ज्ञानधन का स्वामी ही धनी कहलाता है

ज्ञान आत्मा का स्वभाव है,
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ज्ञान आत्मा का स्वभाव है, आत्मा कितनी ही मिलन और निकृष्ट दशा को क्यों न प्राप्त हो जाए, उसका स्वभाव मूलत: कभी नष्ट नहीं होता। ज्ञान लोक की कतिपय किरणें, चाहे वे धूमिल ही हों, मगर सदैव आत्मा में विद्यमान रहती है, निगोद जैसी निकृष्ट स्थिति में भी जीव में चेतना का अंश जागृत रहता है, इस दृष्टि से प्रत्येक आत्मा ज्ञानवान ही कही जा सकती है, मगर जैसे अत्यल्प धनवान को धनी नहीं कहा जाता, विपुल धन का स्वामी ही धनी कहलाता है, इसी प्रकार प्रत्येक जीव को ज्ञानी नहीं कह सकते, जिस आत्मा में ज्ञान की विशिष्ट मात्रा जागृत एवं स्पूâर्त रहती है, वही वास्तव में ज्ञानी कहलाता है।

ज्ञान की विशिष्ट मात्रा का अर्थ है -विवेक युक्त ज्ञान होना, स्व-पर का भेद समझने की योग्यता होना और निर्मल ज्ञान होना, जिस ज्ञान में कषाय जीवन का मिलन न हो वही वास्तव में विशिष्ट ज्ञान या विज्ञान कहलाता है। साधारण जीव जब किसी वस्तु को देखता है तो अपने राग या द्वेष की भावना का रंग उस पर चढ़ा देता है और इस कारण उसे वस्तु का शुद्ध ज्ञान नहीं होता, इसी प्रकार जिस ज्ञान पर राग द्वेष का रंग चढा रहता है, जो ज्ञान कषाय की मिलनता के कारण मिलन बन जाता है, उसे समीचीन ज्ञान नहीं कहा जा सकता। सम्यकज्ञान जिन्हें प्राप्त है,उनका दृष्टिकोण सामान्य जनों के दृष्टिकोण से कुछ विलक्षण होता है। साधारण जन जहां वाहन दृष्टिकोण रखते हैं, ज्ञानियों की दृष्टि आंतरिक होती है। हानि-लाभ को आंकने और मापने के मापदंड भी उनके अलग होते हैं। साधारण लोग वस्तु का मूल्य स्वार्थ की कसौटी पर परखते हैं, ज्ञानी उसे अन्तरंग दृष्टि से अलिप्त भाव से देखते हैं, इसी कारण वे अपने आपको कर्म बंध के स्थान पर कर्म निर्जरा का अधिकारी बना लेते हैं।

संसार प्राणी जहां हानि देखता है, ज्ञानी वहां लाभ अनुभव करता है, इस प्रकार ज्ञान दृष्टि वाले और बाहरी दृष्टि वाले में बहुत अन्तर है। बाहरी दृष्टि वाला भौतिक वस्तुओं में आसक्ति धारण करके मिलनता प्राप्त करता है जब कि ज्ञानी वस्तु स्वरूप को जानता है, बहुत बार ज्ञानी और अज्ञानी की बाहरी चेष्टा एक सी प्रतीत होती है मगर उसके आंतरिक परिणामों में आकाश-पाताल जितना अंतर होता है, ज्ञानी जिस लोकोत्तर कला का अधिकारी है वह आसानी से उपलब्ध कहाँ होता है?

– महावीर प्रसाद अजमेरा
जोधपुर, राजस्थान

स्वर्ग-नरक स्वयं के कर्मों से

भगवान बुद्ध के एक परम भक्त की मृत्यु होने पर उसके पुत्र ने सोचा कि अंत्येष्ठी के बाद होने वाला मंत्र-पाठ किसी आम पंडित से न करवाकर, भगवान बुद्ध से ही कराऊं, ताकि उसके पिता को स्वर्ग मिलना सुनिश्चित रहे, यह चिन्तन करके उसने भगवान बुद्ध से निवेदन किया कि मेरे पिता की श्राद्ध क्रिया में होने वाले मंत्र पाठ आप करवायें, ताकि उनको स्वर्ग मिलना पूर्णत: निश्चित रहे। भगवान बुद्ध यह कथन सुनकर मुस्कराये एवं कहा कि तुम एक पत्तल के दोनो में पत्थर के टुकड़े व एक दूसरे दोने में ताल मखाना ले आओ। अपने पिता की भगवान बुद्ध के माध्यम से अच्छी गति सुनिश्चित जानकर, वह प्रसन्न मन से दोनों वस्तुएं ले आया, तब बुद्ध ने उसे कहा कि वह नदी किनारे जाकर इन दोनों को बहा दो एवं कुछ देर बताये हुए मंत्राचार करे, एवं मुझे उसका परिणाम बताओ।

व्यक्ति ने वैसा ही किया एवं कुछ देर बाद आकर बोला कि पत्थर वाला दोना तो तुरन्त नदी में डूब गया, परन्तु मखाना वाला नहीं डूबा, तब बुद्ध ने उस व्यक्ति को सुझाव दिया कि अपने मंत्रवादी पण्डित से भी वहां जाकर मंत्र पढवायें, यदि पत्थर वाला दोना ऊपर जा जावे व मखाना वाला डूब जाये तो मुझे आकर बताना, कुछ समय बाद उस व्यक्ति ने बताया कि वैसा कुछ नहीं हुआ, मखाना वाला दोना तो तैरता ही रहा एवं पत्थर वाला वापस ऊपर नहीं आया।

तब महात्मा बुद्ध ने उस व्यक्ति को समझाते हुए कहा कि व्यक्ति अपने जीवन में जैसा भी घटिया या बढ़िया कार्य करता है, वैसा ही उसका कर्म बंधन हो जाता है, वैसे ही फल मृत्यु भावी जीवन में भी तार देते हैं, यानि डूबते नहीं हैं, जो व्यक्ति घटिया व फरेब का काम करता है, वो उस कंकर की तरह भारी हो जाता है, जो उसे भव सागर में डुबो देता है। अपने पिता की मृत्यु के बाद चाहे कितने ब्रह्म-जाप करो या मंत्र पाठ करावो उसका कोई असर नहीं होगा, उसने अपने जीवन में जैसा अच्छा या बुरा कर्म किया है, उसी अनुरूप उसके भावी जीवन की गति होगी। भगवान बुद्ध का यही सन्देश था कि मनुष्य को अपने जीवन में, यानि खुद के द्वारा हमेशा अच्छे व प्रिय काम करने चाहिये ताकि उसकी मृत्यु के बाद अच्छी गति हो एवं उसी से स्वर्ग मिलेगा एवं बुरे कर्मों से नर्क की गति होगी, उसमें अन्य कोई भी महात्मा, मंत्रवेत्रा या पण्डित सहयोगी नहीं बन सकता।

– विजयराज सुराणा जैन
नई दिल्ली

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