Bijay Kumar Jain

क्षमा वीरस्य भूषणम

क्षमा वीरस्य भूषणम

क्षमा नयन का नीर है, हरे जो भव की पीर

घाव भरे कटुवाणी का. शीतल करे शरीर

पर्युषण का अर्थ है- परि-उपसर्ग, वसधातु और अन प्रत्यय, इन तीनों के संयोग से पर्युषण शब्द निष्पन्न हुआ है। परि-समन्तात् समग्रतया उषणं वसनं निवास करणं अर्थात् सम्पूर्ण रुप से निवास करना, विभाव से हटकर स्वभाव में रमण करना। शास्त्रों में पर्व एक ही दिन का स्वीकृत हुआ है, बाकी दिन तो पर्व की सम्यक आराधना की तैयारी के लिए पूर्वाचार्यों के द्वारा नियत किए गये हैं, अत: वे भी उपेक्षनीय नहीं है, जैसे बलवान पर धावा बोलने के लिए बल का संचय करना आवश्यक है उसी प्रकार रागादि शत्रुओं की घात के लिए सात दिन आध्यात्मिक बल संग्रह का समझना चाहिए, यह पर्व मात्र जैन सन्स्कृति का ही नहीं, मानव संस्कृति पर्व है।

एक संवत्सर यानि एक वर्ष के बाद आने वाले महानतम दिन को व्यवहार से ‘संवत्सरी’ कह दिया गया है, वस्तुत: इस पर्व का नाम ‘‘पर्युषण’’ भगवान महावीर ने चातुर्मास के ५० दिन बीतने पर और ७० दिन बाकी रहने पर पर्युषण पर्व की आराधना की थी, ऐसा समवायांग में उल्लेख है। तिथियों की घट-बढ़ के कारण कभी-कभी इधर ४९ दिन और उधर ७१ दिन हो जाते हैं।

पर्युषण पर्व को ८ दिनों में जैन लोग अधिकतर सांसारिक कार्यो से निवृत होते है, इस पर्व में प्रात:कालीन प्रवचन, श्रवण, स्वाध्याय, प्रेक्षाध्यान, जप, द्रव्यों का परिमाण, रात्रि भोजन का परित्याग, ब्रह्मचर्य का पालन, अणुव्रत साधना, सामायिक, मौन, सामूहिक प्रतिक्रमण, पौषध साधना आदि करते हैं साथ ही भगवान महावीर का जीवन दर्शन पढ़ा जाता है, ८ वें दिन संवत्सरी महापर्व यथाशक्ति उपवास एवम् पोषध कर, सभी धर्माराधना करते हैं, सभी से क्षमायाचना (खमत-खामणा) करते हैं। क्षमा का अर्थ है सहना, सहने को अपना धर्म मानकर विरोधी भाव को सहना क्षमा है, क्षमा शक्तिशाली का अस्त्र है। अपनी शक्ति के उन्माद पर नियन्त्रण रखना क्षमा है, इसके द्वारा व्यक्ति वर्ष भर में एकत्रित तनाव से मुक्त हो जाता है, शान्ति उसे मिलती है जिसके ह्रदय में क्षमा लहराये, दूसरों की कमजोरियों, अपराधों और भूलों को भूला सके, वही आनन्द का स्रोत बन सकता है, अपने अपराधों के लिए क्षमा मांगने में जो न सकुचाये वह महान है। शान्तिदूत वही है, जो अपनी भूलों से उत्पन्न वेदना को भुला देने का नम्र अनुरोध करे। गुरुदेव आचार्य श्री तुलसी ने कहा था क्षमाशील वह होता है जो अतीत को विस्मृत करता है, वर्तमान की चिन्तनधारा बदलता है और भविष्य में किसी प्रकार की थलना न करने का संकल्प करता है, क्षमा वही व्यक्ति कर सकता है, जिसका ह्रदय विशाल हो जिसमें सहज, सरलता हो और जीवन को अभिभूत करनेवाली मृदुता हो”|

एक बार चीन के सम्राट मगफू को सूचना मिली की उसके राज्य में विद्रोह हो गया है, सम्राट ने प्रतिज्ञा की कि वह विद्रोहियों को समुल नष्ट कर देगा। सम्राट प्रतिज्ञा करके सेना सहित विद्रोहग्रस्त क्षेत्र में पहुँचा। सम्राट के विशाल सेना सहित आने की सूचना पाकर विद्रोहियों ने आत्मसमर्पण कर दिया और सम्राट ने भी सभी को क्षमा कर दिया, यह देखकर सम्राट के वफादार सैनिकों को बड़ा आश्चर्य हुआ। एक सेनापति ने साहस करके पूछा- ‘‘महाराज आपकी प्रतिज्ञा का क्या हुआ?’’ सम्राट बोला ‘‘मैं अपनी प्रतिज्ञा पर अटल हूँ, मैंने सारे विद्रोहियों को नष्ट कर दिया है, अब वो मेरे शत्रु नहीं रहे, बल्कि मेरे मित्र बन गये हैं।’’ यह है दया-क्षमा-शालीनतायुक्त व्यवहार का सुपरिणाम।

भगवान महावीर ने कहा है कि ‘‘कोहो पिईयपणा सई’’ क्रोध प्रीति का नाश करता है। क्रोध पर विजय पाने के लिए एक मात्र उपाय ‘क्षमा’ है। क्षमा से ही जीव को मानसिक शान्ति मिलती है। क्षमापना से वैमनस्य दूर हो जाता है, मन हल्का हो जाता है, हमारी वर्तमान जीवन शैली सुख-सुविधा एवम् स्वार्थ भरी है यही यह पर्व है जिससे हटकर, आत्म दर्शन याने बाहर की नहीं भीतर की यात्रा के लिए प्रेरीत करता है तो आईए ‘जिनागम’ के सभी धर्म प्रेमी भाईयों एवम् बहनों! इस महापर्व के ‘क्षमा’ कुम्भ में गोते लगाकर, मन को पवित्र बनाएँ और इस जीवन रुपी बगीचा के फूलों को और अधिक तप, त्याग, संयम, आराधना, प्रार्थना, जप, सामायिक ध्यान आदि से महकाएँ, क्योंकि क्षमा से बढ़कर इस संसार से मुक्त करनेवाला अन्य कोई तप नहीं इसीलिए तो कहा जाता है कि ‘‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’’

क्षमा यज्ञ है

क्षमा यज्ञ है

अपनी आत्मा को विकार (राग-द्वेष, ईष्र्यादि) रहित एवम् ज्ञान स्वभाव से परिपूर्ण करना ही क्षमा है, यदि कोई आकर हमें गालियाँ देने लगे या मारपीट करे तो उस समय पर क्रोध न करना, सभी से क्षमा माँगना, सभी के प्रति मैत्री एवम् समभाव रखना, वैर का परित्याग करना और स्वयं निर्विकारी बने रहना ही ‘क्षमा’ है। हमारे भारतवर्ष में ‘क्षमा भाव’ को धारण कर, हम सभी जैनी भाई-बहन पर्व के रुप में राष्ट्रीय स्तर पर मनाते हैं। ‘क्षमा’ हमारे पारस्परिक वैमनस्य को समाप्त करके हमें निर्विकारी बने रहने की प्रेरणा देती है। जिस प्रकार हम क्षमापना पर्व मनाते हैं उसी तरह यह दिवस पूरे विश्व में अलग-अलग तिथियों एवम नामों से मनाया जाता है। पश्चिम एशिया के कोने में बसा एक छोटा सा नगर शक्तिशाली देश इजरायल, हर वर्ष १६ सितम्बर को ‘प्रायश्चित दिवस’ मनाते हैं। राष्ट्रीय दिवस के रूप में संस्थान आदि बंद रखते हैं, इस दिन सभी आत्मचिन्तन करते हैं तथा अपनी सामाजिक समस्याओं को हल करते हैं। इससे देशवासियों का नैतिक व राष्ट्रीय चरित्र ऊँचा होता है, शायद यही कारण है कि इजरायल देश में व्यक्तिगत व सामाजिक विवाद बहुत कम होता है और उनका सामाजिक व राष्ट्रीय संगठन बहुत ही मजबूत है।

गुरु रामदास प्रतिदिन दो-तीन घर से भोजन मांग लिया करते और जो कुछ मिल जाता उसी को पूरे दिन का भोजन समझ लिया करते, एक दिन वे भोजन के लिए एक दरवाजे पर जाकर खड़े हुए और भिक्षा के लिए गृहस्वामिनी को आवाज लगाई, उस दिन घर की मालकिन किसी कारणवश क्रोध से भरी हुई थी, ऐसी स्थिति में गुरु की आवाज ने अग्नि में घी का काम किया। गुरु की आवाज सुनकर वह क्रोध से उबल पड़ी और जिस पोतने (सफाई करने वाला कपड़ा) से चौका धो रही थी, वही उनके मुख पर दे मारा।

यह सब देख गुरु रामदास न तो दु:खी हुए और न हीं रुष्ट हुए। मुस्कराते हुए उस पोतने को लेकर वह नदी के किनारे पहुँचे, वहाँ जाकर उन्होंने पहले स्नान किया, फिर उसने पोतने को खूब अच्छी तरह धोकर, सुखाकर घर ले आये और शाम को उस कपड़े से आरती के लिए बत्ती बनाकर भगवान से प्रार्थना की कि ‘हे प्रभु! जिस तरह ये बत्तियाँ प्रकाश दे रही हैं, उसी तरह उस माता का हृदय भी प्रकाशमान रहे।’

‘क्षमाशील’ व्यक्ति अपने कष्टों को नहीं देखते अपितु दूसरों की पीड़ा को देखकर द्रवित होकर, उनको भी दु:ख से दूर रहने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं।

क्षमा पर्व / पर्युषण पर्व के उपलक्ष्य में…
क्षमा धारो…..क्षमा करो…..

चाल – दुनिया में रहना है तो …(२) सायोनारा ………

क्षमा धारो भाई क्षमा धारो…मन-वचन-काय से क्षमा धारो

रत्नत्रय युक्त क्षमा धारो…क्रोध-मान-माया-लोभ छोड़ो…(१)

पहले स्वयं को क्षमा करो…मोह शोभ रहित क्षमा धारो

हर जीव प्रति क्षमा करो…क्षमा-याचना भी सभी से करो…(२)

अन्यथावाणी से न होती क्षमा…क्षमा-भाव बिन न होती क्षमा…

मित्रों से ही क्षमा न होती क्षमा…

क्षमावाणी कार्ड से (में) न होती क्षमा…(३)

अक्षमा भाव ही न करो उत्पन्न…स्व-भाव को ही करो मलिन

मोह क्षोभ से भाव होता मलिन…

मलिन भाव से होती क्षमा मलिन…(४)

क्षमा है आत्मा का शुद्ध भाव…राग-द्वेष-मोह आदि अशुद्ध-भाव

अशुद्ध भाव त्याग से होती क्षमा…अन्य जीव यदि न करें क्षमा…(५)

पारस प्रभु ने तो क्षमा धारा…कमठ दुष्ट ने न क्षमाधारा…

पाश्र्व प्रभु पर उपसर्ग किया…पाश्र्व प्रभु को तो मोक्ष मिला…(६)

क्षमा से पाप भी दूर होता…मानसिक-ताप भी दूर होता

विविध रोग भी दूर होते…तन-मन…आत्मा स्वस्थ होते…(७)

क्षमा है ‘‘वीरस्य भूषणम’’ अक्षमा से है आत्म पतनम्

संक्लेश-कलह भी नाशनम…वैर-विरोध भी प्रणाशनम…(८)

उत्तम क्षमा तो मुनि धारे…आंशिक श्रावक जन धारे…

संकल्पी हिंसा सम त्याग करे…व्यर्थ-संक्लेश-श्रावक न करें…(९)

उत्तम क्षमा का भाव धरे…श्रमण बनने का भाव धरे…

श्रमण बनकर साम्य धरे…साधना से मोक्ष प्राप्त करें…(१०)

उत्तम क्षमादि है दश धर्म…आत्मिक-शाश्वतिक-विश्व-धर्म…

परस्पर में करते ये सहयोग…सम-उत्पन्न ये आत्म-भाव…(११)

सम्यग्दृष्टि में ये होते उत्पन्न…सर्वज्ञ में ये होते संपूर्ण…

आत्मिक वैभव मिले इसी से…

‘कनक’ चाहे ये नवकोटि से…(१२)

आत्मशुद्धि का पर्व – पर्वाधिराज पर्युषण पर्व

आत्मशुद्धि का पर्व – पर्वाधिराज पर्युषण पर्व

Paryushan

लहरों को मझधार नहीं, किनारा चाहिए

हमें चांद सुरज नहीं, सितारा चाहिए

मोह-माया में भटकी, इस आत्मा को

प्रभु महावीर के संदेशों का सहारा चाहिए

जैनों के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर का नाम लेते ही व्यक्ति नहीं, सत्य का आभास होने लगता है। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद, ब्रह्मचर्य, अभय, क्षमा के प्रतीक भगवान महावीर के उपदेशों, सिद्धांतों के प्रसार-प्रचार की आज अत्यंत आवश्यकता है।

आज समस्त विश्व हिंसा की कगार पर खड़ा है, ऐसे में जरूरत है ‘विश्व मैत्री दिवस’ ‘क्षमा-याचना’ दिवस मनाने की। जैनों का महत्वपूर्ण महापर्व पर्वाधिराज ‘पर्युषण’ एवम् क्षमापर्व ‘संवत्सरी दिवस’ फिर एक बार दुनिया को क्षमा का, प्रेम का अमर संदेश देने के लिये आया है।

