Bijay Kumar Jain

भगवान महावीर निर्वाण पर खास प्रस्तुति

भगवान महावीर निर्वाण पर खास प्रस्तुति

निर्वाण प्राप्ति का ध्रुव मार्ग

Mahavir Bhagawan

भगवान महावीर ने पावापुरी से मोक्ष प्राप्त किया। महावीर की आत्मा कार्तिक की चौदस को पूर्ण निर्मल पर्याय रुप से परिणमित हुई और महावीर, सिद्धपद को प्राप्त हुए। पावापुरी में इन्द्रों तथा राजा-महाराजाओं ने निर्वाण-महोत्सव मनाया था, उसी दीपावली तथा नूतनवर्ष आज का दिवस है। भगवान पावापुरी स्वभाव ऊध्र्वगमन कर ऊपर सिद्धालय में विराज रहे हैं, ऐसी दशा आज भगवान को पावापुरी में प्रगट हुई, इसलिए पावापुरी भी तीर्थधाम बना, हम सम्मेदशिखर की यात्रा के समय पावापुरी की यात्रा करने गये, तब वहाँ भगवान का अभिषेक हुआ था, वहाँ सरोवर के बीच में – जहाँ से भगवान मोक्ष पधारे वहाँ भगवान के चरण कमल स्थापित हैं। तीर्थंकरों का द्रव्य त्रिकाल मंगलरुप है तथा जो जीव, केवलज्ञान प्राप्त करने वाला है, उसका द्रव्य भी त्रिकाल मंगलरुप है।

भगवान की आत्मा त्रिकाल मंगलस्वरुप है, उनका द्रव्य तो त्रिकाल मंगलरुप है ही वे जहाँ से मोक्ष को प्राप्त हुए, वह क्षेत्र भी मंगल है, आज मोक्ष प्राप्त किया, इसलिए आज का दिन भी मंगलरुप है और भगवान के केवलज्ञानादिरुप भाव भी मंगलरुप हैं, इस प्रकार भगवान महावीर परमात्मा द्रव्य-क्षेत्र-काल और भाव से मंगलरुप हैं। भगवान के मोक्ष प्राप्त करने पर यहाँ भरतक्षेत्र में तीर्थंकर का विरह हुआ। भगवान का स्मरण कर भगवान के भक्त कहते हैं कि- हे नाथ! आपने चैतन्यस्वभाव में अन्तर्मुख होकर आत्मा की मुक्तदशा साथ ली और दिव्यवाणी द्वारा हमें उसी आत्मा का उपदेश दिया, ऐसे स्मरण द्वारा श्रद्धा-ज्ञान की निर्मलता करें, वह मंगलरुप है, जहाँ ऐसी निर्मलदशा प्रगट हो, वह मंगल क्षेत्र है, श्रद्धा-ज्ञान का जो भाव है, वह मंगल भाव है और आत्मा स्वयं मंगलरुप है। भगवान का मोक्षकल्याणक मनाने के बाद इन्द्र और देव नन्दीश्वरद्वीप में जाकर वहाँ आठ दिन तक उत्सव मनाते हैं।

आज भगवान का निर्वाण दिवस है और इस ‘अष्टप्राभृत’ में भी आज निर्वाण की ही गाथा पढ़ी जा रही ह निर्वा किस प्रकार तथा कैसे पुरुष का होता है, वह बात शीलप्राभृत की ११-१२ वीं गाथा में कहते हैं-
णाणेव दंसणेव य तवेण, चरिएण सम्मसहिएण
होहदि परिणिव्वाणं, जीवाणं चरित्तसुद्धाणं
सीलं रक्खंताणं दंसणसुद्धाण दिढचरित्ताणं
अत्थि धुवं णिव्वाणं विसएसु विरत्तचित्ताणं
उपयोग को अन्तर्मुख करके, धर्मी जीव, चैतन्य के शान्तरस का अनुभव करते हैं, जिस प्रकार कुएँ की गहराई में से पानी खींचते हैं, उसी प्रकार सम्यक्आत्मस्वभावरुप कारण परमात्मा को ध्येय रुप से पकड़कर, उसमें गहराई तक उपयोग को उतारने से पूर्ण शुद्धता होती है और इसी रीति से निर्वाण होता है, निर्वाण कोई बाह्य वस्तु नहीं है, किन्तु आत्मा की पर्याय परमशुद्ध हो गयी तथा विकार से छुट गयी, उसी का नाम निर्वाण है।

भगवान का मनुष्य शरीर था, इसलिए अथवा वङ्काऋषभ नाराचसंहनन था, इसलिए निर्वाण हुआ ऐसा नहीं है, किन्तु सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्र और सम्यकतप से भगवान ने मुक्ति प्राप्त की, अभी भगवान महावीर का शासन चल रहा है, भगवान अपने परम आनन्द में तृप्त हो रहे हैं, अतीन्द्रिय आनन्द का अनुभव कर रहे हैं, ऐसे निर्वाण दशा का आज मंगलदिवस है, यह निर्वाण के उपाय की गाथा भी मंगल है, ‘दीपावली’ मंगलमय है,
जिसने चैतन्य में ही उपयोग लगाकर उसे बाह्य ध्येय से विमुख किया है, अर्थात् विषयों से विरक्त होकर चैतन्य के आनन्द-रस का स्वाद लेता है, आनन्दानुभव को उग्र बनाकर स्वाद में लेता है, ऐसा पुरुष नियमपूर्वक ध्रुवरुप से निर्वाण को प्राप्त होता है।यह निर्वाण का ध्रुवमार्ग! अन्तर्मुख होकर जिसने ऐसा मार्ग प्रगट किया, वह वहाँ से लौटता नहीं, ध्रुवरुप से निर्वाण को प्राप्त करता है, जो जीव, दर्शन शुद्धिपूर्वक दृढ़ चारित्र द्वारा चैतन्य में एकाग्र होता है, उसे बाह्य विषयों से विरक्ति हो जाती है, उसी का नाम शील है और ऐसा शीलवान जीव अवश्य मोक्ष प्राप्त करता है। चैतन्यध्येय से च्युत होकर जिसने पर को ध्येय बनाया है, उस जीव के शील की रक्षा नहीं होती, उसके दर्शनशुद्धि नहीं है

उसके उपयोग में राग के एकतारुपी विषयों का ही सेवन है, जिसने चैतन्यस्वभाव की रुचि प्रगट की है और राग की रुचि छोड़ी है, उसे चैतन्यध्येय से बाह्य विषयों का ध्येय छूट जाता है- ऐसा शील निर्वाणमार्ग में प्रधान है, इस प्रकार से दो गाथाओं में तो दर्शनशुद्धि के उपरान्त चारित्र की बात कह कर साक्षात् निर्वाण मार्ग का कथन किया।अब, एक दूसरी बात कहते हैं- किन्हीं ज्ञानी धर्मात्मा को कदाचित् विषयों से विरक्ति न हुई हो, अर्थात् चारित्रदशा की स्थिरता प्रगट न हुई हो, किन्तु श्रद्धा बराबर है तथा मार्ग तो विषयों की विरक्तिरुप ही है, इस प्रकार यथार्थ प्रतिप्रादन करते हैं तो उस ज्ञानी को मार्ग की प्राप्ति हो जाती है। सम्यकमार्ग का स्वयं को भान है और उसी को भली भाँति प्रतिपादन करते हैं, किन्तु विषयों से विरक्तिरुप मुनिदशा आदि प्राप्त नहीं होती।अस्थिरता है तो भी वे ज्ञानी धर्मात्मा मोक्षमार्ग के साधक हैं, वे मंगलरुप हैं, उन्हें इष्टमार्ग की प्राप्ति है और यथार्थ मार्ग दर्शाने वाले हैं, इसलिए उनके द्वारा दूसरों को भी सम्यकमार्ग की प्राप्ति होती है, किन्तु जो जीव, विषयों से राग से लाभ मनाता है, उसे सम्यकमार्ग में श्रद्धा नहीं होती, वह तो उन्मार्ग पर है तथा उन्मार्ग को बतलाने वाला है। धर्मात्मा को राग होता है, किन्तु उसे वे बन्ध का ही कारण जानते हैं, इसलिए राग होने पर भी उनकी श्रद्धा में विपरीतता नहीं होती, उन्हें मार्ग की प्राप्ति होती है और उनसे ही दूसरे जीव मार्ग प्राप्त कर सकते है, सत्मार्ग प्राप्त जीव ही निमित्तरुप होते हैं।

अज्ञानी, राग से स्वयं लाभ मानता है और दूसरों को भी मनवाता है, इसलिए वह स्वयं मार्ग से भ्रष्ट है और उसके निकट मार्ग की प्राप्ति नहीं हो सकती। अहा! चैतन्य के श्रद्धा-ज्ञान तथा उसमें लीनता रुप वीतरागता किंचित् कर्तव्य नहीं है, राग का एक कण भी मोक्ष को रोकनेवाला है, वह मोक्ष का साधन वैâसे हो सकता है? ऐसी ज्ञानी को श्रद्धा है। ज्ञानी जहाँ पुण्यभाव को भी छोड़ने योग्य मानते हैं, वहाँ वे पाप में स्वच्छन्तापूर्वक वैâसे बरतेगें, चारित्रदशारहित हो तो भी सम्यग्दृष्टि मोक्षमार्ग में ही है, क्योंकि उन्हें वीतराग चारित्र की भावना है, राग की भावना नहीं, श्रद्धा में वे सारे जगत् से विरक्त हैं, ज्ञान-वैराग्य की अद्भुत शक्ति उनको प्रगट हुई है, अन्तर में चैतन्य को ध्येय बनाकर राग से भिन्नता का भान हुआ है- ऐसे भान बिना कोई राग से लाभ माने तथा उसका प्ररुपण करे तो वह उन्मार्ग में हैं, उसके ज्ञान का विकास निरर्थक है, भगवान के मार्ग को उसने नहीं जाना है, भगवान किस प्रकार मोक्ष को प्राप्त हुए- उसकी उसे खबर नहीं है। अस्थिरता के कारण सम्यक्त्वी के विषय न छूटे, तथापि उनका ज्ञान नहीं बिगड़ता, दृष्टि के विषय में शुद्ध चैतन्य स्वभाव को पकड़ा है, वह कभी नहीं छूटता, उस ध्येय के आश्रम से वे सम्यकमार्ग में बरतते हैं, मोक्ष के माणिक स्तम्भ उनके आत्मा में जम गये हैं… वीर प्रभु के मंगलमार्ग पर चलकर वे भी मुक्ति को साथ रहे हैं। पूर्णतारुप परिनिर्वाण, मंगलरुप है और उसके प्रारम्भरुप सम्यक्त्व भी मंगल रुप है, इस प्रकार साध्य और साधक दोनों की बात आज ‘दीपावली’ के मांगलिक में आयी है।

