राष्ट्रभाषा घोषित करने की मांग की। महावीर प्रतिष्ठान में आयोजित पत्रकार वार्ता के संयोजक विजय भंडारी ने कहा कि यह मुद्दा बहुत अहम है और इसकी मांग पूरे देशवासियों के जरिए होनी चाहिए। ‘जीतो’ के माध्यम से हम इस मुद्दे को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक जरूर पहुंचाएगें। पत्रकार-वार्ता में डॉ. कल्याण गंगवाल, विजयकांत कोठारी, कांतीलाल ओसवाल, पूना मर्चेट चेंबर के पोपटलाल ओस्तवाल, रमेश ओसवाल, अजीत सेठिया, अरूण सिंघवी आदि उपस्थित थे। बतादें कि पहले मातृभाषा फिर-राष्ट्रभाषा का संदेश लेकर मुंबई से निकली यह यात्रा पुणे से आगे दक्षिण भारत, मध्य प्रदेश और आगरा होते हुए दिल्ली पहुंची। पुणे के पश्चात सातारा के श्री कुबेर विनायक मंदिर में भारतीय भाषा सम्मान यात्रा का दल शाम ६.३० बजे पहुंचा, वहां उपस्थित सभी प्रबुद्ध लोगों के सम्मुख भारतीय भाषाओं व हिंदी के महत्व को प्रतिपादित किया गया उपस्थित लोगों ने अच्छा प्रतिसाद दिया, उसी रात कराड स्थित श्री केसरिया तीर्थ धाम पहुंचकर रात्रि विश्राम किया गया। दिनांक २६ दिसंबर को प्रात: नाश्ता करने के पश्चात निपानी के लिए यात्रा दल ने प्रस्थान किया। दिनांक २६ दिसम्बर २०१८ को कर्नाटक स्थित निपानी पहुंचे। राष्ट्रभाषा प्रेमियों का स्वागत दिल्ली जाएगी और माननीय राष्ट्रपति जी का समय मिलने से निवेदन देगी कि सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान बढ़ाया जाए, भारत की एक राष्ट्रभाषा घोषित की जाए और भारत को भारत बोला जाए। भारतीय भाषा सम्मान यात्रा अपनी मंजिल की ओर… तत्पश्चात बेलगांव के भारतेश सेन्ट्रल स्कूल में रात्रि विश्राम किया किया। दिनांक २७ दिसम्बर को कुमटा के लिए प्रस्थान किया, नवग्रह मंदिर वरूर हुबली के पास विशाल मंदिर में आचार्य श्री गुणनंदी करीब ८० वर्ष पुराने गुरूकुल के संचालक श्री महावीर पाटिल ने किया। स्कूल के प्राध्यापक श्री राजेंद्र खोतजी ने एक सभा का आयोजन किया, जिसमें करीबन ५०० छात्रों ने भाग लिया, व्यवस्था अनुशासित करने के लिए गुरूकुल के शिक्षकों ने अपना कर्तव्य निभाया। मंच का संचालन श्री राजेन्द्र खोत जी ने किया और कहा कि आज का पावन दिन हमारी निपानी के लिए बहुत ही शुभ है, निपानी में भारतीय भाषा सम्मान यात्रा का आगमन हुआ है। ‘भारतीय भाषा अपनाओ अभियान’ की सफलता के लिए अनथक प्रयास वरिष्ठ पत्रकार व सम्पादक बिजय कुमार जैन ने मुंबई से किया है जो पुणे, सातारा, कराड होते हुए निपानी पहुंचे हैं, जिसमें राष्ट्रभाषा प्रेमी भारत के विभिन्न प्रांतों से पधारे हैं। बतादें की सम्मान यात्रा का उद्देश्य एकमात्र भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाना है यह यात्रा विभिन्न राज्य से होती हुई दिल्ली जाएगी और माननीय राष्ट्रपति जी का समय मिलने से निवेदन देगी कि सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान बढ़ाया जाए, भारत की एक राष्ट्रभाषा घोषित की जाए और भारत को भारत बोला जाए। भारतीय भाषा सम्मान यात्रा अपनी मंजिल की ओर… तत्पश्चात बेलगांव के भारतेश सेन्ट्रल स्कूल में रात्रि विश्राम किया किया। दिनांक २७ दिसम्बर को कुमटा के लिए प्रस्थान किया, नवग्रह मंदिर वरूर हुबली के पास विशाल मंदिर में आचार्य श्री गुणनंदी जी महाराज साहब का आशीर्वाद प्राप्त किया, यहां के कन्नड़ भाषी छात्रों को कन्नड़ में कहा कि पहले हमारी मातृभाषा, फिर हमें राष्ट्रभाषा का सम्मान मिलना चाहिए, बच्चों ने पूछा कि क्या राष्ट्रभाषा कोई भी नहीं है ऐसा कैसे हो सकता है? हमने कहा कि आप कन्नड़ के साथ हिंदी पढ़ो, बच्चों ने जोरदार तालियों के साथ स्वागत किया और कहा कि अब हम हिंदी पढ़ेंगे, हिंदी सीखेंगे, हिंदी बोलेंगे, इसी दिन राष्ट्रप्रेमियों का दल दोपहर में कुमटा के गिब प्राइमरी स्कूल में छात्रों को हिंदी के बारे में संबोधित किया और उन्हें देश की हमारी कोई राष्ट्रभाषा नहीं इसके बारे में बताया। बच्चों ने राष्ट्रपति से निवेदन किया हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा घोषित कि जाए। यात्रा आगे प्रस्तान करते हुए रात्रि में मैंगलूर पहुंचा, मैंगलूर पहुंचते वक्त कुछ देर हो गई लेकिन मैंगलूर के राष्ट्रभाषा प्रेमियों ने दल का इंतजार रात्रि ९.१५ बजे तक किया, एक बड़ी सभा का आयोजन किया गया था जहां पर वयोवृद्ध हिंदी सेवी भी उपस्थित थे, हिंदी के प्रति बातें लोगों ने सुनी, तालियों के साथ स्वागत किया और कहा कि भारत की एक राष्ट्रभाषा होनी ही चाहिए और बिजय कुमार जी जो आप का नारा है ‘पहले मातृभाषा-फिर राष्ट्रभाषा’ एक दिन पूरा राष्ट्र इस भावना का सम्मान करेगा और भारत सरकार हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान देगी, भारत को भारत कहेगी। आचार्य श्री विद्यासागर जी की भावना का सभी ने स्वागत किया और कहा कि आज भारत का एक संत बोल रहा है, एक दिन भारत के सभी संत समाज बोलेंगे, रात्री विश्राम कच्छी भवन में करवाया गया था, मैंगलूर में राजस्थानी संघ के अध्यक्ष अशोक धारीवाल का विशेष सहयोग रहा। दिनांक २८ दिसम्बर २०१८ को सुबह इडली-वड़ा सांभर और चाय का आनंद लेकर सभी केरल की ओर प्रस्थान कर गए व कोझीकोड पहुंचे, यहाँ की व्यवस्था राजू बाफना जी ने कल्याण जी आनंद जी पेढी में की थी, सभी ने भोजन कर स्थानीय लोगों से मिले, उन्हें ‘हिंदी बनें राष्ट्रभाषा’ अभियान के बारे में बताया, लोगों ने पूछा कि क्या हमारे भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है, ऐसा कैसे हो सकता है,तत्काल स्थानीय रहवासी जयंत भाई ने गूगल में सर्च किया गुगल में उन्हें पता चला कि हिंदी मात्र ऑफिशियल लैंग्वेज है, बहुत ही दर्द हुआ, लोगों ने कहा कि बिजय कुमार जी हम आपके साथ है जैसा आप कहेंगे, हम करेंगे, हम भारी संख्या में ४ जनवरी को दिल्ली पहुंचेंगे। सभा की समाप्ति के बाद साथ चल रही नाटक मंडली की टीम के प्रमुख महेश राठी जी व टीम ने यात्रा के साथ चलने में असुविधा जताई कि हम आगे नहीं चल सकते, मुंबई वापसी की व्यवस्था करवाएं, उनकी मुंबई वापस की व्यवस्था कर दी गई। कारवां कोयंबतूर की ओर चल पड़ा। २९ दिसम्बर २०१८ का कोयंबतूर में राजस्थानी संघ जो ३६ कौम का एक संघ बना हुआ है जिसके अध्यक्ष सीए. श्री कैलाश जैन व मंत्री दीपक नाहटा ने सभी का स्वागत किया और कहा कि भारी संख्या में हम भी ४ जनवरी को दिल्ली में उपस्थित रहेंगे। २९ दिसंबर २०१८ को यात्रा दल सेलम पहुंचे, सेलम में सर्वप्रथम श्री दिगंबर जैन समाज के अध्यक्ष विमल जी पाटनी व कार्यभार संभालने वाले श्री अजय जी ने सब का स्वागत किया और एक सभा का आयोजन किया गया, सभा में जब सभी को पता चला कि हमारे देश भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है, सभी को काफी दुख हुआ, मलाल हुआ और अपने विचार व्यक्त किए कि बिजय कुमार जी आप आगे बढ़ें, हमारा तन-मन-धन के साथ आपको सहयोग रहेगा, सभी का धन्यवाद किया गया, सभी लोग वापस विश्राम स्थल पर आए और सुबह की तैयारी में व्यस्त हो गए। दिनांक ३० दिसम्बर २०१८ को चेन्नई के लिए प्रस्थान किया गया। तमिल हमारी मातृभाषा है हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा -तमिलनाडु निवासी दिनांक ३० दिसंबर २०१८ को यात्रा तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई पहुकोयंबतूर ंची, चेन्नई के पोरुर तीर्थ में सभा की व्यवस्था की गई थी, सभी ने वहां पर दोपहर के भोजन का आनंद लिया। सभा में उपस्थित लोगों ने कहा कि बहुत ही अच्छा काम है, तमिलनाडु की धरती और तमिलनाडु के निवासी हिंदी बने राष्ट्रभाषा अभियान का पूरा सहयोग करेंगे क्योंकि आप पहले मातृभाषा की बात कर रहे हैं तो इसमें तमिलनाडु का कहीं पर भी कोई विरोध नहीं रहेगा और कहा कि बहुत ही नेक और उत्तम कार्य है जो काम ७२ वर्ष पहले होना चाहिए था वह आज आप के नेतृत्व में हो रहा है इसके लिए हमसभी तमिलनाडु निवासी आपको धन्यवाद देते हैं। चेन्नई होते हुए यात्रा नेल्लोर पहुंची। तत्पश्चात विजयवाडा के लिए रवाना हुई। दिनांक ३१ दिसंबर २०१८ साल का अंतिम दिन सभी हैदराबाद पहुंचे, हैदराबाद में हिंदी मैत्री मंच के अध्यक्ष डॉ रियाज अंसारी व प्रोफ़ेसर विद्याधर जी ने यात्रा दल का स्वागत किया। सभा का आयोजन हिंदी विद्या मंदिर में किया गया था। भारी संख्या में शिक्षकों की उपस्थिति थी। अध्यक्षता डॉ अंसारी ने किया व डॉ रजनी ने आभार व्यक्त किया। सभा में उपस्थित शिक्षकों ने कहा कि जैन साहेब २०१९ में हिंदी राष्ट्रभाषा बनकर रहेगी ऐसी हमारी शुभकामनाएं हैं। सभा का समापन रात्रि ८:३० बजे राष्ट्रगान के साथ हुआ। दिनांक १ जनवरी २०१९ वर्ष का प्रथम दिन हम सभी हैदराबाद से आदिलाबाद पहुंचे। अदिलाबाद में स्वागत स्थानीय निवासी बजरंग लाल जी अग्रवाल के यहाँ हुआ। सर्वप्रथम सभी ने दोपहर का भोजन किया। सभा में चर्चा हुई कि क्यों आज तक हमारे देश की राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई है,सभी को जानकारी दी गई और इंडिया का विस्तृत रूप बताया गया तो सभी ने जोरदार स्वर में कहा कि अब हम हमारे देश को भारत कहेंगे, हमारे देश का नाम भारत है और इसका प्रचार-प्रसार हम जोरदार तरीके से करेंगे, हमारे व्यापार में हर जगह हम भारत ही लिखेंगे, भारत ही कहेंगे, भारत ही बोलेंगे, सभा का समापन राष्ट्रगान के द्वारा हुआ। दिनांक १ जनवरी २०१९ वर्ष का प्रथम दिन संध्या को हम सभी नागपुर पहुंचे, नागपुर में श्री दिगंबर जैन भवन में सभा का आयोजन किया गया था। सभा में भारी संख्या में राष्ट्रभाषा प्रेमी उपस्थित हुए थे,सभी लोगों ने जानना चाहा कि आज तक हमारी भारत की राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई? जब उन्हें विस्तृत जानकारी मिली तो सभी को दुख भी पहुंचा और आज तक की अनभिज्ञता के लिए शर्मिंदा भी हुए ,सभी ने यह भी कहा कि कैसे हमारे देश की राष्ट्रभाषा बने बिजय कुमार जी, हमें बताइए कि हमें क्या करना है, हम सभी, हर प्रकार से आपके साथ हैं, हम ही नहीं, एक दिन पूरा देश आपके साथ होगा, हम सभी तन मन से आपके अभियान का समर्थन करते हैं और विश्वास दिलाते हैं कि आपका ये अभियान सफल होकर रहेगा। सभा में उपस्थित राष्ट्रभाषा प्रेमियों ने आचार्यश्री विद्यासागर जी को नमोस्तु करते हुए कहा कि यह अभियान आचार्य श्री का नहीं एक दिन पूरे देश का होगा, आचार्य श्री का सपना जरूर पूरा होगा। सभा में उपस्थित सर्वश्री नरेश पाटनी, जय कुमार जैन, किशोर कुमार जैन, हैदराबाद अधीर जैन,अरुण पाटोदी, सुमत लल्ला जैन, हस्तीमल कटारिया, अजय कासलीवाल,हुकुमचंद सेठी,रतन लाल गंगवाल, अशोक कुमार जैन,अभय जैन, विनय वीरेंद्र जैन, निकेश विमलचंद जैन, कमल कुमार बडजाते, दीपक जवेरी,राजकुमार जैन, अनीश जैन (पत्रकार) डा सुश्री रीचा जैन आदि की उपस्थिति रही सभा का समापन राष्ट्रगान से हुआ।