Bijay Kumar Jain

जीवन मोक्ष: सत्संग, समर्पण, और संत

जीवन मोक्ष: सत्संग, समर्पण, और संत

Jivan Moksh

सन्त और सत्संग के बिना यह दुर्लभतम मानव जीवन भी व्यर्थ है जो सन्तों की कीमत समझ लेते हैं, उनके भीतर से यह वचन निकलता है- ‘‘जो दिन साधु न मिले, वो दिन होय उपास’’ उन्हें सत्संग के बिना उपवास-सा महसूस होता है।
सत्संग आत्मा की खुराक है। आत्मा की व्यवस्था सिर्फसंतकृपा से ही हो सकती है, अपितु जिस शरीर में भव्यात्मा विराजमान है, उस शरीर की व्यवस्था तो माँ-बहन, बेटी, पत्नी या बेटा कोई भी कर सकता है, जब हम संतों के समीप जाते हैं, उनके सत्संग में मन लगाकर बैठते हैं तो वे हमें ‘‘ज्ञानामृत भोजन’’ अर्थात् ज्ञान का अमृत परोसते हैं, अगर हम उसे श्रद्धा से ग्रहण करते हैं और धीरे-धीरे आचरण में उतारते है तो हमें दुगुना लाभ मिलता है, हमारी ज्ञान की प्यास खुलती है और आचरण से मन शुद्ध एवं शरीर स्वस्थ बनता है।
ज्ञान पिपासा है जो हमें सन्त की तलाश करायेगी। प्यासा व्यक्ति पानी एवं ज्ञानी ज्ञान की तलाश करता है, यदि हमें ज्ञान होगा तो सन्त की तलाश करेंगे और सुराहीरुपी सन्त के समक्ष प्याला बनकर समर्पित हो जाएंगे, समर्पित होने से ही प्याला भरता है और प्याला भरे होने से ही प्यास बुझती है। आत्मा की भूख और प्यास मिटाने के लिए सन्त समागम और प्रभुभजन अति आवश्यक है। सत्संग और प्रभु भजन जीवन में बड़ी दुर्लभता से मिलते हैं। सत्संग मिलने का मतलब है – सन्तों का दीदार होना और सन्तों से प्यार होना। दीदार में सिर्फ दर्शन होता है और प्यार में सम्पूर्ण समर्पण। समर्पण के साथ किया गया सत्संग ही जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाता है। समर्पण से मिट्टी के द्रौणाचार्य से भी एकलव्य की शिक्षा और सिद्धि प्राप्त हुई थी।

  • विष के प्याले में मीरा बाई को श्री कृष्ण के दर्शन हुए थे, जिसे जो भी मिलता है, समर्पण से मिलता है अहंकार से नहीं।
  • अहंकार से मिलता है सिर्पâ अंधकार और समर्पण से मिलता है प्रकाश।
  • यदि हम सन्त चरणों में समर्पित होते हैं तो अन्त:करण प्रकाशित हो जाता है जैसे कि माटी समर्पित होती है तो गागर बनती है, बूंद समर्पित होती है तो सागर बनती है।
  • संसारी गुरुचरणों में समर्पित होता है तो सन्त बनता है, सन्त प्रभुचरणों में समर्पित होता है तो अरिहन्त बन जाता है।
  • समर्पण का सूत्र है स्वयं को अर्पित कर देना, जो भी समर्पित हुआ, वह पा गया।
  • यदि हम मार्ग भूले भी तो समर्पण का प्रकाश सही मार्ग पर ले जायेगा और सत्य से मिला देगा।
  • यदि हमें सत्य को पाना है तो स्वयं को सन्त-चरणों में समर्पित करना होगा क्योंकि संत ही साधन है प्रभु-प्राप्ति का।
  • ‘गुरु’ मानवता की मुंडेर पर चारित्र्य का चिराग है। साधना के शिखर पर सिद्धत्व की सृष्टि है। आत्मा की भूमि पर अमृत की वृष्टि है।
  • गुरु ही हमारी पिपासा को देख-परखकर हमें मोक्ष मार्ग पर चलने को लाभान्वित कराता है, मार्गदर्शन करता है और मोक्ष का परम फल, परम प्रसाद दिला देता है। मगर पथ पर तो हमें स्वयं ही चलना होता है।
  • मोक्षमार्ग पर चलने के लिए हमें श्रद्धा, ज्ञान एवं आचरण की तीव्र आवश्यकता है। सच्ची श्रद्धा, सच्चा ज्ञान तथा सच्चा आचरण ही हमें मोक्ष के मार्ग पर ले जायेगा, इसलिए कहा गया है

‘‘सम्यक दर्शन, ज्ञान चारित्रणि मोक्ष मार्ग’’

