श्री क्षेत्र धर्मस्थल: इतिहास और परम्परा

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आज से लगभग सात सौ वर्ष पूर्व कुडुमा ग्राम के ग्राम-प्रमुख गृहस्थ श्री विरमण्णाजी हैगड़े के द्वारा धर्मस्थल की ‘‘हैगड़े परम्परा’’ का प्रारम्भ हुआ था, आज जो ‘‘धर्मस्थल’’ नाम से प्रतिष्ठित है, इसी छोटे से ग्राम का प्राचीन नाम ‘‘कुडुमा’’ था। कुडुमा का हैगड़े परिवार ही ग्राम का प्रधान परिवार था, यह परिवार सदैव से अपनी धर्मनिष्ठा, सदाचरण और उदारता के लिये विख्यात रहा है, प्राचीन काल में इस ग्राम का एक नाम ‘‘मल्लारमाडी’’ भी था।
हैगड़े परिवार अडिग आस्थावान जैन परिवार है, अष्टम तीर्थंकर चन्द्रनाथस्वामी की उपासना और आराधना इनके यहाँ सदाकाल से चली आ रही है, निवास स्थान के साथ चन्द्रनाथस्वामी का मन्दिर इनके यहाँ अनिवार्य रूप से विद्यमान रहा है, इसी प्रकार बाहुबली स्वामी भी पिछले एक सहस्त्र वर्षों से हैगड़े परिवार के आराध्य रहे हैं, आज भी चन्द्रनाथस्वामी के मन्दिर में ऊपरी मंजिल पर लता-वेष्ठित बाहुबली स्वामी की एक अत्यंत प्राचीन मनोहर प्रसिद्ध धातु-प्रतिमा स्थापित है, जिसकी नित्य पूजन-आराधना चन्द्रनाथस्वामी के ही समान आदर और श्रद्धा के साथ होती है।
अतिथि-सत्कार और आगत्य-सेवा हैगड़े परिवार का शास्वत धर्म रहा है, दूर-दूर तक प्रसिद्ध हेगड़े परिवार की दानशाला के द्वार सहस्त्र वर्षों से कभी बन्द नहीं हुए, पेरगड़े स्थानीय तुलू भाषा में हैगड़े का ही पर्यायवाची नाम है, हैगड़े का स्नेहपूर्ण आतिथ्य सदा सबके लिये उपलब्ध रहा है, यहाँ मानवमात्र की सेवा का ध्येय सर्वोपरि रहता आया है, ऊँच-नीच या छोटे-बड़े का यहाँ कभी कोई भेद नहीं किया गया, यह परम्परा दिन-दूनी रात-चौगुनी होकर आज भी उसी प्रकार विद्यमान है जैसी वह हजार साल पहले रही होगी।

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श्री धर्मस्थल में अत्यंत प्राचीन-श्री चंद्रनाथ स्वामी का मंदिर
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सर्व समभाव का मूलाधार-श्री मंजुनाथ स्वामी का मंदिर

परम्परा का प्रारम्भ-जनऋतियों के अनुसार चौदहवीं शताब्दी के पूर्वाद्र्ध में एक दिन चार संत मल्लारमाडी के पेरगड़े के द्वार पर प्रगट हुए, गृहपति विरमण्णा पेरगड़े और उनकी पत्नी श्रीमती अम्मु बल्लालती ने परम्परा और मर्यादा के अनुरूप उनका स्वागत-सत्कार किया, कहा जाता है कि ये संत चार धर्म देवता ही थे, पेरगड़े परिवार के आतिथ्य से प्रसन्न होकर उन्होंने स्वप्न में विरमण्णा दम्पति को संकेत दिया कि वे यहीं स्थायी निवास करना चाहते हैं, सुबह पेरगड़े ने आश्चर्यपूर्वक देखा कि कुछ सामग्री छोड़कर चारों संत अंतर्धान हो गए, उन अलौकिक अतिथियों के अवदान के रूप में शाश्वत धर्मलाभ का आशीर्वाद और अक्षय-निधि का वरदान ही पेरगड़े दम्पति के पास शेष था, यही धर्मस्थल का बीजाकुरण था।