भगवान् महावीर एवम् दीपावली

भगवान् महावीर एवम् दीपावली

Mahavir God

मानव ने अपने अन्तर जागरण की प्रभात बेला में जब आँखें खोलीं तो अपने चतुर्दिक् व्याप्त संसति की संरचना को देखकर विस्मय-विमुग्ध हो गया। अपनी कर्मस्थली, अपना लोक ही उसकी समझ से परे हो, यह उसके लिए
कम परिताप की बात न थी, उसने सोचा, आखिर यह सब क्या है? हमारे सामने सारी वसुन्धरा सजी-संवरी खड़ी है और हम हैं कि जो अंधेरे में भटक रहे हैं, कुछ भी समझने-बूझने के लिए, प्रकाश की कहीं से एक भी क्षीणरेखा ऩजर नहीं आ रही है, तब सभी ने – ‘‘तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय’’ की गुहार शुरु कर दी। कहना गलत न होगा, मानव सृष्टि के संस्कार का कार्य यहीं से आरम्भ हुआ। मानव-संस्कृति यहीं से उद्भुत हुई, तब से जब भी कभी अन्धकार की काली घटाओं ने मानवलोक को घेरा, कहीं न कहीं से कोई न कोई किरण रेखा कौंध उठी और दिव्यज्योति के प्रस्पुâटन की वह कौंध तद्युगीन अन्धकार को छिन्न-भिन्न करती चली गई।

मानव सभ्यता के आदिकाल में आदिनाथ ऋषभदेव हुए, तदन्तर मर्यादा पुरुषोत्तम राम और पाश्र्व भी इसी परम्परा की महत्त्वपूर्ण कड़ी है। महापुरुषों की इसी तेजस् परम्परा में श्रमण संस्कृति के महान् उद्गाता भगवान् महावीर आए, उन्होंने विश्व को ऐसी दिव्य ज्योति प्रदान की, जिससे मानव समाज चमत्कृत हो उठा। जब भगवान् महावीर धराधाम पर अवतरित हुए, उस समय भारतवर्ष अन्धकार के गहन गर्त में डूबा हुआ था। भारत के धर्म और भारत की संस्कृति पर अज्ञानरुपी अंधकार का ऐसा सघन आवरण छाया था कि कुछ लोग भ्रमवश, उस अन्धकार को ही प्रकाश मान बैठे थे। कुछ लोग ऐसे भी थे, जो प्रकाश की खोज में इधर-उधर भटक रहे थे, किन्तु सही मार्ग प्राप्त करने में विफल हो रहे थे, जातीयता एवम् साम्प्रदायिकता आदि के क्षुद्र विभेद, मानव मन को कलुषित कर रहे थे।

धर्म के नाम पर होने वाले याज्ञिक पशुबलि आदि के बाह्य क्रिया-काण्डों ने एक तरह से मानव को सत्य से पथभ्रष्ट कर दिया था। सत्य और न्याय का कहीं भी नामोनिशान नहीं था। बलवान निर्बलों को प्रताड़ित कर रहे थे, उनके श्रम पर स्वयं आनंद ले रहे थे। नारियों की हीन दशा भी मानव समाज के लिए कम ग्लानि की बात न थी। धर्म एवम् धर्मशास्त्रों के नाम पर नाना प्रकार के कुत्सित कर्म, बिना किसी रोक-टोक के हो रहे थे। सांस्कृतिक विनाश की उक्त काली रात्रि के गहन अंधकार के बीच, ज्योति पुरुष भगवान् महावीर ने नवचेतना का उन्मेष किया। धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आदि प्राय: सभी क्षेत्रों में एक स्वस्थ क्रान्ति का उद्घोष कर, समाज को एक नई ज्योति प्रदान की, एक नई दिशा दी, जीवन जीने के लिए आत्माओं को, अपनी आत्मा के समान देखने का मंगलमय उपदेश प्रदान कर,मानव को ‘देवाणुप्पिय’ संबोधन से सम्बोधित किया। भगवान् महावीर का दृष्टिकोण समन्वयवादी था, उन्होंने भेद में अभेद की, विग्रह में परस्पर प्रेम की स्थापना करने के लिए ‘स्याद्वाद्’ का आविर्भाव किया। स्याद्वाद् का यही आशय है कि प्रत्येक धर्म, दर्शन एवम् परम्परा में कुछ न कुछ सच्चाई का अंश निहित है, अस्तु, हमें विरोध में न पड़कर, प्रत्येक पक्ष की सच्चाई के अंश का समादर करना चाहिए तथा परस्पर प्रेम एवम् सद्भाव का वातावरण निर्मित करना चाहिए।

उन्होंने कहा- ‘‘संसार में कल्याण करने वाला उत्कृष्ट मंगल एकमात्र धर्म ही है और कुछ नहीं, अहिंसा, संयम एवम् तप का समग्र रुप है’’ भगवान् महावीर का कहना था कि – ‘‘कोई भी सत्य क्षेत्र, काल, व्यक्ति या नाम आदि के बन्धन में कभी बंधा नहीं रह सकता, सच्चा धर्म अहिंसा है, जिसमें जीवदया, विशुद्ध प्रेम और बन्धु भाव का समावेश होता है। सच्चा धर्म संयम है, जिसमें मन और इन्द्रियों को वश में रखकर स्वात्मरमणता का आध्यात्मिक आनन्द लिया जाता है। सच्चा धर्म तप है, जिसमें जनसेवा, तितिक्षा, विनय, परहित भावना, ध्यान, आत्म चिन्तन एवम् स्वाध्याय आदि का समावेश होता है और जब ये तीनों पूर्णरुपेण एक साथ मिल जाते हैं, तो साधक की साधना परिपूर्ण हो जाती है।फलत: उसे दिव्य ज्योति प्राप्त हो जाती है, इस प्रकार भगवान् महावीर ने जन-जागरण की दिशा में विश्व-कल्याणकारी धर्मदेशना की पावन ज्योति विकीर्ण करते हुए वैâवल्य प्राप्ति के बाद तीस वर्ष तक भारत की पवित्र धरा पर विचरण करते रहे। भगवान महावीर की विचारक्रान्ति उभयमुखी थी, एक ओर इस क्रान्ति ने समाज को सड़ी-गली रुढ़ियों से मुक्त किया तो दूसरी ओर जन-जीवन में व्याप्त भोगशक्ति को दूर कर शुद्ध वीतरागता और निष्काम-साधना का पथ प्रशस्त किया।

उक्त उभयमुखी क्रान्ति का इतना व्यापक प्रभाव हुआ कि न सिर्पâ मेघकुमार, नन्दीषेण जैसे अमित वैभव की गोद मेंं पले राजकुमारों ने ही भिक्षु का बाना अपनाया, बल्कि राजमहलों में मुक्त विलासिता का जीवन बिताने वाली मृगावती, नन्दा, कृष्णा जैसी महारानियों तक ने भिक्षुणी व्रत को अंगीकार कर, अपने को गौरवान्वित किया, एक ओर अर्जुन माली जैसे अनेक साधारण नागरिक भगवान् के संघ में थे, तो दूसरी ओर प्रसन्नचंद्र जैसे सम्राट भी थे। बस, खासियत यह है कि संघ में दोनों का दर्जा बराबर था। इन्द्रभूति गौतम जैसे उच्चकुलीन ब्राह्मण भगवान के आत्मीय शिष्य थे तो हरिकेशी जैसे चाण्डाल भी प्रभु के प्रिय अंतर्वासी थे। धर्म संघ में दोनों ही एक समान बन्धुभाव से रहते थे। भगवान का कहना था कि तुम्हारा पहले का वर्ण भेद के आधार पर खड़ा अस्तित्व मर चुका है, अब तुम दोनों ने धर्मबन्धु के रुप में श्रमण संघ में नया जन्म लिया है, इस संदर्भ में भगवान महावीर की वाणी है कि विश्व के सभी प्राणी आत्मभूत हैं, कोई पराया नहीं है।

सव्व भूयप्पभूएसु।’
मनुष्य का जीवन जन्म से नहीं, कर्म से सम्बन्धित है।

-जिनागम

दीपावली की दिव्यता

दीपावली की दिव्यता

आत्म-ध्यान से सिद्धि

आत्म-ध्यान

मानवता को अहिंसा-सत्य, समानता, समत्व-भाव, स्वावलम्बन, सहिष्णुता, विरोध, सच्चारित्र और अभय का पावन सन्देश देने वाले विश्व पूज्य भगवान महावीर का परिनिर्वाण ई.पूर्व ५२७, कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि के अन्तिम पहर में स्वाति नक्षत्र में पावापुर में हुआ था। महावीर सिद्धलोकवासी हो गए। इन्द्र और देवताओं ने निर्वाण कल्याणक पूजा की, नौलिच्छिवि, नौ मल्ल राजा और श्रेणिक राजा ने प्रजाजनों के साथ मिलकर प्रभु का निर्वाण कल्याणक मनाया व दीप जला कर ज्ञान-प्रकाश उत्सव मनाया, पावा नगरी दीप-आलोक से जगमगा गयी।