पर्युषण शब्द संस्कृत का शब्द है। प्राकृत अर्धमागधी में इसे पज्जोसवणा, पज्जुसणा या पज्जोसमणा कहा जाता है। कहते हैं वर्ष में चार अष्टान्हिक पर्व आते हैं, कुछ प्राचीन ग्रंथों में छह अष्टान्हिक (आठ दिनों तक मनाया जाने वाला) पर्वों का भी उल्लेख है। माना जाता है कि इन दिनों में देवगण नंदीश्वर दीप में आते हैं और वहाँ अट्ठाई महोत्सव मनाते हैं। यह अट्ठाई महोत्सव आठ दिन (श्वेताम्बर) का होता है इसलिये श्वेताम्बर पर्युषण पर्व आठ दिन के मनाने की एक प्राचीन परंपरा चल रही है।

अष्टान्हिक पर्व यह है –

१.आषाढ सुद ७ से १४

२.अश्विन सुद ७ से १४

३.चैत्र सुदि ७ से १४

४.भाद्रपद मास में धूमधाम से मनाया जानेवाला पर्युषण पर्व (१२ से ४)

५.कार्तिक सुदि ७ से १४

६.फाल्गुन सुदि ७ से १४

पर्वाधिराज पर्युषण पर्व जो आत्मा के निकट जाकर परिमार्जन, परिष्करण, प्रतिक्रमण का अर्थबोध प्रदान करता है। आत्म-ज्ञान से शाश्वत संदेश देता है। आठ दिन तक मनाया जाने वाला यह पर्व शुद्ध आध्यात्मिक पर्व है, इसके भी दो पक्ष हैं। एक बाह्य और दूसरा आंतरिक। बाहृ की साधना में श्रावक-श्राविका उपवास, पोषध, प्रतिक्रमण करना व्याख्यान (प्रवचन) सुनना,हरी सब्जियाँ – रात्रि भोजन का त्याग करना, ब्रह्मचर्य का पालन, साधार्मिक भक्ति, अभयदान, क्षमापना और अट्ठम तप आदि कर्तव्यों का पालन करते हैं। (जैन साहित्य में आठ अंक विशिष्ट महत्व रखता है। सिद्ध भगवान के आठ गुण बताये गये हैं जो आठ कर्मों का क्षय करने से आत्म स्वभाव के रूप में प्रकट होते हैं। साधु की प्रवचन माता आठ है। अष्ट मंगल जो प्रत्येक शुभ कार्य के पहले मांडे जाते हैं। आत्मा के सूचक प्रदेश भी आठ है। अट्ठाई पर्व के भी आठ दिन हैं, ये सारी क्रियाएँ भी एक तरह से आंतरिक पक्ष को संबल प्रदान करती हैं। दूसरा पक्ष है आत्मशुद्धि, विश्व मैत्री और क्षमा-याचना का। कहते हैं अंतस के दो प्रबल शत्रु होते हैं राग और द्वेष। ये दो शत्रु ही हमारे नैतिक पतन का प्रमुख कारण बनते हैं। क्रोध, मोह-माया-लोभ, परिग्रह के शिकंजे में फंसकर मानव अनगिनत अपराधों में लिप्त हो जाता है, ये पर्व हमें संदेश देता है। कटुता-अनबन, राग-द्वेष के भावों से मुक्त होकर क्षमा-प्रेम-स्नेह, मानवता और आत्मशुद्धि के रंग में रंग जाओ। आत्मशुद्धि के लिये सबसे महत्वपूर्ण है क्षमायाचना, वह भी अंतस मन से होनी चाहिये, ताकि मन में कोई विकार बाकी न रहे। ओशो कहते हैं ‘‘महावीर सिर्फ जैन नहीं थे, वे जिन थे, स्वयं को जीतने वाले’’ आत्म रुपांतरण की जो राह महावीर ने दिखाई वह आज भी उतनी ही सार्थक है। संवत्सरी दिवस के चार महत्वपूर्ण अंग है, चार आवश्यक कर्तव्य है जो हर साधक को करने चाहिये। उपवास, प्रतिक्रमण, आलोचणा और क्षमापना। उपवास से तन-मन दोनों की शुद्धि होती है।

उपवास का मतलब होता है अपनी आत्मा में रमण करना। भगवान महावीर चार-चार महीने का उपवास करते हैं जो इस बात का सबूत है कि उनके पास कितनी आत्मिक शक्ति थी। (आज भी कई साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका मासक्षमण (३० उपवास) या उससे अधिक उपवास करते हैं) आप भीतर चले जाते हैं तो बाहर का स्मरण छूट जाता है। महावीर की ‘काया-क्लेश’ का मतलब यही है कि काया की ऐसी साधना की जाये उसे ऐसा नियंत्रित किया जाये कि काया बाधक न रहकर साधक हो जाए। आज इस अर्थ को लोगों तक पहुँचाने की अत्यंत आवश्यकता है ताकि वीर की वाणी – वीर की धारा समूचे जगत में अखंड बहती रहे और अंतस के अंधेरे में सबके अंतर दीप जलते रहें।

‘संवत्वरी दिवस’ का सबसे बड़ा कर्तव्य है क्षमापना। महावीर कहते हैं क्षमा मांगने से मनुष्य छोटा नहीं होता, बल्कि जो क्षमा मांगता और क्षमा देता है वह ‘वीर’ होता है ‘क्षमा वीरस्य भूषणम’ महावीर का जीवन चरित्र पढ़ें वह कभी किसी से नहीं डरे, जो भी व्यक्ति आध्यात्मिक विकास करेगा, अपनी चेतना का उद्वारोहण करेगा उसका भय समाप्त हो जायेगा, जिस वीर के हाथ में क्षमा का अमोघ शध्Eा है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। क्षमा से शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। क्षमापना का संदेश आत्मशक्ति का संदेश है, जीवन शुद्धि का महोत्सव है, विश्व-मैत्री की भावना है, यही भाव जीवन को निर्मल बनाता है। (संवत्सरी प्रतिक्रमण द्वारा, वर्ष भर हुई भुलों की, पापों की हम समालोचना करते हैं) अट्ठारह दिनों का यह समय अध्यात्म चिंतन का समय है। आत्मा से सभी विकारों का विसर्जन करने का समय है, समस्या के समाधान का समय है।

आज इस पावन पर्व पर हम अभय बनने का संकल्प करें, मन को पवित्र और निर्भय बनाने का मार्ग प्रशस्त करें।

खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमतु में

भिति में सव्वे भुएसु वेर मज्जं न केणइ

-मंजू लोढ़ा जैन, मुम्बई

‘मिच्छामी दुक्कड़म’ का अर्थ

‘मिच्छामी दुक्कड़म’ का अर्थ

Michami Dukham

कृपया मुझे क्षमा करें, क्या अपने परिवार, रिश्तेदारों-और दोस्तों से क्षमा मांगना अच्छा नहीं है? यह बहुत महत्वपूर्ण होता है कि सभी अपने नाज़ुक रिश्तों को सुधारें और नकारात्मक संबंधों के रिश्तों को साफ रखें और घृणा से दूर रहें।

दरअसल, ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ एक सामुदायिक तरीके से व्यक्तिगत माफी की औपचारिकता है, यह व्यक्तिगत क्षमा की तुलना में मानवीय करुणा को बढ़ाने का एक माध्यम है, इसमें एक संपूर्ण समुदाय शामिल है, एक संपूर्ण समाज, माफी वास्तव में एक सबसे महत्वपूर्ण मानव मूल्य है।

यह मानव जाति को उनकी पिछली गलतियों को सुधारने की अनुमति / मौका देता है और मानवता को एक सबक सिखाता है। माफी मांगने में शर्मिंदा होने की कोई बात नहीं होती, जब किसी व्यक्ति से क्षमा मांगें तो उसे हमेशा माफ़ कर देना चाहिए।

‘मिच्छामी दुक्कड़म’ क्या है?

मिच्छामी का अर्थ निरर्थक (क्षमा) होता है और दुक्कड़म (दुश्क्रूट) का मतलब बुरा कर्म है, इसलिए मिच्छामी दुक्कड़म का अनुवाद करने का अर्थ है मेरे दुष्ट कर्मों या बुरे कार्यों के लिए क्षमा करें। जैन परिवारों में पैदा हुए लोग इसके पीछे अर्थ और विषय से पूर्ण रूप से परिचित हैं।

‘मिच्छामी दुक्कड़म’ क्यों कहते हैं?

अगर हम अपने आपको प्रतिबिंबित करते हैं तो हम महसूस करेंगे कि हमारा मन लगातार व्यस्त है या तो हमारे बारे में सोच रहा है जो हमारे पास हो सकता है या दुनिया के दूसरे छोर तक, शारीरिक गतिविधियों से बात कर या कर सकता है, यह सोच, हमारे शब्द या हमारी शारीरिक गतिविधियां, हमारी खुशी, दु:ख, क्रोध, लालच, ईष्र्या और अहंकार आदि का प्रतिबिंब होता है और हम उन पर प्रतिक्रिया करते हैं, हम अपनी आत्माओं के लिए विभिन्न प्रकार के नए कर्मों को आकर्षित होते हैं।

मिच्छामी दुक्कड़म’ कहकर करेंगे प्रायश्चित

मिच्छामी दुक्कड़मकहकर मांगेंगे क्षमा

संवत्सरी : क्षमा, अहिंसा और मैत्री का पर्व

क्षमा, अहिंसा और मैत्री का पर्व है संवत्सरी। संवत्सरी पर्व पर जैन धर्मावलंबी जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं। गौरतलब है कि जैन धर्म के श्वेतांबर पंथ में पर्युषण पर्व संपन्न पर क्षमावाणी दिवस मनाया जाता है।

जैन धर्म की परंपरा के अनुसार पर्युषण पर्व के अंतिम दिन क्षमावाणी दिवस पर सभी एक-दूसरे से ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ कहकर क्षमा मांगते हैं, साथ ही यह भी कहा जाता है कि मैंने मन, वचन, काया से जाने-अनजाने में आपका दिल दुखाया हो तो मैं हाथ जोड़कर आपसे क्षमा मांगता हूं।

जैन धर्म के अनुसार ‘मिच्छामी’ का भाव क्षमा करने और ‘दुक्कड़म’ का अर्थ गलतियों से है अर्थात् मेरे द्वारा जाने-अनजाने में की गईं गलतियों के लिए मुझे क्षमा कीजिए।

आचार्य महाश्रमण के अनुसार- क्षमापना से चित्त में आह्लाद का भाव पैदा होता है और आह्लाद भावयुक्त व्यक्ति मैत्री भाव उत्पन्न कर लेता है और मैत्री भाव प्राप्त होने पर व्यक्ति भाव विशुद्धि कर निर्भय हो जाता है, जीवन में अनेक व्यक्तियों से सम्पर्क होता है तो कटुता भी वर्ष भर के दौरान आ सकती है, व्यक्ति को कटुता आने पर उसे तुरंत ही मन से साफ कर देनी चाहिए और संवत्सरी पर अवश्य ही साफ कर लेना चाहिए।

‘मिच्छामी दुक्कड़म’ प्राकृत भाषा का शब्द है, प्राकृत भाषा में काफी जैन ग्रंथों की रचना ही हुई है। पर्युषण महापर्व जैन धर्मावलंबियों में आत्मशुद्धि का पर्व है, इस तरह पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि के साथ मनोमालिन्य दूर करने का सुअवसर प्रदान करने वाला महापर्व है।

इस दौरान लोग पूजा-अर्चना, आरती, समागम, त्याग-तपस्या, उपवास आदि में अधिक से अधिक समय व्यतीत करते हैं,इस पर्व का आखिरी दिन ‘क्षमावाणी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जिसमें हर किसी से ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ कहकर क्षमा मांगते हैं। पर्युषण पर्व के आखिरी दिन ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ कहने की परंपरा है, इसमें हर छोटे-बड़े से ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ कहकर क्षमा मांगते हैं।

उत्तम क्षमा- जैन क्षमावाणी पर्व  दिगम्बर संप्रदाय का पर्युषण पर्व

उत्तम क्षमा- जैन क्षमावाणी पर्व दिगम्बर संप्रदाय का पर्युषण पर्व

Kshama

धर्म यात्रा की इस कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं विभिन्न दिगम्बर जैन मंदिरों में, दिगम्बर जैन धर्मावलंबी भाद्रपद मास में पर्युषण पर्व मनाते हैं। ऋषि पंचमी (गणेश चतुर्थी के एक दिन बाद) से पर्व की शुरुआत होती है और यह अगले दस दिनों तक चलता है, यह पर्व ‘दस लक्षण’ के नाम से भी जाना जाता है।

