Bijay Kumar Jain

दशलक्षण पर्व धुलियान में ….

दशलक्षण पर्व धुलियान में ….

दशलक्षण

धुलियान (प.बंगाल) : पवित्र गंगा नदी किनारे बसे भव्य जिनालय में दशलक्षण पर्व धुमधाम के साथ मनाया गया। रोजाना अभिषेक व शान्तिधारा के बाद गाजेबाजे के साथ मीना व सुलोचना दीदी के सानिध्य में पुजा अर्चना होती थी। दोपहर में तत्वार्थसुत्र की कक्षा तथा सायं को महाआरती के पश्चात दीदी का प्रवचन व रोजाना धार्मिक सांस्कृतिक कार्यक्रम होता था, जिसमें वृद्धाश्रम जैसे नाटक व मोबाईल ईन्टरनेट के कुफल के बारे में दर्शाया गया, अनन्त चतुर्दसी को भगवान की पालकी के साथ भव्य जुलुस निकाला गया, तदपश्चात वासुपुज्य भगवान का निर्वाण लाडु चढ़ाया गया। धुलियान के दशलक्षण व्रतधारी श्रीमान प्रमोद काला, श्रीमान सुरेन्द्र सेठी, श्रीमती ममता सेठी, अंकित काला, सुश्री दिव्या रारा व करन रारा को पारणा के पहले सम्मानित किया गया।
क्षमावणी पर्व पर सभी ने एक दुसरे के घर जाकर क्षमा याचना की।

-संजय कु. बड़जात्या

बिहार के बिमल जैन व निर्मल जैन सम्मानित …..

पटना : समाज सेवा क्षेत्र में बिमल जैन (पटना) और संगीत के क्षेत्र में निर्मल जैन (मुंगेर) को २३ सितंबर को बिहार प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन, पटना में महामहिम राज्यपाल के कर कमलों से दोनों सगे भाईयों को समाज रत्न की उपाधि से अलंकृत किया गया जो सिर्फ उनके अपने लिए ही गौरव की बात नहीं वरन् जैन समाज के लिए भी सम्मान की बात है, जब एक तरफ तीर्थंकर श्री १००८भगवान् वासुपूज्य का निर्वाण का लड्डु चढ़ रहा था उसी सुन्दर बेला में दोनों को सम्मानित किया जा रहा था, सचमुच यह एहसास उनके परिवार के साथ समाज को भी गर्वित कर गया।

-संजय बड़जात्या जैन, धुलियान

श्री सकलभाव महादेव मंदिर प्राणप्रतिष्ठा

श्री सकलभाव महादेव मंदिर प्राणप्रतिष्ठा

संघवी ए३ पैराडाइज, आसनगांव (शाहपुर) में श्री सकलभव महादेव मंदिर प्राणप्रतिष्ठा महोत्सव धूमधाम से मनाया गया
Mandir Pranpratishta

संघवी ए३ ग्रुप द्वारा निर्माण किये गए पब्लिक रोड का उद्घाटन दही काला के शुभ अवसर पर संघवी ए३ पैराडाइज, आसनगांव (शाहपुर) में श्री सकलभव महादेव मंदिर प्राणप्रतिष्ठा महोत्सव मनाया गया, कार्यक्रम भव्य उत्सव के साथ श्लोकों और मंत्रों के उच्चारण के साथ पवित्र वातावरण में हर्षों उल्लास के साथ संपन्न हुआ। महोत्सव में आसनगांव तथा प्रोजेक्ट के रहिवासी, ए३ ग्रुप स्टाफ, ग्राम पंचायत और जिला परिषद से विशेष अतिथि उपस्थित थे, इसी अवसर पर संघवी ए३ ग्रुप द्वारा विकसित सड़क का उद्घाटन गणमान्य व्यक्तियों ने किया, ग्रुप द्वारा निर्माण किए गए इस १८ फ़ीट चौड़ा पब्लिक रोड की लम्बाई तुलसी विहार से संघवी पैराडाइज तक है, समारोह में मुख्य अतिथि प्रकाश पाटिल-ठाणे ग्रामीण शिवसेना अध्यक्ष, मंजूषा जाधव-जिला परिषद ठाणे के ग्रामीण अध्यक्ष तथा श्री पांडुरंग बरोरा – शाहपुर विधानसभा आमदार मौजूद थे।
संघवी ए३ ग्रुप के शैलेश संघवी ने इस अवसर पर कहा,‘मंदिरों के विकास की परंपरा और आध्यात्मिक सद्भाव को बढ़ावा देने की प्रथा को आगे बढ़ाते हुए, शिव मंदिर तथा सड़क का ख़ूबसूरत तोहफा हम आसनगांव के निवासियों को दे रहे है, मानस मंदिर, माहुली फोर्ट और तानसा झील जैसे टूरिस्ट जगह के करीब बसा संघवी पैराडाइस, मुंबई नाशिक हाईवे से १० मिनट तथा आसनगांव स्टेशन से केवल ५ मिनट के दूरी पर है, प्रोजेक्ट में रेडी १ और २ BHK अपार्टमेंट्स जिसमें गार्डन और टेरेस फ्लैटस भी मौजूद हैं, नैसर्गिक सुंदरता के अलावा प्रोजेक्ट में जिम, इंडोर गेम्स तथा शिवमंदिर है।

श्री संघवी सांकलचंदजी चुन्नीलालजी तातेड़ परिवार द्वारा
तीन सिद्धि तप एवं दो अट्ठाई तपस्वियों द्वारा सानंद पूर्णाहुति

संघवी परिवार को कल्पसूत्रजी, महावीर स्वामीजी के पालना का लाभ तथा कुमारपाल महाराजा द्वारा १०८ दीपक की महाआरती करने का लाभ श्री संघवी सांकलचंदजी चुन्नीलालजी तातेड़ परिवार की पुत्रवधु श्रीमती ममता शैलेश संघवी, पुत्रवधु श्रीमती पूनम पक्षाल संघवी तथा परिवार की सुपुत्री श्रीमती विमला संजयजी सेठ के पुत्र शिवांग के सिद्धि तप ,पुत्रवधु श्रीमती रिंकू राकेश संघवी एवं पौत्र ऋषभ रमेश संघवी के अट्ठाई तप की सानंद पूर्णाहुति एक भव्य सिद्धितप पारणा महोत्सव, भायखला के शेठ मोतिषा आदेश्वर दादा के दरबार में दादा आदिनाथ की कृपा एव प. पु. आ. देव श्री उदयप्रभसूरीश्वरजी म.सा. की पावन निश्रा तथा आशीर्वाद के साथ संपन्न हुई।
पर्युषण पर्व में सिद्धितप के महोत्सव में और भी कई कार्यक्रम आयोजित किये गए थे, संघवी परिवार को कल्पसूत्रजी, महावीर स्वामीजी के पालणा का लाभ तथा कुमारपाल महाराजा द्वारा १०८ दीपक की महाआरती करने का लाभ भी मिला, तपस्वीयों का बहुमान बड़े उत्साह से साथ किया गया, काफी हर्षोल्लास के साथ पर्युषण पर्व तथा सभी तप संपन्न हुए।

गौ-संवर्धन के लिए स्वतंत्र मंत्रालय बनेगा

गौ-संवर्धन के लिए स्वतंत्र मंत्रालय बनेगा

Cow Savardhan

खजुराहो: आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज की मौजूदगी में पहली बार विद्यासागर जीव दया सम्मान घोषित किए गए, कार्यक्रम में आचार्य श्री विद्यासागर दयोदय पशु सेवा केंद्र तेंदूखेड़ा (दमोह) को पहला स्थान मिला, इस दौरान मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि अब सरकार में गो संवर्धन के लिए अलग से मंत्रालय का गठन किया जाएगा, गायों के संवर्धन में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी, आचार्यश्री ने मुख्यमंत्री की ओर देखते हुए कहा- कि इन्हें हर पांच साल में परीक्षा देना होती है, इस परीक्षा में सफलता के लिए उनका आशीर्वाद मुख्यमंत्री के साथ है।
एक महीने पहले भी मुख्यमंत्री शिवराज चौहान खजुराहो जैन मंदिर समूह में आचार्य श्री के दर्शन के लिए पहुंचे थे तब उन्होंने कहा था- कि वे राज्य सरकार की ओर से शुरू होने वाले आचार्य विद्यासागर जीव दया सम्मान की पहली घोषणा आचार्यश्री की मौजूदगी में ही करना चाहते हैं, इसमें पहला पुरस्कार पशु सेवा केंद्र तेंदूखेला दमोह, दूसरा गौ-शाला एवं जैव कृषि अनुसंधान केन्द्र केदारपुर ग्वालियर को और तीसरा गौत्रास निवारणी गोपाल गौ शाला बड़नगर उज्जैन को दिया गया किया, सांत्वना सम्मान स्वरूप इस कार्य में संलग्न ७ अन्य संस्था और व्यक्तिगत स्तर पर सम्मानित किया गया।

नए समवसरण जिनालय की रखी आधारशिला
जैन मंदिर समूह के पास ही आचार्य श्री के ससंघ सानिध्य में समवशरण जिनालय की आधारशिला रखी गई, इस अवसर पर नए भव्य मंदिर का निर्माण करने वाली संस्था स्वर्णोदय तीर्थ न्यास खजुराहो के महामंत्री ने सभी का स्वागत किया, कार्यक्रम को वित्त मंत्री जयंत मलैया और सुधा मलैया ने भी संबोधित किया, संचालन नितिन नंदगावकर ने किया। कार्यक्रम में मप्र गौ-संवर्धन बोर्ड के अध्यक्ष स्वामी अखिलेश्वरानंद, प्रमुख सचिव संस्कृति मनोज श्रीवास्तव, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के डायरेक्टर राहुल जैन, संचालक पशुपालन डॉ. आरके रोकड, कलेक्टर रमेश भंडारी, एसपी विनीत खन्ना मौजूद थे।

कॉलेजों में शाकाहार भोजनालय स्थापित होंगे : शिवराज चौहान
मुख्यमंत्री ने कहा- वे कभी अहिंसा का मार्ग नहीं छोड़ेंगे, वे जब भी गुरूवर के चरणो मे आते हैं, सात्विक विचार आते हैं। विकास का मार्ग खुलता है, उन्होंने कहा- हर शिक्षण संस्थान जैसे इंजीनीयरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज और अन्य कॉलेजों में अलग से शाकाहर भोजनालय स्थापित होंगे।आचार्यश्री विद्यासागर महाराजा के सामने नत-मस्तक होकर आशीर्वाद लेते