निर्वाण के दो दिन पूर्व त्रयोदशी को पावा नगरी के मनोहर वन में सरोवर के मध्य मणिमय शिलापुर प्रभु विराजमान हुए। मन-वचन-काय योग का निरोध कर, क्रिया रहित हो, परम शुक्ल ध्यान में लीन हो गये जिससे शेषाचार अघतिया कर्मों का नाश हुआ, प्रतिदिन ६-६ घड़ी तीन बार खिरने वाली दिव्य ध्वनि बन्द हो गयी और वचन योग का भी पूर्णत: निरोध हो गया। प्रभु ने सुक्ष्म क्रिया प्रतिपाती ध्यान द्वारा ७२ कर्म प्रकृतियों का आयोग, गुण स्थान के उपान्त्य में क्षय किया, तत्पश्चात शुक्ल ध्यान के चतुर्थपाद व्युपरत क्रिया निवृति का आलम्बन लेकर शेष १३ कर्म प्रकृतियों का अन्त समय में क्षयण कर, सिद्ध परमेष्ठी हो गये। अग्नि कुमार देवों के इन्द्र ने अपने मुकुट से अग्नि प्रज्ज्वलित कर, जिनेन्द्र प्रभु की देह का सन्स्कार किया, प्रभु का जब निर्वाण हुआ, उनके प्रमुख गणधर इन्द्रभूति गुणावा में विराजे थे।

त्रयोदशी से चतुदर्शी की रात्रि का समय प्रजावासियों का अत्यन्त कौतुहल का समय था, वे भगवान की दिव्य ध्वनि से, प्रभु की सन्निकटता से वंचित हो गये थे और उसी क्रम में प्रभु का वियोग हो गया। हर्ष और वियोग का दु:ख दोनों एक साथ विद्यमान था, अन्तत: वियोग के भावों का शमन कर, सर्वजनों ने प्रभु का निर्वाण महोत्सव उल्लास पूर्वक मनाया तब से जैन परम्परा में भगवान महावीर के निर्वाण की स्मृति में दीपावली महोत्सव, वर्ष-प्रतिवर्ष मनाया जाने लगा। कार्तिक कृष्ण अमावस्या की सन्ध्या को इन्द्रभूति गौतम केवल ज्ञान प्राप्त कर, चतुर्विध संघ के नायक बने थे, अत: उनकी पावन स्मृति में ज्ञान के प्रतीक दीप-मालिकाओं से उत्सव मनाया, यह परम्परा अभी भी निरन्तरित जारी है।

भगवान महावीर के निर्वाणोत्सव की स्मृति में निर्वाण कल्याणक पूजा सम्पन्न की गयी थी, कालान्तर में निर्वाण लाडू चढ़ाने की प्रथा चल पड़ी, जिनेन्द्र देव की पूजा अष्टद्रव्य से की जाती है, अष्टद्रव्य में नैवेद्य भी है। निर्वाणलाडू नैवेद्य का प्रतीक है जो क्षुधा (भूख) रोग के निवारण हेतु समर्पित किया जाता है। मोक्षफल की प्राप्ति हेतु नारियल, बादाम आदि फल समर्पित किया जाता है। दीपावली के दिन भगवान महावीर को मोक्ष हुआ था जो सभी जीवों को अभिष्ट है अत: विशिष्ट पूजन में फल का समर्पण युक्ति-युक्त प्रतीत होता है। मोक्ष होने पर क्षुधादि १८ दोषों से स्वत: मुक्ति मिल जाती है इस दृष्टि से निर्वाण लाडू के स्थान पर निर्वाण-फल समर्पित करने हेतु विचार किया जा सकता है। आज भारी-भार के निर्वाण लाडू चढ़ाकर वैभव/मान प्रदर्शन होने लगा है जो वीतरागी परम्परा के अनुकूल नहीं है। सुधार की दिशा और दशा वीतरागता एवम् जैनत्व के प्रकाश में हो तो उससे कषाय-पोषण या प्रदर्शन के स्थान पर आत्म-कल्याणक हो सकेगा और भगवान महावीर का शासन निर्वाण विशुद्ध रूप में प्रवाहमान होता रहेगा। मिष्ठान वितरण और नैवेद्य में अन्तर है, भावात्मक दृष्टि से यह भी स्मरण रखना चाहिए। दीपावली के दिन पटाखे फोड़ना त्रस जीवों की हिंसा का निमित्त बनता है,अत: इससे भी दूर रहना चाहिए।

धन्य या ध्यान तेरस – जैसा ऊपर कहा है, निर्वाण के दो दिन पूर्व भगवान महावीर ने ध्यान योग लगाया, इस ध्यान योग के निमित्त अघातिया कर्म की ८५ (७२+१३) प्रकृतियाँ क्षय को प्राप्त हुई और भगवान महावीर को मोक्ष प्राप्त हुआ, इस दृष्टि से ध्यान के महत्व को दर्शाने और जीवन में ध्यान की परम्परा विकसित करने, ध्यान तेरस महोत्सव मनाना प्रारम्भ हुआ, ध्यान को ही धन्य रूप माना गया। काल दोष से ध्यान की अवधारणा लुप्त हो गयी और ध्यान तेरस को धन तेरस के रूप में मनाने लगे, व्यवसाय की दृष्टि से ऐसा प्रयोग आकर्षक भी लगा। धनतेरस को कुछ न कुछ बर्तन, सोना-चाँदी क्रय करना चाहिए ऐसी भावना जनमानस में उत्पन्न हुई। संसार, शरीर और विषय भोगों से मुक्ति पाने हेतु आत्म-ध्यान ही एक मात्र ऐसा राजमार्ग है जो कर्म बन्धनों से मुक्ति दिलाता है। काल दोष से अब ‘आत्मा’ और ‘ध्यान’ शब्द अरूचि-बोधक हो गये हैं

इससे ऐसा लगने लगता है जैसे दर्शन-मोह का गहन अन्धकार दृष्टि को आकृत किये हो। धन तेरस का दिन सचेतक है, क्या हम उसके सही स्वरूप को समझकर सच्चे अर्थों में मोक्षमार्गी बनेंगे? विचारणीय जीवन में ध्यान (आत्म-ध्यान) के अभाव में कषायों का वेग पुष्ट हो रहा है। आकुलता और अशान्ति बढ़ रही है। ध्यान यदि धन में रूपान्तरित हो जाये तो इष्ट के स्थान पर अनिष्ट तो होना ही है, जहाँ तक लौकिक प्रयोजनों की सिद्धि का प्रश्न है, वह तो अरहन्तादिक के प्रति स्तवनादि रूप विशुद्ध परिणामों से सहज ही सिद्ध हो जाते हैं, उसके लिए लक्ष्मी आदि की पूजा करना इष्ट नहीं है। विशुद्ध, तीव्र विशुद्ध परिणामों से सातादिक आदि पुण्य प्रकृतियों का बन्ध होता है पूर्वकृत असातादिक पाप प्रकृतियों का अनुभव मन्द होता है या पाप प्रकृतियाँ पुण्यरूप परिणामित हो जाती हैं, जिनके उदय से इन्द्रिय सुख की सामग्री स्वमेव मिलती है, सप्रयोजन अरहन्तादिक की भक्ति भी पाप बन्ध का कारण होती है, समग्र रूप में धन के स्थान पर ध्यान को जीवन का अंग बनाना हित कारक है। ‘दीपावली पर्व’ विद्यमान

जीवन को उत्कर्ष पर ले जा कर, अन्तत: निश्रेयश पद अर्थात् मोक्षदायक बनें इस दृष्टि से इस पर्व को सही स्वरूप में मनाना अपेक्षित है। आचार्य, साधु भगवन्त और विद्वान जन, समाज के भ्रम को दूर कर, उनका सद्मार्ग दर्शन करें, यही सविनय निवेदन है जिससे ‘दीपावली’ दिव्यता को प्राप्त होगी। आलेख समापन के पूर्व भगवान महावीर एवम् गौतम गणधर का संक्षिप्त परिचय देना अपेक्षित है:महावीर का जन्म क्षत्रिय कुल के विदेह-देश स्थित कुण्डग्राम (वासोकुण्ड) के राजा सिद्धार्थ के यहाँ, ईसा पूर्व २७ मार्च ५९९ को हुआ था। कुण्डग्राम वैशाली गणराज्य का अंग था, तीस वर्ष की आयु में महावीर ने जिनेश्वरी दीक्षा धारण कर बारह वर्ष तक निरन्तर आत्मा की मौन साधना कर, केवल्य ज्ञान प्राप्त किया, तत्पश्चात् जो आत्म-वैभव, अनन्त-ज्ञान पाया
था, उसके प्रकाश में समवसरण सभा के माध्यम से जगत के जीवों को तीस वर्ष तक त्रिरत्न रूप आत्मकल्याण का मार्ग बताया। संयम, त्याग और तप के माध्यम से जीवन को आध्यामिक ऊँचाईयों तक ले जाने का मार्ग अहिंसा, सत्य आदि पाँच महाव्रत, तीन गुप्ति, पाँच समिति, पाँच इन्द्रियजय, बारह तप, दशधर्म और पाँच चारित्र का आवलम्बन लेकर त्रिकाल शुद्ध आत्मा को पर्याय में शुद्ध की प्रक्रिया तक ले जाता है, यह मार्ग वीतरागता की प्राप्ति का मार्ग कहा जाता है। महावीर का परिनिर्वाण पावा में दीपावली के दिन हुआ। वासोकुण्ड वासी सर्वसमाज के महानुभाव महावीर जयन्ती, दीपावली का पर्व, महावीर की शिक्षाओं को अपने जीवन का अंग बना लिया जो कि महावीर का अद्भुत प्रभाव है।

भगवान महावीर का शासन प्रभावशील है। भगवान महावीर के प्रथम गणधर ब्राह्मण मूल के इन्द्रभूत गौतम थे, वे वेदपाठी थे, उनका जन्म मगध देश के गोबरग्राम (नालन्दा के निकट) में हुआ था। पचास वर्ष तक वैदिक धर्म का पठन-पाठन कराते रहे। भगवान महावीर के समवशरण के मानस्तम्भ को देखकर उनका मान गला और आत्मज्ञान हुआ, उन्होंने जिनेश्वरी दीक्षा ग्रहण की और पर्यायज्ञानी हो गये, वे भगवान के प्रथम गणधर हुए उनकी उपस्थिति में आषाढ़ पूर्णिमा को दिव्यध्वनि खिरी, अत: वह दिन गुरूपूर्णिमा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। महावीर के निर्वाण के दिन गणधर गौतम को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। बारह वर्ष तक उन्होंने चतुर्विध संघ का सन्चालन किया और ई.पूर्व ७१५ में गुणावा जी से मोक्ष पधारे, आपकी स्मृति में नालन्दा में पुत्रोत्पत्ति पर सौहर गीत गाये जाते हैं। दीपावली का पर्व ‘जिनागम’ के प्रबुद्ध पाठकों का मंगलमय हो।