मन की रफ्तार

मन की रफ्तार

हमने अपने घर के वरिष्ठ सदस्यों के मुंह से सुना था, ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। मन की गति को न पकड़ सका, राजा संत रईस।’’ जब भी रफ्तार का नाम लिया जाता है, कुछ बातें दिमाग में चली आती हैं। हवा की गति तेज होती है, सूर्य के प्रकाश की गति तेज होती है, ध्वनि की गति तेज होती है, इन सभी गतियों की तुलना मन के रफ्तार से नहीं की जा सकती। मन की गति को मापना संभव नहीं है। साथ-साथ भूखंड की ऊर्जाओं को मापने का प्रयास किया जाता है। ऊर्जा मापने के लिए वैज्ञानिकों ने कई यंत्रों का अविष्कार किया, सभी यंत्र प्रकृति, भूखंड के बारे में संभावना ही बता सकते हैं। परिणाम के करीब जा सकते हैं, मगर शतप्रतिशत परिणाम नहीं देते, आपने टीवी और प्रिंट मीडिया में सुना और पढ़ा होगा, ‘‘तूफान आने की संभावना है, बरसात आने की संभावना है, तेल के कुएं निकलने की संभावना है, भूकंप आने की संभावना है, सूखा-बाढ़ आने की संभावना है, अधिक ठंड या अधिक गर्मी पड़ने की संभावना है। ज्योतिष शास्त्र कहता है, ‘‘गणना के हिसाब से आपकी जिंदगी में ऐसा होने की संभावना है।’’ वास्तुशास्री कहता है, ‘‘भूखंड में संशोधन के बाद अच्छे परिणाम आने की संभावना है’’ हर विषय संभावना ही बताती है, सच में क्या होगा, केवली भगवान और नारायण कृष्ण ही बता पायेगें। सभी विद्याएं, विद्वान संभावनाओं की बात करते हैं। मन की गति, समय की गति दोनों का समावेश अगर आपस में कर दिया जाए तो असंभव कुछ भी नहीं, हमें संभावनाओं का ज्ञान हो जाए, पुरूषार्थ की गति को, मन की गति को आपस में संयोग कह दें, तब असंभव कुछ नजर नहीं आएगा और भी बन जाएगा। गीता में कृष्ण ने अपने उद्बोधन में अर्जुन से कहा था, ‘‘हे अर्जुन, समय गतिवान है, समय की गति पकड़ने का प्रयास मत करना। समय के साथ अपनी गति को जोड़ देना।’’
आज हम पूरे हिन्दुस्तान में भ्रमण करते हैं, समय की गति को पकड़ने का प्रयास करने वाले कौन-कौन से प्रांत हैं? प्रथम नाम आपको महाराष्ट्र का मिलेगा, उसका उदाहरण आप अपनी आंखों से प्रत्यक्ष देख सकते हैं। अमीर हो या गरीब हो, नौकर हो या मलिक हो, कम से कम १२ घंटा एवं १६ घंटों तक कार्य करते हैं। यही कारण है, मुम्बई को ‘‘आर्थिक राजधानी’’ कहा जाता है, यह बात क्या सिर्फ मराठियों पर लागू होती है, बिलकुल नहीं। प्रांत में रहने वाले सभी भारतीयों पर लागू होती है, समय की गति को पकड़ने का पूरा प्रयास, समय पर कार्य पूरा करने का प्रयास, समय पर पहुंचने का प्रयास देखने लायक है, केवल देखने लायक ही नहीं सराहने लायक भी है। क्या सभी मुम्बईवासी ऐसा प्रयास करते हैं? जो करते हैं, वह सफलता को प्राप्त करते हैं, मैंने आचार्यों के लेख पढ़े, उनके कुछ अंश अपनी भाषा में आपके साथ बांटने का या आप तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा हूं। मेरा यह प्रयास सार्थक होता है, तो मैं अपने आपको धन्य समझूंगा। आचार्य कहते हैं, ‘‘चौबीस घंटे का दिन-रात होता है, प्रकृति अपनी नियति नहीं बदलती, चौबीस की छब्बीस या तेईस घंटे नहीं करती।’’ आचार्यों ने चार तरह के मनुष्यों का वर्णन किया है। पहला-चार घंटे काम करता है और चौदह घंटे सोता है, छह घंटे आलस्य और प्रमाद में बीता देता है, ऐसा क्यों होता है? दुश्चिंताएं, ख्याली पुलाव, अज्ञात भय, दूसरा क्या करेगा, दूसरा क्या कहेगा, डर के मारे जी-हुजुरी, अपने आपको समझदार दिखाने के प्रयास में असफल हो जाता है, उसका एक साल का लक्ष्य तीन साल में पूरा होता है। दूसरा-आठ घंटा काम करता है, दस घंटा सोता है और छह घंटे आलस्य करता है, वह अपना लक्ष्य दो साल में पूरा करता है। तीसरा-बारह घंटा काम करता है, आठ घंटा सोता है और चार घंटा नित्य क्रियाएं एवं प्रमाद में निकाल देता है, वह अपना एक साल का लक्ष्य एक साल में पूरा करता है। चौथा-संत, महंत, विश्व के विशिष्ट, सफल, व्यापारी हो, अध्यात्मिक हों, समाजसेवी हो या परमार्थ के काम में जुड़े हुए हो, इनकी दिनचर्या सबसे अलग होती है। अगर आप विश्व के टॉप टेन (प्रथम दस) हस्तियों के बारे में इंटरनेट के माध्यम से पढ़ने का समझने का प्रयास करेंगे एवं दिनचर्या को अपने आप में उतारने का प्रयास करें तो संभव है कि टॉप टेन में आपका नाम भी आ जाए, निश्चित ही आपका नाम आएगा। भाग्यलक्ष्मी, कर्मलक्ष्मी, यशलक्ष्मी, कुल लक्ष्मी, मां भगवती आपका स्वागत करने के लिए तत्पर खड़ी हैं। आप प्रयास करके तो देखें। बिल गेट्स, फोर्ड, अंबानी और टाटा, बिड़ला की पंक्तियों में आपका नाम निश्चित लिखा जाएगा, इसके लिए आपको समय का सदुपयोग करना होगा, जिंदगी का एक-एक सेकेंड करोड़ों रूपए से अधिक कीमती होता है, अनमोल होता है, अनमोल समय को बेमोल बर्बाद मत करो, समय को आप साथ दें, समय आपका सम्मान करेगा। प्रकृति, परमात्मा आपके सम्मान की व्यवस्था, सम्मान के कारण आपके समक्ष उपस्थित कर देंगे, सोलह घंटे काम करने वाले और छह घंटा प्रकृति एवं शरीर विज्ञान के आदेशानुसार शरीर को आराम देना या सोने का प्रयास करना है तो उनका एक साल का लक्ष्य चार से छह माह में पूर्ण हो जाता है क्योंकि वो आज का काम कल पर नहीं छोड़ते। परिस्थिति एवं कठिनाइयों का सामना करते हुए आज का काम आज ही पूरा करते हैं। अपनी पूरी शक्ति परेशानियां और कठिनाइयों को अपने से अलग करने में लगा देते हैं जो पुरूषार्थ के साथ तन कर खड़ा हो जाता है, कठिनाई एवं परेशानियां अपने आप पलायन करने लगती है, इतना ही नहीं परेशानियां पैदा करने वाले स्वयं आपके आत्मविश्वास से परेशान हो जायेंगे।

जब टूटने लगे होंसले तो बस ये याद रखना
ढूंढ़ लेना अंधेरों में मंजिल अपनी
बिना मेहनत के हासिल तख्तो ताज नहीं होते
जुगनू किसी रोशनी के मोहताज नहीं होते

-डॉ.सम्पत सेठी जैन

(वास्तु एवं निर्माेलॉजिस्ट)

विवेक और जैन धर्म: जैन धर्म में विवेक की भूमिका

विवेक और जैन धर्म: जैन धर्म में विवेक की भूमिका

  • जैन धर्म किसी एक धार्मिक पुस्तक या शास्त्र पर निर्भर नहीं है, इस धर्म में ‘विवेक’ ही धर्म है |
  • जैन धर्म में ज्ञान प्राप्ति सर्वोपरि है और दर्शन मीमांसा धर्माचरण से पहले आवश्यक है |
  • देश, काल और भाव के अनुसार ज्ञान दर्शन से विवेचन कर, उचित- अनुचित, अच्छे-बुरे का निर्णय करना और धर्म का रास्ता तय करना |
  • आत्मा और जीव तथा शरीर अलग-अलग हैं, आत्मा बुरे कर्मों का क्षय कर शुद्ध-बुद्ध परमात्मा स्वरुप बन सकता है, यही जैन धर्म दर्शन का सार है, आधार है |
  • जैन दर्शन में प्रत्येक जीवन आत्मा को अपने-अपने कर्मफल अच्छे-बुरे स्वतंत्र रुप में भोगने पड़ते हैं, यहाँ परमात्मा को, कर्मों को क्षय कर आत्मा स्वरुप प्राप्त किया जा सकता है ​|
  • जिनवाणी में किसी व्यक्ति की स्तुति नहीं है, बल्कि समस्त आत्मागत गुणों का महत्व दिया गया है, जिनधर्म गुणों का उपासक है।
  • हमारे बाहर कोई हमारा शत्रु नहीं है, शत्रु हमारे अंदर है, काम क्रोध, राग-द्वेष आदि विकार ही आत्मा के शत्रु हैं, हम राग और द्वेष को जीत कर अविचल निर्मल वीतरागी बन सकते हैं |
  • ज्ञान और दर्शन के सभी दरवाजे खुले हैं। अनेकान्तवाद के अनुसार कोई दूसरा धर्म पन्थ भी सही हो सकता है क्योंकि सत्य सीमित या एकान्तिक नहीं है |
  • अन्य धर्मों की तुलना में जैन धर्म में अपरिग्रह पर अधिक जोर दिया है, आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह और उनके प्रति मोह आसक्ति वर्जित है |
  • जैन धर्म में नगर और नारी को समान स्थान दिया गया है, श्रावकश्राविका, श्रमण-श्रमणियों के रुप में बराबर स्थान तथा नारी को भी मुक्ति पाने का अधिकारी माना गया है |
  • जैन धर्म, जैन दर्शन के अनुसार जन्म, जाति, रंग, लिंग का कोई भेदभाव नहीं, मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से पहचाना जाना चाहिए |
  • जैन दर्शन, जैन धर्म, जैन आचार निवृत्ति परक है, इसमें त्याग और तपस्या, अनासक्ति और अपरिग्रह पर बड़ा जोर है, प्रवृत्ति सूचक कर्मों से उच्चौत्तर आत्माओं को दूर रहने की सलाह दी गई है |
  • जैन धर्म में रुढ़िवादिता नहीं है, चूंकि एक किसी गुरु, तीर्थंकर, आचार्य या संत को ही सर्वोपरि नहीं माना गया है, समयानुसार विवेकमुक्त बदलाव मुख्य सिद्धांतों की अवहेलना किये बिना मान्य किया गया है |
  • किसी तरह के प्रलोभन से जैनमत में धर्म परिवर्तन के कोई नियम नहीं है, स्वत: जिन धर्म संयत आचरण करने पर व्यक्ति जिनोपासक बन सकता है |
  • जल, अग्नि, वायु, वनस्पति, आकाश, पृथ्वी, ६ प्रकार के जीवों की रक्षा का संकल्प लेना तथा जीवन यापन के लिए आवश्यकता से कम, उपयुक्त साधनों का प्रयोग करना, यतनापूर्वक पाप रहित जीवन जीना ‘जैन धर्म’ का मुख्य सिद्धांत है |
  • जैन धर्म में कोई देव भाषा नहीं है, भगवान महावीर के अनुसार जन भाषा में धार्मिक क्रियाएँ और ज्ञान प्राप्ति की जानी चाहिए, सामान्य जन भाषा भगवान महावीर के समय में प्राकृत और पाली थी, लेकिन आज ये भाषायें भी जन भाषायें नहीं रही, अत: अपने क्षेत्र की भाषा में चिंतन, मनन और धर्म आराधना होनी चाहिए, यही भगवान महावीर के उद्घोष का सार है, हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषा या अन्य कोई भी भाषा प्रयोग में ली जा सकती है |
  • ‘‘जियो और जीने दो’’ ‘‘परस्परोपग्रह जीवनाम्’’ दयाभाव युक्त और उसी के तहत जीवों के जीने में सहयोग करना अहिंसा का व्यवहारिक रुप है |
  • जैन धर्म के सिद्धांतों की वैज्ञानिक प्रामाणिकता एक के बाद एक स्वयंसिद्ध है, जैसे वनस्पति में जीव है, जीव और जीवाणु है, पानी, भोजन, हवा में जीव है, यह सब बातें वैज्ञानिक सिद्ध कर चुके हैं, इससे सिद्ध होता है कि जैनाचार्य और जैन दर्शन द्वारा प्रदत्त ज्ञान अंधविश्वासों से मुक्त व सच्चा है।
  • जैन श्रमण, साधु, साध्वी भ्रमण करते रहते हैं, एक स्थान पर नहीं रहते, मठ नहीं बनाते, आश्रम नहीं बनाते, पैसा कौड़ी अपने नाम से संग्रह नहीं करते।
  • जैन धर्म में गृहस्थों के लिए, श्रावक-श्राविका के लिए, सन्त-साध्वी के लिए अलग-अलग आचार मर्यादायें तय की गई है |
  • अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह यह पाँच महाव्रत हैं, शाकाहारी भोजन हो, नशा-मुक्त जीवन हो, शिकार और जुए से दूर रहें, झूठ और चोरी का व्यवहार न करें, व्यभिचार मुक्त जीवन जीए |
  • मुक्ति का मार्ग अहिंसा, तप दान और शील के द्वारा बताया गया है, किसी से वैर न हो, सभी प्राणियों से प्रेम हो, इन मर्यादाओं के पालन के लिए विवेक प्राप्ति हेतु ज्ञान दर्शन स्वाध्याय के द्वारा प्राप्त करना हमारा आवश्यक कर्तव्य है |
  • जैन दर्शन सत्यनिवेषी है, सत्य ही धर्म है, परिस्थितिवश विवेक से सत्य को ढूंढना और उचित-अनुचित, धर्म- अधर्म, पाप-पुण्य का निर्णय करना, ये मुख्य शिक्षाएँ हैं।