बेंगलूरु में ३५०सिद्धितप के तपस्वियों का पारणा व सम्मान

शहर के श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर ट्रस्ट व संभवनाथ जैन मंदिर के तत्वावधान में आचार्य श्री जिनसुन्दरसूरीश्वरजी म.सा., पन्यास प्रवर श्री कल्परक्षित म. सा. आदि ठाणा साध्वीवृन्द की निश्रा में सामुहिक सिद्धितप सम्पन्न पारणा व सम्मान का कार्यक्रम त्रिपुरावासिनी पेलेस ग्राउन्ड में सम्पन्न हुआ। शोभायात्रा पेलेस क्षेत्र में घूमती हुई वापस सभागार में पहुंचकर धर्मसभा में परिवर्तित हुई।धर्मसभा में साधु-साध्वियों ने मंगलाचरण किया। संघ के बाबुलाल पारेख ने सबका स्वागत किया, सचिव प्रकाशचंद राठोड ने सिद्धितप की जानकारी दी।
आचार्य श्री मुक्तिसागरसूरीजी ने तपस्वियों की अनुमोदना करते हुए कहा कि तप से सब कुछ संभव है, तप करने से आत्मा पर लगे कर्मरज खत्म हो जाते हैं, आचार्य श्री ने ३१ दिसम्बर को होने वाले महाअभिषेक व शतावधान कार्यक्रम की जानकारी दी, आचार्य श्री जिनसुन्दरसूरीजी म.सा. ने कहा कि सिद्धितप एक महान तप है इसे करने से सारे कार्य सिद्ध हो जाते हैं। पन्यास प्रवर कल्परक्षित विजयजी म.सा. ने बताया कि मनुष्य साधन से नहीं साधना से बड़ा बनता है, इस मौके पर ३५० तपस्वियों का विशेष सम्मान किया गया। लाभार्थी परिवारों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन सुरेन्द्र गुरूजी ने किया। कार्यक्रम में नाकोडा तीर्थ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष रमेश मुथा जैन का सम्मान किया गया, इस अवसर पर कोषाध्यक्ष शांतिलाल नागौरी, सहसचिव गौतम सोलंकी, ट्रस्टी देवकुमार के. जैन जो खुद सिद्धितप के तपस्वी थे, तिलोक भंडारी, मदनलाल जैन, देशमल पटीयात, मदनलाल वेदमुथा सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे, भंवरलाल चौपडा चेयरमेन संभवनाथ मंदिर, संभवनाथ जैन सेवा मंडल, श्री लब्धिसूरी जैन संगीत मंडल, श्री आदिनाथ जैन सर्वोतम सेवा मंडल आदि ने कार्यक्रम की व्यवस्था संभाली।

– देवकुमार के. जैनबेंगलू

डिजिटल विद्या के द्वारा जैन धर्म की पढ़ाई

डिजिटल विद्या के द्वारा जैन धर्म की पढ़ाई

नांदगांव : भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा के अंतर्गत युवा महासभा के माध्यम से भारत के जैन इतिहास में पहली बार नांदगांव में बच्चों के लिये ‘डिजिटल पाठशाला’ का उद्घाटन किया गया।
भारतवर्षीय दिगम्बर युवा महासभा के कार्याध्यक्ष पारस लोहाडे (नासिक) और संयुक्त महामंत्री आनंद काला (नांदगांव) की नियुक्ति के बाद यह पहला कदम था, नांदगांव में छोटे बच्चों की पाठशाला को डिजिटल पाठशाला का स्वरुप दिया गया।
भाद्रपद के पहले ही दिन यानी ऋषिपंचमी को श्री. खं.दि.जैन मंदिर में डिजिटल पाठशाला का उदघाटन किया गया।
डिजिटल पाठशाला का उद्घाटन माननीय जयकुमार कासलीवाल, (वकील) एवम् खं.दि.जैन समाज के अध्यक्ष सुशिलकुमार कासलीवाल के कर कमलों द्वारा किया गया, उद्घाटन के दौरान नुतनकुमार कासलीवाल, दिलीप सेठी, रविद्र लोहाडे, फुलचंद लोहाडे, राजकुमार काला, मल्लीकुमार काला, कैलाश काला, पियुष काला, चंचल गंगवाल, राजेश बडजाते, आनंद काला, ललित काला, कैलाश सेठी एवम् सभी जैन समाज के मान्यवर उपस्थित थे।
नांदगांव में आनंद काला और ललित काला ने कहा कि आज का युग कमप्यूटर का युग है, सभी बच्चों को मोबाइल और कम्प्यूटर पर बताई जानकारी जल्दी से याद होती है, डिजिटल पाठशाला द्वारा बच्चों का बताया गया कि जैन समाज क्या है? तीर्थंकर क्या हैं, जम्बूद्वीप क्या है, भगवान कैसे थे? चमत्कार कैसे होते थे? पुज्य-पाप क्या है, चोरी, परिग्रह क्या है, यह सभी डिजिटल पाठशाला के माध्यम से बताया गया।

– एम.सी. जैन, पत्रकार

संयम स्वर्ण जयंती महोत्सव
पर शोभायात्रा का आयोजन

संत शिरोमणि परम् पुज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज संयम स्वर्ण जयंती महोत्सव समिति का आभार, जिन्होंने पुलक मंच परिवार इंदौर को भव्य शोभायात्रा का संयोजक बनाया एवम् सेवा का अवसर देकर अनुग्रहित किया।
उदासीन आश्रम से भव्य विशाल शोभायात्रा परम् पुज्य आर्यिका श्री आदर्शमति जी माताजी ससंघ के पावन सानिध्य में निकली, जो कि समवसरण मन्दिर कंचन बाग होती हुई रविन्द्र नाट्य ग्रह परिसर तक पहुंची, जहां पर विशाल धर्म सभा में परिवर्तित हो गई। रविन्द्र नाट्य ग्रह पूरा खचाखच भरा था, परिसर के बाहर भी सैकड़ों समाजजन उपस्थित थे। इंदौर के गुरु भक्त समाज ने फिर एक नया इतिहास रचा, हजारों समाजजनों ने उपस्थित होकर शोभायात्रा को भव्याति भव्य बनाया।
विभिन्न संघठनों, महिला मंडलों ने शानदार झाकियां निकालकर उत्कृष्ट गुरु भक्ति का परिचय दिया, आयोजक समिति के सचिन जैन (युवा उद्योग रत्न) एवम सुशील डबडेरा सहित सम्पूर्ण समिति को धन्यवाद दिया गया, सभा का शानदार संचालन डॉक्टर संजय जैन ने और श्रीमती अनामिका बाकलीवाल ने किया, इस अवसर पर पुलक चेतना मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रदीप बड़जात्या को आचार्य भगवन के चित्र के अनावरण का सौभाग्य प्राप्त हुआ, पुलक मंच परिवार की श्रीमती अनामिका बाकलीवाल, संगीतकार पंकज जैन की संगीतमय लहरियों से सभी भक्त झूम उठे।

जैन कान्फ्रेंस युवा शाखा द्वारा वैयावच्च सेवा पुरस्कार

राष्ट्रीय पुरस्कार

श्री पवनजी पितलिया जैन बेंगलोर (कर्नाटक)

प्रांतीय पुरस्कार :

१) श्री मनिषजी संचेती जैन रायपुर (छत्तीसगढ़)
२) श्री नरेन्द्रजी बाफना जैन इन्दोर (मध्यप्रदेश)
३) श्री श्रीकांतजी चंगेडिया जैन इचलकरंजी (महाराष्ट्र)
४) श्री नीतिनजी शिंगवी जैन अहमदनगर (महाराष्ट्र)
५) श्री जयंतीजी परमार जैन पनवेल (रायगढ़)
६) श्री राकेशजी दलाल जैन बेंगलोर (कर्नाटक)
७) श्री महेन्द्रजी चोपड़ा जैन चेन्नई (तमिलनाडु)
८) श्री अशोकजी जयचन्दा जैन, दिल्ली
९) श्री विवेकजी जैन रोहतक (हरियाणा)
१०) श्री राजेंद्रजी बोल्या जैन सूरत (गुजरात)
११) श्री राजेशजी कटारिया जैन सिकन्द्राबाद (आंध्र प्रदेश)
१२) श्री हरीशजी जैन कलकत्ता (पश्चिम बंगाल)

प्रोत्साहन पुरस्कार

१) श्री सिद्धार्थ कर्णावट जैन वडगांव शेरी – (मुम्बई-पुणे)
२) श्री आनंद सालेचा जैन निम्बाहेड़ा ( राजस्थान)
३) श्री अशोक बाफना जैन , चिंचवड़ (मुम्बई-पुणे)
४) श्री गौतम गूगले जैन पुणे ( मुम्बई-पुणे)

सभी साथियों का हार्दिक अभिनंदन।

-शशिकुमार (पिंटू) कर्णावट जैन
राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष, युवा शाखा
जैन काँन्फ्रेंस

श्रीफल भेट

श्रीफल भेट

दिगम्बर जैन समाज सामाजिक संसद इंदौर के नेतृत्व में मुनि प्रमाण सागरजी एवं विराट सागरजी को १३४१ श्रीफल भेट
Shrifal Bhet

इंदौर से १७ बसों एवं ६५ कारों का काफिला रतलाम में विराजमान शंका समाधान प्रणेता प.पु. मुनि १०८ प्रमाण सागरजी,विराट सागरजी को इंदौर पधारने का निवेदन करने विशेष धर्म सेवा दल पहुंचा, जिसमें नवनिर्वाचित अध्यक्ष नरेंद्र वैद, विमल सोगानी सहित ७३ प्रमुख पदाधिकारी की उपस्थिति में गुरुदेव को इंदौर पधारने का विनम्र निवेदन किया गया।

इस महोत्सव में प्रमुख रूप से प्रदीप बड़जात्या, सुरेंद्र बाकलीवाल, सौरभ पाटौदी, राहुल सेठी, डी. के. जैन, मुकेश टोंगिया, पिंकेश टोंगिया, शकुन्तला वैद, जेनेश झांझरी, सुदीप जैन, कमल रावका, महेंद्र निगोतिया आदि उपस्थित रहे, ऐसे महाकुम्भ के प्रमुख संयोजक मनोज अनामिका बाकलीवाल, राजीव जैन, मुकेश नीलम जैन, रमेश सुशीला सामरिया, नरेश अनीता सेठिया, निलय स्वेता जैन, राहुल सेठी, धर्मेंद्र संगीता गंगवाल, साधना दगड़े, प्रेम सामरिया सहित बसों के प्रमुख संयोजकों का सहयोग अविस्मरणीय रहा।
मंगलाचरण चिंतन बाकलीवाल एवं रतलाम की २२ बालिकाओं ने प्रस्तुत किया। साथ ही पूज्य मुनिराजों की १३४१ दीपकों से आरती सम्पन की गई।

महोत्सव का ससक्त संचालन अनामिका मनोज बाकलीवाल ने किया, आभार अशोक काला ने माना, साथ ही इंदौर से पधारे सभी सदस्यों का धन्यवाद मनोज बाकलीवाल ने सविनय अर्पित किया।