स्वप्न के संकेतों के अनुसार विरमण्णा और बल्लालती अम्मा ने पास ही अपने निवास के लिये नया भवन बनाकर वह पुराना निवास धर्म-देवताओं के आवाहन-पूर्ण के लिये खाली कर दिया, वहाँ नित्य की तरह तरह से पूजा आराधना और उत्सव आयोजित होने लगे। अन्नदान अधिक व्यवस्थित होकर चलने लगा, इस प्रकार श्री विरमण्णाजी पेरगड़े को वर्तमान हैगड़े परम्परा का प्रथम-पुरूष होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, यह परम्परा आज तक विच्छिन्न रूप से चल रही है।
श्री विरमण्णाजी हैगड़े के जन्म और अवसान की तिथियाँ अब तक स्थिर नहीं की जा सकी है, परन्तु उनके उत्तराधिकारी द्वितीय हैगड़े श्री पदमैया की अवसान तिथि १४३२ हमें ज्ञात है, फिर चन्द्रैया प्रथम १४३२ से १५०५ तक इस पीठ पर रहे, उनके पश्चात् चौथे धर्माधिकारी देवराज हैगड़े से लेकर चौदहवें पीठाधीश श्री कुमारैया हैगड़े के अवसान (१८३० ईस्वी) तक सवा तीन सौ वर्षों का इतिहास सन संवत् सहित अभी लिखा नहीं जा सका है, पट्टावली में उन सबके नाम और क्रम सुरक्षित हैं और उनका काल निर्धारित करने के प्रयास हो रहे हैं।

कुडुमा धर्मस्थल बन गया-विरमण्णा दम्पत्ति के द्वार पर अचानक प्रगट हुए चार संतों ने स्वप्न संकेतों में जैसा कहा था, विरमण्णाजी ने उसका अक्षरश: पालन करना प्रारम्भ कर दिया था, इसलिये कुडुमा के इस परिवार को यह सिद्धि प्राप्त थी जब तक उनके यहाँ अतिथिसत्कार और अन्नदान का क्रम चलता रहेगा, जब जक भक्ति, श्रद्धा और धर्माचरण उनमें विद्यमान रहेगा, तब तक उनकी सम्पत्ति दिनों दिन बढ़ती ही जायेगी।
कई पीढ़ियों तक जनसेवा और अतिथि-सत्कार निरन्तर वृद्धिगत होकर यहाँ चलता रहा, बदिनड़े पहाड़ी पर कालरकाई, कालराहु, कुमारस्वामी और कन्याकुमार चारों देवताओं के चार उपमन्दिर भी बना दिये गये, उनमें निरन्तर पूजा-अर्चना होने लगी, अण्णप्पास्वामी का मन्दिर भी निर्मित हो गया। कालान्तर में कदरी से मंगाकर मंजुनाथस्वामी का मंदिर भी निर्मित हो गया। कालान्तर में कदरी से मंगाकर मंजूनाथस्वामी का शिव-विग्रह भी यहाँ स्थापित कर दिया गया, इस प्रकार एक ही तीर्थ पर मंजुनाथ स्वामी, चन्द्रनाथ स्वामी, बाहुबली स्वामी और धर्म देवताओं की पूजा-आराधना एक साथ करने की परम्परा ने सर्व-धर्म-समन्वय का एक अनोखा पवित्र वातावरण यहाँ निर्मित कर दिया गया, प्राय: हर धर्म के मानने वाले यात्रियों का बड़ी संख्या में यहाँ नित्य आगमन होने लगा, उन सबके लिये विश्राम और भोजन की नि:शुल्क व्यवस्था करना हैगड़े का कर्तव्य बन गया, इस तीर्थ की कीर्ति दूरश्री दूर फैलने लगी, धीरे-धीरे दो सौ वर्ष बीत गये।