-डॉ रिखब चन्द जैन

(चेयरमैन टी.टी. ग्रुप)

ओजस्वी सन्त तरूण सागरजी

ओजस्वी सन्त तरूण सागरजी

tarun sagarji

मध्यप्रदेश के दमोह के छोटे से ग्राम में जन्मा एक बालक कभी देश का इतना ओजस्वी व प्रखर वक्ता सन्त बन जायेगा, यह किसी की कल्पना में नहीं था। २६ जुन सन् १९६७ में जन्मा पवन कुमार जैन, अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान ही एक जैन सन्त का आध्यात्मिक प्रवचन सुनकर, मन से आन्दोलित हो गया एवं १४ वर्ष की उम्र में अपना घर छोड़ दिया, वह किशोर अगले ५-६ वर्ष अपनी ज्ञान-पिपासा की शान्ति एवं मानव जीवन का उद्देश्य पूर्ण सुख-शान्ति प्राप्ति हेतु गुरू की खोज करता रहा, अन्त में सन् १९८८ में २१ वर्ष की आयु में दिगम्बर आचार्य श्री पुष्पदन्त सागरजी से मुनि दीक्षा लेने पर गुरू से नया नाम मिला- ‘‘मुनि तरूण सागर’’

मुनि तरूण ने शुरू के कुछ वर्ष ज्ञान व अध्यात्म शक्ति के विकास में लगाये, यह लिखने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि कुछ ही अन्तराल में, ‘तरूण सागर’ ज्ञान का सागर बन गया एवं एक विशिष्ट प्रवचन शैली विकसित की, जिसकी वजह से श्रोता बरबस ही उनकी ओर खिंचता चला जाता था, उन्होंने देश को अनेक शहरों का भ्रमण किया एवं अपनी ओजपूर्ण वाणी एवं धीमी व तेज उतार-चढ़ाव वाली प्रवचन की विशेष शैली से अपने श्रोताओं को सही जीवन जीने का सन्देश किया, उनका कहना था कि तुम स्वयं अच्छे व्यक्तियों की खोज मत करो, तुम स्वयं ही इतने अच्छे बन जाओ कि लोग तुम्हारी खोज करें, तुम्हारे जीवन में गुणों का इतना सुवास हो कि आने वाला तुम्हारे जीवन व व्यवहार से प्रभावित होकर जावे।

अधिकांश प्रवचनकार ऐसा सोचते हैं कि हमें अपनी बात इतनी मिठास से कहनी चाहिये ताकि श्रोता को आनन्द मिले, परन्तु मुनि तरूण सागरजी की प्रवचन शैली एक अलग ही किस्म की थी, वे कही जाने वाली कड़वी व कूट सत्य को श्रोता के सामने ज्यों का त्यों परोस देते थे, यानि कुनैन की गोली पर मिठास का लेप नहीं करते थे, वो बताई जाने वाली बात को ऊंचा-नीचा करके व कई बार घुमा-फिराकर ऐसे ज्यों की त्यों कहते थे कि श्रोता को हार्ट-अटैक की तरह एक दम अटैक करती थी, वह सोचने को मजबूत होता था कि मुझे अब कुछ करना चाहिये, सोचना चाहिये, चिन्तन व विचार परिवर्तन होना चाहिए।

उनकी विद्वता व वैशिष्टतया से केवल आम आदमी ही नहीं बल्कि विद्वान व प्रबुद्धजन, साहित्यकार व राजनेता भी प्रभावित होते थे, इस वजह से उनके गुणों की सुगन्ध व पहचान बढ़ती गई, प्रवचन में तो हजारों-हजारों व्यक्ति उपस्थित होते थे, वो मन्दिरों व स्थानकों के अलावा, स्कूलों कॉलेजों व जेल में प्रवचन देते थे, मध्यप्रदेश, हरियाणा की विधानसभा में यही एक जैन सन्त रहे, जिन्हें अपनी बात रखने का अवसर मिला, उन्होंने पुलिस अकादमियों व सेना के जवानों को भी सम्बोधित किया एवं उन्हें प्रभावित किया।

सन्त तरूण सागरजी अपनी बात खूब कड़ाई से रखते थे, अत: वो कड़वे प्रवचनकार नाम से विख्यात हो गये, उनके प्रवचनों का संकलन ‘‘कड़वे प्रवचन’’ नाम से कई भागों व कई भाषाओं में प्रकाशित हुए है, जैन सन्तों में सम्भवत: यही एक व्यक्ति है जिनका नाम ‘लिम्का रिकॉर्ड बुक’ में ही नहीं, बल्कि ‘गिनीज रिकॉर्ड’ में भी शामिल हुआ है, उनके प्रवचनों की एक पुस्तक तो विशिष्ट आकार में प्रकाशित हुई थी, जो स्वयं में एक रिकॉर्ड है।

वरिष्ठ पत्रकार व सम्पादक बिजय कुमार जैन ‘हिंदी सेवी’ के निवेदन पर मुनि श्री तरूण सागरजी ‘जैन एकता’ के काफी पक्षधर बनें एवं इस हेतु अनवरत मे सहयोग करते रहे। तेरापंथ के आचार्य श्री महाश्रमणजी का सन् २०१४ में जब दिल्ली में चातुर्मास था, तब उन्हीं के प्रयास से दिगम्बर मूर्तिपूजक, स्थानक व तेरापंथी चारों सम्प्रदायों का चातुर्मास के अवसर पर विशाल सम्मेलन हुआ था, तब यह भी तय किया गया था कि ऐसा आयोजन प्रति वर्ष होगा, परन्तु एकता की ओर बढ़ते कदम और आगे नहीं बढ़े, वह फिलहाल मुनि ही कहलाते थे, परन्तु ज्ञान, मान-सम्मान में किसी भी आचार्य से कम नहीं थे, इनकी पहचान कम ही उम्र में व कम ही वर्षों में पूरे विश्व में हो गयी थी।