ज्योतिर्मय निर्वाण दिवस

ज्योतिर्मय निर्वाण दिवस

Budhha

साधक के जीवन के लिए निर्वाण पर्व तथा उत्सवों का महत्वपूर्ण स्थान है। भारत के प्राचीन इतिहास में अनेक पर्वों के वर्णन हैं, जीवन के हर-अंग के साथ कोई-न-कोई पर्व है विकास के लिये, निर्माण के लिये हर पर्व महान है। भारतवर्ष की महान संस्कृति एवं उज्ज्वल परंपरा में ‘दीपावली’ का महत्वपूर्ण स्थान है। दीपमाला में सिर्फ एक ही ज्योतिर्मय दीप नहीं, दीपों की अवलियां पंक्तियां है, एक के बाद एक क्रम बद्ध दीप-प्रज्वलित हैं, इसलिये दीपमाला और दीपावली एक ही है, दीपावली ज्योति का पर्व है, प्रकाश का पर्व है, इस ज्योतिपर्व के साथ इतिहास की महत्त्वपूर्ण कड़ियां-स्वर्णिम श्रृंखलाएं जुड़ी हुई हैं।

‘‘चलते-चलते राह है बढ़ते-बढ़ते ज्ञान
तपते-तपते सूर्य है महावीर महान’’

एक ज्योतिर्मय-व्यक्तित्व, जो इतिहास का चमकता-दमकता अद्भुत रत्न-चिंतामणि इस पर्व के साथ-संबंधित है, वह है श्रमण-भगवान महावीर- वह महान-विशाल एवं विराट आत्मा अनंत-ज्योतिर्मय-आत्मा, जिसका हर गुण (ज्ञान, दर्शन, चरित्र, वीर्य-सुख, शांति एवं आनंद) अनंत है। भ.महावीर के लिए अर्थात् जिनका आचरण ही दूसरों के लिये राह/मार्ग संदेश-बना उस प्रायोगिक अनुभव से जिन्होंने आत्मज्ञान से विश्वविज्ञान को प्राप्त किया, ऐसे जीवात्मा रूपी कमल को विकसित करने वाले ज्ञान-सूर्य भगवान महावीर हैं।

वत्र्तमान-अवसर्पिणि काल की चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर महावीर हैं, वे अपने युग के युगदृष्टा-युगवीर, युगपुरूष थे, वे सर्वोत्तम धर्म नेता थे। अहिंसा और सत्य के संस्थापक थे, अनंत तेजस संपन्न आध्यात्मिक पुरूष थे, अपूर्व-सहनशील, क्षमाशील एवं घोर तपस्वी थे, वे क्रांतिकारी, समाज सुधारक, जन-जन के हितैषी, प्राणी मात्र के प्रिय-विश्व के कर्णधार, सत्य-पथ प्रदर्शक थे, उन्होंने हमें-अहिंसा के द्वारा संपूर्ण प्राणी जगत से प्रेम करना सिखाया था, उनकी अहिंसा मनुष्य मात्र तक ही सीमित नहीं थी, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, सकल जीवधारियों के प्रति उन्होंने अहिंसापूर्ण, दयापूर्ण-व्यवहार करने का मार्ग दर्शाया, वे आत्मदर्शी और आत्मजयी थे, क्षमावीर और धैर्यवान थे, समदर्शी और सहिष्णु थे, प्रेम और सत्य के प्रेमी थे, करूणा की मुर्ति थे, उनके समवरण में सभी धर्मों, मतो, संप्रदायों के लोग-एक-साथ उठते-बैठते थे।अमृतवर्षी प्रवचनों से सबके शुष्क-हृदय को शीतल करते थे, उन्होंने लोगों को समझाया कि कर्म से व्यक्ति ब्राह्मण होता है, कर्म से क्षत्रिय होता है, कर्म से वैश्य या क्षुद्र होता है, जन्म से कोई ब्राह्मण या शुद्ध नहीं होता, जन्म से कोई बड़ा या छोटा नहीं होता, आज सारा समाज धर्म और संप्रदाय को लेकर अशांत है, हिंसक बना हुआ है, विषमता बढती जा रही है, मनुष्य न्युट्रोन जैसे भयानक सर्वनाशक हथियार बना रहा है जो सबके लिये घातक है।

भगवान-महावीर का परिनिर्वाण-दिवस ज्योतिपर्व मनाते हुए ढाई हजार वर्ष से अधिक हुए, अहिंसा और सह अस्तित्व की ज्योति-परमज्योति में मिल गई, हम दीपावली ज्योति पर्व उस महान-आत्मा की स्मृति में मना रहे हैं। कल्पसूत्र में कहा है निर्वाण के समय भगवान महावीर के अंतिम समवसरण में उपस्थित राजाओं ने यह निर्णय लिया कि भाव-उद्योत्त, भाव प्रकाश, भाव ज्योति हमारे बीच से चली गई है, ऐसे में उस ज्योति के प्रतीक के रूप में द्रव्य उद्योत्त किया जाए, द्रव्य प्रकाश किया जाए, क्योंकि भाव-ज्योति को जगाने की स्मृति के लिये द्रव्य ज्योति एक प्रतीक है। तत्कालीन वे ज्ञान-ज्योति के प्रतीक-रत्न-दीप आज नहीं रहे पर-मिट्टी के दिए आज भी जल रहे हैं, इस प्रकार जैन इतिहास के अनुसार दीपावली को ज्योति-पर्व का रूप-श्रमण-भगवान-महावीर के निर्वाण दिवस से मिला। राजाओं ने रत्न-दीप-प्रज्वलित किये, देवों ने, देवियों ने, अप्सराओं ने, यत्रों ने, गंधर्वों ने रत्नों की ज्योति से पावापुरी के कण-कण को आलोकित कर दिया, जगमगा दिया तब से यह ज्योतिपर्व की परंपरा जन-जीवन में प्रवाहित हो गई, जो आज भी श्रद्धा एवं भक्ति के साथ प्रवाहमान है। पर्यूषण के उपरांत जैनों का दूसरा पवित्र त्यौहार दिवाली है, जैनी दिवाली चार दिनों तक मनाते हैं, मूलत: दिवाली निर्वाण उत्सव है, परंतु इन्द्रभूमि गौतम द्वारा वैâवल्य विभूति की प्राप्ति के उपलक्ष में दिवाली को लक्ष्मी (धन) पूजा का त्यौहार भी माना गया है, एक जैनी के लिये सबसे बड़ी विभूति और महालक्ष्मी केवल ज्ञान की प्राप्ति है। व्यवहार में धन ही लक्ष्मी है, अत: व्यवहाररत जैनों द्वारा आध्यात्म लक्ष्मी को गौण कर भौतिक लक्ष्मी की पूजा का समावेश दिवाली पूजन में किया जाना स्वाभाविक है। अमावस्या की प्रात: नर-नारी मंदिरों में जाकर

श्री महावीराय नम: और श्री केवल ज्ञान लक्ष्मी नम:
लिख कर पूजन करने का उल्लेख तिथिवार सहित करते हैं

महावीर निर्वाण पूजा करते हैं और श्रवण करते हैं। कोई-कोई उपवास भी रखते हैं। पूजा में लाडू चढ़ाने की प्रथा है। सायंकाल को मंदिर और घरों में दीपक जलाए जाते हैं तथा बही पूजन किया जाता है, इसके लिये कोई-पुरोहित नहीं बुलाए जाते, सब स्वयं पूजा करते हैं। उच्चासण पर जैन शास्त्र विराजमान करते हैं, जो ज्ञान-लक्ष्मी मानी जाती हैं, आरती की जाती है और बही खाते में इस तरह से ज्योति पर्व के उपलक्ष में मनाया जाने वाला यह महापर्व आध्यात्मिक ज्योति पर्व है, अनंत ज्योतिर्मय ज्ञान-लक्ष्मी की उपासना का पर्व है जो प्रतिवर्ष प्रकाश का संदेश लेकर आता है, यह ज्योति पर्व अन्दर और बाहर की दरिद्रता को तोड़ने के लिये है। प्रभु महावीर और उनके महान-शिष्य गुरू गौतम का पावन स्मरण ही इस पर्व के साथ संबद्ध हैं, आनंद का स्त्रोत है, उनका स्मरण जीवन में परम प्रसन्नता की गंगा बहा देता है, उनके स्मरण मात्र से हमारे इस जीवन का ही नहीं, जन्म-जन्मान्तरों की तकलीफों, बाधाओं, रूकावटों की समाप्ति हो जाती है और ऐसे भाव आते हैं कि जीवन मंगलमय, आनंदमय बन जाता है। अंदर का अंधकार, बाहर के अंधकार को मिटा देता है, जैसे दीपावली के हजारों लाखों दीप-जगमगाकर बाहर के अंधकार को नष्ट कर देते हैं उसी प्रकार हमारा अन्तर्मन भी ज्ञान ज्योति से जगमगा जाए,

‘‘ज्योति-पर्व-पर-ज्योतिर्मय हो,
जीवन का कण कण, क्षण-क्षण
विघ्न-जाल से मुक्त सर्वथा
हो मंगल का नित्य वरण।।

इस शुभ अवसर पर दिल से ऐसे भाव निकलते हैं-क्योंकि आज के पदार्थवादी युग और तनावग्रस्त जीवन तंत्र या समस्त विभिषिकाओं से बचने का एक मात्र रास्ता महावीर की शरण ही है, जिसे हम इस प्रकार से कह सकते हैं-

‘‘मरूस्थल को आग की नहीं, पानी की जरूरत है
संसार को वंâजूस की नहीं, कर्ण दानी की जरूरत है
भूले-भटके विश्व को फिर से नई राह मिले
सचमुच आज महावीर जैसे ज्ञानी की जरूरत है