प्राचीन पुरातत्व तीर्थों की सुरक्षा आवश्यक- निर्मलकुमार सेठी जैन

प्राचीन पुरातत्व तीर्थों की सुरक्षा आवश्यक- निर्मलकुमार सेठी जैन

चिकलठाणा (महाराष्ट्र) : जैन धर्म अति प्राचीन धर्मों में से एक है तथा जैन धर्म केवल भारत में ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में जैन धर्म फैला हुआ था। अफगानिस्थान से लेकर इरान, इराक, इथोपिया, युरोप, अमेरिका आदि अनेक स्थानों पर जैन धर्म का अस्तित्व था।
पुरातत्व के धर्मो से, प्राचीन तीर्थं क्षेत्रों की ‘‘सुरक्षा’’ और संरक्षण होना आवश्यक है, ऐसे भावपूर्ण उद्गार भारतवर्षिय दिगम्बर जैन महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्मल कुमार सेठी ने औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में अध्यात्मयोगी राष्ट्रसंत आचार्य १०८ विशुद्ध सागरजी महाराज के सानिध्य में हिराचंद कासलीवाल प्रांगण में भारतवर्षिय दिगम्बर जैन महासभा अधिवेशन में बोल रहे थे। संयुक्त मंत्री प्रशांत टोंग्या, महाराष्ट्र अध्यक्ष सुमेरचंद काला, डि.बी. कासलीवाल डि.यु. ठोले, देवेंद्र काला, प्रकाश पाटणी व जैन गजट के राष्ट्रीय प्रतिनिधी एम.सी. जैन आदि उपस्थित थे। राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्मल कुमार सेठी ने कहा, ‘‘गिरनारजी भारतीय जैन समाज का सिद्ध क्षेत्र है, उस पर भी अन्य समाज कब्जा जमाया हुवा है, बहुत अड़चने होती हैं, इस पर ध्यान देना होगा, आचार्य विशुद्ध सागरजी ने कहा, ‘‘पुरातत्व की रक्षा होनी चाहिए और प्राचीन क्षेत्रों का अस्तित्व सुरक्षित के लिए समाज और युवकों को ध्यान रखना होगा।
‘‘राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्मल कुमार सेठी ने पत्रकार एम.सी. जैन के स्वास्थ्य के बारे में पुछा, हाल ही में पत्रकार एम.सी. जैन का एंजिओप्लास्ट’’ हुआ था, स्वास्थ्य की ओर पुरा ध्यान देने की बात सेठी जी ने कही। ललित पाटणी, रमेश बड़जाते, दिलीप कासलीवाल, अशोक गंगवाल, प्रकाश कासलीवाल, पं. शिवचरण लालजी, पं. कमलेश, पं. दिनेशजी आदि उपस्थित थे।

‘सेलो’ ग्रुप के चेयरमेन घीसूलाल बदामिया को दर्शन सागर अवार्ड

मुंबई: ‘सेलो’ ग्रुप के चेयरमेन घीसूलाल बदामिया, धुलेवा ग्रुप के मोहन जैन और प्रमुख निर्यातक जयेश जैन को इस साल का दर्शन सागर अवॉर्ड मिला है। राष्ट्रसंत आचार्य चन्द्रानन सागर सूरीश्वर महाराज के सान्निध्य में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव रघुवीर सिंह मीणा एवं राजस्थान कांग्रेस के महामंत्री नीरज डांगी के हाथों नाकोडा दर्शन धाम में सम्मानित किया गया।
दर्शन सागर अवॉर्ड समिति के प्रमुख प्रवीण शाह के अनुसार देश भर में शिक्षा, चिकित्सा, जीवदया और समाजसेवा के क्षेत्र में विशिष्ट कार्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर दिया जाने वाला यह प्रतिष्ठित सम्मान है। अवॉर्ड समिति के सदस्य मोती सेमलानी एवं निरंजन परिहार ने समारोह में मुख्य अतिथि रघुवीर सिंह मीणा एवं कांग्रेस महामंत्री नीरज डांगी का स्वागत किया। नाकोडा दर्शन धाम में आयोजित इस समारोह में ट्रस्ट मंडल के अध्यक्ष कांतिलाल शाह ने सभी का आभार जताया। आदिवासी महिलाओं को स्वावलंबी बनाने हेतु ट्रस्ट मंडल की ओर से सिलाई मशीनें वितरित की गर्इं।
नाकोडा दर्शन धाम में आयोजित इस समारोह में देश के कई राज्यों से आए करीब डेढ़ हजार दर्शन भक्तों की उपस्थिति में मेरे गुरूवर दर्शन सागर ग्रंथ एवं भक्ति संगीत की सीडी का विमोचन भी हुआ, अवॉर्ड समिति के प्रमुख प्रवीण शाह के मुताबिक समारोह में मीरा-भायंदर की पूर्व महापौर गीता जैन सहित उद्योग, व्यापार जगत के कई प्रमुख लोग उपस्थित थे। समारोह का संचालन ओजस्वी वक्ता ओम आचार्य ने किया एवं संगीतकार नरेंद्र वाणीगोता ने भक्ति रस से सराबोर संगीत का संयोजन किया। सागर समुदाय के गच्छाधिपति रहे आचार्य दर्शन सागर सूरीश्वरजी महाराज की पुण्यतिथि पर पिछले तेरह सालों से हर साल दिया जानेवाले राष्ट्रीय स्तर के अवॉर्ड समारोह का समापन राष्ट्रसंत आचार्य चन्द्रानन सागर सूरीश्वर महाराज के महामांगलिक प्रवचन से हुआ।

खजुराहो में आयोजित होगा सद्भावना सम्मेलन, १४ अक्टूबर को होगा आयोजन
जरूर देखें मार्गदर्शन करें

खजुराहो : संत शिरोमणि आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज के सानिध्य में हथकरघा के प्रचार-प्रसार के लिए पहली बार सम्मेलन का आयोजन हो रहा है, जिसका नाम ‘सद्भावना सम्मेलन’ दिया गया है।
१४ अक्टूबर को आयोजित होने वाले इस सम्मेलन की तैयारी जोरों पर है, इस आयोजन के लिए सम्पूर्ण विश्व से हज़ारों श्रद्धालुओं के शामिल होने का अनुमान जताया जा रहा है, कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण होगा प्रातःकालीन पूजा जिसमें सभी हथकरघा निर्मित वध्Eा पहनेंगे। दोपहर में राष्ट्रीय स्तरीय हथकरधा वेशभूषा प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें भारत के सभी राज्यों से प्रतिभागी भाग ले रहे हैं। आचार्य श्री के मंगल प्रवचन एवं केंद्रीय जेल सागर के कैदियों द्वारा भव्य नाटिका का भी मंचन होगा एवं प्रज्ञाचक्षु कलाकारों द्वारा भव्य भजन संध्या का भी आयोजन किया गया है, अधिक जानकारी के लिये संपर्क करें-

-रेखा जैन

भ्रमणध्वनि: ७०००७३९३५१, ९६५०७१२८८०

ध्रुव आर. जैन, आगरा (सद्भावना सम्मेलन की ओर से प्रतिनिधि)

चातुर्मास संदेश

चातुर्मास संदेश

Aacharya Shivmuni

प्रति वर्ष की भांति वर्षावास जारी है। भगवान महावीर से लेकर वर्तमान तक सभी साधु-साध्वी वृन्द चातुर्मास में चार माह एक स्थान पर रहकर आराधना में रत रहते हैं। विहरमान अरिहंत परमात्मा भी चार माह के चातुर्मास करते हैं, इस काल में एक स्थान पर रहकर त्रिगुप्ति की विशेष आराधना की जाती है। आवश्यक प्रवृति समितिपूर्वक करें क्योंकि इस काल में वातावरण के अन्तर्गत अत्याधिक त्रास व स्थावर जीवों की उत्पत्ति हो जाती है, उनकी रक्षा व आत्म-साधना का अवसर है चातुर्मास, देश भर में सभी साधु-साध्वियों के आध्यात्मिक चातुर्मास पर हार्दिक मंगलभावना यह है कि आप सभी का यह चातुर्मास वीतराग-धर्म को फैलाने में सार्थक हो, हर तरफ आनंद, शांति, सुख, समृद्धि का वातावरण बनें, पूरे विश्व में भगवान महावीर की वीतरागता का प्रचार हो।

चतुवर्ध संघ इस वर्ष को अपरिग्रह वर्ष के रूप में मना रहा है, श्रावक वर्ग व्यक्ति, वस्तु एवं स्थान से ममत्व छोड़ने हेतु पुराना जो भी परिग्रह है, उसमें से यथाशक्ति सहधर्मी बन्धुओं के सहयोग, शिक्षा, सेवा हेतु अपने धन का उपयोग करें, आवश्यकता से ज्यादा संग्रह न करें, जो है उसके प्रति तथा शरीर के प्रति ममत्व का त्याग करते हुए भेद-ज्ञान की साधना में आत्मा को महत्व दें। चतुवर्ध संघ के लिए निर्देश है कि सभी अधिकांश समय साधना को दें। भगवान ने स्वयं साढ़े बारह वर्ष मौन-ध्यान साधना में व्यतीत किये तथा भगवान महावीर के दस श्रावकों ने भी साधना को प्रमुखता दी। आत्मा के ऊपर अनन्त कर्म का परिग्रह लगा है, उसकी सफाई करनी है। प्रत्येक साधक कत्र्ताभाव का त्याग करे, इस चातुर्मास में हम आत्मदृष्टि को प्राप्त करते हुए अपना मोक्ष मार्ग प्रशस्त करें। आप सबका चातुर्मास आध्यात्मिक हो, मंगलमय हो, सभी कर्म-निर्जरा करते हुए सिद्धालय की ओर बढ़ें, यही हार्दिक मंगल कामना है!
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में चातुर्मास एक सामाजिक रूप लेता जा रहा है, इस काल में साधु-साध्वियों के दर्शनार्थ पूरे देश में हजारों की संख्या में धार्मिक बंधु यात्रा करने लग गये हैं, हर चातुर्मास स्थल एक तीर्थ क्षेत्र बन जाता है। स्थानीय समाज सहधर्मी बंधुओं की सेवा में उत्कृष्ट भावनाओं से सेवारत रहता है और आतिथ्य सेवा कर प्रमोद भावना से भावित होता है, यह समाज में सेवा, भावना का उत्कृष्ट उदाहरण है किन्तु इसमें कई जगहों पर विकृतियां भी आती जा रही हैं, एक संघ दूसरे संघ से अपना नाम बड़ा करने में अपने क्षेत्र में कुछ विशेष करना चाहता है, इस प्रतिस्पर्धा में समाज में फिजूलखर्ची बढ़ती जा रही है, सात्विक भोजन, राजसी भोजन का रूप लेता जा रहा है, शिकायत भाव भी बढ़ता जा रहा है, तीर्थयात्री विशेष अतिथि की तरह विशेष सुविधाओं की मांग करने लगे हैं, भोजन करने एवं संघ की अतिथि सेवा के बदले दान की वृत्ति लुप्त होती जा रही है, ऐसे समय में समाज अपनी प्रवृत्ति पर ध्यान दे।

चातुर्मास के लिए विशेष संदेश –
प्रत्येक साधक आत्मार्थ को मुख्यता दे, आत्र्त व रौद्र ध्यान को त्यागें अर्थात् अहंकार वाले ‘मैं’ को अज्ञानवश मानते हुए ‘मेरे’ का ध्यान छोड़कर, ‘स्व’ स्वरूप का ध्यान कर आनंद, शान्ति, ज्ञान की आराधना करें, अन्तत: सभी नकारात्मक व सकारात्मक भावों का निपटारा कर शुक्ल ध्यान की ओर बढ़ें, आने वाले आश्रवों को रोकने के लिए संवर अर्थात् जिनशासन की मर्यादाओं का उत्कृष्ट भावना से पालन कर बाह्य व आभ्यांतर तप की साधना के द्वारा मुक्ति की ओर अग्रसर हों। ज्ञाता-दृष्टा भाव में रहकर होषपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए भगवान महावीर की वीतरागता को जीवन में लाकर, अपने जीवन को आनन्दित करें।