वैसे तो पर्युषण पर्व दीपावली, ईद या क्रिसमस की तरह उल्लास-आनंद का त्योहार नहीं हैं, फिरभी इनका प्रभाव पूरे समाज में दिखाई देता है, इसी तरह का उल्लास विभिन्न दिगम्बर जैन मंदिरों में देखने को मिलता है, हजारों की संख्या में जैन धर्मावलंबी भगवान महावीर के दर्शन करने के लिए विशेष रूप से सजाए गए मंदिरों में उमड़ पड़ते हैं। पर्युषण पर्व मनाने का मूल उद्देश्य आत्मा को शुद्ध बनाने के लिए विभिन्न सात्विक उपायों पर ध्यान केंद्रित करना होता है, पर्यावरण का शोधन इसके लिए वांछनीय माना जाता है, पर्युषण के दौरान पूजा, अर्चना, आरती, समागम, त्याग, तपस्या, उपवास में अधिक से अधिक समय व्यतीत करने तथा सांसारिक गतिविधियों से दूर रहने का प्रयास किया जाता है, संयम और विवेक के प्रयोग पर विशेष बल दिया जाता है।

पर्युषण के समापन पर क्षमापना या क्षमावाणी पर्व मनाया जाता है, इस दिन जैन धर्मावलंबी पूरे वर्ष में किए गए ऐसे कार्यों के लिए क्षमा माँगते है जिनसे किसी को उनके द्वारा जाने-अनजाने में दु:ख पहुँचा हो, कहा जाता है कि क्षमा माँगने वाले से ऊँचा स्थान क्षमा देने वाले का होता है।

क्षमा माँग कर बैरभाव खत्म करें

क्षमा माँग कर बैरभाव खत्म करें

Michami Dukham

जैन धर्मावलंबियों के पर्युषण पर्व समाप्त होने के बाद बारी आती है क्षमावाणी पर्व की, पर्युषण का पहला दिन उत्तम क्षमा का दिन होता है और इस दिन से शुरू हुए पयुर्षण पर्व के दस दिन हमें धर्म को आत्मसात कर बैरभाव को दूर करके क्षमा भाव बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं। दसलक्षण पर्व के अंतर्गत की गई पूजा-अर्चना हमें अहंकार से दूर कर मानवीयता की ओर ले जाती है, यह मानवीयता भी एक माँ के समान ही है, जिस प्रकार कोई भी माता अत्यंत क्षमाशील होती है, हमारी किसी भी अच्छी-बुरी बात को भूलकर तुरंत हमें क्षमा (माफी) प्रदान करती है, वैसे ही ‘दसलक्षण पर्व’ हमें उत्तम क्षमा की अनंत शक्ति का आभास कराता है, यह पर्व हमें शिक्षा देता है कि सांसारिक मानवीय जीवन में छोटी-मोटी भूलें होती ही रहती हैं, किसी भी कारणवश एक-दूसरे किसी के भी मन का सहज ही दुखी होना संभव है, ऐसे में हमें बैरभाव को परे रखकर क्षमा का मार्ग अपनाना चाहिए। क्षमा का मार्ग अतुलनीय होता है, क्षमा हमें हमारे पापों से दूर करके मोक्ष का रास्ता दिखाती है। किसी भी धर्म की किताब का अगर हम अनुसरण करते हैं तो उसमें भी क्षमा भाव को ही सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है, फिर चाहे वो हिंदू हो या जैन, कुरान हो या गीता…। सभी के अनुसार एक दिन यह सृष्टि नष्ट होने वाली है और मिटना यानि नष्‍ट होने का परिवर्तन ही संसार का स्वभाव है, परिवर्तन ही सृष्टि की देन है, ऐसे में हमें परिवर्तन का मार्ग अपना कर धर्म के सही रास्ते पर चलना चाहिए, हम रोजमर्रा के जीवन में देखते है कि जब-जब किसी से भी हमारी दुश्मनी बढ़ती है तब-तब हमारा क्रोध, अहंकार सामने वाले दुश्मन को मरने-मारने पर उतारू हो जाता है, ऐसे में हमारी दुश्मनी कभी खत्म नहीं होती, दुश्मन को मारने से अच्छा है कि हम हमारे अंतरात्मा में पनप रही उस दुश्मनी को ही मार डालें, तब जाकर हम किसी को क्षमा करने योग्य और किसी की क्षमा पाने योग्य बन पाएँगे।

ऐसे में दुश्मनी से छूटने का एकमात्र उपाय है, हमारी सोच का बदलना, जब तक हम हमारी सोच नहीं बदल पाएँगे, हमारे चेहरे और दिल के बैरभाव को भुलाकर हम मुस्कुराहट नहीं ला पाएँगे तब तक क्षमा पाना और करना संभव नहीं है। क्षमा भाव में एक आत्मीयता छिपी होती है, और वह हमारे चेहरे पर दिखाई देनी चाहिए। हमारे दिल को झकझोर देने वाली एक निरंतर सोच हमें अपने आप में डुबोकर रखती है, ऐसी बैरभाव वाली इस सोच को बदल कर हमें निश्छल मुस्कुराहट बिखेरकर सामने वाले के क्रोध को जड़ से समाप्त कर देना चाहिए।

ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमेशा सामने वाला व्यक्ति ही आपसे क्षमा माँगे। चाहे वो फिर आपसे उम्र में छोटा ही क्यों न हो.। आप भी पहल करके, उसके सामने झुककर उससे क्षमा माँग लेंगे तो उसमें आपका मान-सम्मान बिलकुल भी कम नहीं होगा। बल्कि आपके इस व्यवहार से सामने वाला भी पिघल जाएगा। उसका गुस्सा, क्रोध, अहंकार सबकुछ अपने आप ही खत्म हो जाएगा, और वह स्वयं भी आपके आगे झुक जाएगा।

क्षमा का यह मार्ग भगवान द्वारा बताया गया मार्ग है। तभी तो पर्युषण पर्व के बहाने प्रति वर्ष यह दसलक्षण पर्व आकर हमें अपने सही-गलत कर्मों की याद दिलाता है और दस दिन के तप, पूजा से हमें यह सीख देता है कि क्रोध से जीवन नहीं चलता, क्रोध से घर नहीं चलते, क्रोध अहं से तो अच्छे से अच्छे परिवार, देश, दुनिया सब नष्‍ट हो जाते हैं।

सम्मिलित परिवार बिखरकर अलग-अलग घरों में तब्दील हो जाते हैं, ऐसे ही फिर दिल के भी टुकड़े-टुकड़े होकर वह बिखर जाता है, घर बँट गए, परिवार बँट गए, प्यार बँट गया और फिर संसार बँट गए। वैसे ही परिवार के बिखरकर टुकड़े हो जाते है, जैसे एक बच्चे का खिलौना टूटकर बिखर जाता है, इन सबसे बचने और अपने क्रोध, अहं से मुक्ति का एक ही उपाय है और वह है क्षमा का मार्ग। क्षमा का मार्ग अपना कर ही हम सही और सत्य के रास्ते पर चल सकते हैं और यही हमारे जीवन का सही मार्ग भी होना चाहिए। हम सब क्षमा, अहिंसा के रास्ते पर चले तो निश्चित ही सभी का कल्याण होगा, चाहे मामला फिर अयोध्या में मंदिर या मस्जिद बनने का क्यों न हो, सत्य, अहिंसा और क्षमा का रास्ता ही देश, दुनिया को बचाने और शांतिपूर्ण जीवन जीने का सही रास्ता है, अत: अहिंसा और क्षमा के रास्ते को अपनाते हुए ही अयोध्या के फैसले का स्वागत करके विश्व में शांति, अमन और चैन कायम रखें।