२ जनवरी २०१९ को नरसिंहपुर पहुंचे, मध्यप्रदेश का वो क्षेत्र जहाँ हमारा स्वागत ही नहीं हुआ, छात्रों से साक्षात्कार का मौका भी मिला, जब बच्चों को बताया कि हमारे देश की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है जो कि होनी चाहिए, बच्चों ने जोरदार आवाज में कहा कि क्या हमारा देश आजाद नहीं है, हमारे देश की आवाज कौन सी है? नरसिंहपुर के साथियों ने हमारा सम्मान कर दोपहर के भोजन के साथ सभी ने विदा किया और कहा कि नरसिंहपुर का बच्चा-बच्चा आपके साथ है। दिनांक २ जनवरी २०१९ को सभी उत्तर प्रदेश स्थित खुरई पहुँचे, जहाँ आचार्य श्री विद्यासागर जी प्रवास के दौरान विराजमान थे, सभी ने आचार्यश्री के दर्शन किए, हमने भारतीय भाषा सम्मान यात्रा के बारे में विवरणों के साथ बताया, आचार्य श्री ने कहा कि दो बातों का ख्याल रखना, हिंदी बने राष्ट्रभाषा आंदोलन अहिंसा पूर्वक हो,जैनों का आंदोलन नहीं जन-जन का आंदोलन बने,हमने कहा कि आचार्य श्री आपके निर्देशों का पालन होगा और विश्वास दिलाते हैं कि जब तक भारत सरकार हिंदी बनें राष्ट्रभाषा पर निर्णय नहीं ले लेती, हम दिल्ली से बाहर नहीं जायेंगे। आचार्यश्री ने दोनों हाथ उठा कर आशीर्वाद दिया और कहा कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। ३ जनवरी २०१९ को यात्रा ग्वालियर पहुंची, ग्वालियर के छात्रावास में हम सभी का स्वागत हुआ और भारी संख्या में उपस्थित छात्रों ने सम्मिलित आवाज में कहा कि राष्ट्रपति जी हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलवाइयेऔर भारत को भारत बोलने के लिए हमें आशीर्वाद दीजिए, इस निवेदन को रिकॉर्डिग किया गया और यह प्रयास किया जायेगा कि यह निवेदन माननीय राष्ट्रपति जी भारत के हाथों सुपुर्द कर सकें। हमारी मुलाकात सत्यनारायण जी जटिया से भी हुई जो राज्यसभा के सदस्य भी हैं साथ ही राजभाषा विभाग के उपाध्यक्ष, उन्होंने कहा जैन साहब आपकी भावना बहुत अच्छी है, हिंदी को मैं भी सम्मान दिलाना चाहता हूं, मैं भी जैन हूँ आचार्य श्री विद्यासागर जी का भक्त हूँ लेकिन आपसे निवेदन करता हूं कि आपके पास जिद के साथ जुनून भी है कृपया जुनून को बरकरार रखें और जिद को छोड़ दें कारण यह है कि यह सिलसिला जारी रहेगा तो ही हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान मिल पाएगा, आदरणीय जटिया जी ने हमें मिठाई खिलाई और विदा किया। दिनांक ६ जनवरी २०१९ को जयपुर पहुंचे, यहां पर हमारे प्रिय मित्र व भाषा प्रेमी अरुण अग्रवाल जी के निवास स्थल पर हमने नाश्ता किया, अरुण जी को हमने बताया कि हमारा अभियान राजस्थान में पहले राजस्-थानी फिर अपनी राष्ट्रभाषा बने,साथ ही भारत को भारत बोला जाए, अरुण जी ने कहा कि बिजय कुमार जी मैं तो भाषा प्रेमी हूँ, आपका यह नारा पहले मातृभाषा फिर राष्ट्रभाषा का मैं पूर्ण समर्थन करता हूं और आपके कहे अनुसार हम जयपुर में नहीं पूरे राजस्थान में ३० जनवरी २०१९ को महात्मा गांधी जी की पुण्यतिथि पर हम मूक रैली का आयोजन करेंगे और सभी को बताएंगे कि ‘राष्ट्रभाषा बिना भारत गूंगा है’ विश्वास दिलाता हूं कि जैन साहब एक दिन पूरा भारत राष्ट्रभाषा के लिए आंदोलन करेगा, आपकी भावना का समर्थन करेगा। हिंदी बने राष्ट्रभाषा अभियान की सफलता के लिए हमने मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी के दर्शन किए सभी आवां पहुंचे वहां मुनि पुंगव श्रीसुधासागर जी के दर्शन हुए, सुधा सागर जी ने दोनों हाथों से आशीर्वाद दिया कहा कि आप बहुत अच्छा काम कर रहे हो, उसके बाद हमने मुनिश्री निष्कंप सागर जी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त किया, क्षुल्लक श्री १०५ धैर्य सागर जी महाराज ने कहा कि आपको २६ जनवरी के पूर्व संध्या के पहले जब आदरणीय राष्ट्रपति जी का उद्बोधन होता