महावीर निर्वाण दिवस पर उनको नमन करें, उनके द्वारा प्रज्वलित ज्योति को नमन करें और उस ज्योति के आलोक में स्वयं को आलोकित करें, ऐसी भावना ‘जिनागम’ परिवार व्यक्त करता है।

श्री पार्श्व जन्म कल्याणक महाभिषेक की सभा

श्री पार्श्व जन्म कल्याणक महाभिषेक की सभा

Shri Parshwa Janm

मालव मार्तण्ड पू.आ.श्री मुक्ति सागरसूरिजी म.सा.की निश्रा में श्री शंखेश्वर पाश्र्वनाथ जैन संघ राजाजीनगर के सलोत आराधना भवन में आगामी षोष दशमी दि ३० एवं ३१ दिसंबर को श्री पाश्र्वनाथ प्रभु के जन्म दीक्षा कल्याणक पर होने वाले २३ लाख महाभिषेक की सफलता के लिए संपन्न हुई। सभा में सर्वश्री उत्तमकरण सचेती, जीवराज कामेला, नरपतराज सोलंकी, मीलनभाई सेठ, विजयराज राय गांधी, सुरेश बंदा मूथा आदि अनेक महानुभाव उपस्थित थे।
उक्त जानकारी समस्त जैन की एकमात्र ‘जिनागम’ के समाचार प्रभारी देवराज के. जैन ने देते हुए बताया कि तीन महिने बाद होनेवाला यह महाभिषेक बैंगलोर ही नहीं समग्र दक्षिण प्रांत का सर्वप्रथम एक विराट और अनूठा आयोजन होगा, इसमें १००८, जोड़े सहित २३०० प्रभु भक्त मिलकर १००८ नव निर्मित १००८ नव निर्मित प्रभु प्रतिमाओं पर २३ लाख अभिषेक संपन्न करेंगे, इससे पूर्व दि. ३० दिसंबर को १००८ प्रभु मुर्तियों को भव्यातिभव्य विराट जुलूस भी निकाला जायेगा एवं संध्या को ‘एक शाम पारस के नाम’ से भक्ति संध्या भी होगी।
श्री जैन ने बताया कि यह आयोजन बसवन गुड़ी के नेशनल ग्राउन्ड में होगा, किन्ही कारण से वहां हो सकने पर जयनगर के शालिनी ग्राउन्ड में किया जा सकता है।
इस महाभिषेक की विशाल कार्यकारिणी में आज नरेश नाहर एवं जयदीप शाह को भी जोड़ा गया, साथ ही इस विराट और भव्य आयोजन में भारत के पंतप्रधान नरेन्द्र मोदी को भी आमंत्रित करने का दायित्व नरेश नाहर को सौंपा गया है, इस आयोजन की तैयारियां पू. आचार्य श्री के मार्गदर्शन में बड़ी ही सुव्यवस्थित चल रही है।

बेंगलोर चिकपेट धार्मिक पाठशाला का वार्षिकोत्सव सम्पन्न

Chickpet Temple

बेंगलुरू : चिकपेट श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर संघ द्वारा संचालित श्री विजयलब्धिसूरी जैन धार्मिक पाठशाला का वार्षिकोत्सव पन्यास श्री कल्परक्षित विजयजी म.सा., मुनि श्री अजितअनुसागरजी म.सा. आदि ठाणा साध्वीवर्या आदि की निश्रा व उपस्थिति में ‘गिरनार पर प्रण’ ऐतिहासिक नाटिका तीन-तीन पीढीयों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुती से सबको भाव-विभोर कर दिया।
पन्यास प्रवर श्री कल्परक्षित विजयजी म.सा. ने सम्बोधित करते हुए कहा कि गणधरों द्वारा रचित आगमों का ज्ञान, अर्थ व भावार्थ की जानकारी व ज्ञान पाठशाला में जाने से मिलेगा, उन्होंने पाठशाला की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि माता-पिता को चाहिए कि संस्कृति बचाने के लिए बच्चों में धार्मिक संस्कार भरें और बच्चों को पाठशाला जरूर भेजें। मुनि श्री अजितचन्द्रसागरजी म.सा. ने कहा अखण्ड धारा से संस्कारों से सिंचन कर ९१ वर्ष का सफर धार्मिक पाठशाला का पुरा होना ऐतिहासिक है। जिनशासन की पताका लहराए, वैसे पाठशाला में संस्कार गुंजते रहेंगे। बाबुलालजी पारेख ने स्वागत भाषण द्वारा सबका स्वागत किया, पाठशाला के चेयरमेन देवकुमार के. जैन ने कहा कि व्यवहारिक शिक्षा के बोझ तले धार्मिक शिक्षा व संस्कार पूरी तरह से दबते जा रहे हैं ऐसे में आत्मोन्नति के मार्ग पर आगे कैसे बढे, इन्ही प्रश्नों का उत्तर खोजने के सार्थक प्रयास का नाम श्री विजयलब्धि धार्मिक पाठशाला की पूरे भारत वर्ष में विशिष्ट पहचान बनी है। श्री जैन ने यही भी कहा कि मानव समाज मां-बाप, भाई-बहन आदि अगर बच्चों से घनिष्ट व प्यारा रिश्ता बना रहे क्योंकि इसकी बराबरी कोई भी रिश्ता नहीं कर सकता। बच्चे हमारा ही नया स्वरूप हैं। नौ दशक पहले स्थापित इस पाठशाला से ९० चरित्र सम्पन्न साधु-साध्वी भी समाज को दिए, जिसमें कई ज्ञानी साधु-साध्वी शामिल हैं। अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित जैन तत्व ज्ञान विद्यापीठ परिक्षा में पाठशाला ने स्वर्ण पदक प्राप्त किए हैं। पाठशाला की सफलता का श्रेय ट्रस्ट मंडल, उदारमना व्यक्तियों, गुरूओं और अभिभावकों को जाता है जो अपने बच्चों को यहां भेजते हैं। आभार प्रकट प्रकाशचंद राठोड़ जैन ने किया, गौतम सोलंकी जैन ने विचार व्यक्त किए, कनिक्की ने संचालन किया। सुरेन्द्र सी. शाह गुरूजी, सुरेश शाह गुरूजी ने पाठशाला की गतिविधीयों की जानकारी दी। नटवरशाह गुरूजी, प्रवीण शाह गुरूजी, विक्रमशाह गुरूजी सहित बेंगलोर की कई अध्यापकों का बहुमान किया गया। उत्तीर्ण विद्यार्थियों को पुरस्करित किए गये, कार्यक्रम में संगीत की प्रस्तुती पाठशाला के अभ्यासकों व महिला-बालिका मंडल द्वारा दी गई। व्यवस्था श्री आदिनाथ जैन सेवा मंडल, आदिनाथ अर्हम मैया एकता परिवार व समकित गु्रप ने संभाली, कार्यक्रम पश्चात साधर्मिक भक्ति का आयोजन किया गया।

श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ चातुर्मास २०१८

श्री आदिनाथ भगवान एवं दादा गुरुदेव को अभिषेक हेतु २ स्वर्ण कलश भेंट

राजगढ़ (धार) म.प्र.: ५अक्टूबर २०१८ को श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ में चातुर्मासार्थ विराजित दादा गुरुदेव की पाटपरम्परा के अष्ठम पट्टधर वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की निश्रा में परम गुरुभक्त श्री मोहनलाल शंकरलालजी जैन परिवार ने प्रभु श्री आदिनाथ भगवान व दादा गुरुदेव श्रीमद्विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की गुरुप्रतिमा पर अभिषेक हेतु श्री आदिनाथ राजेन्द्र जैन श्वे. पेढ़ी ट्रस्ट श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ में २ स्वर्ण कलश अर्पित किये, इसके पूर्व गुरुभक्त परिवार ने पूज्य आचार्य श्री ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. से आशीर्वाद प्राप्त कर कलश पर वासक्षेप करवाया, इस अवसर पर मुनिराज श्री पुष्पेन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री रुपेन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जिनचन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जीतचन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जनकचन्द्रविजयजी म.सा. आदि ठाणा व श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ के महाप्रबंधक अर्जुनप्रसाद मेहता, आनन्दीलाल धारीवाल, वाल्मिकी मेहता, महेन्द्र जैन आदि भी उपस्थित थे।