सभी को जैन पयुर्षण के क्षमावाणी पर्व पर ‘उत्तम क्षमा’।

क्षमावाणी पर्व पर स्वयं से भी क्षमा मांगे

क्षमावाणी पर्व पर स्वयं से भी क्षमा मांगे

Kshama

पर्युषण : मन की सफाई का पर्व

हिंदी सेवा व जैन एकता का अलख जगाने वाले वरिष्ठ पत्रकार व सम्पादक बिजय कुमार जैन कहते हैं कि तमाम बुराई के बाद भी हम अपने आपको प्यार करना नहीं छोड़ते तो फिर दूसरे में कोई बात नापसंद होने पर भी उससे प्यार क्यों नहीं कर सकते? इसी तरह भगवान महावीर और हमारे अन्य संत-महात्मा भी प्रेम और क्षमा भाव की शिक्षा देते हैं |

भगवान महावीर ने हमें आत्म कल्याण के लिए दस धर्मों के दस दीपक दिए हैं, प्रतिवर्ष पर्युषण आकर हमारे अंत:करण में दया, क्षमा और मानवता जगाने का कार्य करता है, जैसे हर दीपावली पर घर की साफ-सफाई की जाती है, उसी प्रकार पर्युषण पर्व मन की सफाई करने वाला पर्व है, इसीलिए हमें सबसे पहले क्षमा याचना हमारे मन से करनी चाहिए, जब तक मन की कटुता दूर नहीं होगी, तब तक क्षमावाणी पर्व मनाने का कोई अर्थ नहीं है, अत: जैन धर्म क्षमा भाव ही सिखाता है, हमें भी रोजमर्रा की सारी कटुता, कलुषता को भूल कर एक-दूसरे से माफी मांगते हुए और एक-दूसरे को माफ करते हुए सभी गिले-शिकवों को दूर कर क्षमा पर्व मनाना चाहिए। दिल से मांगी गई क्षमा हमें सज्जनता और सौम्यता के रास्ते पर ले जा‍ती है, आइए क्षमा पर्व पर हम अपने मन में क्षमा भाव का दीपक जलाएं उसे कभी बुझने न दें, ताकि क्षमा का मार्ग अपनाते हुए धर्म के रास्ते पर चल सकें। कहते हैं माफी मांगने से बड़ा माफ करने वाला होता है। अत: हम दोनों ही गुण स्वयं में विकसित करें।

क्षमा पर्व का पावन दिन है भव्य भावना का त्योहार,

विगत वर्ष की‍ सारी भूलें देना हमारी आप बिसार।।

।। उत्तम क्षमा… जय जिनेंद्र…।।

क्षमा पर्व देता है मधुरता का संदेश

क्षमा पर्व देता है मधुरता का संदेश

पर्युषण एक आध्यात्मिक त्योहार है। 

इस दौरान ऐसा लगता है मानो जैसे किसी ने दस धर्मों की माला बना दी हो। दसलक्षण धर्म की संपूर्ण साधना के बिना मनुष्य को मुक्ति का मार्ग नहीं मिल सकता।

पर्युषण पर्व का पहला दिन ही ‘उत्तम क्षमा’ भाव का दिन होता है। धर्म के दस लक्षणों में ‘उत्तम क्षमा’ की शक्ति अतुल्य है। क्षमा भाव आत्मा का धर्म कहलाता है। यह धर्म किसी व्यक्ति विशेष का नहीं होता, बल्कि समूचे प्राणी जगत का होता है।

जैन धर्म में पर्युषण पर्व के दौरान दसलक्षण धर्म का महत्व बतलाया गया है। वे दस धर्म क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आंकिचन और ब्रह्मचर्य बतलाए गए हैं। यह वही धर्म के दस लक्षण हैं, जो पर्युषण पर्व के रूप में आकर, सभी जैन समुदाय और उनके साथ-साथ संपूर्ण प्राणी-जगत को सुख-शांति का संदेश देते हैं।

जब भी कभी आप क्रोधित हो तब आप मुस्कुराहट को अपना कर क्षमा भाव अपना सकते हैं, इससे आपके दो फायदे हो जाएंगे, एक तो आपके चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाएगी, जिससे उसी समय आपके मन का सारा क्रोध नष्ट होकर मन में क्षमा का भाव आ जाएगा और दूसरा आपकी निश्छल मुस्कुराहट सामने वाले व्यक्ति के क्रोध को भी समाप्त कर देगी, जिससे निश्चित ही उनका भी ह्रदय परिवर्तन हो जाएगा। क्षमा एक ऐसा भाव है, जो हमें बैर-भाव, पाप-अभिमान से दूर रखकर मोक्ष मार्ग की ओर ले जाता है।

सनातन, जैन, इस्लाम, सिख, ईसाई, सभी धर्म एक ही बात बताते हैं कि एक दिन सभी को मिटना है अत: परस्पर मिठास बनाए रखें। मिट जाना ही संसार का नियम है, तो फिर हम क्यों अपने मन में राग-द्वेष, कषाय को धारण करें, अत: हमें भी चाहिए कि हम सभी कषायों का त्याग करके अपने मन को निर्मल बनाकर सभी छोटे-बड़ों के लिए अपने मन में क्षमा भाव रखें। जैन पुराण कहते हैं कि जहां क्षमा होती है वहां क्रोध, मान, माया, लोभ आदि सभी कषाय अपने आप ही नष्ट हो जाते हैं।

जीवन में जब भी कोई छोटी-बड़ी परेशानी आती है तब व्यक्ति अपने मूल स्वभाव को छोड़कर पतन के रास्ते पर चल पड़ता है। जो कि सही नहीं है, हर व्यक्ति को अपना आत्म चिंतन करने के पश्चात सत्य रास्ता ही अपनाना चाहिए, हमारी आत्मा का मूल गुण क्षमा है, जिसके जीवन में क्षमा आ जाती है उसका जीवन सार्थक हो जाता है।क्षमा भाव के बारे में भगवान महावीर कहते हैं कि –

‘क्षमा वीरस्य भूषणं’

अर्थात् क्षमा वीरों का आभूषण होता है, अत: आप भी इस वर्ष क्षमा पर्व सभी को अपने दिल से माफी देकर भगवान महावीर के रास्ते पर चलें।