है उसके पहले भारत भर के हर कलेक्टर-एसडीएम के पास राष्ट्रभाषा बने अभियान का पत्र देना चाहिए, आदरणीय राष्ट्रपति जी के नाम, ताकि उनके उद्बोधन के पहले यह विषय भी शामिल हो जाए, साथ ही उन्होंने कहा कि आप लोगों को इस अभियान से जितने भी धर्म भारत में है उन सभी के गुरु भगवंत को व बड़े सामाजिक पद पर बैठे अध्यक्षों से संपर्क कर उन सभी को जोड़ने का प्रयास करना चाहिए ताकि ‘हिंदी बने राष्ट्रभाषा’ अभियान सफल हो जाये, तत्पश्चात् हमने क्षुल्लक श्री १०५ गंभीर सागर जी महाराज के दर्शन किए,आशीर्वाद लिया, संध्या का भोजन कर आंवा से प्रस्थान कर गए। श्री १००८ मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र स्वस्तिधाम जहाजपुर में दिनांक ६ जनवरी २०१९ को हम सभी परम पूज्य विदुषी लेखिका आर्यिका शिरोमणि श्री १०५ स्वस्ति भूषण माताजी के दर्शन किए, हमने आर्यिका श्री को बताया कि आज तक हमारी कोई राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई है और हमारे भारत का नाम भारत होना चाहिए, इस निवेदन को सुनते ही आर्यिका श्री ने कहा कि बहुत ही बढ़िया काम कर रहे हो, मेरी आपको शुभकामनाएं हैं सफलता न मिलने पर नए-नए रास्ते चुनना, सफलता जरूर मिलेगी, यह मेरा आशीर्वाद है मैं अब अपने प्रवचन में भी हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाने का निवेदन करती रहूंगी, अपने सभी श्रावकगणों से, आर्यिका श्री का आशीर्वाद लेकर हम केसरिया तीर्थ की तरफ आगे बढ़े। दिनांक ७ जनवरी २०१९ को हम सभी श्री जैन श्वेतांबर मंदिर पावागढ़ तीर्थ पहुंचे वहां हमारे दर्शन मुनि श्री पूर्णचंद्र विजय जी महाराज साहब, जो वल्लभ समुदाय से आते हैं, उनके दर्शन किए उन्होंने कहा की बहुत ही अच्छे विचार है, देश की अपनी एक राष्ट्रभाषा तो होनी ही चाहिए हमारे देश का नाम तो भारत है, मैं पूर्ण रूप से समर्थन करता हूं और कुछ ही दिनों में बल्लभ समुदाय से मैं इस भावना का परिचय करवा दूंगा, उन्होंने यह भी कहा कि आप बड़ौदा निवासी नीरज भाई जैन अधिवक्ता से संपर्क करें वह भी इसी विचार से हैं और आपका साथ भी देंगे, समर्थन भी देंगे हम सभी ने उनके दर्शन आशीर्वाद लिया, मांगलिक लिया और मुंबई की तरफ आगे बढ़े। रास्ते में लोगों की तबियत खराब होने लगी, ड्राईवर मंगेश की तबियत कुछ ज्यादा ही खराब हो गयी हम सभी ने विचार किया कि बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, बड़ौदा, सूरत की यात्रा कमी अगले बार करेंगे, हम सभी को जल्द ही मुंबई पहुंच जाना चाहिए, करीब ११.३० रात्री, ७ जनवरी २०१९ को हम सभी मुंबई पहुंचे। -जिनागम

क्या आप तिरंगे झंडे के बारे में जानते हैं?

क्या आप तिरंगे झंडे के बारे में जानते हैं? प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना एक ध्वज होता है। यह एक स्वतंत्र देश होने का संकेत है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की अभिकल्पना पिंगली वैकेयानन्द ने की थी और इसका वर्तमान स्वरूप २२ जुलाई १९४७ को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था, जो १५ अगस्त १९४७ को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी, इसे १५ अगस्त १९४७ और २६ जनवरी १९५० के बीच भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया और इसके पश्चात भारतीय गणतंत्र ने इसे अपनाया। भारत में ‘तिरंगे’ का अर्थ भारतीय राष्ट्रीय ध्वज है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफ़ेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ २ और ३ का है। सफ़ेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी सारनाथ के शेर