– आचार्य श्री शिवमुनि

आचार्य अनेकांत सागर जी महाराज ससंघ की शोभा यात्रा

आचार्य अनेकांत सागर जी महाराज ससंघ की शोभा यात्रा

Aacharya Anekant

इंदौर के धर्म प्रेमी समाज ने शानदार गुरु भक्ति का परिचय दिया। समाज जनों के अविस्मरणीय सहयोग से पुलक मंच परिवार ने एक नया इतिहास रचा। चारित्र चक्रवर्ती परम् पुज्य आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण परम्परा के सप्तम पट्टाचार्य परम् पुज्य आचार्य श्री अनेकान्त सागर जी महाराज ससंघ, तीन मुनिराज, पांच माताजी, एक क्षुल्लक जी आदि ९ पिच्छी धारी साधु-संतों का माँ अहिल्या की नगरी इंदौर शहर में अखिल भारतीय पुलक जन चेतना मंच एवम राष्ट्रीय जैन महिला जागृति मंच, इंदौर के तत्वावधान एवम आचार्य ससंघ के पावन सानिध्य में माणक चोक मन्दिर राजवाड़ा से भव्य विशाल शोभा यात्रा निकली जो कि खजूरी बाजार, गोराकुण्ड, मल्हारगंज, मोदी जी की नसिया, बड़े गणपति होती हुई नरसिंह वाटिका परिसर, रामचन्द्र नगर एरोड्रम रोड पर पहुंच कर विशाल धर्म सभा में परिवर्तित शोभा यात्रा की लंबाई इतनी बड़ी थी कि एक सिरा राजवाड़ा तो दूसरा सिरा गोराकुण्ड से आगे तक पहुंच गया, समाजजनों में बहुत ही गजब का उत्साह था।
जुलुस मार्ग में सैकड़ों जगह आचार्य श्री का पाद पक्षालन एवम आरती कर समाजजन गदगद हुए। शोभा यात्रा में इंदौर से बाहर खण्डवा पुणे सहित राजस्थान एवम महाराष्ट्र के अनेक शहरों के गुरु भक्त उपस्थित हुए। शोभा यात्रा में पुलक मंच परिवार ने मंच की गौरवशाली ड्रेस कोड में उपस्थित होकर मंच की एकता एवम् समर्पण का परिचय दिया। इंदौर महिला मंच परिवार ने बहुत ही शानदार उपस्थिति दर्ज करवाकर मंच का नाम गौरान्वित किया, महिला संघटन सोशल गु्रप एवम मन्दिर क्षेत्रों के सदस्यों ने बहुत ही शानदार प्रस्तुति देकर गुरु भक्ति का परिचय दिया। बालिका मंचों की प्रस्तुति एवम अन्य कई आकर्षणों को देखकर समाजजन चकित रह गए। क्षेत्रीय विधायक सुदर्शन गुप्ता, विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष हुकम चन्द सावला सहित इंदौर समाज के लगभग सभी समाज श्रेष्ठियों ने आचार्य संघ की भव्य आगवानी की। बैंड-बाजे, घोड़े डी जे सेट से सजी इस शोभा यात्रा में हजारों समाजजनों ने उपस्थित होकर शानदार गुरु भक्ति का परिचय दिया।

हम नहीं दिगम्बर, श्वेताम्बर, स्थानकवासी, तेरह पंथी
हम एक पंथ के अनुयायी एक देव के विश्वासी

श्री जैन श्वेताम्बर खतरगच्छ श्री संघ के तत्वाधान में महावीर बाग एरोड्रम रोड इंदौर परिसर में शहर में विराजित समग्र जैन समाज के सन्तों के पावन सानिध्य में स्वाधीनता, दिवस पर बहुत ही भव्यता के साथ मनाया गया, इस अवसर पर दिगम्बर जैन आचार्य श्री अनेकांत सागर जी महामुनिराज ससंघ एवम श्वेताम्बर जैन आचार्य श्री जिनमणिप्रभ सुरि जी, श्री गौतम मुनि जी, श्री शांतिमुनि जी, मुनि श्री मुक्ति सागर जी एवम साध्वी मयणा श्रीजी सहित अनेक पुज्य साधु-साध्वी उपस्थित थे, इस अवसर पर श्वेताम्बर जैन समाज एवम संस्थायें, दिगम्बर जैन समाज, दिगम्बर जैन सामाजिक संसद अध्यक्ष नरेन्द्र वेद, पुलक मंच परिवार, महासमिति के पदाधिकारियों सदस्यों सहित हजारों समाजजनों ने उपस्थित होकर कार्यक्रम का गौरव बढ़ाया, इस ऐतिहासिक कार्यक्रम के आयोजक समिति के ललित जैन एवम् प्रदीप चौधरी सहित पूरी समिति को बहुत-बहुत बधाई।

जैन श्रावकाचार की सामाजिक प्रासंगिकता

जैन श्रावकाचार की सामाजिक प्रासंगिकता

भगवान महावीर के आचार दर्शन का आधार समता है, आयारों में कहा गया-‘समियाए धम्मे’, अर्थात् समता से भिन्न धर्म नहीं हो सकता, जो समतावान् होता है वह पापकारी प्रवृत्ति नहीं कर सकता, वास्तव में रागद्वेष रहित कर्म ही आचार है, जिस व्यक्ति के व्यवहार में रागद्वेष की जितनी प्रबलता होगी उसका आचार एवं व्यवहार उतना ही अधिक दूषित होगा, इसलिए आचार की उच्चता के लिए समत्व में प्रतिष्ठित होना आवश्यक है।
समता दो प्रकार की है-स्वनिश्रित और परनिश्रित, राग और द्वेष के उपशमन के द्वारा अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में संतुलित अनुभूति करना स्वानिश्रित समता है, सब प्राणी सुख के इच्छुक और दु:ख के विरोधी हैं, इसलिए कोई भी वध योग्य नहीं है, यह आत्मतुला पर निश्रित समता है, स्वनिश्रित समता की सिद्धि के लिए भगवान ने कषाय के उपशमन का उपदेश दिया पर-निश्रित समता की सिद्धि के लिए प्राणातिपात आदि पापों से विरत होने का उपदेश दिया। स्वाश्रित समता आत्मशुद्धिपरक है एवं पराश्रित समता जीवनशुद्धि एवं सामाजिक व्यवहार पर आश्रित है। जैन आचार का यह वैशिष्ट्य है कि यह निश्चय और व्यवहार में संतुलन बनाए हुए है, फलस्वरूप आत्माराधना समाज के विकास में सहयोगी बन जाती है।

जैन आचार का आधार रत्नत्रय : जैन आचार की पूर्व भूमिका है-ज्ञान। ज्ञानशून्य आचार को वहां कोई महत्त्व प्राप्त नहीं हैं। अहिंसा की अनुपालना ज्ञानपूर्वक ही संभव है। दशवैकालिक सूत्र में ठीक ही कहा गया कि जो जीव को नहीं जानता, अजीव को नहीं जानता, वह संयम को कैसे जानेगा? अर्थात् अज्ञानी के लिए संयम का आचरण असंभव है, पहले यह जान लेना आवश्यक है कि जीव क्या है, अजीव क्या है? यह जानने के बाद ही अहिंसा की अनुपालना सरलता से हो सकती है। आचार्य उमास्वाति ने ठीक ही कहा कि ‘सम्यगदर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्ग:’ अर्थात् सम्यक दृष्टिकोण, सम्यक ज्ञान एवं सम्यक चारित्र तीनों का समन्वित रूप ही मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करता है। जैन आचार की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि इसके संपूर्ण सिद्धान्त अनेकांत पर आश्रित है, केवल ज्ञान अथवा केवल दर्शन अथवा केवल चारित्र-एकांकी मार्ग से मोक्ष की प्राप्ति असंभव है। ज्ञानक्रियाभ्यां मोक्ष: अर्थात् ज्ञान एवं क्रिया का समन्वयक ही परम लक्ष्य को प्राप्त करा सकता है। भक्तिमार्ग, ज्ञानमार्ग एवं आचारमार्ग की एकांकी प्ररूपणा से हटकर जैनदर्शन त्रिवेणी संगम को आचार की पराकाष्ठा स्वीकार करता है।
ज्ञान का फल है-अहिंसक आचरण, वही ज्ञान सम्यक होता है, जिसकी पूर्णता अहिंसा में हो, जिस ज्ञान से हिंसा की उत्प्रेरणा मिलती हो, हिंसा की साधन सामग्री विकसित होती हो, वह ज्ञान नहीं, ज्ञानाभास है। संसार परिभ्रमण का हेतु है। वास्तविक ज्ञानी तो वही है जो समता एवं अहिंसा की अनुपालना करता है। सूत्रकृतांग में कहा है-ज्ञानी होने का यही सार है कि वह किसी की हिंसा नहीं करता। समता अहिंसा है, इतना ही उसे जानना है, अत: स्पष्ट हो गया कि अहिंसा ही परम आचार है जिस पर जैन दर्शन के संपूर्ण सिद्धान्त टिके हुए हैं और यह अहिंसा समता के आधार पर विकसित होती है, जैसे मुझे दु:ख अप्रिय है वैसे ही सब जीवों को दु:ख अप्रिय है, इस समता का अनुभव जितना विकसित होता है उतनी ही अहिंसा विकसित होती है और समाज में यदि इस आत्मौपम्य की चेतना जागृत हो जाए तो वर्तमान में व्याप्त आतंकवाद, बलात्कार, भ्रष्टाचार, अमानवीय व्यवहार को स्वयं विराम मिल जाएगा।
भगवान महावीर ने आचार के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी चिन्तन प्रस्तुत किया, उन्होंने यह स्पष्ट कहा कि गृहस्थ समाज में रहता हुआ, संपूर्ण अहिंसा व्रत का पालन नहीं कर सकता, अत: उन्होंने दो प्रकार के आचार की परूपणा की ‘श्रमणाचार एवं श्रावकाचार’ श्रमण के लिए पांच महाव्रतों का देशकाल निरपेक्ष होकर त्रिकाल में पालन अनिवार्य है जबकि श्रावक के लिए १२ अणुव्रतों का देशकाल एवं क्षमता सापेक्ष पालन करने का प्रावधान है।

बारह अणुव्रतों की सामाजिक प्रासंगिकता : जैन आगमों में हर गृहस्थ के लिए पांच अणुव्रत एवं सात शिक्षाव्रत का प्रावधान कर भगवान महावीर ने स्वस्थ, शान्त, समृद्ध एवं अहिंसक समाज संरचना का सूत्र हाथों में थमा दिया। पांच अणुव्रत, जो जैन आचार्यों द्वारा प्रतिपादित है-अहिंसा, सत्य, अचौर्य, स्वदार संतोष एवं इच्छा परिमाण-ये पांचों व्रत न केवल आत्मकल्याण के लिए उपयोगी हैं अपितु समाज, राष्ट्र और विश्व के कल्याण के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है, अब क्रमश: प्रत्येक अणुव्रत की वर्तमान समस्याओं के संदर्भ में सामाजिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला जाएगा।