पर्यूषण पर्व: आत्मशोधन और जैन आध्यात्मिकता

पर्यूषण पर्व: आत्मशोधन और जैन आध्यात्मिकता

Paryushan

दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है। जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे। वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है। जैन धर्म में कुल २४ तीर्थंकर हुए हैं। तीर्थंकर अर्‍हंतों में से ही होते हैं। जैन संस्कृति में जितने भी पर्व व त्योहार मनाए जाते हैं, लगभग सभी में तप एवं साधना का विशेष महत्व है। जैनों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है पर्युषण पर्व। पर्युषण पर्व का शाब्दिक अर्थ है आत्मा में अवस्थित होना। पर्युषण का एक अर्थ है कर्मों का नाश करना। कर्मरूपी शत्रुओं का नाश होगा तभी आत्मा अपने स्वरूप में अवस्थित होगी अतः यह पर्युषण पर्व आत्मा का आत्मा में निवास करने की प्रेरणा देता है।

यह सभी पर्वों का राजा है, इसे आत्मशोधन का पर्व भी कहा गया है, जिसमें तप कर कर्मों की निर्जरा कर अपनी काया को निर्मल बनाया जा सकता है। पर्युषण पर्व को आध्यात्मिक दिवाली की भी संज्ञा दी गई है, जिस तरह दिवाली पर व्यापारी अपने संपूर्ण वर्ष का आय व्यय का पूरा हिसाब करते हैं, गृहस्थ अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं, ठीक उसी तरह पर्युषण पर्व के आने पर जैन धर्म को मानने वाले लोग अपने वर्ष भर के पुण्य पाप का पूरा हिसाब करते हैं, वे अपनी आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल की साफ-सफाई करते हैं। पर्युषण महापर्व मात्र जैनों का पर्व नहीं है, यह एक सार्वभौम पर्व है, पूरे विश्व के लिए यह एक उत्तम और उत्कृष्ट पर्व है, क्योंकि इसमें आत्मा की उपासना की जाती है। संपूर्ण संसार में यही एक ऐसा उत्सव या पर्व है जिसमें आत्मरत होकर व्यक्ति आत्मार्थी बनता है व अलौकिक, आध्यात्मिक आनंद के शिखर पर आरोहण करता हुआ मोक्षगामी होने का सद्प्रयास करता है। पर्युषण आत्म जागरण का संदेश देता है और हमारी सोई हुई आत्मा को जगाता है। यह आत्मा द्वारा आत्मा को पहचानने की शक्ति देता है। पर्युषण पर्व जैन धर्मावलंबियों का आध्यात्मिक त्योहार है। पर्व शुरू होने के साथ ही ऐसा लगता है मानो किसी ने दस धर्मों की माला बना दी हो, यह पर्व मैत्री और शांति का पर्व है। जैन धर्मावलंबी भाद्रपद मास में पर्युषण पर्व मनाते हैं। श्वेताम्बर संप्रदाय के पर्युषण ८ दिन चलते हैं, उसके बाद दिगम्बर संप्रदाय वाले १० दिन तक पर्युषण मनाते हैं, उन्हें वे दसलक्षण के नाम से भी संबोधित करते हैं, यह पर्व अपने आप में ही क्षमा का पर्व है, इसलिए जिस किसी से भी आपका बैरभाव है, उससे शुद्ध हृदय से क्षमा मांग कर मैत्रीपूर्ण व्यवहार करें।

भारतीय संस्कृति का मूल आधार तप, त्याग और संयम हैं, संसार के सारे तीर्थ जिस प्रकार समुद्र में समाहित हो जाते हैं, उसी प्रकार दुनिया भर के संयम, सदाचार एवं शील ब्रह्मचर्य में समाहित हो जाते हैं। मानव की सोई हुई अन्तः चेतना को जागृत करने, आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार, सामाजिक सद्भावना एवं सर्व धर्म समभाव के कथन को बल प्रदान करने के लिए पर्यूषण पर्व मनाया जाता है, साथ ही यह पर्व सिखाता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति में ज्ञान व भक्ति के साथ सद्भावना का होना भी अनिवार्य है, जैन धर्म में दस दिवसीय पर्युषण पर्व एक ऐसा पर्व है जो उत्तम क्षमा से प्रारंभ होता है और क्षमा वाणी पर ही उसका समापन होता है। क्षमा वाणी शब्द का सीधा अर्थ है कि व्यक्ति और उसकी वाणी में क्रोध, बैर, अभिमान, कपट व लोभ न हो। दशलक्षण पर्व, जैन धर्म का प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण पर्व है। दशलक्षण पर्व संयम और आत्मशुद्धि का संदेश देता है। दशलक्षण पर्व साल में तीन बार मनाया जाता है लेकिन मुख्य रूप से यह पर्व भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से लेकर चतुर्दशी तक मनाया जाता है। दशलक्षण पर्व में जैन धर्म के जातक अपने मुख्य दस लक्षणों को जागृत करने की कोशिश करते हैं। जैन धर्मानुसार दस लक्षणों का पालन करने से मनुष्य को इस संसार से मुक्ति मिल सकती है। संयम और आत्मशुद्धि के इस पवित्र त्यौहार पर श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक व्रत-उपवास रखते हैं। मंदिरों को भव्यतापूर्वक सजाते हैं तथा भगवान महावीर का अभिषेक कर विशाल शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं, इस दौरान जैन व्रती कठिन नियमों का पालन भी करते हैं जैसे बाहर का खाना पूर्णतः वर्जित होता है, दिन में केवल एक समय ही भोजन करना आदि। पर्युषण पर्व की समाप्ति पर जैन धर्मावलंबी अपने यहां पर क्षमा की विजय पताका फहराते हैं और फिर उसी मार्ग पर चलकर अपने अगले भव को सुधारने का प्रयत्न करते हैं। आइए! हम सभी अपने राग-द्वेष और कषायों को त्याग कर भगवान महावीर के दिखाए मार्ग पर चलकर विश्व में अहिंसा और शांति का ध्वज फैलाएं।