सोलहवीं सदी में देवराज हैगड़े के समय पुष्पक्षेत्र उडुपी से सौदे मठ के पीठाधिपति श्री वादिराज स्वामीजी धर्मयात्रा करते हुए यहाँ पधारे, यहाँ के दान, धर्म आदि की उत्तम और उदार व्यवस्था देखकर वे बहुत प्रभावित हुए और अनायास उनके श्रीमुख से निकल पड़ा- ‘‘यह तो धर्मस्थल ही है।’’ बस, फिर उसी दिन से कुडुमा या मल्लारमाडी का नाम ‘‘धर्मस्थल’’ ही प्रचलित हो गया, लोग धीरे-धीरे स्थान का प्राचीन नाम भूलने लगे, आज तो वादिराज स्वामी का दिया हुआ यह ‘‘धर्मस्थल’’ नाम ही इस तीर्थ का जग-प्रसिद्ध नाम है, इस परम्परा के चौदहवें धर्माधिकारी श्री कुमारैया हैगड़े एक प्रभावशाली सुदर्शन महापुरूष थे, दूर-दूर तक उन्हें राज मान्यता और सम्मान प्राप्त होता था, उस समय कृष्णराज वाडियार तृतीय मैसूर के महाराजा थे, श्री कुमारैया जी का महाराजा के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध था, वे अनेकों बार मैसूर महाराजा के अतिथि हुये और उन्हें धर्म का महत्व समझाया।

मलय प्रदेश और विशेष कर समुद्र तटीय कर्नाटक की शताब्दियों पुरानी भक्ति प्रेरित लोग कला ‘‘यक्षगान’’ सत्रहवीं शताब्दी में लुप्तप्राय हो चुकी थी। श्री कुमारैया जी ने अपने कार्यकाल में उसे नव-जीवन प्रदान किया, उन्होंने यक्षगान के रूप को सँवारा, गाँव-गाँव से कलाकारों को बुला कर धर्मस्थल में उन्हें आश्रय दिया, मंच-प्रदर्शन के लिए मण्डली को अनेक वाद्ययन्त्र बनवा कर प्रदान किये, अनेक प्रकार के वस्त्र, आभूषण, अलंकार और आयुध उन्हें उपलब्ध कराये, इस प्रकार मुकारैया जी हैगड़े ने इस भूमि भाग की एक दुर्लभ कला-परम्परा को समाप्त होने से बचाया, उन्होंने यक्षगान में दशावतार तथा महाभारत और रामायण के कई प्रसंगों को जोड़कर यक्षगान को जन समुदाय के लिए रोचक और शिक्षाप्रद बनाया।
सन् १९१२ में जब कुमारैयाजी पुन: मैसूर गये तब धर्मस्थल की उस यक्षगान मण्डली को अपने साथ ले गये, मैसूर में मण्डली के द्वारा कई प्रदर्शन किए गये, जिन्हें वहाँ भारी सराहना मिलती रही। मैसूर महाराज ने पूरी मण्डली को बहुत से उपहार आदि देकर प्रोत्साहित किया, उन्होंने यक्षगान मण्डली को स्थायी रूप से मैसूर में रोकने की इच्छा व्यक्त की, परन्तु कुमारैयाजी ने शेष यात्रा के लिए उपयोगी बताकर अपनी मण्डली को साथ ही रखा, मण्डली के कुछ कलाकारों को अवश्य उन्होंने मैसूर महाराज के आश्रय में छोड़ दिया, जिनके वंशज अभी भी वहाँ यक्षगान की परम्परा को जीवित रखे हुए हैं, कुमारैया जी से प्रभावित होकर वाडियार महाराज ने श्रवणबेलगोल मठ के लिए उसी समय एक ग्राम दान में दिया।
मैसूर से कुमारैया जी कोडगू गये और कई दिन तक वहाँ के राजा वीरराजेन्द्र के अतिथि रहे, राजा ने इस यात्रा की स्मृति स्वरूप अनेक उपहार और अस्त्र शस्त्र कुमारैया जी को भेंट किये।
यात्रा मार्ग में स्थान-स्थान पर यक्षगान के कार्यक्रम होते रहे, उस प्रदर्शन के माध्यम से जन-जन की भक्ति-भावना प्रोत्साहित होती रही, इस प्रकार कुमारैया जी हैगड़े की वह मैत्री-यात्रा ‘‘धर्म-यात्रा’’ में परिवर्तित हो गयी।
श्रवणवेलगोल के गोमटेश्वर बाहुबली सहित अनेक जिनालयों का दर्शन इस यात्रा में प्राप्त हुआ, १८३० में कुमारैया जी का देहावसान हो गया, उनके स्थान पर चन्दैया चतुर्थ को ‘हैगड़े’ पद प्राप्त हुआ।