दिल्ली में आपके अनेकों चातुर्मास सम्पन्न हुए हैं, इस साल सन् २०१८ का चातुर्मास कृष्णानगर क्षेत्र के राधेपुरी मन्दिर में था, वो पीलिया की बिमारी से ग्रस्त हो गये, यह बिमारी वैसे कोई खतरनाक श्रेणी की व जानलेवा नहीं होती, परन्तु आपके लिये असाध्य बन गयी।

स्थिति कण्ट्रोल में नहीं आई, उम्र का केवल ५१ वां वर्ष ही चल रहा था, यानि भविष्य की काफी सम्भावना थी, परन्तु एक विवेकपूर्ण आचारवान सन्त होने के नाते उन्होंने अपना मानस सल्लेखना पूर्वक समाधि लेने का बना लिया, इस स्थिति में दिल्ली स्थित अनेक जैन साधु उनके पास पहुंच गये एवं सभी ने उनकी कम उम्र देखते हुए, उन्हें संथारा लेने व दिलाने के पक्ष में नहीं थे, परन्तु एक सितम्बर २०१८ रात्री में एकाएक स्थिति बिगड़ गयी एवं रात्रि में ३:१८ की ब्रह्मवेला में अपनी अन्तिम श्वास ली।

देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित अनेक विद्वतजनों ने आपके कृतृत्व की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए अश्रपूरित श्रद्धांजलि दी, यह एक प्रश्न खड़ा हुआ कि इतनी कम उम्र में ऐसे महान सन्त की इहलीला क्यों समाप्त हुयी, इनके कृतृत्वों ने इनका जवाब दे दिया कि मात्र इतनी कम उम्र में ही समाज व राष्ट्र को इतना कुछ दे दिया एवं परोस दिया कि आगामी कई पीढ़ियां उनसे लाभान्वित होती रहेंगी, जो काम ९०-१०० वर्ष उम्र में होता था, उन्होंने ५० की उम्र में ही कर लिया, अत: प्रभु! ने शायद किसी अन्य लोक में ज्यादा अपेक्षा समझकर, इस महान आत्मा को वहां भिजवा दिया होगा, प्रभु की लीला कौन जान सकता है? प्रात: ४ बजे तक समाचार सर्वत्र फैल गया एवं कृष्ण नगर का चप्पा-चप्पा जनाकीर्ण हो गया, प्रात: ७ बजे के आसपास उनके पार्थिव शरीर को, बैठी हुई मुद्रा में हजारों व्यक्तियों की सहभागिता से गाजियाबाद से आगे मुरादनगर स्थित तरूण सागर धाम में उनके पार्थिव शरीर को संध्या वेला में अग्नि के सुपुर्द कर दिया गया। मुनि श्री तरूण सागरजी ने पूरे विश्व के करोड़ों व्यक्तियों को अपने प्रवचनों -कृतृत्वों से प्रभावित किया था, अनेक भाषाओं में व कई खण्डों में प्रकाशित उनकी प्रवचनों की पुस्तकें आगामी शताब्दियों को दिशाबोध देती रहेगी, प्रेरणा देती रहेगी। कुछ वर्षों पहले आचार्य महाप्रज्ञजी ने एक सन्देश, मेरे माध्यम से इनको भिजवाया था, तब से व्यक्तिगत पहचान हो गयी थी, इसके बाद जब भी दर्शन का अवसर मिला खूब स्नेहाशक्ति आशीर्वाद देते थे, ऐसी महान आत्मा को ‘जिनागम’ परिवार का शत: शत: वन्दन।

– विजयराज सुराणा, नई दिल्ली
आत्मविकास का अपूर्व अवसर : चातुर्मास

आत्मविकास का अपूर्व अवसर : चातुर्मास

Chaturmas

प्रत्येक क्रिया काल के अनुसार करनी चाहिए-मनुष्य श्रम करता है किन्तु उसका फल पाने के लिए ‘काल’ की उपयुक्तता /अनुकूलता जरुरी है, जैसे स्वास्थ्य सुधारने के लिए सर्दी का मौसम अनुकूल माना जाता है, वैसे धर्माराधना और तप: साधना के लिए वर्षावास,चातुर्मास का समय सबसे अधिक अनुकूल माना जाता है।

संपूर्ण सृष्टि के लिए वर्षाकाल सबसे महत्वपूर्ण है, इन महीनों में आकाश द्वारा जलधारा बरसाकर धरती की प्यास बुझाती है, धरती की तपन मिटाती है और भूमि की माटी को नम्र, कोमल, मुलायम बनाकर बीजों को अंकुरित करने के लिए अनुकूल बनाती है इसलिए २७ नक्षत्रों से वर्षाकाल के १० नक्षत्र और १२ महीने में चातुर्मास के ४ मास ऋतुचक्र की धुरी हैं, सृष्टि के लिए जीवनदायी हैं, प्राणिजगत् के लिए प्राणसंवर्धक और जीवन रक्षक माने जाते हैं।

वर्षावास का यही काल धर्माराधना के लिए सर्वोत्तम काल माना गया है।

चातुर्मास की विश्रुत परंपरा – आपके सामने दो शब्द आ रहे हैं- वर्षावास और चातुर्मास, पहले इसी पर विचार कर लें। वर्षावास का मतलब है- वर्षा ऋतु। श्रावण-भाद्रपद का महीना वर्षा ऋतु में एक स्थान पर रहना, एक ही स्थान पर निवास करना, जैन आगमों में इसे वर्षावास कहा गया है। वर्षा ऋतु केवल दो मास होते हैं, इसके बाद आती है शरद् ऋतु-आसोज और कार्तिक मास और ये चारों मास मिलकर चातुर्मास काल कहलाता है।

वैदिक व बौद्ध परंपरा में भी इस चार मास काल को चातुर्मास कहा गया है, चातुर्मास के लिए परिव्राजक, ऋषि, श्रमण, निग्र्रन्थ एक स्थान पर निवास करते हैं, आज भी यह चातुर्मास परंपरा चल रही है। वैदिक संत महात्मा आज भी वर्षाकाल में चातुर्मास करते हैं, भले ही वे चार महीने के बजाय दो महीने ही एक स्थान पर ठहरते हैं, श्रावण-भाद्रपद तक एक स्थान पर रुकते हैं। जनता को धर्माराधना, भागवत श्रवण, रामायण पाठ, व्रत-उपवास आदि की प्रेरणा देते हैं। बौद्ध भिक्षुओं में भी किसी समय चातुर्मास के चार माह एक स्थान पर ठहरने की परंपरा थी किन्तु अब वे भी दो मास में ही (कभी-कभी) चातुर्मास समाप्त कर देते हैं। जैन परंपरा में आज भी चातुर्मास की यह परंपरा अक्षुण्ण चल रही है। आषाढ़ी पूनम से कार्तिक पूनम तक चार महीने तक पदविहारी जैन श्रमण एक ही स्थान पर निवास करते हैं। जैन श्रमणों के लिए नवकल्पी विहार बताया है- मृगसर मास से आषाढ़ मास तक ८ महीने एक-एक मासकल्प तथा श्रावण मास से कार्तिक मास तक चार महीने चातुर्मास का एक कल्प नवकल्पी विहार का विधान जैन आगमों में है।

चातुर्मास : अंतर जागरण का संदेश-वैदिक ग्रंथों के वशिष्ठ ऋषि का कथन है कि चातुर्मास में चार महीने विष्णु भगवान समुद्र में जाकर शयन करते हैं इसलिए यह चार मास का काल धर्माराधना, योग, ध्यान, धर्मश्रवण, भागवत पाठ व जप-तप में बिताना चाहिए।
इन चार महीने में विवाह-शादी, गृह-निर्माण आदि कार्य नहीं करने चाहिए, यात्रा नहीं करनी चाहिए, एक समय भोजन करना और रात्रि भोजन नहीं करना, यहाँ तक भी कहा जाता है कि चार महीने सभी देवता शयन करते रहते हैं, अस्तु चार मास तक देवता शयन का मतलब है ये चार मास धर्माराधना और योगसाधना में ही बिताना चाहिए। वैदिक ग्रंथों के इस प्रतीकात्मक कथन पर विचार करें कि चार महीने तक देवता क्यों सो जाते हैं? या वास्तव में ही देवता या भगवान सोते हैं? इस कथन के गंभीर भाव को समझें तो स्पष्ट होगा कि देवता सोने का मतलब हैं- हमारी प्रवृत्तियाँ, हमारी क्रियाएँ सीमित हो जायें। सोना निवृत्ति का सूचक हैं, जागना प्रवृत्ति का सूचक है। हमारा पुरुषार्थ, हमारा पराक्रम जो बाह्यमुखी था वह चार महीने के लिए अंतर्मुखी बन जाये, बाहर से हम सोये रहें, भीतर से जागते रहें। बाहरी चेतना, संसार भावना कम हो, सुस्त हो और अंतरचेतना, धर्म भावना प्रबल हो यही मतलब है देवताओं के सोने का…