१. अहिंसा अणुव्रत:- अहिंसक समाज की संरचना के प्रथम सोपान पर अहिंसा की न्यूनतम मर्यादा का पालन करने वाला व्यक्ति कम से कम चलने-फिरने वाले स्थूल जीवों की हिंसा नहीं करेगा, निरपराधी को समाप्त करने का प्रयास नहीं करेगा और बिना प्रयोजन किसी को संकल्प पूर्वक नहीं मारेगा। भगवान महावीर ने गृहस्थ के लिए आरंभजा हिंसा एवं विरोधजा हिंसा का परिहार नहीं किया, अपितु संकल्पजा हिंसा का निषेध किया है, उनका यह स्पष्ट चिन्तन था कि महारंभी जीवन शैली स्वस्थ समाज के लिए काम्य नहीं हो सकती। अनारंभी जीवन शैली सामाजिक प्राणी के लिए संभव नहीं हो सकती। बीच का रास्ता है-अल्पारंभ का। अल्पारंभ का अर्थ है- हिंसा का अल्पीकरण, इस छोटे से व्रत को व्यापक रूप में अपना लिया जाए तो वर्तमान विश्व की ज्वलन्त समस्या, आतंकवाद के समाधान की दिशा प्रशस्त हो सकती है, उसकी जड़ें उखड़ सकती हैं।
भगवान महावीर का युग कृषि प्रधान युग था, उस समय खेती मुख्यत: पशुओं पर आधारित थी, एक दृष्टि से खेती और पशु अभिन्न से हो गए थे। पशुओं के प्रति किसी प्रकार का क्रूर व्यवहार न हो, इस बिन्दु पर भगवान ने बल दिया। स्थूल प्राणातिपात विरमण व्रत के पांच अतिचार महावीर युग में पशुहिंसा के पांच रूप में अधिक प्रचलित थे, वे इस प्रकार है-

  • वध – निर्दयता से मार-पीट करना।
  • बंधन – गाढ़ बन्धन से बांधना।
  • अंग – भंग-चमड़ी उतारना और नाक-कान आदि अवयव काटना।
  • अतिभार – बहुत अधिक भार लादना।
  • वृत्ति-विच्छेद – अपने आश्रित प्राणी के खान-पान या आजीविका में कटौती करना।

आजकल कृषि की स्थिति बदल चुकी है फिर भी पशुओं के प्रति क्रूर व्यवहार छूट नहीं पाया है, पशु पर अतिभार लादने की बात आज भी चलती है। क्रूरता के अन्य कारणों में मनोरंजन, प्रसाधन सामग्री एवं चिकित्सा को लिया जा सकता है। सांडों की लड़ाई, मुर्गो की लड़ाई इत्यादि रईस लोगों की शौकीया वृत्ति की परिणितियां है। प्रसाधन सामग्री का निर्माण करने के लिए थोड़े से लोगों की विलासी मनोवृत्ति के लिए छोटे-बड़े निरीह प्राणियों को जिस क्रूरता से मारा जाता है वह निश्चित ही मानव सभ्यता के लिए एक महाकलंक है, चिकित्सा के क्षेत्र में ई-शोध भी एक ऐसा ही नशा है, उस निमित्त से आज तक एक-एक वैज्ञानिक हजारों-हजारों मेंढ़क, चूहों और बन्दरों को बलि का बकरा बना देता है जो सर्वथा अवांछनीय एवं त्याज्य है।
अहिंसा के लिए आवश्यक है- संवेदनशीलता, दूसरों को कष्ट देते समय यह अनुभूति हो जाए कि यह कष्ट मैं दूसरों को नहीं स्वयं को दे रहा हूं, जिस समाज में संवेदनशीलता नहीं है, वह समाज अपराधियों, हत्यारों या क्रूरता के खेल-खेलने वालों का समाज बन जाता है। अणुव्रती समाज में संवेदनशीलता का विकास होता है जिसके कारण क्रूरता जनित समस्याओं से निजात मिल सकता है। अहिंसा अणुव्रत पालन करने का सबसे पहला परिणाम होता है-पर्यावरण के प्रदूषण की समाप्ति। आज पर्यावरण का प्रदूषण बढ़ा है, उसमें अनावश्यक हिंसा का बहुत बड़ा हाथ है, कितना पानी का अपव्यय, कितने जंगलों की कटाई, कितने पशु-पक्षियों का निर्ममता से शिकार करने से अनेकों प्रजातियों का नष्ट होना, अनावश्यक भूमि का खनन एवं दोहन-यह सब अपने स्वार्थ के लिए इतनी मात्रा में हो रहा है कि वातावरण तेजी से प्रदूषित होता जा रहा है। पृथ्वी पर मानव अस्तित्व की सुरक्षा एवं शांति, अहिंसा अणुव्रत के सम्यक पालन से ही संभव है। अहिंसा अणुव्रती कभी भी आत्महत्या, भ्रूणहत्या, परहत्या नहीं करेगा, आत्मपीड़न, पर-पीड़न नहीं देगा। मन, वचन एवं काया से हिंसात्मक प्रवृत्तियों से बचेगा, जिससे समाज में शांति, समरसता, संवेदनशीलता एवं आपसी सौहार्द का विकास होगा।

२. सत्य अणुव्रत : एक श्रावक अहिंसा अणुव्रत का पालन करता है तो उसे सत्यनिष्ठ बनना होगा, मृषावाद का वर्जन करना होगा। मृषा (झूठ) संभाषण के मुख्यत: चार कारण माने गए हैं-क्रोध, लोभ, भय और हास्य, इन कारणों की तीव्रता को नियन्त्रित करने से सहज रूप से सत्य की साधना हो सकती है। सत्य अणुव्रत का पालन करने वाला श्रावक पुष्ट आधार के बिना किसी पर दोष का आरोपण नहीं करता, किसी के लिए अहितकारक असत्य नहीं बोलता, किसी के गोपनीय रहस्य का उद्घाटन नहीं करता, किसी को गलत पथदर्शन नहीं देता और झूठी साक्षी नहीं देता व झूठा हस्ताक्षर भी नहीं लिखता, इनमें से एक भी आचरण करने वाला न केवल व्रत भंग का अपितु सरकार की कानून के तहत् भी अपराधी होता है एवं विविध प्रकार के दण्ड का भागी बनता है, पर सत्य अणुव्रत का पालक न केवल अपराध मुक्त समाज के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, अपितु समाज में विश्वास का पात्र बनता है और विश्वास सत्य के बिना नहीं होता, समाज के सारे व्यवहार का आधार सत्य है, उसके बिना एक दिन भी लेन-देन का बाजार नहीं चल सकता। आर्थिक व्यापार एवं आर्थिक बाजार का विकास सत्य पर ही टिका हुआ है।

३. अचौर्य अणुव्रत : श्रावकाचार में अचौर्य अणुव्रत की महत्ती उपयोगिता है, इस व्रत के अनुसार चोरवृत्ति से किसी दूसरे की वस्तु उठाने से अचौर्य अणुव्रत भंग होता है, किन्तु गहराई से विचार करने पर ज्ञात होता है कि अनैतिकता या अप्रामाणिकता की वृत्ति ही चोरी है, जब तक मनुष्य में नैतिकता की चेतना जाग्रत नहीं होती, वह आर्थिक अपराधों से नहीं बच सकता, नैतिकता का विकास तभी संभव है जब कोई भी मनुष्य दूसरे के प्रति क्रूरतापूर्ण व्यवहार न करे। क्रूरतापूर्ण व्यवहार दो तरह से हो सकता है-शरीर के संदर्भ में और आर्थिक संदर्भ में, शारीरिक स्तर पर की जाने वाली क्रूरता का समावेश हिंसा में होता है। आर्थिक मामले में बरती जाने वाली क्रूरता जैसे बच्चों की खाद्य-पेय सामग्री में मिलावट, दवाओं में मिलावट, सामान्य खाद्य-पेय पदार्थों में मिलावट करना, भ्रष्टाचार करना, झूठा माप-तोल कर ग्राहकों को धोखा देना, टेक्स की चोरी करना, राज्य निषिद्ध वस्तुओं का आयात-निर्यात करना इत्यादि चोरी से बचने की मनोवृति का सम्बन्ध अचौर्य अणुव्रत के साथ ही है, इस प्रकार अचौर्य अणुव्रती नैतिक मूल्यों के विकास में एवं भ्रष्टाचार-क्रूरता मुक्त समाज निर्माण में आदर्श नागरिक की भूमिका अदा कर सकता है।

४. स्वदार संतोष व्रत : गृहस्थ के साधनाक्रम में ‘‘स्वदार सन्तोष’’ (अपनी पत्नी से संतोष करना) का प्रयोग बहुत महत्त्वपूर्ण है, इस प्रयोग से उन्मुक्त वासना सिमटकर एक बिन्दु पर केन्द्रित हो जाती है, विवाह संस्था के दृढ़ीकरण में ‘स्वदार संतोष’ व्रत की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है, जिस समाज या पाश्चात्य संस्कृति में इस प्रकार के व्रत का मूल्य नहीं है, वहां विग्रह के बाद भी उच्छृंखल यौनाचार चलता है। विवाह पूर्व और विवाहेत्तर यौन सम्बन्धों के कारण, वेश्या गमन एवं परस्त्री गमन के कारण पति-पत्नी में आपसी कलह की स्थिति पैदा होती है और परिवार टूट जाते हैं, इस दृष्टि से स्वदार संतोषव्रत को पारिवारिक जीवन का आधार माना जा सकता है। पाश्चात्य अपसंस्कृति के प्रभाव में आकर पूर्वी राष्ट्र भी अपने उन्मुक्त भोग से उत्पन्न होने वाली समस्याएं जैसे पारिवारिक विघटन, तलाक, यौन-शोषण, बलात्कार, क्रूरतापूर्ण कर्म, यौन व्यापार आदि में लिप्त पाए जा रहे हैं। एड्स जैसी जानलेवा बीमारी का मुख्य कारण इसी को माना जाता है, अत: स्वदार संतोष व्रत न केवल यौन उच्छृंखलता पर नियंत्रण कायम कर सकता है अपितु समाज में शांतिपूर्ण सहवास के वातावरण का निर्माण कर सकता है।