श्री चन्दैया हैगड़े (चतुर्थ) का कार्यकाल सन् १८३० में प्रारम्भ हुआ, विद्यमान धर्माधिकारी धर्मभूषण, परोपकार, धुरन्धर, अभिनव चामुण्डराय डॉ. वीरेन्द्र हैगड़े अपनी परम्परा के इक्कीसवें धर्माधिकारी हैं, उनकी सम्पूर्ण परम्परा का क्रम इस प्रकार है-

धरती पर एक मात्र धर्मस्थल-जहां पर भव्यात्मा का है हार्दिक स्वागत
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श्रीयुत मंजैयाजी हैगड़े (१९१८-१९५५) धर्मस्थल के सत्रहवें धर्माधिकारी श्री धर्मपाल हैगड़े के आकस्मिक अवसान के उपरान्त उनकी माताजी ने उत्तराधिकारियों के रूप में एक परिवार के दो बालकों, चन्दैया और मंजैया को एक साथ गोद लिया था, दो बालकों को दत्तक बनाने का कोई उदाहरण कहीं सुना भी नहीं गया, यह एक असाधारण घटना थी, इसका क्या अभिप्राय था यह जानने का हमारे पास कोई उपाय नहीं है।
दत्तक विधि के समय दोनों बालक अवयस्क थे। चन्दैया जी १३ वर्ष के थे और मंजैया जी ८ वर्ष के थे, तब चन्दैया जी को हैगड़े पीठ पर आसीन करा कर उनके मातुल पद्मशेट्टी को परमर्शदाता बनाकर उनके कार्यकाल का प्रारम्भ हुआ, ये पद्मशेट्टी मंजैया हैगड़े (तृतीय) के पिता थे।
१९१८ ईस्वी में जब श्रीचन्दैया जी हैगड़े का निधन हुआ, तब उनके पुत्र रत्नवर्म मात्र छ: माह के शिशु थे, इस कारण चन्दैया जी के निधन उपरान्त मंजैया जी को धर्माधिकारी पीठ पर आसीन कराया गया, सन् १९५५ तक तैंतीस वर्ष वे इस पीठ पर रहे, उन्होंने अपने कार्यकाल में अनेक प्रकार से श्री क्षेत्र की महिमा में अभिवृद्धि करने का प्रयत्न किया।
कई शताब्यिों से क्षेत्र पर दीपावली के एक माह पश्चात् पाँच दिन का ‘‘दीपोत्सव’’ मनाने की परम्परा चली आ रही थी, मंजैया जी ने इस वार्षिक उत्सव के साथ कला संगीत-सम्मेलन, सर्वधर्म सम्मेलन और कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की आयोजना जोड़कर इसे एक नवीन गरिमा से मंडित कर दिया, उनके द्वारा प्रारम्भ की गई यह परम्परा कई गुने विस्तार के साथ आज भी धर्मस्थल में चल रही है, उन आयोजनों के माध्यम से सभी धर्मों का सन्देश जन-जन तक पहुँचता  है, साहित्यकारों, संगीतज्ञों और कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता है और देवस्थान को प्रसिद्धि प्राप्त होती है।
११-१२ वर्षों का काल एक ‘‘युग’’ माना जाता है, सम्भवत: धर्मपीठ पर तीन युग पूर्ण करने के उपलक्ष्य में श्री मंजैया हैगड़े ने एक ऐसे समारोह का संकल्प किया, जिसे आयोजित करने वाले लोग इतिहास के पृष्ठों पर बहुत विरले ही पाये जाते हैं, उन्होंने ‘‘नडावली’’ उत्सव आयोजित किया, यह छठवीं शताब्दी में महाराजा हर्षवर्धन द्वारा प्रयाग में त्रिवेणी संगम पर आयोजित ‘‘सर्वस्वदान’’ की तरह का आयोजन था, इसमें मंजैया जी ने अपना सब कुछ दान में देने की घोषणा की थी।