-सज्जनराज मेहता जैन
कमला सज्जनराज मेहता जैन, चेन्नई

संसार का आठवाँ आश्चर्य जैन साधु

संसार का आठवाँ आश्चर्य जैन साधु

हमारे पूर्व जन्म की पुण्यायी के कारण हम इस जन्म में जैन कुल में पैदा हुए, जैन कहलाये तथा हमें जैन-सन्तों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। हमारे साधु-साध्वियों को संसार का आठवां आश्चर्य कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। गर्मी हो या सर्दी, सड़क हो या कच्चा रास्ता, कंकर हो या कांटे, रात्रि भोजन व कच्चे पानी का त्याग, बरसात में छाता नहीं, ओढ़ने के लिए चादर या कम्बल नहीं, रात्रि में मच्छर काटते हैं, बिजली का उपयोग नहीं, दो-तीन जोड़ी पतले कपड़ों से सम्पूर्ण जीवन व्यतित करना तो आश्चर्य ही है। हम एक दिन भी इस तरह का जीवन जी नहीं सकते, इतनी कठिन जीवन शैली तो शायद ही किसी अन्य धर्माचार्यों में मिलेगी इसलिए जैन साधु-संतों का जीवन विश्व के लिए अविश्वसनीय लगता है।
इस भौतिक युग में हमारे साधु-संतों के प्रवचन व शिक्षा का ही परिणाम है कि आज हम सिर ऊँचा करके चल सकते हैं अन्यथा अभी तक गहरी खाई में गिर गये होते, हम इन्हें कोटिश: वन्दन करते हैं, इन्होंने ही संसार लांगकर हमें सही मार्ग दिखाने, हमारी जीवन नैय्या पार उतारने तथा हमें इन्सान बनाने का कार्य किया है। जैन धर्म में अनेक ऐसे-ऐसे संत मुनिराज हुए हैं जिनके त्याग, तपस्या व बलिदान की बातें सुनें तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। महावीर के अनुसार उपदेश वही देना चाहिए जिसका स्वयं के जीवन के साथ सीधा तालमेल हो और जिन्होंने भगवान के बहुमूल्य उपदेशों की कभी अवहेलना नहीं की। आचरण शुद्धि का ध्यान रखते हुए क्रियावान संत कहलायें। गाँव हो या शहर, धर्म स्थान पुराना हो या आधुनिक, बस अपना डेरा डाला और आडम्बर रहित चातुर्मास में मानवता का पाठ पढ़ाते हुए धर्म गंगा बहाते थे, एक यूरोपीयन लेखक ने लिखा है कि मैंने सब धर्मों के नियमों को देखा है पर जैन धर्म में महावीर स्वामी के बनाए संघ धर्म के मुकाबले का और कोई सिद्धान्त नहीं जचता। आज परिस्थितियां बदल गई हैं, एक अलग ही भूगोल देखने को मिलता है। समाज में धन की बढ़ोत्तरी के साथ ही आडम्बर का प्रवेश भयानक मोड़ ले रहा है। चातुर्मास में खर्चे लाखों-करोड़ों तक पहुँच गये हैं। जैन धर्म में अनेक सम्प्रदाय होने के कारण इस क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा ने अपनी नींव जमा ली है। धन कमाने में प्रतिस्पर्धा तो समझ में आती है लेकिन व्यर्थ में धन गवाने की प्रतिस्पर्धा आश्चर्यजनक लगती है, ऐसा लगता है धर्म व समाज पर धनपतियों का एकाधिकार हो गया है तथा सारी सत्ता उनके कदमों में सिमट गई है, अपनी जबरन प्रतिभा को उभारने के लिए धर्म संस्थानों का गलत उपयोग हो रहा है। आपके पास पैसा है तो आप भगवान के चरण छू सकते हैं, धार्मिक कार्यक्रमों में आगे की कतार में बैठ सकते हैं या फिर बड़े साधु-संतों के नजदीक जा सकते हैंं, शायद मेरी यह बात गलत लगेगी, लेकिन मैंने जो प्रत्यक्ष देखा व सुना है उसी का वर्णन कर रहा हूँ।
भारत में होनेवाले चातुर्मास में सालाना खर्चों का अनुपात अगर २०० करोड़ भी आंके और उसमें से ५० प्रतिशत जनहित कार्यों में लगाया जाये तो प्रतिवर्ष एक भव्य अस्पताल या २०-२५ पाठशालाएँ या कोई रिसर्च सेंटर या फिर हजारों स्वधर्मी भाई-बहनों को मदद मिल सकती है।
मानवता के मसीहा महावीर के उपदेशों में कहीं भी आडम्बर की चर्चा नहीं मिलती है। वे एक योगी थे लेकिन हम भोगी बन गये हैं, हमारी सारी धार्मिक प्रवृत्तियाँ विद्रोह को निमंत्रण दे रही है। आज हमें जरुरत है अपनी करनी, कथनी में समानता लाने की, महावीर को श्रद्धा से मन में बसाकर, आडम्बरों की होली जलाकर, दीपावली के दीप मन में प्रज्ज्वलित करने की। अन्यथा भविष्य में ऐसे दुष्परिणाम सामने आयेगें जिससे समाज का ढांचा चरमरा जायेगा। हमारे वरिष्ठ संतों ने समाज के लिए महत्वपूर्ण योगदान देकर आदर्श परम्पराओं की सुदृढ़ नींव रखी, उनको बरकरार रखना हमारे वर्तमान संत मुनिराजों का कत्र्तव्य बन जाता है जिससे जैन धर्म और नयी ऊँचाईयां छू सके, मैं उनसे करबद्ध प्रार्थना करता हूँ कि धर्म के नाम पर तथा समाज में हो रहे आडम्बर को अति शीघ्र रोकने का प्रयास करें, आपके उपदेश संजीवनी का काम करते हैं, आज भी साधु-साध्वियों के प्रति समाज में श्रद्धा का भाव है, अपने स्वार्थ की होली जलाकर जैन समाज को एक नई दिशा व प्रेरणा प्रदान करने का कष्ट करें, जैन धर्म को एक राष्ट्र धर्म बनाने के सपने को साकार करें। सादर जय जिनेन्द्र!

चातुर्मास क्यों

चातुर्मास स्व पर कल्याण के लिए एक सुनहरा समय है। चातुर्मास साधुसाध्वी, श्रावक-श्राविका हेतु धर्म आराधना, साधना व धर्म प्रेरणा संदेश के लिए विशिष्ट महत्व रखता है। वर्ष भर में तीन चातुर्मासिक पर्व आते हैं। आषाढ पूर्णिमा या (चतुर्दशी) कार्तिक पूर्णिमा व फाल्गुन पूर्णिमा इन तीनों में आषाढ़ी पुर्णिमा वर्षाकालीन का विशेष महत्व है। ८ माह पदयात्रा विचरण करने वाले संत-साध्वी वर्षावास हेतु एक ही स्थान पर चार माह के लिए स्थिर हो जाते हैं, इस समय में साधु-साध्वी आत्मकल्याण, ज्ञान, दर्शन. चारित्र, तप की आराधना व जीवों की रक्षा तथा धर्म अनुष्ठानों की विशेष प्रेरणा देते हैं, वैसे तो मानव को हर पल, हर क्षण धर्म साधना करनी चाहिए लेकिन विभिन्न दायित्वों के कारण बारह माह धर्म आराधना न कर सके उनके लिए चातुर्मास वरदान स्वरुप है, जैसे आषाढ़ के बादलों को देखते ही मयूर गर्जन सुनने के लिए उत्कंठित हो जाता है, वैसे ही चातुर्मास के निकट आते ही श्रद्धालुजन, भक्तजन भगवान की वाणी को श्रवण व साधना हेतु उत्सुक हो जाते हैं।