५. अपरिग्रह अणुव्रत : आर्थिक आपाधापी के इस युग में आत्मविस्मृति अपने अति के बिन्दु तक पहुंच गई है, आज सारा समाज परिग्रह की आसक्ति के दुष्परिणाम भुगत रहा है। चारों ओर स्वार्थ की दौड़-भाग मची हुई है, सभी स्वकेन्द्रित चिन्तन कर रहे हैं-मैं सुखी रहूं, मेरा परिवार सुखी रहे-इस आकांक्षा को साकार रूप देने के लिए धनार्जन की अंधी दौड़ में भागता जा रहा है। धनार्जन जो जीवन जीने के लिए उपयोगी साधन था, आज उसने साध्य का स्थान बना लिया है, सारी समस्याओं की जड़ है-धन को केन्द्र में रखकर कार्य करना, फलत: समाज में संग्रह वृत्ति बढ़ रही है। संग्रह वृत्ति के कारण आसक्ति अथवा तृष्णा बढ़ रही हैं, जिसके फलस्वरूप समाज में अपहरण, शोषण, अनियन्त्रित भोग एवं आर्थिक वैषम्य बढ़ रहा है। भगवान ने इन सबकी समाप्ति के लिए मानव जाति को इच्छापरिमाण एवं अपरिग्रह का सन्देश दिया है।
सामाजिक जीवन में जो भी विषमता और संघर्ष वर्तमान में हैं, उन सबके पीछे कहीं न कहीं अनियन्त्रित आवेश, अहंकार, छल-छद्म (कपट-वृत्ति) तथा संग्रह-वृत्ति है, इन्हीं अनियन्त्रित कषायों के कारण सामाजिक जीवन में विषमता और अशान्ति उत्पन्न होती है, आवेश या अनियन्त्रित क्रोध के कारण पारस्परिक संघर्ष, आक्रमण, युद्ध एवं हत्याएं होती हैं, आवेशपूर्ण व्यवहार दूसरों के मन में अविश्वास उत्पन्न करता है और फलत: सामान्य जीवन में जो सौहार्द होना चाहिए, वह भंग हो जाता है। वर्ग या अहंकार की मनोवृत्ति के कारण ऊंच-नीच का भेद-भाव, पारस्परिक-घृणा और विद्वेष पनपते हैं। सामाजिक जीवन में जो दरारें उत्पन्न होती हैं, उनका आधार अहंकार भी होता है। माया या कपट की मनोवृत्ति भी जीवन को छल-छद्म से युक्त बनाती है, इससे जीवन में दोहरापन आता है तथा अन्त: बाह्य की एकरूपता समाप्त हो जाती है, फलत: मानसिक एवं सामाजिक शांति भंग होती है। संग्रह की मनोवृत्ति के कारण शोषण और व्यावसायिक जीवन में अप्रमाणिकता फलित होती है।
महावीर भगवान ने बताया कि ‘‘इच्छा हु आगास समा अणंतिया“ अर्थात् इच्छा आकाश के समान अनन्त है। मनुष्य अपनी संग्रह वृत्ति को इच्छा परिमाणव्रत द्वारा या परिग्रह-परिमाण व्रत के द्वारा नियन्त्रित करे। महावीर ने कभी नहीं कहा कि एक गृहस्थ के लिए अपरिग्रही होना आवश्यक है, उन्होंने परिग्रह की कोई निश्चित सीमा-रेखा नियत नहीं की अपितु उसे व्यक्ति के स्वविवेक पर छोड़ दिया, इसका जीवन्त उदाहरण है-उपासकदशा में वर्णित आनन्द आदि दसों श्रावकों का जीवन, जिन्होंने समृद्ध होने पर भी स्व विवेक से किस प्रकार जमीन-जायदाद, बहुमूल्य वस्तुएं, धन-धान्य, पशु एवं अन्य छोटी से छोटी वस्तुओं की सीमा रेखा निर्धारित की एवं स्वेच्छा से संयम किया, अत: आचार्य तुलसी के अनुसार गृहस्थ के संदर्भ में अपरिग्रह के तीन सूत्र बनते हैं-
१. अर्जन में नैतिकता-अशुद्ध साधन का उपयोग नहीं करना
२. अर्जन की सीमा-अमुक स्थिति तक पहुंचने के बाद व्यवसाय से मुक्त होना
३. अर्जित सम्पत्ति के व्यक्तिगत भोग का संयम करना
इस प्रकार हर गृहस्थ परिग्रह परिमाण व्रत द्वारा न केवल अर्थ के अर्जन एवं भोग का संयम करता है अपितु अर्थ की आसक्ति एवं अहं से भी बचाता है, जिसके परिणाम स्वरूप परिवार-समाज में दहेज को लेकर होने वाली हत्याएं एवं विविध प्रकार के तनाव को विराम मिल सकता है। शोषण, अपराध चेतना, अपहरण, क्रूरतापूर्ण व्यवहार, अमानवीय व्यवहार, आर्थिक वैषम्य से उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रियात्मक हिंसा, प्रदर्शन की वृत्ति इत्यादि आज सामान्य जनता में प्रतिशोध की भावना उत्पन्न करती है, इन सारी समस्याओं का समाधान इच्छापरिमाण व्रत से स्वत: हो जायेगा एवं शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व सम्पन्न समाज का सपना साकार हो सकेगा, इस प्रकार हम कह सकते हैं कि श्रावक-जीवन में इच्छा परिमाण एवं कषाय-चतुष्टय पर जो नियन्त्रण लगाने की बात कही गई है, वह सौहार्द एवं सामंजस्यपूर्ण जीवन एवं मानसिक तथा सामाजिक शान्ति के लिये आवश्यक है, उसकी प्रासंगिकता कभी भी नकारी नहीं जा सकती।
तीन गुणव्रत : पांच अणुव्रत के बाद श्रावक के लिए तीन गुणुव्रत बतलाए गए हैं।
१. दिग् व्रत- गमनागमन के लिए क्षेत्र का सीमाकरण
२. भोगोपभोग – खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने आदि के काम आने वाली वस्तुओं का संयम
३. अनर्थदण्डव्रत- बिना प्रयोजन हिंसा से बचना एवं अनावश्यक हिंसा का परित्याग करना
आचार्य तुलसी के शब्दों में जैसे तम्बू तानने के लिए जमीन में कुछ खूंटिया गाड़नी पड़ती हैं, खूंटियों के आलम्बन बिना तम्बू टिक नहीं सकता, उसी प्रकार इच्छापरिमाण एक तम्बू है, उसे टिकाने के लिए तीन खूंटियों की अनिवार्यता है, इस प्रकार इन तीन व्रतों या नियमों को स्वीकार किए बिना इच्छाओं को सीमित करने का संकल्प फलित नहीं हो सकता।

६. दिग्व्रत- साम्राज्यवादी मनोवृत्ति के दो रूप हैं-क्षेत्र-विस्तार और व्यापार विस्तार। प्राचीन काल में क्षेत्रीय उपनिवेशवाद का प्रचलन था, आज उसका स्थान व्यावसायिक उपनिवेशवाद ने ले लिया है। वर्तमान परिस्थितियों में सामान्यत: कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर सीधा अधिकार करना नहीं चाहता, किन्तु व्यापार पर अपना कब्जा करने के अवसर खोजता रहता है। बहुउद्देशीय कम्पनियों की घुसपैठ भी आर्थिक साम्राज्य स्थापित करने के लक्ष्य से हो रही है, ऐसा माना जाता है, किसी भी राष्ट्र में व्यावसायिक प्रभुत्व के विस्तार को रोकने में दिगव्रत एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। दिग् परिमाण व्रत स्वीकार करने वाला अपने अर्थोपार्जन एवं विषयभोग का क्षेत्र छहों/चारों दिशाओं में निर्धारित करता है, जिसके फलस्वरूप अर्थलोलुपता एवं विषय तृष्णा की पूर्ति हेतु देश-विदेश में भटकन की मनोवृत्ति पर स्वत: नियंत्रण स्थापित हो जाता है। यद्यपि वर्तमान तीव्र संचार तकनीकी के युग में कहा जा सकता है कि इस प्रकार के व्रत की आज क्या प्रासंगिकता हो सकती है, इस व्रत के द्वारा अनियंत्रित आकांक्षाओं पर अंकुश लगता है, स्वदेश प्रेम एवं स्वावलम्बन का विकास होता है, अनावश्यक हिंसा एवं परिग्रह पर स्वत: नियंत्रण हो जाता है। निर्धारित क्षेत्र से बाहर यातायात की सीमा करने से उन क्षेत्रों में होने वाले समस्त आरम्भ-समारंभ के पाप से न केवल व्यक्ति बचता है अपितु सन्तोष वृत्ति का विकास करता है, जो सुखी जीवन का आधार सूत्र है।

७. भोगोपभोग परिमाण व्रत : श्रावक के व्यक्तिगत जीवन में स्वेच्छा से भोगोपभोग वृत्ति पर अंकुश लगाना ही इस व्रत का मूल उद्देश्य है। आज के भोगवादी संस्कृति के युग में इस व्रत की उपयोगिता को कोई विचारशील व्यक्ति अस्वीकार नहीं करेगा। आज भोगोपभोग सामग्री की जितनी विधाएं विकसित हुई हैं, उस भूल-भूलैया में व्यक्ति बाजार में जाने के बाद जेब खाली किए बिना नहीं लौट पाता है। छोटी से छोटी साबुन से लेकर बड़ी से बड़ी वस्तुओं की इतनी विविधताएं है कि व्यक्ति का दिमाग चकरा जाता है क्या खरीदें और क्या न खरीदें? आनन्द श्रावक ने किस प्रकार विलेपन, हस्त प्रोच्छन, मुखवास जैसी छोटी-छोटी वस्तुओं का संयम कर स्वादवृत्ति, आसक्ति एवं उच्छृंखल भोग पर अंकुश लगाया, इस व्रत से स्वादवृत्ति के कारण बढ़ने वाली बीमारियों पर रोकथाम संभव है एवं अनावश्यक धारण करने के वस्त्र, दैनन्दिन प्रयोग में आने वाली नई साधन-सामग्री बर्तन, चद्दर, फ्रीज इत्यादि सारी सुविधाजनक सामग्री के संग्रह एवं आसक्ति पर नियंत्रण होगा एवं अभावग्रस्त को पर्याप्त सामग्री उपलब्ध हो सकती है।
जैन आचार्यों ने बड़े ही मनोवैज्ञानिक तरीके से यह भी स्पष्ट करने का प्रयास किया कि गृहस्थ को समाज में जीने के लिए आजीविका का उपार्जन अनिवार्य है, पर जिस व्यवसाय में महाहिंसा होती है जिन्हें १५ कर्मादान नाम से जाना जाता है, वैसे व्यवसाय से आजीविका अर्जित करना निषिद्ध माना गया है। महावीर द्वारा १५ महाहिंसात्मक व्यवसायों का निषेध वास्तव में आज के संदर्भ में देखा जाये तो बड़ा प्रासंगिक प्रतीत होता है, यहां मात्र उसकी वर्तमान युग में किस प्रकार पर्यावरण प्रदूषण से उत्पन्न होने वाली समस्याओं से निजात पाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका है उसका विश्लेषण किया जा रहा है। वनकर्म अर्थात् जंगल कटवाने का व्यवसाय, अंगार कर्म में अग्नि प्रज्ज्वलित करके किये जाने वाले सारे व्यवसायों को निषेध किया गया है। आज बड़े-बड़े कारखानों में महाहिंसा के साथ-साथ निकलने वाले धूएं से जिस प्रकार शहरों में वायु प्रदूषण बढ़ रहा है एवं ओजोन की छत में भी छेद बढ़ता जा रहा है, साथ ही फर्नीचर साज-सज्जा के लिए जंगलों की कटाई जिस कदर से हो रही है यह अनुमान लगाया जा रहा है कि भविष्य में वर्षा का स्रोत सूख जाने से तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए ही होगा। साथ ही दन्त, रस, विष, केश एवं यन्त्रपीड़न आदि व्यवसायों में धनार्जन के लिए जिस क्रूरतापूर्ण बर्बर तरीके से पशुओं का कत्ल एवं पशुओं पर परीक्षण किया जा रहा है, वह निश्चित ही मानव जाति के लिए महाकलंक है। अनेक प्रजातियां प्राणियों की आज विलुप्त हो चुकी है एवं अनेक विलुप्ति के कगार पर है। भगवान महावीर ने ठीक ही कहा कि जो षड्जीवनिकाय के अस्तित्व को अस्वीकार करता है, वह अपने अस्तित्व को ही अस्वीकार करता है। परस्पर सभी जीव अपने अस्तित्व के लिए एक दूसरे पर निर्भर है। इस अन्तर्निभरता के सूत्र को विस्मृत करने के कारण ही आज स्वयं मानव अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है, इसीलिए आजकल Human Survival की बात पर गंभीरता से विचार-विमर्श एवं मानव अस्तित्व की सुरक्षा हेतु पर्यावरण प्रदूषण पर सरकार द्वारा रोकथाम के विविध आयाम अपनाए जा रहे हैं, पर जब तक मानव का स्वनियंत्रण काम नहीं करेगा, मात्र बाह्य नियंत्रण से वांच्छित परिणाम की आशा करना अशक्य है, इस प्रकार आज भोगोपभोगव्रत की प्रासंगिकता हस्ताम्लकवत् स्वत: सिद्ध है।