डी.एम. कालेज उजिरे में हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो.एन. नागराज पूवणी ने अपने स्मृति कोश में बताया है कि नडावली-उत्सव के समय चन्द्रनाथ स्वामी मंदिर में पंचकल्याणक महा-पूजा का आयोजन किया गया था, श्री रत्नवर्म और उनकी धर्मपत्नी रत्नम्मा जी देवेन्द्र और शची के रूप में उस उत्सव का संचालन कर रहे थे, मंजैया जी हैगड़े ने चन्द्रनाथ स्वामी मंदिर के समीप अपने घर की सारी वस्तुएँ निकाल कर रख दी थी, अनेक गाँवों के लोग एकत्र हुए थे और जिसे जो मन भाता वह उस वस्तु को उठा कर अपने घर ले जाता था, किसी को कोई रोक-टोक नहीं थी, तरह-तरह के बर्तन, अन्न, वस्त्र और आभूषण उस सामग्री में सम्मिलित थे, सन् १९५१ की पन्द्रह से बाईस फरवरी तक पूरे सप्ताह यह अनुष्ठान चलता रहा।

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धर्मस्थल में बाहुबलि प्रतिष्ठापना के स्वप्नदर्शी दंपतीस्वर्गीय रत्नवर्माजी हैगड़े एवं श्रीमती रत्नम्माजी

श्री मंजैया हैगड़े कलाप्रेमी और कला संरक्षक तो थे ही, वे स्वयं एक उत्कृष्ट कलाकार भी थे, उन्होंने स्वयं अपनी कुंचिका से अनेक बहुरंगे चित्रों की रचना की, उनके कुछ चित्र अभी भी धर्मस्थल के वसन्त-महल और मंजूषा संग्रहालय में सुरक्षित हैं, भगवान बाहुवली के जीवन पर मंजैया जी द्वारा बनाये कुछ चित्र-फलक श्रवणबेलगोल में भी रखे हैं जिन्हें १९८१ में गोमटेश्वर सहस्त्राब्दी प्रतिष्ठापना एवं महामस्तकाभिषेक महोत्सव के अवसर पर विशेष रूप से प्रदर्शित किया गया था, पीठासीन धर्माधिकारी श्री मंजैया के द्वारा चित्र-फलकों पर बाहुबली का चित्रांकन उस तथ्य को भी समर्थित करता है कि धर्मस्थल में बाहुबली में बाहुबली की मान्यता सदैव प्रवर्तमान रही है, सभी धर्माधिकारियों ने चन्द्रनाथ मन्दिर में प्रतिदिन स्वामी के साथ बाहुबली प्रतिमा की भी पूजा-आराधना की है और समय-समय पर उनके उपदेशों को रेखांकित और प्रचारित करने के प्रयत्न किये हैं।
मंजैयाजी को अपने सुकार्यों के बल पर दक्षिण कन्नड़ जिले में जननायक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हो गई थी, उन्हें दो बार मद्रास विधान-परिषद का सदस्य भी मनोनीत किया गया था, अपने कार्यकाल में उन्होंने लोक-कल्याण के अनेक कार्य इस जिले में कराये, बीच में किन्हीं अज्ञानियों के द्वारा धर्मस्थल के आस-पास धर्म के नाम पर कुछ प्राणियों की बलि दी जाने लगी थी, उन्होंने संबंधित लोगों को धर्म का मर्म समझाया, जीव दया का महत्व बताया और अपने अधिकार क्षेत्र में बलि-प्रथा बंद कराने में सफलता प्राप्त की।
इस प्रकार ३७ वर्ष का यशपूर्ण कार्यकाल पूरा कर १९५५ में मंजैयाजी दिवंगत हुए, उनके उपरान्त श्री रत्नवर्माजी ने अपनी ३७ वर्ष की परिपक्व आयु में धर्माधिकारी का पद ग्रहण किया।

१५५ वें मर्यादा महोत्सव के त्रिदिवसीय कार्यक्रम में हुई घोषणा
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जैन विश्व भारती लाडनूं की सेवा मुनि देवेंद्र कुमार जी को मिली