पर्वाधिराज पर्यूषण संवत्सरी महापर्व पर धर्ममय प्रखर उद्बोधन

नई दिल्ली : भक्ति भावों का सैलाब न्यू फ्रेंड्स कालोनी के जे.आर. जैन भवन में इन दिनों चरमोत्कर्ष पर है, ‘‘तीरवी वाणी की पावन सरिता’’ के विसद से बहुचर्चित उ.भा. प्रवर्तिनी डॉ. सरिता जी म., घोर तपस्विनी डॉ. पिंकी (शुभा) जी म., परम विदुषी साध्वी सम्बोधि श्री म. तथा सेवाभावी रजनी जी म. के पावन सानिध्य में महापर्व पर्यूषण की आराधना का मंगलमय ठाठ लगा है। तपस्याओं की झड़ी लगाने वाले एन.एफ.सी., ग्रेटर कैलाश, भोगल, रोहिणी, ईस्ट ऑफ कैलाश, कालिन्दी, ग्रीन पार्क, कालकाजी आश्रम, डिफेंस कालोनी, जंगपुरा, बदरपुर, उड़ीसा, नीमच तथा अन्य पर्वाधिराज पर्यूषण की उपासना में जुटे हैं, सभी के मन में उत्साह-तरंगे और न ही क्षेत्र सम्बन्धी दूरी की चिन्ता है, सभी को इन दिनों अपनी आत्मशुद्धि और गुरू अर्चना की भावना इतना विभोर किये हुए है कि बस निराला ही समा बँधा है। आठों दिन महामंत्र नवकार जप की स्वरलहरियाँ गूँजती रही। सुबह लगभग ६ बजे से जाप प्रारंभ हो जाता ८.०० बजे से शास्त्र वाचन और प्रवचन का कार्यक्रम शुरू होता, जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करता रहा। परम पूज्य प्रवर्तिनी जी द्वारा धाराप्रवाह जिनवाणी की देशना ऐसी जादू भरी होती थी कि यहाँ विराजित श्रोतागण आत्मविस्मृत हो जाते।
परम श्रद्धेय आचार्य सम्राट ध्यान योगी श्री शिवमुनि जी म.सा. की कृपा से स्थानक में अभूतपूर्व रंग बरसा, श्री अन्तगड़ सूत्र एवं कल्पसूत्र का बहुत सुंदर रीति से होने वाला पाठ श्रवण कर सभी अत्यधिक आनंदित हुए। सुश्री महक और सुश्री मुस्कान ने महामंत्र नवकार के भक्तिगीत पर नृत्य प्रस्तुति दी, तपस्वियों का बहुमान किया गया। आलोचना पाठ के बाद सबने मांगलिक श्रवण किया।
संघ अध्यक्ष सुश्रावक सुभाष ओसवाल ने अपनी धर्म सहायिका नीलम ओसवाल सहित सभी कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। भक्तिमय वातावरण से गद्गद् होते हुए तपस्वी भाई-बहनों के साथ गणमान्य व्यक्तियों का बहुमान समागत अतिथियों का आभार व्यक्त किया गया। सुश्राविका संगीता जैन (धर्मपत्नी महेश जैन) ने आयम्बिल की तपस्या करते हुए सायंकालीन प्रतिक्रमण कराने का संपूर्ण पर्यूषण पर्व में आठ दिनों तक विपुल लाभ लिया, कई परिवारों के तो सभी सदस्य इस तपयज्ञ में जुड़ कर सभी के प्रेरणा स्त्रोत बनों।
दिनांक १३ सितंबर को महापर्व संवत्सरी संबंधी प्रतिक्रमण संपन्न हुआ, विगत वर्ष में जाने-अनजाने में हुई भूलों के लिए ८४ लाख जीवायोनियों के साथ क्षमायाचना, परमपूज्य आचार्य प्रवर, युवाचार्य जी, उपाध्याय जी, प्रवर्तकजी एवं समस्त पूज्य संतरत्नों एवं महासत्तियाँ जी म.सा. से हार्दिक क्षमायाचना कर सब ने अपनी आत्मा को उज्जवल किया। क्षमापना पर्व दिनांक १४ सितंबर को प्रात:काल ६.३० बजे नवकार मंत्र जाप के समापन सहित मंगलमय क्षणों में सोल्लास सम्पन्न हुआ। पर्यूषण पर्व की ऐतिहासिक आराधना के सभी दिनों में श्रोताओं की उपस्थिति उत्साहवर्धक रही। १५ उपवास, अठाईयाँ, आयंबिल, तप, बेले, तेले और उपवास तप सहित संवर-पौषध करने वाले भाई-बहनों की सूची काफी लम्बी रही। पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व एवं संवत्सरी पर्व के दिनों में नियमित स्वाध्याय भी चलता रहा, इस प्रकार प्रखर उद्बोधन सहित पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व की आराधना सम्पन्न हुई।

-सुभाष ओसवाल ‘हिंदी सेवी’
नई दिल्ली

अजित बागमार को अंतर्राष्ट्रीय नेतृत्व पुरस्कार

नाशिक : अखिल भारतीय मारवाड़ी गुजराती मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजित हुकुमचंद बागमार को अंतर्राष्ट्रीय आदर्श नेतृत्व विकास पुरस्कार २०१८ से सम्मानित किया गया, पटाया के हॉटल सिझन में अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन चायनीज सोशल ग्रुप के अध्यक्ष डॉ. चिंचोग द्वारा यह सम्मान दिया गया, इस अंतर्राष्ट्रीय शिवीर में भारत के १०० प्रतिनिधी व ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड, न्यूर्याक, इंडोनेशिया, सिंगापुर आदि से ५०० अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधी उपस्थित थे।
अजित जी ने अभी तक ५० से अधिक संस्थाओं में अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएं प्रदान की व नई प्रतिभाओं को साथ लेकर सामाजिक कार्य करते रहे हैं।
अखिल भारतीय मारवाड़ी-गुजराती मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजित बागमार नासिक में सुप्रसिद्ध नेचरोपॅथी, अ‍ॅक्युप्रेशर विशेषज्ञ के रूप में आज तक हजारों मरीजों के विविध प्रकार के रोगों का इलाज के साथ हजारों लोगों को व्यसनमुक्त करने का पवित्र कार्य कर रहे हैं। सामाजिक कार्यों में आगे बढ़ते सभी जाति धर्म के लोगों के लिए सामुहिक विवाह का भी आयोजन करते रहे हैं, इसी तरह अन्य सामाजिक कार्यों में भी आप सक्रिय भागीदारी निभाते रहते हैं।
अजित बागमार की नियुक्ति पर विधानसभा के पूर्व सभापति अरूणभाई गुजराती, खा. दिलीप गांधी, आ. डा सुधीर तांबे, आ. दराडे बंधु, आ. देवयानी फरांदे, आ. अनिल कदम, आ. बाळासाहेब सानप, माजी मंत्री बाळासाहेब थोरात, बबनराव घोलप, शोभाताई बच्छावत, बबनराव पाचपुते, राज पुरोहित, प्रतापदादा सोनवणे, निलीमाताई पवार, कोंडाजी मामा आव्हाड, माणिकराव बोरस्ते, हेमराज खाबिया, रमेश निमाणी, महेश पठाडे, सुनिल भोर आदि गणमान्यों ने भी स्वागत किया।

श्री दिगम्बर जैन समाज के वृद्धजन सम्मान समारोह सम्पन्न

जोधपुर : श्री दिगम्बर जैन पंचायत जोधपुर ने वृद्धजनों का सम्मान दिनांक २४-९-२०१८ वार सोमवार को श्री आदिनाथ वाटिका श्री दिगम्बर जैन मन्दिर रेल्वे स्टेशन के पास जोधपुर में किया गया, इस अवसर पर भजन संध्या का आयोजन भी किया गया। श्री अभिनन्दन जैन व श्री आकाश जी पांडया ने मधुर वाणी भजन प्रस्तुत किया, वृद्धजनों के सम्मान में भजन माला का आयोजन किया गया जो इस समारोह में खुशी का आनन्द छा गया। सम्मानित होने वालों में श्री कपूरचन्द जी जैन, श्री सुमेरचन्द जी जैन, श्री.डी.के. जैन, श्यामलाल जैन, राजेन्द्र कुमार जैन, मोहनलाल जैन, श्री एस.के. जैन, राजकुमार जैन, रजनीश कुमार जैन, विजेन्द्र कुमार जैन, महावीर प्रसाद जैन (अजमेरा) जैन गजट संवाददाता, सुरेश जैन (अजमेरा), सुमेरमलजी जैन आदि। श्रीमती जैनमीत जैन, श्रीमती कवलापति जैन, श्री विद्यमान जैन, श्रीमती कमला जैन, श्रीमती कमला पाटनी, श्रीमती शान्ता देवी, श्रीमती अ. सुमित्रा जैन, श्रीमती कमला देवी जैन, श्रीमती विद्या जैन को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के प्रायोजक सुरेश अजमेरा, संचालन रवि जैन, संयोजक राज कुमार छावड़ा व जैनम ग्रुप के सभी सदस्यों ने बड़ी लगन से कार्य किया, जैनम ग्रुप के सदस्यों ने वृद्धजनों का पाद पक्षाल भी किया व आशीर्वाद प्राप्त किया, इस अवसर पर जैन पंचायत के सभी कार्यकारणी के सदस्यों ने सभी वृद्धजनों की दीर्घायु व स्वस्थ जीवन की मंगल कामना की।

-महावीर प्रसाद जैन (अजमेरा)
जोधपुर

दिल्ली : ५ अक्टुबर २०१८ युवाचार्य श्री महेंद्र ऋषि जी के ५२ वें जन्म दिवस पर उदयपुर राजस्थान में आचार्य श्री शिव मुनि जी के पावन सानिध्य में सभी जैन साधु-साध्वी जी महाराज की सेवा करने व जीव दया पुरस्कार वितरित करते हुए |

आचार्य विद्यासागर जी

आचार्य विद्यासागर जी

आत्मबोध और आत्मशुद्धि का ज्ञान कराने वाले जैन संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी
Aacharya Vidhyasagar

३ अक्टूबर २०१८ को जिनागम, मेरा राजस्थान, मैं भारत हूँ, अंधरी टाईम्स के वरिष्ठ सम्पादक बिजय कुमार जैन के साथ दिगम्बराचार्य विद्यासागर जी का खजुराहो में दर्शन लाभ और आशीर्वाद प्राप्त करने का सुअवसर मिला। प्रसंग था -‘हिंदी’ को भारत की राष्ट्रभाषा का संवैधानिक दर्जा मिले’ तथा इस देश को ‘इण्डिया’ नहीं ‘भारत’ के नाम से सम्बोधित किया जाए, दिल्ली स्थित ‘इण्डिया गेट’ को ‘भारत द्वार’ बोला जाए। आचार्यश्री ने बड़े प्रफुल्लित मन से बात को सुना तथा भरपूर आशीर्वाद दिया तथा यह भी कहा- ‘आगे बढो’। आचार्यश्री के आशीर्वाद से हम में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ तथा पूरे जोश के साथ इस राष्ट्रीय महायज्ञ के कार्य को आगे बढ़ाने में गति मिली।
आचार्य श्री विद्यासागर जी के लगभग २० मिनट के सानिध्य में जो वार्ता हुई, इसी मध्य मैं देख रहा था कि उनकी दिनचर्या, उनका सोच, कार्य शैली, स्वाध्याय, स्मरण शक्ति, उनका तप, अध्यात्म साधना आदि सभी अद्भुत थी, उनकी निश्छलता और सादगी सभी के लिए प्रेरणादायी थी। दिखावा लेशमात्र भी नहीं था, यदि उन्हें सभी जैन संतों के लिए एक आदर्श एवं प्रेरणास्त्रोत कहा जाए जो अतिश्योक्ति नहीं होगी।
आचार्यश्री सभी व्यक्तियों को प्रकृति के अनुरूप रहने तथा स्वावलम्बी बनने का आव्हान करते हैं। आचार्यश्री के दर्शन लाभ के बाद यहाँ कुछ ऐसे प्रश्नों का समाधान उल्लेखित कर रहा हूँ जो साधारणतया दिगम्बर जैन साधुओं का दर्शन करने के बाद एक व्यक्ति के मन में उपजते हैं-