८. अनर्थदण्डव्रत : मानव अपने जीवन में ऐसे अनेक कर्म करता है जिसके फलस्वरूप उसका अपना कोई हित साधन नहीं होता, इस निष्प्रयोजन, अनावश्यक कर्म का यहां निषेध किया गया है, आजीविका चलाने के लिए जो पापकारी प्रवृत्ति द्वारा हिंसा करनी पड़ती है वह यहां अर्थदण्ड है और निष्प्रयोजन ही केवल प्रमाद, कुतूहल, अविवेक, अज्ञानता के वशीभूत होकर चलते हुए अनावश्यक पत्तियों को तोड़ना, अपने मनोरंजन के लिए मुर्गे, अश्व, बैल आदि में लड़वाना अनावश्यक हिंसा है।
आचार्य हेमचन्द्र ने प्रमाद जनित अनर्थ हिंसा का उल्लेख करते हुए कहा है कि अश्लील गीत, नृत्य-नाटक आदि (सिनेमा) देखना आसक्तिपूर्वक विषय कषाय वर्धक साहित्य पढ़ना, जूआ खेलना मद्यपान करना, निष्प्रयोजन झूले में झूलना (इससे वायुकाय हिंसा), प्राणियों को परस्पर लड़ाना, बिना कारण सोये पड़े रहना एवं निरर्थक वार्तालाप करना-ये सभी प्रामादाचरण है। अनर्थ हिंसा एवं निष्प्रयोजन प्राणघात से बचने के लिए महावीर ने इस व्रत के माध्यम से अप्रमत्तता का सूत्र दिया।
आचार्य समन्तभद्र ने तो इतनी सूक्ष्मता से इस व्रत को रत्नकरण्ड श्रावकाचार में वर्णन किया है कि निरर्थक जमीन खोदना, अग्नि प्रज्ज्वलित करना, पंखा करना, वनस्पति का छेदन-भेदन करना (फल एवं हरियाली पत्तीदार वनस्पति आदि जीवों की विवाह आदि में विविध आकृति बनाना), पानी का दुरूपयोग (स्नान, हाथ धोने में एवं बर्तन एवं वस्त्र प्रक्षालन में) घी, तेल, दूध आदि के बर्तन खुले रख देना (जिसमें जीवों के गिर जाने से अनावश्यक प्राणिघात के भागीदार बनते हों), लकड़ी, पानी आदि को बिना देख-भाल के काम में लेना-ये सभी प्रमाद से उत्पन्न हिंसा है, जो आज की आधुनिक जीवन शैली के अंग बन चुके हैं, इस व्रत के माध्यम से महावीर ने संपूर्ण जीवनशैली को संयमित करने का प्रयास किया है, इससे न केवल स्वयं का निष्प्रयोजन पाप से बचाव होगा अपितु जागृत मानवीय व्यवहार का विकास होगा एवं संयम चेतना के विकास से अभावग्रस्त को उचित साधन सामग्री उपलब्ध हो सकती है, इसी व्रत के अन्तर्गत गृहस्थ से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अशुभ चिन्तन, पापकर्मोपदेश, हिंसक उपकरणों के दान एवं उपरोक्त प्रमादाचरण से बचे।
श्रावक के उपर्युक्त पांच अणुव्रतों एवं तीन गुणव्रतों का बहुत कुछ सम्बन्ध हमारे सामाजिक जीवन से हैं। मानव समाज में आज भी ये सभी चारित्रिक विकृतियां विद्यमान हैं और एक सभ्य समाज के निर्माण के लिए इनका परिमार्जन आवश्यक एवं अति प्रासंगिक हैं। गृहस्थ के शेष चार शिक्षाव्रतों में सामायिक, दैशावकाशिक, पौषधोपवास का सम्बन्ध विशिष्ट रूप से वैयक्तिक जीवन से हैं। यद्यपि अतिथि संविभाग व्रत की व्याख्या पुन: सामाजिक संदर्भ में की जा सकती है।

९. सामायिक व्रत : सामायिक समभाव की साधना है। गृहस्थ भी समता की आराधना से वंचित न रहे, इसलिए नौंवे व्रत का विधान है। एक मुर्हूत्त तक आत्मचिन्तन, स्वाध्याय-ध्यान-जप आदि के द्वारा समता की आराधना करने से प्रवृत्ति एवं निवृत्ति में सन्तुलन स्थापित होता है, मानसिक तनाव को विराम मिलता है, चित्तवृत्ति का शोधन होने से वास्तविक शान्ति का अनुभव होता है। आज हमारी सामायिक की साधना में समभावरूपी अन्तरात्मा मृतप्राय होती जा रही है और वह एक रूढ़-क्रिया मात्र बन कर रह गई है। सामायिक कत्र्ता के जीवन व्यवहार में आवेश नियंत्रण का अभाव एवं आसक्ति, अधीरता के कारण सामायिक की छवि भावी पीढ़ी पर प्रभावी नहीं हो रही हैै। यह भगवान महावीर द्वारा गृहस्थ के लिए निर्धारित धर्माराधना की ऐसी प्रायोगिक पद्धति है जो अन्य धर्म दर्शन में दुर्लभ है, इस व्रत को प्रभावी बनाने के लिए कोई उपयुक्त पद्धति विकसित की जाए, यह युगीन अपेक्षा है। इसी अपेक्षा को मद्देनजर रखकर आचार्य तुलसी ने अभिनव सामायिक की पद्धति प्रदान की। अगर वह जीवन का अंग बन जाए तो सन्तुलित व्यक्तित्व का निर्माण हो सकता है, इस व्रत के माध्यम से मानसिक सन्तुलन की साधना, मन-वचन और काया के सामंजस्य की साधना एवं विधायक भावों के विकास की साधना से न केवल पारिवारिक शांति कायम हो सकती है अपितु सामाजिक जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में सामंजस्य स्थापित करने की योग्यता अर्जित हो सकती है अन्यथा छोटी-छोटी परिस्थितियों में अपने मानसिक एवं भावनात्मक सन्तुलन को खोकर मानव अपशब्द प्रयोग एवं मारपीट आदि घरेलु हिंसा में तत्पर हो जाता है और आत्महत्या जैसा दुष्कर्म भी कर बैठता है एवं अकल्पनीय अकरणीय कार्य कर लेता है एवं फिर पश्चाताप करता है। सारे अपराध आवेश के अनियंत्रण और इसी समभाव की साधना के अभाव में होती है। अत: सर्वांगीण शान्तिपूर्ण स्वस्थ परिवार एवं समाज संरचना में सामायिक व्रत की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता।

१०. देशावकाशिक व्रत : देश का अर्थ है-छोटा या अंश, इस व्रत में अल्पकालिक तथा छोटे-छोटे नियम के लिए अवकाश रहता है, जो लोग एक साथ दीर्घकालिक त्याग नहीं कर सकते, उनके लिए यह अभ्यास का सुन्दर एवं सरल उपक्रम है। आज के युग में किसी में यदि बुरी लत पड़ गई तो उसे इस प्रकार के व्रत के माध्यम से क्रमश: उसकी बुरी आदत से निजात दिलाया जा सकता है। धीरे-धीरे थोड़े-थोड़े समय के लिए किए गए त्याग भविष्य में व्यक्ति के चरित्र विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, इस व्रत से न केवल भोग्य पदार्थों की असारता समझकर अपना स्वास्थ्य सुधरेगा अपितु मानसिक शक्ति भी दृढ़ होगी एवं आत्म संयम से आत्म बल बढ़ेगा।

११. पौषधोपवास व्रत : जो गृहस्थ अध्यात्म साधना में आगे बढ़ना चाहते हैं वे इस व्रत के अन्तर्गत उपवासपूर्वक विषय-वासनाओं से उपरत होकर श्रावक जीवन में ही श्रमण वत् जीवन का आस्वादन हेतु एक दिन-रात अथवा रात्रिकालिन पौषध स्वीकार कर आत्मा की उपासना करते हैं। भगवान महावीर ने अष्टमी-चतुर्दशी तिथियों पर इस व्रत की आराधना पर जोर दिया था, पर आज के संदर्भ में हर क्षेत्र में सप्ताह में एक दिन सभी को अवकाश प्राप्त होता है उस दिन का सदुपयोग पौषध व्रत के माध्यम से आत्मसाधना में व्यक्ति स्वदोष दर्शन की साधना से अपने चरित्र को शनै:-शनै: परिष्कृत कर अणुव्रती इहलोक एवं परलोक दोनों को सफल बनाने का प्रयास करता है।

१२. अतिथि संविभागव्रत : यह व्रत गृहस्थ के लिए सामाजिक दायित्व का सूचक है, संयमी व्यक्ति अकिंचन होते हैं उनके पास धनवैभव नहीं होता, वे पचन-पाचन की क्रिया से मुक्त होते हैं एवं भ्रामरी भिक्षाचरी से अपना जीवन चलाते हैं, उनके संयम में, भोजन, पानी, वस्त्र आदि अपनी वस्तुओं का संविभाग कर साधु को सहयोग देना इस व्रत का उद्देश्य है, इसीलिए महाभारतकार ने भी गृहस्थ आश्रम को शेष तीन आश्रमों से श्रेष्ठ बतलाया है क्योंकि तीनों ही आश्रम इसी पर टिके हुए हैं। संयमी को निर्दोष आहार देने से अपूर्व कर्मों की निर्जरा होती है एवं शुभ पुण्य के अर्जन के साथ-साथ शुभायुष्य का बंध होता है।
गृहस्थ पर अपने परिजनों के उदरपोषण के दायित्व के साथ-साथ साधक एवं समाज के असहाय एवं अभावग्रस्त व्यक्तियों के भरण-पौषण का दायित्व भी है। हमारा जीवन पारस्परिक सहयोग एवं सहभागिता के आधार पर ही चलता है। दूसरों के सुख-दु:ख में सहभागी बनना एवं अभावग्रस्त पीड़ितों एवं दीन-दुखियों का तन-मन-धन से सहयोग करना भी गृहस्थ का अनिवार्य धर्म है, इस व्रत द्वारा गृहस्थ में समाज सेवा, दान चेतना एवं अर्जन के साथ विसर्जन की चेतना का जागरण होता है एवं साथ ही अनासक्ति का विकास होने से आत्मोत्थान होता है एवं समाज में सदाशयता, सामाजिक सम्बन्धों में मधुरता एवं साधार्मिक वात्सल्य का विकास होता है।