पीलमेडू, कोयंबटूर: जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के महाकुंभ १५५ वें मर्यादा महोत्सव के समारोह का आयोजन कोयंबटूर के कोडशिया के परिसर में बने विशाल प्रवचन हॉल में शांतिदूत, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगल महामंत्रोच्चार के साथ शुभारंभ कर पुनीत संघीय परंपरा का निर्वाह करते हुए आचार्य भिक्षु द्वारा लिखित मर्यादा पत्र को स्थापित किया एवं विधिवत् १५५वें मर्यादा महोत्सव की उद्घोषणा की।
मर्यादा घोष व गीत : पूज्यप्रवर द्वारा १५५वें मर्यादा महोत्सव की उद्घोषणा के पश्चात मुनि दिनेश कुमार जी ने मर्यादा घोष लगाते हुए मर्यादा समवसरण के विशाल पंडाल को गुंजायमान किया। ‘भीखण जी स्वामी भारी मर्यादा बाँधी संघ में’ इस मर्यादा गीत का समवेत स्वर में संगान किया।
सेवा पर विशेष वक्तव्य : मुख्य नियोजिका साध्वी विश्रुतविभा जी ने एक कथानक के माध्यम से सेवा के महत्त्व पर प्रकाश डाला, आपने कहा कि आज के दिन मंगलभावना करती हूँ कि हम सबको सेवा का अवसर मिले, आचार्यप्रवर के समान सेवा करने वाला दूसरा नहीं, सेवा वही कर सकता है, जिसके मन में करुणा के भाव हो।
सेवा की अर्जी : शासन गौरव साध्वी कल्पलता जी ने साध्वियों को और सेवा का अवसर देने की प्रार्थना की, आपने कहा कि हम सौभाग्यशाली हैं कि हमारे धर्मसंघ में बचपन और बुढ़ापा दोनों सुरक्षित हैं।
मुनि कुमार श्रमण जी ने साधुओं की ओर से सेवा की अर्ज करते हुए कहा कि जहाँ त्राण है, वहाँ कोई चिंता नहीं। साधु-साध्वियों की सेवा आचार्य की सेवा होती है, एक पुस्तक में प्रकाशित तेरापंथ की सेवाओं का मूल्यांकन अन्य संघों ने किस तरह किया है, उसकी जानकारी दी।
सेवार्थी आराध्यों की सेवा : सेवा के महत्त्व को उजागर करते हुए आज के पावन अवसर पर आचार्यप्रवर ने फरमाया कि हमारी मर्यादाओं में एक कार्य है, सेवा की व्यवस्था, जिस धर्मसंघ में सेवा की व्यवस्था और सेवा का आश्वासन नहीं, वह धर्मसंघ वृद्धि नहीं कर सकता, सेवा से संघ वृद्धिगत हो सकता है, हमारे धर्मसंघ में सेवा-केंद्र बने हैं, उन केंद्रों में सापेक्षा सेवाग्राही साधु-साध्वी रखे जाते हैं, उनकी सेवा की व्यवस्था भी की जाती है, सेवाग्राही हैं, तो सेवादायी भी हैं, जो स्वस्थ हैं वे कम से कम सेवा ले और ज्यादा से ज्यादा सेवा दें, चाहे साधु हो, श्रावक परावलंबिता कम रहे, परवश होना दु:ख व स्ववश होना सुख है, सेवा से साधु तीर्थंकर नाम गौत्र का बंधन कर सकता है, हमारे साधु-साध्वियाँ किस तरह से सेवा केंद्रों में सेवा देते हैं, साधुता के पात्र हैं। गुरुकुलवास में भी सेवा देते हैं। सेवा के अनेक प्रकार होते हैं, जैसे व्याख्यान देना, पात्री रंगना, कपड़े सिलना आदि, शरीरगत सेवा जो वृद्धों-ग्लानों की होती है, वो विशेष सेवा होती है, यह सेवा का महत्त्वपूर्ण आयाम है। माला फेरना, ध्यान करना, पढ़ने-लिखने को गौण कर सेवा को प्राथमिकता देनी चाहिए। सेवा लेने वाले भी हमारे आराध्य हैं, हमारे आराध्य तभी प्रसन्न होंगे जब इन सेवार्थी आराध्यों की सेवा होगी।