क्षमा करें और कराएं।

आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान, गंगाशहर

आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान, गंगाशहर

नैतिकता का शक्तिपीठ
आचार्य तुलसी की अजर-अमर स्मृतियां

Acharya Tulsi Shanti Pratishthan

आचार्य तुलसी का महाप्रयाण २३ जून १९९७ आषाढ कृष्णा तृतीया वि.सं. २०५४ को हुआ। आचार्य तुलसी के महाप्रयाण के बाद उनके अन्तिम संस्कार स्थल पर आचार्यश्री महाप्रज्ञ के पावन सान्निध्य में स्मारक हेतु शिलान्यास किया गया। श्रद्धेय आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी ने इस परिसर का नामकरण नैतिकता का शक्तिपीठ किया, जो आज इस रूप में प्रतिष्ठित है। आचार्य तुलसी का समाधि स्थल उनके द्वारा प्रदत्त नैतिक मूल्यों के विकास प्रचार-प्रसार एवं संस्कारों के जागरण की प्रेरणा देता है, इस शक्तिपीठ की स्थापत्य कला अपनी वैशिष्ट्यता लिए हुए है, यह समाधि स्थल श्रद्धालुओं के लिए उपासना और ध्यान-साधना की उपयुक्त तपःस्थली है।
आचार्य तुलसी की अन्तिम संस्कार स्थली पर निर्मित इस समाधि स्थल का लोकार्पण १ सितम्बर २००० को हुआ, समाधि स्थल परिसर में ३० हजार वर्गफुट के गोल घेरे में मूल समाधि अवस्थित है, इसके शिखर पर चारों दिशाओं में लगे संगमरमर पर आचार्य तुलसी के विभिन्न मुद्राओं में रेखाचित्र उनकी स्मृति को मुखर कर रहे हैं, उल्लेखनीय यह भी है कि समाधि स्थल की अंतःस्थ भूमि में एक अस्थि-कलश स्थापित है, यह अस्थि-कलश अष्ट धातुओं एवं बहुमूल्य रत्नों की नक्काशी से युक्त सिद्धहस्त शिल्पियों द्वारा निर्मित किया गया है, इनसे जुड़ी दर्शक दीर्घाएं भी विस्तृत हैं, इस पवित्र प्रांगण में भव्य एवं आकर्षक आर्ट गैलरी बनाई गई है, जिसमें आचार्य तुलसी के पूरे जीवन की स्मृतियों को चित्रित किया गया है, यह तुलसी चित्रदीर्घा निश्चय ही दृष्टव्य है। समाधि स्थल में संलग्न एक विशाल अणुव्रत मंच है जो आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के वृह्द आयोजनों के लिए बहुपयोगी है, यह ओपन थिएटर हृदय की विशालता व खुले विचारों की उदारता का परिचायक है। नैतिकता का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए इस मंच का सार्वजनिक उपयोग किया जाता है।
‘नैतिकता का शक्तिपीठ’ को बाहरी आकर्षण एवं सुरम्यता प्रदान करने के लिए परिसर की सीमा में भव्य विशाल उद्यान भी लगाया गया है, यहां सिर्फ तन और मन ही नहीं, आत्मा तक तरंगित हो उठती है।
नैतिकता का शक्तिपीठ की स्थापत्य कला के बाहरी परिवेश को देखने एवं नैतिकता के महान् सम्बोधन का श्रद्धा से स्मरण एवं आत्मशान्ति प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में विभिन्न धर्मों के श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों का आगमन निरन्तर जारी रहता है।
आचार्य तुलसी की स्मृतियों को चिरस्थायी रखने उनके कल्याणकारी कार्यों एवं अवदानों को प्रचारित-प्रसारित करते हुए नैतिकता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान का गठन किया गया। आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान के सदस्य सम्पूर्ण भारत एवं पड़ोसी देशों में भी है, इस संस्थान के २०५२ आजीवन सदस्य हैं। प्रतिष्ठान आचार्य तुलसी के जीवन, विचार, कला, दर्शन, साहित्य व विधाओं पर शोध एवं तुलसी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को अजर-अमर बनाने के लिए आचार्य तुलसी राजस्थानी साहित्य शोध संस्थान, पुस्तकालय एवं वाचनालय, आचार्य तुलसी साहित्य केन्द्र आदि अनेक महत्वपूर्ण आयाम संचालित किये जा रहे हैं।
प्रतिष्ठान द्वारा शक्तिपीठ के ठीक सामने आशीर्वाद अतिथिगृह का भी निर्माण करवाया गया है, इस चार मंजिला भवन में कमरे, डॉरमेंटरी, सुसज्जित हॉल, सत्कार आदि पाकशाला सहित सभी सुविधाजनक व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। यह भवन आध्यात्मिक सामाजिक आयोजनों एवं यात्रियों के लिए बहुत उपयोगी हैं, यहां पधारने वाले यात्रियों के लिए भोजनशाला की भी नियमित व्यवस्था रहती है, अनेक श्रद्धालु प्रतिवर्ष दर्शनार्थ पधारते हैं, उनके लिए यहां सभी अनुकूल सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं। नैतिकता का शक्तिपीठ परिसर में झूले, फव्वारे, आ.तु.फिजियोथैरेपी सेन्टर, प्रेक्षाध्यान कक्ष संचालित किये जा रहे हैं, भ्रमणपथ का निर्माण किया गया है।
आचार्य तुलसी की पावन स्मृति में बीकानेर के सबसे बड़े जिला अस्पताल पीबीएम में प्रतिष्ठान के सहयोग से निर्मित आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर चिकित्सा एवं अनुसंधान केन्द्र में नित्य सैकड़ों वैंâसर रोगियों को शारीरिक स्वास्थ्य लाभ के साथ ही उन्हें जीवनमूल्यों की प्रेरणा व प्रेक्षा ध्यान के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है, इस वैंâसर सेंटर में कोबाल्ट कक्ष, पेलिएटिव यूनिट, प्रेक्षा कॉटिज आदि का निर्माण भी करवाया गया है, आचार्य तुलसी की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में यहां बॉनमेरो ट्रीटमेंट यूनिट के निर्माण की प्रक्रिया जारी है।
आचार्य तुलसी समाधि स्थल के अलावा गंगाशहर में आचार्य तुलसी के निर्वाण स्थल तेरापंथ भवन, गंगाशहर में जिस कमरे व पट्ट पर अंतिम श्वास ली, उसको दर्शनीय बनाया गया है, यहां आचार्य श्री के चित्र व संदेशों के साथ ही आचार्य तुलसी स्वास्थ्य निकेतन एवं आचार्य तुलसी कम्प्युटर प्रशिक्षण केन्द्र के माध्यम से हजारों लोग प्रतिवर्ष लाभान्वित होते हैं। तेरापंथ भवन से कुछ दूरी पर ‘बोथरा भवन’ स्थित है, जहां आचार्य श्री तुलसी ने अपने जीवन काल की अंतिम रात्रि व्यतीत की थी, इस भवन को आचार्य तुलसी की स्मृति में फोटो गैलरी के रूप में परिवर्तित किया गया है।
सभी धर्मों के साधु-संतों के समय-समय पर होने वाले सामान्य समागम से जहां गंगाशहर अपनी आध्यात्मिकता के कारण विख्यात है वहीं आचार्य तुलसी की पुण्यभूमि के गौरव एवं उनकी स्मृति में बने नैतिकता के शक्तिपीठ की स्थापना से इस क्षेत्र की ख्याति में एक नया आयाम जुड़ा है।

-जैन लूणकरण छाजेड़
अध्यक्ष आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान
गंगाशहर, राजस्थान, भारत