उपसंहार : आज पूरे विश्व में ‘‘Life Style’’ के बारे में चिंता या चिन्तन किया जा रहा है। संसार में जो बदलाव आएगा, उससे जैन लोग भी अप्रभावित नहीं रह पाएंगे। मनुष्य आज अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है, कुछ समस्याएं शाश्वत होती है, उनका अस्तित्व तीनों कालों में रहता है। कुछ समस्याएं सामयिक होती है, वे समय-समय पर बदलती रहती हैं। उपरोक्त विश्लेषण से यह बात समझ में आ जाती है कि बारह अणुव्रतों के सम्यक पालन से शाश्वत एवं सामयिक दोनों समस्याओं का समाधान संभव है। व्रतों का पालन कर व्यक्ति स्वयं सुखी और स्वस्थ जीवन जीयेगा एवं परिवार-समाज में शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की स्थापना कर स्वस्थ एवं शांतपूर्ण समाज संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। अस्तु जैन धर्म के श्रावकाचार की उपर्युक्त समीक्षा करने के पश्चात् यह स्पष्ट हो जाता है कि जैन श्रावकों के लिए महावीर द्वारा प्रतिपादित आचार के नियम एवं सर्वांगीण जीवन शैली के १२ सूत्र, हर देश, हर व्यक्ति, हर समाज में एवं हर युग ये प्रासंगिक सिद्ध होते हैं।

-समणी डॉ. शशिप्रज्ञा

सहायक आचार्य

जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय, लाडनूं

वर्षायोग एक संस्कृति

वर्षायोग एक संस्कृति

Virajsagarji Maharaj

-प.पू. गणाचार्य १०८ श्री विरागसागर जी महाराज

वर्षायोग की प्राचीनता : वर्षायोग का सर्वाधिक प्राचीन उल्लेख दिगम्बर जैन ग्रन्थों में मिलता है, मूलाचार ग्रन्थ में मुनियों के दस स्थिति कल्पों में पद्य नामक कल्प वर्षायोग का विधान है, वहाँ पर कहा गया है कि मुनिजनों को वर्षायोग नियमत: करना चाहिए, इसी प्रकार अन्य ग्रन्थों में भी वर्षायोग का विधान है। बौद्ध के चातुर्मास का तथा हिन्दु ग्रन्थ बाल्मीकि रामायण आदि में श्री रामचन्द्र जी के चातुर्मास का उल्लेख है, चातुर्मास की परम्परा आज भी निर्वाधित रुप से चली आ रही है, दिगम्बर जैन संत आज भी नियम से चातुर्मास करते हैं।

वर्षायोग का अर्थ :- वर्षायोग दो शब्दों से मिलकर बना है, वर्षा + योग = वर्षायोग, वर्षा यानि वर्षात्, योग यानि धारण करने वाली, योग शब्द अनेक अर्थों में प्रचलित है- यथा

    • योगशास्त्र में योग का अर्थ मिलना अर्थात् आत्मा से जुड़ने को योग कहा जाता है।
    • गणित शास्त्र में योग (जैसे- २+२ का योग ४) शब्द का अर्थ वृद्धि लिया गया है
    • जैन ग्रन्थों में योग शब्द का अर्थ आत्म प्रदेशों के परिस्पंदन में कारण भूत मन, वचन, काय को कहा है अथवा इन तीनों को स्थिर रखने को योग कहा है, यहाँ यही अर्थ अनुग्रहीत है।
    • जैन ग्रन्थों में आध्यात्मिक साधना, आराधना, बाह्याभ्यंतर तप, निश्चय व्यवहार परक पंचाचार, ध्यान को भी योग कहा गया है। प्राचीन काल में मुनिगण वर्षाकाल में किसी वृक्ष के नीचे ४ माह तक स्थिर और अखण्ड साधना करते थे किन्तु वर्तमान काल में हीन संहनन (कम शक्ति) होने के कारण किसी तीर्थक्षेत्र, ग्राम, नगर, मन्दिर या धर्मशाला आदि में रहकर यथा शक्ति साधना करते हैं, इसीलिए वर्षायोग या वर्षावास यह सार्थक संज्ञा है।

चातुर्मास :- श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक इन चार माह में वर्षायोग होने से इसे चातुर्मास भी कहते हैं, इससे अर्थ स्पष्ट होता जाता है कि वर्षायोग का संबंध मात्र वर्षा ऋतु के दो माह से नहीं अपितु वर्षाकाल के चार माह से है, अत: ‘चातुर्मास’ भी सार्थक संज्ञा है।

वर्षायोग क्यों :- वर्षाकाल में निरंतर पानी बरसता है जिससे नदी नालों में बाढ आ जाती है, मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। अनंत जीवों वाली साधारण वनस्पति अर्थात् हरी घास उत्पन्न हो जाती है। असंख्य सूक्ष्म जीव कीट पतंगे आदि जीव-जन्तु उत्पन्न हो जाते हैं। बिलों में पानी भर जाने से बहुत से जीव जन्तु बिलों से बाहर आ जाते हैं, जिससे उन सबकी रक्षा बहुत कठिन हो जाती है, अत: अहिंसा व्रत के धारी साधुजन अपने प्राणी संयम की रक्षा हेतु चातुर्मास करते हैं अर्थात् चार माह एक ही स्थान पर ठहरते हैं।

वर्षायोग कब :- चातुर्मास की स्थापना आषाढ माह के शुक्ल चतुर्दशी की पूर्व रात्रि में की जाती है, किन्हीं ग्रन्थों में आषाढ माह की प्रतिपदा को वर्षायोग धारण करते हैं ऐसा भी उल्लेख है, यथा- जैनाचार्य श्री जिनसेन ने कहा है कि आदिनाथ ने कृषि शिक्षा आषाढ माह की प्रतिपदा को ही दी थी, इसी कारण वर्षायोग इसी माह में स्थापित किया जाता है।
व्याकरणाचार्य पाणिनी ने भी वर्ष की समाप्ति आषाढ माह में मानी है तथा कार्तिक कृष्णा अमावस्या की अंतिम रात्रि में साधुजन चातुर्मास समाप्त करते हैं क्योंकि इस दिन ही वीर निर्वाण संवत् आदि की परि समाप्ति होती है। राजाओं के युग में आर्थिक वर्ष की भी पूर्णता दीपावली अर्थात् कार्तिक कृष्णा अमावस्या के दिन ही मानी जाती है इसी दिन वार्षिक आय-व्यय की पूर्णता पुरानी बही-खातों में की जाती है।

वर्षायोग कैसे :- वर्षायोग के स्थापना व निष्ठापन के एक दिन पूर्व मध्यान्ह सामायिक में मंगल गोचर मध्यान्ह वंदना क्रिया, सिद्ध, चैत्य, पंचगुरु, शांति व समाधि भक्ति पूर्वक की जाती है तथा बाद में मंगल गोचर भक्त प्रत्याख्यान विधि (उपवास ग्रहण क्रिया) सिद्ध, योगी, आचार्य, शांति व समाधि भक्ति पूर्वक की जाती है, दूसरे दिन साधुगण वार्षिक प्रतिक्रमण करते हैं पश््चात् चातुर्मास स्थापना पूर्व रात्रि में एवं निष्ठापन अपर रात्रि में वृहद सिद्ध, चैत्य तथा स्वयं भू स्तोत्र में से क्रमश: दो-दो तीर्थंकर की स्तुति व लघु चैत्य भक्ति क्रमश: सभी दिशाओं में मुख करके की जाती है किन्हीं-किन्हीं संघों में पूर्व या उत्तर दिशा में मुख कर ही की जाती है, मात्र आवर्तन शिरोनति चारों दिशा में की जाती है।
अंत में पंच महागुरु भक्ति शांति व समाधि भक्ति पढते हुए स्थापन, निष्ठापन करें। वर्षायोग समाप्ति के बाद वीर निर्वाण क्रिया करें। सुयोग्य श्रावक जन इस कार्य की निर्विघ्न समाप्ति के उद्देश्य से अभिषेक विधान करते हैं, ध्वजारोहण, कलश स्थापना, मंगलदीप प्रज्ज्वलन करते हैं तथा स्थापना व निष्ठापन के अवसर पर चारों दिशाओं में मंगल हेतु पीली सरसों या पुष्पादि का क्षेपण करते हैं।
एक और प्रश्न खड़ा हो सकता है कि चातुर्मास-कलश की स्थापना क्यों की जाती है? तो कलश के प्रकरण में पंचास्तिकाय तात्पर्य वृत्ति १/५/१५ में कहते हैं – पुण्णा मणोरहेहि य केवलणाणेण चावि संपुण्णा।
अरहंता इदि लोए सुमंगलं पुण्णवुंâभो दु।।
अरहंत भगवान सम्पूर्ण मनोरथों से तथा केवलज्ञान से पूर्ण हैं, इसीलिए लोक में पूर्ण कलश को मंगल माना जाता है।

वर्षायोग से लाभ :- चातुर्मास काल में साधुगणों को गमनागमन की सीमा निर्धारित कर चार माह एक ही स्थान पर रहने से ध्यान, अध्ययन, चिंतन का अधिक अवसर प्राप्त होता है, उनकी त्याग तपस्या भी सर्वाधिक होती है। आहारादि में भी वे हरी पत्ती, साग, घुने अनाज, फली, पुराने मेवा आदि का त्याग करते हैं और भी अपनी शक्ति अनुसार नियम आदि लेकर तप, त्याग तथा अध्ययन की विशेष साधना करते हैं तथा श्रावकों को भी साधुजनों की सेवा-सुश्रुषा एवं घर-घर में चौकों के माध्यम से श्रावक भी शुद्ध प्रासुक आहार लेते हैं। साधुजनों के माध्यम से श्रावक संस्कार शिविर, पूजन शिविर, शिक्षण शिविर, व्यसन मुक्ति- शाकाहार अभियान, स्वाध्याय क्लास, सामाजिक संगठन, धर्म प्रभावना का पर्याप्त अवसर प्राप्त होता है।
वर्षाकाल में प्राय: व्यवसाय, शादी विवाह आदि नहीं होने से श्रावक जनों को भी पर्याप्त मात्रा में धर्मलाभ प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हो जाता है। साधुओं के उपदेश से श्रावक क्षेत्रादिकों में दान, आहार दान इत्यादि शुभ क्रियाओं में प्रवृत्त होकर धर्म का अर्जन करते हैं। श्रावकों का साधुओं के निकट आने से उनमें भी तप, त्याग, साधना चर्या के संस्कार आते हैं।

-संजय जैन