व्यवहार में भी चातुर्मास का अपना विशेष महत्व है, इन दिनों हुई बरसात मानव को पूरे साल भर सरसता प्रदान करती है, जैसे कि एक राजा ने अपने सभासदों में प्रश्न किया कि बारह में से चार गए तो पीछे क्या बचेगा? कईयों ने उत्तर दिया-आठ, किन्तु राजा संतुष्ठ नहीं हुए, राजा ने महामंत्री से पूछा तो हाथ जोड़कर कहा कि- अन्नदाता बारह में से यदि चार चले गये तो पीछे कुछ भी नहीं बचेगा। राजा ने पूछा-यह कैसे? मंत्री ने समाधान दिया कि महाराज एक वर्ष में बारह महिनों में वर्षा ऋतु के चातुर्मास के चार महीने निकाल दिये जायें तो शेष शून्य ही रहेगा। यदि चातुर्मास के चार माह पानी नहीं बरसा तो शेष आठ माह में हाहाकार, त्राहि-त्राहि मच जाएगी क्योंकि एकेन्द्रिय से पांचेन्द्रिय तक के सभी जीवों के लिए जल आवश्यक है। मंत्री के उत्तर से राजा व सभी सभासद संतुष्ट हुए, जैसे जल के कारण ही चातुर्मास का महत्व बढ़ता है उसी प्रकार भगवान की वाणी रुपी वर्षा धर्म साधना, आराधना से ही चातुर्मास का महत्व बढ़ता है। क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष की ज्वाला से तपते हुए मन की धरती को शीतल और शांत बनाएंगे। हिंसा, स्वार्थ, वासना की गंदगी को दूर करने का प्रयास करेंगे। धर्म में अडिग रहते हुए सुख-दु:खों में समभाव रखेंगे। प्रभु वचनों को सद्गुरु मुख से श्रवण कर, अपने जीवन की दिशा बदलेगें।
आत्म शोधन कर अपने प्रकृति स्वभाव में परिवर्तन लायेंगे और दुर्गुणों का नाश कर सद्गुणों का बीजारोपण करेंगे। व्यसन मुक्त संस्कार युक्त जीवन के साथ हर वर्ग को जोड़ते हुए धर्म के सही मर्म को समझाते हुए स्वाध्याय, ध्यान, तपस्या की ज्योति जलायेगें, तभी चातुर्मास का यह सुनहरा समय सार्थक होगा, तभी परम पद प्राप्ति की मंजिल की ओर अग्रसर हम हो पायेंगे।

-महेश नाहटा जैन


नगरी (छ.ग.)

मो. ०९४०६२०१३१५१

दिल्ली में तपस्वियों का सम्मान​

दिल्ली में तपस्वियों का सम्मान​

दिल्ली:

दिनांक ३० सितम्बर को बड़ी श्रद्धा एवं हर्षोल्लास से उपाध्याय श्री गुप्तिसागर जी म.सा. का ३७ वाँ दीक्षा समारोह सम्पन्न हुआ, इस अवसर पर क्षमावाणी महापर्व का भी आयोजन किया गया, जिसमें दिल्ली में १० उपवास व इससे अधिक उपवास करने वालों को विशेष रूप से सम्मानित किया गया, कार्यक्रम में ३१०८ यात्रियों को श्री सम्मेद शिखर जी की यात्रा के टिकट वितरित किए गए, इस अवसर कई गणमान्यों के साथ ही केंद्रीय विज्ञान प्रोद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन व दिल्ली के स्वास्थ मंत्री सत्येन्द्र जैन भी उपस्थित थे, जिन्होंने सभा को सम्बोधित भी किया।

एकता में शक्ति

मुझे जिनागम पत्रिका मिली, बराबर तीन दिनों तक इस पत्रिका पर चिन्तन किया, बहुत ही शिक्षाप्रद है, थोड़ा सा समय हमसभी आत्म चिन्तन में लगायें, जैन समाज जो बिखरा हुआ है, हम आपस में झगड़ते हैं, जिसका लाभ दूसरों को मिल जाता है।
दिगम्बर-श्वेताम्बर हम सब ‘एक’ बन जायें, भारत में शासन करने लगें, एकता में ही शक्ति निहित है। उदाहरण के तौर पर एक छोटा सा लेख लिख रहा हूँ, ध्यान से पढिये और आत्म चिन्तन करिये।
एक व्यक्ति के पास रेशम का धागा था, रेशम के धागे आपस में लड़ने लगे, अलग-अलग रहने की सबने ठानी। धागे दर्जी के पास गये और कहा हमारे टुकड़े कर दो। दर्जी ने रेशम के धागे के टुकड़े कर दिये। धागे हवा से इधर-उधर हो गये, एक व्यक्ति आया उसने देखा, रेशम के धागे हैं जिसको एक कर बड़ा से गट्टा बना दिया, फिर जंगल में गया खजूर की पत्तियों को इकट्ठा किया, फिर उसकी सिलाई करके चटाई बनाई, उसने चटाई को बाजार में बेच दिया। धागे अलग अलग रहे तो कोई नहीं पूछा, जब एक हो गये तो उसका आदर हो गया, इसी तरह जैन समाज अलग-अलग रहेगें तो हमारे ऊपर हमले होते रहेगें, चारों सम्प्रदाय एक हो जायें तो हमारा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। धर्म एक है, मान्यता अलग रहे हमारे धर्म पर, हमारे मुनियों पर हमले हों तो उस समय ‘एकता’ का परिचय जरूर दें।
‘हिन्दी’ हमारी राष्ट्रीय भाषा है फिर भी हम हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं मानते, जब ‘हिन्दी’ को सभी भारतीय बोलने लग जायेगें, तो भारत का नाम दुनिया में रोशन हो जायेगा, ‘हिन्दी’ भाषा राष्ट्र की है जिसके हम अनुयायी हैं।

– महावीर प्रसाद अजमेरा

जोधपुर

तेरापंथ स्थापना दिवस पर कहा रहे

तेरापंथ स्थापना दिवस पर कहा रहे

तेरापंथ स्थापना दिवस

तेरापंथ की फुलवारी सदा हरी-भरी – शासनश्री मुनि विजय कुमार

यह जगत् द्वन्द्वात्मक है, अनेक प्रकार के विरोधी द्वन्द्व हमें यहां देखने को मिलते हैं, दिन-रात, सर्दी-गर्मी, मृदु-कठोर आदि द्वन्द्वों की तरह ही कभी पतझड़ तो कभी वसंत के दर्शन यहां होते रहते हैं, यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसे कोई रोक नहीं सकता, व्यक्ति और समूह दोनों में यह विविधता दिखाई देती है, अनुकूल परिस्थिति घटित होने पर व्यक्ति को लगता है ‘अच्छे दिन आ गये’ और प्रतिकूलता घटित होने पर लगता है ‘अच्छे दिन चले गये’। समय के बदलाव के साथ व्यक्ति की सोच में भी बदलाव परिलक्षित होता रहता है। तेरापंथ एक धर्मसमुदाय है, इसकी प्राण -प्रतिष्ठा महान् तपस्वी आचार्य भिक्षु के हाथों हुई। संघ चिरजीवी व स्वस्थ बना रहे इसके लिए उन्होंने इस धर्मसंघ की नींव में मर्यादा और अनुसाशन के दो ऐसे पीलर लगाये कि ये आने वाले हर खतरे से संघ को सुरक्षित रख लेते हैं, एक आचार्य के नेतृत्व में सारी सत्ता सौंपकर उन्होंने धर्मसंघ पर महान् उपकार किया। आचार्य की जागरूकता ही समूचे संघ को निश्चिन्तता व स्वस्थता प्रदान करती है, संघ के सदस्यों में निश्चिन्तता व आश्वासन ही संघ की जीवन्तता का सबल प्रमाण है। संघ षाट्त्रिशिका में आचार्य श्री तुलसी ने लिखा हैविश्वस्ता यत्र स्वस्था:स्यु: रुग्णा वृद् धास्तपस्विन:।सुश्रूषया समाश्चस्ता: स संघ:संघ उच्यते।।