Vidhyasagar

१. जैन साधु निर्वस्त्र क्यों रहते हैं ?
जैन साधु आत्मशुद्धि पर अपना ध्यान केंद्रित रखते हैं, उनकी मान्यता है कि यदि आप कुछ संग्रह करने की मनोवृत्ति रखेंगे तो मूल उद्देश्य से भटक जायेंगे, वस्त्र भी लगाव का कारण बन सकते हैं तथा आत्मशुद्धि के मार्ग में बाधक बन सकते हैं। वे सर्दी, गर्मी, वर्षा आदि सभी प्रकार के मौसमों के मिजाज को बड़ी प्रसन्नता से सहन करते हुए अनवरत आत्मशुद्धि के मार्ग की ओर अग्रसर होते रहते हैं। जैन धर्मावलम्बियों की मान्यता है कि सभी प्रकार की आसक्तियों से मुक्त होने पर ही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सुलभ होता है। पूर्ण आसक्तियों का परित्याग करने में परिवार, धन और सभी प्रकार की सांसारिक वस्तुओं का त्याग करना सम्मिलित है।

२. जैन संतों द्वारा ‘पिच्छी’ और ‘कमण्डल’ को अपने हाथों में रखने के पीछे उद्देश्य क्या है ?
जैन धर्मावलम्बी ‘अहिंसा परमो धर्म’ अर्थात् अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है की मान्यता को स्वीकार करते हैं। मोर की पंखुड़ियां विश्व में उपलब्ध वस्तुओं में सबसे नरम/कोमल होती है तथा उससे किसी भी प्राणी को कोई क्षति नहीं पहुंचती है।
एक विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि मोर को किसी प्रकार की क्षति पहुँचाए बिना उनके द्वारा प्राकृतिक रूप में छोड़ी गई इन पंखुड़ियों को लोग एकत्रित करते हैं तथा इस प्रकार एकत्रित की गई पंखुड़ियों से पिच्छी तैयार की जाती है। संत लोग फर्श पर बैठने से पहले अथवा किसी धर्मग्रंथ को छूने के पहले पिच्छी से उसे साफ करते हैं जिससे किसी भी प्रकार के सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव को भी कोई क्षति न पहुँचे और शांतिपूर्ण तरीके से उसे अन्यत्र स्थानांतरित किया जा सके।
‘कमण्डल’ हाथ धोने के लिए तथा अन्य स्वास्थ्य सम्बंधी कारणों से अपने हाथों में रखते हैं। दिगम्बर जैन संत केवल इन दो चीजों को अपने साथ रखते हैं, अन्य शब्दों में कहा जा सकता है कि ये दो चीजें जैन संतों की अपने कार्यों में शुद्धता के प्रतीक हैं।

३. दिगम्बर जैन संत किस प्रकार आहार करते हैं ?
ये संत दिन में केवल एक बार आहार लेते हैं तथा एक बार ही पानी पीते हैं, चूँकि जैन संत सभी सांसारिक वस्तुओं का परित्याग कर देते हैं, इसी कारण वे आहार के लिए बर्तनों का भी प्रयोग नहीं करते। वे खड़ी मुद्रा में आहार ग्रहण करने के लिए अपने हाथों का उपयोग करते हैं। श्रावकों/अनुयायियों/समर्पित भाव रखने वालों द्वारा संतों को जो आहार दिया जाता है, उसमें शुद्धता का पूरा ध्यान रखा जाता है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वे अपने ‘आहार’ के लिए आम लोगों पर निर्भर रहते हैं तथा आहार स्वाद के लिए नहीं अपितु जीवित रहने के लिए ही ग्रहण करते हैं, उनके जीवन का मूल उद्देश्य ‘मोक्ष’ प्राप्त करना होता है जिसकी ओर उनका विशेष ध्यान रहता है।
४. जैन संत यातायात के साधनों का प्रयोग क्यों नहीं करते ?
जैन संत अहिंसा को परम धर्म मानते हुए सभी सांसारिक वस्तुओं का परित्याग कर देते हैं तथा एक स्थान से दूसरे स्थान पर विहार करते समय गाड़ियों आदि का उपयोग यह सोचकर नहीं करते कि इन यातायात के साधनों के प्रयोग में हजारों जीव-जन्तुओं की क्षति होती है, जैन संत जब विहार करते हैं तब इतनी सावधानी रखते हैं कि उनके कदमों से छोटी-सी चींटी अथवा अन्य किसी प्रकार के कीड़े-मकोड़ों को क्षति न पहुंचे, उनका प्रत्येक कार्य इस प्रकार का होता है कि मन-वचन अथवा कर्म से प्राणी मात्र को किसी प्रकार का कष्ट न पहुंचे।

५. जैन दर्शन के मौलिक सिद्धांत क्या हैं ?
जैन दर्शन की मान्यता है कि यह ब्रह्माण्ड और इसमें पाये जाने वाले सभी तत्व शाश्वत हैं, समय की गति के साथ इनका न आदि और न ही अन्त है। कर्म, मृत्यु, पुर्नजन्म आदि सभी इस ब्रह्माण्ड में अपने सार्वभौमिक नियमों के अन्तर्गत परिचालित होते हैं। सभी तत्व अपने स्वरूप में लगातार परिवर्तित अथवा रूपान्तरित होते रहते हैं। ब्रह्माण्ड में किसी तत्व को उत्पन्न अथवा विनष्ट नहीं किया जा सकता है, इस ब्रह्माण्ड को संचालित करने के लिए ईश्वर अथवा अन्य कोई देवी-शक्ति नहीं है। जैन दर्शन ईश्वर को सृष्टि का रचयिता, पालनहार अथवा विनष्ट करने वाला नहीं मानता, जैन दर्शन की मान्यता है कि ईश्वर मानव का एक श्रेष्ठ रूप है और इस रूप में इस सृष्टि की अच्छी अथवा बुरी घटनाओं में उसका कोई हस्तक्षेप नहीं है।
एक व्यक्ति के जब सभी कर्मों का नाश हो जाता है तो उसकी आत्मा मुक्त हो जाती है, वह ‘मोक्ष’ की स्थिति में पहुंच जाता है, सभी व्यक्तियों में एक ही प्रकार की आत्मा होती है, अस्तु सभी में ईश्वर बनने की क्षमता है। जैन दर्शन में ईश्वर मानव का सर्वश्रेष्ठ रूपान्तरण है। यह ब्रह्माण्ड छ:तत्वों-जीव, पुद्गल, अक्ष, धर्म, अधर्म और काल से बना है।
ईश्वर आत्म स्वरूप है तथा सभी प्रकार के कर्मों के बंधन से मुक्त है। राग, द्वेष और आत्मज्ञान की कमी के कारण आत्मा कर्मों के बंधन में फँस जाती है, आत्मा अपने नैसर्गिक रूप से सर्वाधिक शक्तिशाली, चैतन्य और आध्यात्मिक है।
जैन धर्म में आत्मा की शुद्धि के लिए संतों द्वारा मन, वचन, कर्म से अहिंसा और अपरिग्रह का मार्ग अपनाया जाता है।
जैन धर्म के सिद्धांतों में ‘जीओ और जीने दो’, प्राणी मात्र को नष्ट न पहुंचाना, अपरिग्रह का पालन करना, क्रोध न करना, अभिमान का त्यागना, जाने-अनजाने में किसी के साथ दुव्र्यवहार न करना, चोरी नहीं करना, अकारण धन और समय की बर्बादी नहीं करना, जो कुछ भी करें-सावधानी से करना, सभी में एक जैसी आत्मा है, व्यक्ति आत्मा को अपने कर्मों के बंधन में फँसाता है। व्यक्ति से अपेक्षा है कि वह प्राकृतिक नियमों के अनुसार जीवन यापन करें, सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चारित्र अपनाकर मोक्ष प्राप्त करें, संक्षेप में आत्मशुद्धि ही जैन दर्शन का मार्ग है, कर्मों के बंधन से मुक्ति मोक्ष का द्वार है।

प्रो. मिश्री लाल मांडोत

विश्व शांति के लिए शुरू हुआ नवकार महामंत्र अनुष्ठान

बैंगलुरू : आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर ट्रस्ट के तत्वावधान में पंन्यासश्री कल्परक्षितविजयजी की निश्रा में नवकार महामंत्र का विशिष्ट आयोजन हुआ। पहले दिन उपकरण वंदनावली से कार्यक्रम की शुरूआत करते हुए पंन्यासश्री ने कहा कि नवकार महामंत्र को आत्मसात करना चाहिए। नवकार महामंत्र जीवन में उतारने से शांति संभव है। नवकार मंत्र की निष्काम साधना से लौकिक व परलौकिक सभी प्रकार के कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
यदि जाप करने वाला सदाचारी, शुद्धात्मा, सत्यवक्ता, अहिंसक व ईमानदार हो तो ऐसे व्यक्ति को मंत्र की आराधना का फल तत्काल मिलता है। मंत्र का जाप मन, वचन और काया की शुद्धिपूर्वक विधि सहित करना चाहिए। संघ के सहसचिव गौतमचन्द सोलंकी ने बताया कि नवकार महामंत्र का अखंड जाप नौ दिनों तक चला। ट्रस्टी देवकुमार जैन ने ‘जिनागम’ को बताया कि इस अनुष्ठान में एकासना तप की व्यवस्था आदिनाथ जैन सर्वोत्तम सेवा मंडल द्वारा एवं नौ द्रव्यों द्वारा कराई गयी।