सेवा केंद्रों की नियुक्तियाँ : पूज्यप्रवर ने सेवा केंद्रों की चाकरी फरमाते हुए कहा कि हमारे तेरापंथ धर्मसंघ में अनेक सेवा केंद्र हैं, सभी साधु-साध्वियों ने अपनी सेवा भावना व्यक्त की, अच्छी बात है, उनके अनुरोध का सम्मान करता हूँ, समय पर उपयोग किया जाएगा, हम सबकी सेवा भावना पुष्ट रहे।
लाडनूं के लिए : हमारे धर्मसंघ में जो सेवा केंद्र हैं उनमें लाडनूं प्राचीन सेवा केंद्र है, बहुत पुराना सेवा केंद्र है, बचपन से मैं उस केंद्र को बाल मुनि अवस्था से देखता आ रहा हूँ वो हवेलियाँ सेवा केंद्र की जिसमें कभी-कभी गुरुदेव तुलसी ने भी वहाँ प्रवास किया था मैं सबसे पहले साध्वियों के इस लाडनूं केंद्र में साध्वी कमलप्रभा जी बोरज आगामी वर्ष के लिए सेवा का दायित्व संभालें।

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बीदासर के लिए : हमारा दूसरा सेवा केंद्र जिसे समाधी केंद्र की संज्ञा प्राप्त है वह है-बीदासर। बीदासर हमारा एक थली का अच्छा क्षेत्र है, श्रीमद्जयाचार्य का कृपा पात्र और परमपूज्य मघवागणी जैसे रत्न उत्पन्न हुए, जिन्हें वीतरागकल्प कहा गया है। श्रीमद्जयाचार्य के उत्तराधिकारी थे और कितने वे शांत स्वभाव के कोमल रहे होंगे और उनकी बहन भी गुलाबाजी जैसी महान साध्वी हुई बीदासार हमारे मघवागणी से जुड़ा हुआ रहा है, जयाचार्य का जहाँ प्रवास होता रहा है, हमारे ४३ साधुसाध्वियां एक साथ बीदासर की धरती पर दीक्षित हुए थे, इस बीदासर की भूमि में वहाँ के लिए दो सिंघाड़ों की नियुक्ति करना चाहूँगा, साध्वी सुप्रभा जी और साध्वी उर्मिला कुमारी जी, ये दोनों अग्रणी सिंघाड़े बीदासर साध्वी केंद्र की सेवा का दायित्व आगामी वर्ष में संभालें।
गंगाशहर के लिए : गंगाशहर सेवा केंद्र जो गुरुदेव तुलसी की महाप्रयाण भूमि है यह थली का एक सुरंगा क्षेत्र है। हमारे धर्मसंघ के वयोवृद्ध मुनि राजकरण जी स्वामी जो बहुश्रुत परिषद के सदस्य हैं, वहाँ विराजमान हैं, वे स्वस्थ रहें, उनका स्वाध्याय का क्रम जप, तप जो भी है चलता रहे, खूब अच्छी आराधना होती रहे और साधना चलती रहे, स्वास्थ्य का ध्यान रखें, जो साध्वियों का सेवा केंद्र है, उसे साध्वी अमितप्रभा जी एवं साध्वी गुप्तिप्रभा जी, दोनों सिंघाड़े द्वारा आगामी वर्ष में गंगाशहर के सेवा केंद्र का दायित्व संभालें।
श्रीडूंगरगढ़ के लिए : श्रीडूंगरगढ़ भी हमारा थली का अच्छा श्रद्धालु क्षेत्र है और वहाँ हमारी साध्वियाँ विराजमान हैं, सेवाग्राही साध्वियाँ वहाँ के लिए साध्वी पावनप्रभा जी का सिंघाड़ा, इस आगामी वर्ष हेतु श्रीडूंगरगढ़ सेवा केंद्र की सेवा का दायित्व संभालें।
राजलदेसर के लिए : राजलदेसर जहाँ परमपूज्य गुरुदेव तुलसी ने मुनि नथमल जी टमकोर को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, राजलदेसर सेवा केंद्र के लिए साध्वी विनयश्री जी श्रीडूंगरगढ़ को मैं आगामी सेवा वर्ष में सेवा के लिए नियुक्त करता हूँ।