जिस संघ में रुग्ण, वृद्ध और तपस्वी संत-सती अपनी सेवा के लिए निश्चिन्त रहते हैं, उन्हें अपने सुखद भविष्य का भरोसा होता है, वे समाधिस्थ होते हैं, वास्तव में वही संघ विशिष्ट है। तेरापंथ में दीक्षित होने वाले व्यक्ति को निश्चिन्तता का वरदान सहज प्राप्त हो जाता है, यहां सबकी चिंता का भार गुरु अपने पर ले लेते हैं, शिष्य के सुख-दु:ख मानकर चलते हैं। रामायण का एक प्रसंग है, कहते हैं कि राम-लक्ष्मणसीता वनवास संपन्न कर अयोध्या आये तब कौशल्याजी ने लक्ष्मण से पूछा- ‘तेरे पर शक्ति का प्रहार कहां हुआ था’ लक्ष्मण बोले- ‘वेदना राघवेन्द्रस्य केवलं व्रणिनो वयम’ मेरे तो केवल घाव हुआ था, वेदना तो बड़े भाई राम को हुई थी, यही स्थिति ‘तेरापंथ’ में देखने को मिलती है। शारीरिक रुग्णता संत-सतियों को होती है किंतु उसकी वेदना का अनुभव संघ के नायक आचार्य को होता है, वे किसी की कठिनाई सुनते ही उसके निवारण के लिए प्रयत्नशील हो जाते हैं, मैं आज से लगभग ५० वर्ष पहले की अपनी ही बात यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ, मेरी दीक्षा का दूसरा वर्ष चल रहा था, उस समय गुरूदेव तुलसी की दक्षिण यात्रा चल रही थी, तेज गर्मी का मौसम था, मुनि हीरालाल जी स्वामी रात के समय संतों को सोने की जगह बता रहे थे, मुझे जहां सोने का स्थान बताया, वहां बेहद गर्मी थी, मैंने मुनिश्री से दूसरे स्थान के लिए निवेदन किया किंतु उन्होंने अपनी मजबूरी बता दी। गुरुदेव तुलसी के कानों में मेरा व मुनिश्री का संवाद पड़ा।

पूज्यवर ने मुनि हीरालाल जी को आवाज लगाई और कहा कि हीरालाल! मेरे पास यह थोड़ी जगह खाली है उस विजय कुमार को मेरे पास सुला दें, मैंने संकोच अनुभव किया पर गुरुदेव की वत्सलता ने मुझे वहां सोने के लिए मजबूर कर दिया, यह है गुरु की अतिशायी कृपा, जो शिष्यों की पीड़ा को धो डालती है। वर्तमान में हम आचार्य श्री महाश्रमणजी को देख रहे हैं, वे प्रलंब और सुदूर यात्रा पर विहरमाण हैं। वृह्द संघ परिवार उनसे दूर है किंतु दूरी का अनुभव किसी को नहीं होने देते, दूर होते हुए भी वे एक-एक साधु-साध्वी की अपेक्षाओं का, उसकी चित्तसमाधि रखते हैं, किसी को भी अकेलेपन का अनुभव करने की जरूरत नहीं है, गुरु का सिंचन और संपोषण शिष्यों को दूर होते हुए भी निकटता का अहसास कराता है। शिष्यों की समाधि के लिए गुरु और शिष्य का यह अद्भूत तादात्म्य केवल ‘तेरापंथ’ में ही देखने को मिलता है। उदयपुर में साध्वी प्रमुखाश्री जी के घुटनों का ऑपरेशन हो रहा था, आचार्य महाश्रमणजी जो उस समय युवाचार्य थे, वहां हॉस्पिटल में पधार, साध्वी प्रमुखाश्री जी से कहा अगर आपको खून की जरूरत हो तो हम दे सकते  हैं। यद्यपि जरूरत नहीं पड़ी किंतु ऐसी भावना रखना अपने आप में महत्त्व की बात है।

आचार्यवर के श्रीचरणों में अनेक छोटे-बड़े संत रहते हैं, सबको मार्गदर्शन देना, उन्हें संबल प्रदान करना, हताशा व निराशा से उन्हें बचाना गुरुवर के प्रशासन-कौशल की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। केवल साधु-साध्वियों को ही नहीं, श्रावकश्राविकाओं को भी आचार्यवर संपोषण देते रहते हैं, उनकी भावनाओं को तोड़ते नहीं, जोड़ते हैं। विज्ञप्ति में कई बार पढ़ते हैं तब जानकारी होती है कि कभी-कभी तो विहार से भी ज्यादा श्रम और भ्रमण घरों में वृद्ध-बीमार व्यक्तियों को दर्शन देने में हो जाता है। गुरु द्वारा प्रदत्त संबल और उनकी निश्छल मुस्कान श्रावक-श्राविकाओं के लिए शक्तिवर्धक और आनंदवर्धक रसायन का काम करती, आधि-व्याधि को दूर कर देता है, किसी भी उद्यान को सरसब्ज और सुरम्य बनाये रखने के लिए केवल सिंचन ही नहीं, अनावश्यक पत्तों व डालियों की कांट-छांट करनी भी आवश्यक होती है, संघ के अनुशास्ता भी दोषों के निवारण के लिए अहर्निश सजग रहते हैं। आदिगुरु आचार्य भिक्षु से लेकर आचार्य महाश्रमण तक के इतिहास में इस तरह के अनेक प्रसंग हमें पढ़ने व सुनने को मिलते हैं जिनसे ज्ञात होता है कि तेरापंथ में कभी कोई विघटन नहीं हुआ, दोषों को पनपने को मौका नहीं आया। सारणा-वारणा अर्थात् गुणों को प्रोत्साहन और त्रुटियों पर अंगुलि निर्देश आदि विशेषताएं आचार्यों में होनी जरूरी है, नेतृत्व की यह निपुणता ‘तेरापंथ’ में हम सदा से देखते रहे हैं, इसी वजह से तेरापंथ
की फुलवारी सदा हरी-भरी और सुरम्य रहती है, ऐसी बसंत की छटा तेरापंथ उद्यान में सदा-सदा बनी रहे, ‘जिनागम’ परिवार भी ऐसी मंगल कामना करता हैं।

क्षमा मोक्ष का द्वार है

क्षमा मोक्ष का द्वार है

क्षमा व स्नेह

क्षमा व स्नेह

क्षमा व स्नेह स्वाभाविक गुण है जबकि ईर्ष्या अथवा कटुता, विभाव दशा की देन है इसी कारण द्वेष अथवा वैर से उत्पन्न क्रोध को ज्यादा समय तक कोई टीकाकर नहीं रख सकता, कुछ ही समय बाद वह स्वत: समाप्त हो जाता है। क्रोध जब आता है तब ज्वाला का काम करता है, न मालूम क्या-क्या जलाकर राख कर दे। स्नेह जीवन में अमृत तुल्य है, जबकि क्रोध हलाहल विष, स्नेह जीवन को मधुर सुगन्धमय व बिना किसी बोझ व तनाव के स्वाभाविक रुप से विकसित करता है, जबकि द्वेष से जीवन मलिन ग्लानियुक्त व कटुता से कलुषित होता रहता है साथ ही अनावश्यक बोझ से दबा हुआ महसूस होता है अत: द्वेष त्याज्य है।द्वेष व क्रोध, स्वयं को जलाता है जबकि सामने वाले को मात्र उकसाता है जिसमें स्वयं का अहित अधिक है। सांवत्सरिक महापर्व के दिन हमें मन, वचन, काया के योग से स्वार्थ या प्रमादवश किसी का दिल दुखाने में आया हो अथवा दु:ख पहुँचाया हो तो समझपूर्वक क्षमायाचना करनी चाहिए ताकि द्वेष का धुँआ,आत्मा पर कालिमा लगाने से पहले ही समाप्त हो जाये। द्वेष आत्मा के लिये दूषण है,क्षमा आत्मा का भूषण है द्वेष वात्सल्य से मिटेगा जैसे गंदा कपड़ा, गंदे पानी से साफ नहीं होता बल्कि स्वच्छ पानी की आवश्यकता होती है वैसे ही द्वेष-प्रतिद्वेष से नहीं बल्कि मैत्री की मधुरता से समाप्त होगा। जैसा कि हम देखते हैं चन्दन स्वयं को काटने वाली कुल्हाड़ी को भी सुगन्धित करता है, गुलाब का फूल- कांटों के बीच रहकर भी सुगन्ध देता है। जीभ कभी दाँत से कट जाये तो भी दांत का साथ नहीं छोड़ती, यहाँ तक कि तरुवर पत्थर मारने वाले को भी मीठे फल देता है वैसे ही सर्वविदित है कि चंडकौशिक नाग ने भगवान महावीर को डंक मारा फिर भी करुणा व वात्सल्य के फलस्वरुप खून के बदले,दूध की धारा बहने लगी।