के स्तंभ पर बना हुआ है। इसका व्यास लगभग सफ़ेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें २४ तीलियां है। भारत के वर्तमान तिरंगे झंडे का इतिहास: प्रथम राष्ट्रीय ध्वज ७ अगस्त १९०६ को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था। द्वितीय ध्वज को पेरिस में मैडम कामा और १९०७ में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार १९०५ में)। यह भी पहले ध्वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्तऋषि को दर्शाते हैं, यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था। तृतीय ध्वज १९१७ में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड़ लिया। डॉ.एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया। इस ध्वज में ५ लाल और ४ हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्योस में इस पर बने सात सितारे थे। बायीं और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था, एक कोने में सफ़ेद अर्धचंद्र और सितारा भी था। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो १९२१ में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया। यहां आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग, जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें एक सफ़ेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष १९३१ ध्वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष रहा, तिरंगे ध्वज को हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया। यह ध्वज जो वर्तमान स्वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफ़ेद और मध्य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था, तथापि यह स्पष्ट रूप से बताया गया इसका कोई साम्प्रदायिक महत्व नहीं था और इसकी व्याख्या इस प्रकार की जानी थी। २२ जुलाई १९४७ को संविधान सभा ने इसे मुक्त भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्व बना रहा। केवल ध्वज में चलते हुए चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया, इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्वज अंतत: स्वतंत्र भारत का तिरंगा ध्वज बना। ध्वज के रंग: भारत के राष्ट्रीय ध्वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच में स्थित सफ़ेद  पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है।चक्र : इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गतिशील है और रूकने का अर्थ मृत्यु है।ध्वज संहिता : २६ जनवरी २००२ को भारतीय ध्वज संहिता में संशोधन किया गया और स्वतंत्रता के कई वर्ष बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यकालों और फैक्ट्री में न केवल राष्ट्रीय दिवसों पर, बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रूकावट के फहराने की अनुमति मिल गई। अब भारतीय नागरिक राष्ट्रीय झंडे को शान से कहीं भी और किसी भी समय फहरा सकते हैं। बशर्ते कि वे ध्वज की संहिता का कठोरता पूर्वक पालन करें और तिरंगे की शान में कोई कमी न आने दें। सुविधा की दृष्टि से भारतीय ध्वज संहिता, २००२ को तीन भागों में बांटा गया है। संहिता के पहले भाग में राष्ट्रीय ध्वज का सामान्य विवरण है। संहिता के दूसरे भाग में जनता, निजी संगठनों, शैक्षिक संस्थानों आदि के सदस्यों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन के विषय में बताया गया है। संहिता का तीसरा भाग केन्द्रीय और राज्य सरकारों तथा उनके संगठनों और अभिकरणों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन के विषय में जानकारी देता है।