छापर के लिए : छापर हमारा संतों का सेवा केंद्र है और छापर ऐसा क्षेत्र है जो परमपूज्य कालूगणी की जन्मभूमि है जो हमारे दो गुरुओं के गुरु थे, गुरुदेव तुलसी व गुरुदेव महाप्रज्ञ जी जो हमारे गुरु हैं, इन दोनों के वे गुरु थे, जहाँ कालूगणी की जन्मशताब्दी का समारोह गुरुदेव तुलसी ने मनाया था और छापर में मुझे कभी चातुर्मास भी करना है, ऐसी मेरी भावना है, छापर में अभी जो हमारे संत हैं उनकी सेवा के लिए मुनि तत्त्वरुचि जी, जो दो वर्षों से सेवा में हैं, तो मैं चाहूँगा कि तीसरा वर्ष भी वही छापर सेवा केंद्र में सेवा का दायित्व संभालें।
जैन विश्व भारती, लाडनूं के लिए : जैन विश्व भारती एक बड़ी महत्त्वपूर्ण संस्था है, मन रमणीय कारिणी संस्था है, जहाँ शिक्षा, सेवा, साहित्य, ध्यान, योग कितने-कितने आयाम उस संस्था से जुड़े हुए हैं, मान्य विश्वविद्यालय जैन विश्व भारती संस्थान से जुड़ा हुआ है, जहाँ हमारी समणियों का मुख्यालय है, वे यहाँ साधना करती हैं और समणियाँ साध्वियों की सेवा भी करती हैं, हमारे समण हैं भी संतों की सेवा में अपना योगदान देते रहे हैं, समण श्रेणी भी हमारी अनेक रूपों में सेवा देने वाली है। जैन विश्व भारती में हमारे संत सेवाग्राही हैं और जैन विश्व भारती गुरुदेव तुलसी ने चातुर्मास करने की कृपा की थी। आचार्य महाप्रज्ञ जी ने भी चातुर्मास करने की कृपा की थी, लाडनूं का ही एक अंग है जैनों का गौरव है ‘जैन विश्व भारती’ यहाँ के सेवा केंद्र के लिए मैं हमारे मुनि देवेंद्र कुमार जी को आगामी वर्ष के लिए सेवा के लिए नियुक्त करता हूँ।
उपकेंद्र हिसार के लिए : हिसार जो सेवा का मूल केंद्र तो नहीं है किंतु उसे सेवा का उपकेंद्र मान लें, अस्थायी रूप में, जहाँ हमारे कितने-कितने साधु-साध्वियाँ चिकित्सा के लिए जाते रहते हैं, वहाँ जो साध्वियाँ विराजमान हैं, उनको भी सेवा की जरूरत पड़ती है, वहाँ के लिए साध्वी यशोधरा जी के सिंघाड़े को आगामी सेवा वर्ष में हिसार सेवा उपकेंद्र में नियुक्त करता हूँ इस तरह हमारे सेवा भाव पुष्ट रहें, सेवा अच्छी चले, सभी प्रसन्न एवं संतुष्ट रहें, सेवादायी साधु-साध्वियाँ मनोभाव से सेवा दें।
जय तिथि पत्रक भेंट : जैन विश्व भारती द्वारा प्रकाशित जय तिथि पत्रक तथा मित्र परिषद (कोलकाता) द्वारा प्रकाशित, तिथि दर्पण व तिथि पत्रक श्रीचरणों में भेंट किया गया। विकास परिषद के सदस्य पद्मचंद पटावरी ने श्रावक समाज को आह्वान करते हुए सेवा की बात कही, स्थानीय तेयुप व महिला मंडल ने सुमधुर गीत का संगान किया तथा व्यवस्था समिति अध्यक्ष विनोद लुणिया ने आगंतुक सभी श्रावक-श्राविकाओं के प्रति आभार व्यक्त किया गया, कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।

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