आज क्यों नहीं मानव अपने मन-मुटाव को भुलाकर, क्षमा व वात्सल्य के अवतार भगवान महावीर की वाणी ‘‘मिति में सव्व भुएसु वैर मज्झं न केणइ’ अर्थात् जगत में सभी से मैत्री बनाये रखना व किसी से वैर की परम्परा नहीं बढ़ाना है, प्रेम से प्रेम बढ़ता है अत: ऐसी कल्याणकारी भावना को अपने जीवन में सदा के लिये पुन: प्रतिष्ठित करें, यही महापुरुषों का कथन है, अत: जहाँ भी वैर-विरोध का वातावरण बना हो,वहाँ मन-वचन व काया से क्षमा याचना करनी चाहिये। क्षमा वीरों का आभूषण है, क्षमा-स्नेह की सरिता व प्रेम की पवित्र गंगा है, प्रेम के बिना जीवन रेगिस्तान है जहां न पानी है न हरियाली। ‘जिन शासन’ में क्षमा धारण करना, राग द्वेष के कर्मरुपी बीज को समाप्त करना है। ‘जिन शासन’ वस्तुत: जीव शासन है जहां सभी जीव निश्चित रुप से सिद्ध परमात्मा के साधर्मी रहे हुए हैं, अत: कहा जाता है छोटे से छोटा जीव भी सिद्धपद का उम्मीद्वार है फिर उन्हें दु:ख पहुँचाने का हमें क्या अधिकार ? यदि जाने- अनजाने में जहाँ कहीं किसी के साथ वैर अथवा कटुता रही हो अथवा दु:ख पहुँचाया हो तो अंत:करण से क्षमा मांगना, पर्युषण महापर्व की आराधना का सार है। क्षमा, मोक्ष मार्ग की प्रथम सीढ़ी है। गम खाना व गुस्से को पी जाना, क्षमा धर्म है। भूल होना मानवीय प्रकृति है, भूल को सुधारना मानवीय संस्कृति है, भूल को नहीं मानना विकृति है। ‘‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’’ अपनी भूलों पर पश्चाताप करना आत्मा को पवित्र बनाना है. जो भूल न करे वह भगवान जो भूल करके माफी मांगे, वह इन्सान जो भूल को भूल न माने, वह बेईमान जो भूल करके ऊपर से अहंकार करे, वह शैतान पांच पापों से सजाया है, जिसने जीवन वह मानव से शैतान बन बैठा है. हर कली में फूल का अरमान छिपा बैठा है हर मानव में भगवान छिपा बैठा है ।

हम करें सच्ची क्षमायाचना

हम करें सच्ची क्षमायाचना

Apology

संवत्सरी के इस महापर्व पर भले ही हम कई सालों से एक दूसरे के क्षमायाचक बने हैं, एक-दूसरे से क्षमा मांगी है, किन्तु सच्चे अर्थों में हमें प्रकृति के श्रृंगार, राष्ट्र की अमूल्य निधि मूक-मासूम, जीवों से जिनकी रक्षा-सुरक्षा का दायित्व सौंपा था हमें हमारे पूर्वजों गुरूओं, विद्वानों, मुनीषियों से क्षमा मांगनी चाहिए, सही मायनों में आज मूक-मासूम जीवों की रक्षा-सुरक्षा के प्रति अपने नैतिक कर्तव्यों को कैसे पूरा करें? संवत्सरी के पुनीत पावन पर्व पर आज आवश्यकता है इस सम्बन्ध में आत्म चिन्तन की, क्योंकि दया, करुणा और अनुकम्पा का स्वामी मानव मूक व असहाय जीवों के साथ क्रूर, बर्बर, राक्षसी आचरण करने में, अपने शौक, सौन्दर्य, मान-प्रतिष्ठा व धनार्जन के लिए उन्हें मौत के घाट उतारने में लगा है।

यदि आप सचमुच चौरासी लाख जीव योनियों से क्षमायाचना करते हैं,तो मूक-मासूम,असहाय जीवों से आपकी सच्ची क्षमायाचना तभी सम्भव है,जब आप निम्न बातों पर ध्यान देगें:

१. कभी भी पॉलिथीन की थैलियों का प्रयोग नहीं करें
२. कभी भी हिंसक सौन्दर्य प्रसाधनों का उपयोग नहीं करें

३. कभी भी कीटनाशक पदार्थों का उपयोग नहीं करें
४. सदैव बिजली, पानी के दुरुपयोग से अपने को बचावें
५. बिजली का व्यर्थ प्रयोग न करें, बिजली का अपव्यय रोके
६. पत्र, अखबार आदि रद्दी को व्यर्थ कचरे में ना फेके
७. पेड़-पौधे,फूल-पत्तियों को नहीं तोड़ें.
८. पेट्रोल का कम से कम उपयोग करें, पेट्रोल का अपव्यय बचावें
९. कभी भी पटाखे ना फोड़ें, न ही दूसरों को ऐसी प्रेरणा दें
१०. सदैव खाद्य पदार्थों के उपयोग से पहले उसकी निर्माण विधि व मिश्रित स्थिति की अवश्य जांच कर लें
११. हमेशा कत्लखानों का विरोध करें व मूक पशुओं की मदद करें
१२. प्रतिदिन कम से कम एक रोटी मूक जीव को दान अवश्य करें
१३. जर्दा, गुटखा, धूम्रपान एवं मादक पदार्थों से सदैव परहेज रखें
१४. सदैव अच्छी भावना रखें व अच्छे कार्यों में जुटे रहें
१५. कभी भी जूठा भोजन नहीं छोड़ें
१६. अपने प्रत्येक कार्य में पूर्ण विवेक बरतें और मूक जीवों से सच्ची क्षमायाचना करते हुए हिंसा-विरोध हेतु तत्पर रहेगें व अहिंसा का प्रचार-प्रसार एवं जीवात्म रक्षण कार्यों की सफलता हेतु तन-मन-धन से सहयोग-समर्थन देकर हिंसा के प्रचण्ड विरोध का मार्ग प्रशस्त करेंगे। आपके सुझावों, विचारों, मार्गदर्शन एवं सहयोग की अपेक्षा के साथ अहिंसा मार्ग का एक सतत् सक्रिय समर्पित राही……

– महेश नाहटा जैन,नगरी

मो. ०९४०६२०१३५१

क्षमा-सुख का सागर है

जब सामने वाला आग बने, तुम बन जाना पानी

क्षमा सुख का सागर है, यह है महावीर की वाणी

निकल जाते हैं आँसू,कभी-कभी रोने से पहले

टूट जाते हैं ख्वाब, कभी-कभी सोने से पहले

क्षमा अनमोल तोहफा है, भूल सुधारने का

काश! कोई पा ले इसे, मृत्यु होने से पहले

‘क्षमा वीरों का भूषण है’ कथन महावीर का

क्षमा के बिन अहिंसा-पथ अपना नहीं सकते

कागज की कश्ती में डुबकी लगा नहीं सकते

सूरज पर जाकर, घर अपना बना नहीं सकते

कितना कारगर है, कथन यह प्रभु महावीर का

कि क्षमा के बिन खुशी के फूल खिला नहीं सकते

क्षमा के बिन आध्यात्मज्योति जला नहीं सकते

क्षमा के बिन प्रेमामृत, हम पिला नहीं सकते

क्षमा के बिन हम कभी, मोक्ष पा नहीं सकते

क्षमा के बिन मानवता को जिला नहीं सकते

रत्नों के बिना गलहार बेकार होता है

मानवता के बिना मानव बेकार होता है

सदा संघर्षों के बिना जुझने वाले मानव

क्षमा-दान के बिना तो जीवन भार होता है

बिना क्षमा के धर्म पताका फहरा नहीं सकते

बिना क्षमा के नेह का नाता, निभा नहीं सकते

क्षमा है वरदान समूचे जन समाज का

बिन क्षमा के किसी को अपना बना नहीं सकते