दिगम्बर जैन युवक-युवती सम्मेलन सफल

दिगम्बर जैन युवक-युवती सम्मेलन सफल

Indore Jain Temple

अखिल भारतीय पुलक जन चेतना मंच एवम राष्ट्रीय जैन महिला जाग्रति मंच, इंदौर के तत्वावधान में दो दिवसीय अन्तराष्ट्रीय दिगम्बर जैन विवाह योग्य युवक युवती परिचय सम्मेलन भव्यता के साथ सानन्द सम्पन्न हुआ। परिचय सम्मेलन के दूसरे दिन सुबह से ही मुकुट मांगलिक भवन में समाजजनों अभिभावकों एवम प्रत्यासियों का आना शुरू हो गया। सेकड़ों प्रत्यासियों ने मंच पर आकर अपना परिचय दिया, सभी युवक-युवती प्रत्यासियों ने अपनी पसन्द मंच के माध्यम से व्यक्त की, अनेक प्रत्यासियों के अभिभावकों ने भी मंच पर आकर परिचय दिया। दिगम्बर जैन समाज के अध्यक्ष भरत मोदी, संजय पाटोदी, हेमचन्द्र मीना झांझरी, श्रीमती योगिता अजेमरा, राहुल सेठी, विमल माया झांझरी, डॉक्टर अशोक बंडी, डॉक्टर शिरिष श्रीवास्तव, डॉक्टर योगेश जैन ने चित्र अनावरण एवम दीप प्रज्वलन की मांगलिक क्रिया सम्पन्न की। मुकुट मांगलिक भवन में अपार जन समूह उमड़ पड़ा, इस अवसर पर भरत मोदी जी का जन्म दिन भव्यता के साथ मनाया गया। दूसरा सत्र दोपहर २ बजे से प्रारम्भ हुआ दिगम्बर जैन समाजिक संसद के पूर्व अध्यक्ष कैलाश वेद, एम के जैन, सुशील डबडेरा, नवीन गोधा, अनिल जैन ‘जैनको’, अरविंद जैन, एडवोकेट चिंतन बाकलीवाल, सुदीप जैन, अजय मिंडा, अखिलेश जैन, नवनीत जैन, महेंद्र जैन ‘चुकरु’, योगेंद्र काला, कमल काला, पदम मोदी, सुनील जैन, अतुल बघेरवाल, तल्लीन बड़जात्या, कोमल दद्दा, पवन सिंघई, आसिष जी सरिता जी जैन ‘सूत वाले’, दीपक वन्दना जी जैन ‘सूत वाले’, मंच परिवार की राष्ट्रीय सहमंत्री श्रीमती प्रीति जे के जैन, नरेश गंगवाल ‘आष्टा’ सहित अनेक समाज श्रेष्ठियों ने उपस्थित होकर सम्मेलन का गौरव बढ़ाया एवम सभी प्रत्यासियों को शुभकामनाएं प्रेषित की। मंच परिवार सभी सम्मानीय अतिथियों का स्वागत कर गौरान्वित हुआ। प्रमुख संयोजक चिराग जैन श्रीमती नीता जैन एवम श्रीमती अनामिका बाकलीवाल ने मंच संचालन किया।

सम्मेदशिखर जी में गणाचार्यश्री १०८
विरागसागरजी महाराज ८६ पीछी के साथ

इंदौर : परम पूज्य गुरुदेव विरागसागर जी महाराज ससंघ (८६ पीछी) चातुर्मास कलश स्थापना भव्यता के साथ सम्पन्न हुई। भारत वर्ष के अनेकों नगर से हजारों भक्त कार्यक्रम में पधारे। झारखंड शिक्षामंत्री नीरा यादव,१३ पंथी समिति के कैलाश बड़जात्या, कमल पहाड़े, नेमिचन्द जैन जयपुर, खंडाकाजी जयपुर, मनोज़ बाकलीवाल इंदौर, मनिश गंगवाल कलकत्ता, हेमंत पाटनी इंदौर, ओम प्रकाश उदयपुर, दगिमालपुर, गिरिडीह, गया, कलकत्ता, सालेहा, सतना, जबलपुर, आदि अनेकों भक्तों ने कार्यक्रम की शोभा बड़ाई।
कार्यक्रम में शिखरजी में विराजमान सभी साधुगण, आर्यिका श्री ने भी पधारकर धर्म प्रभावना की, कार्यक्रम का संचालन अनामिका मनोज बाकलीवाल ने किया।

जैन-धर्म की वर्तमान दशा

जैन-धर्म की वर्तमान दशा

Aacharaya Bhikshu Jain

आचार्य भिक्षु ने जैन-धर्म की
वर्तमान अवस्था का सजीव
चित्रण किया है-
भगवान् महावीर के निर्वाण होने
पर घोर अन्धकार छा गया है,
जिन-धर्म आज भी अस्तित्व में
है, पर जुगनू के चमत्कार जैसा
जैसे जुगनू का प्रकाश क्षण में
होता है, क्षण में मिट जाता है,
साधुओं की पूजा अल्प होती है,
असाधु पूजे जा रहे हैं।
यह सूर्य कभी उग रहा है,
कभी अस्त हो रहा हैं, भेख-धारी
बढ़ रहे हैं, वे परस्पर कलह
करते हैं।
उन्हें कोई उपदेश दे तो वे क्रोध
कर लड़ने को प्रस्तुत हो जाते हैं,
वे शिष्य-शिष्याओं के लालची
हैं।
सम्प्रदाय चलाने के अर्थी।
बुद्धि-विकल व्यक्तियों को मूंड
इकट्ठा करते हैं,
गृहस्थों के पास से रूपये दिलाते
हैं। शिष्यों को खरीदने के लिए,
वे पूज्य की पदवी को लेंगे,
शासन के नायक बन बैठेंगे;
पर आचार में होंगे शिथिल,
वे नहीं करेंगे आत्म-साधना का
कार्य।
गुणों के बिना आचार्य नाम
धराएंगे, उनका परिवार पेटू
होगा,
वे इन्द्रियों का पोषण करने में
रत रहेंगे, सरस आहार के लिए
भटकते रहेंगे।
वैराग्य घटा है, वेश बढ़ा है,
हाथी का भार गधों पर लदा है,
गधे थक गए, बोझ नीचे डाल
दिया,
इस काल में ऐसे भेखधारी हैं।
उनका भगवान् महावीर के प्रति
आत्म-निवेदन भी बड़ा मार्मिक
है- भगवान् आज यहां कोई
सर्वज्ञ नहीं है और श्रुतकेवली भी
विच्छिन्न हो चुके।
आज कुबुद्धि कदाग्रहियों ने
जैन-धर्म को बांट दिया है।
छोड़ चुके हैं जैन-धर्म को राजा,
महाराजा सब।
प्रभो! जैन-धर्म आज विपदा में
है, केवलज्ञान-शून्य, क्रोध बढ़
रहा है।
इन नामधारी साधुओं ने पेट पूर्ति
के लिए, दूसरे दर्शनों की शरण
ले ली है।
इन्हें कैसे फिर मार्ग पर लाया
जाए?
इनकी विचारधारा का कोई
सिर-पैर नहीं है, न्याय की बात
कहने पर ये कलह करने को
तैयार हो जाते हैं।
प्रभो! तुमने कहा हैसम्यग्दर्श
न, ज्ञान, चरित्र और
तप-मुक्ति-मार्ग नहीं मानना।
मैं अरिहंत को देव, और मानता
हूं गुरू निग्रन्थ को ही। धर्म वही
है सत्य सनातन,
जो कि अहिंसा कहा गया है।
शेष सब मेरे लिए भ्रम-जाल है।
मैं प्रभो! तुम्हारा शरणार्थी हूं,
मैं मानता हूं प्रमाण तुम्हारी आज्ञा
को। तुम्हीं हो आधार मेरे तो,
तुम्हारी आज्ञा में मुझे परम आनन्द
मिलता है।

‘मन का मानव’
– राष्ट्रसंत कवि श्री अमर मुनि जी महाराज सा.

कुछ भी नहीं असम्भव जग में,
सब सम्भव हो सकता है।
कार्य हेतु यदि कमर बाँध लो,
तो सब कुछ हो सकता है।।१।।
जीवन है नदिया की धारा, जब चाहो मुड़ सकती है।
नरक लोक से, स्वर्ग लोक से, जब चाहो जुड़ सकती है।।२।।
बन्धन-बन्धन क्या करते हो, बन्धन मन के बन्धन हैं।
साहस करो, उठो झटका दो, बन्धन क्षण के बन्धन हैं।।३।।
बीत गया कल, बीत गया वह, अब उसकी चर्चा छोड़ो।
आज कर्म करो निष्ठा से, कल के मधुर सपने जोड़ो।।४।।
तुम्हें स्वयं ही स्वर्णिम उज्जवल, निज इतिहास बनाना है।
करो सदा सत्कर्म विहँसते, कर्म-योग अपनाना है।।५।।
मन के हारे हार हुई है, मन के जीते जीत सदा।
सावधान मन हार न जाए, मन से मानव बना सदा।।६।।
तू सूरज है, पगले! फिर क्यों, अन्धकार से डरता है?
तू तो अपनी एक किरण से, जग प्रदीप्त कर सकता है।।७।।
अन्तर्मन में सद्भावां की, पावन गंगा जब बहती।
पाप पंक की कलुषित रेखा, नहीं एक क्षण को रहती।।८।।
धर्म हृदय की दिव्य ज्योति है, सावधान बुझने ना पाये।
काम-क्रोध-मन-लोभ-अहंके, अंधकार में डूब न जाये।।९।।
जाति, धर्म के क्षुद्र अहं पर, लड़ना केवल पशुता है।
जहाँ नहीं माधुर्य भाव हो, वहाँ कहाँ मानवता है? ।।१०।।
मंगल ही मंगल पाता है, जलते नित्य दीप से दीप।
जो जगती के दीप बनेंगे उनके नहीं बुझेंगे दीप।।११।।
धर्म न बाहर की सज्जा में, जयकारों में आडम्बर में।
वह तो अन्दर-अन्दर गहरे, भावों के अविनाशी स्वर में।।१२।।
‘मैं’ भी टूटे, ‘तू’ भी टूटे, एकमात्र सब हम ही हम हो।
‘एगे आया’ की ध्वनि गूँजे, एकमात्र सब सम-ही-सम हो।।१३।।
यह भी अच्छा, वह भी अच्छा, अच्छा-अच्छा सब मिल जाये।
हर मानव की यही तमन्ना, किन्तु प्राप्ति का मर्म न पाये।।१४।।
अच्छा पाना है, तो पहले खुद को, अच्छा क्यों न बना लें।
जो जैसा है, उसको वैसा, मिलता यह निज मन्त्र बना लें।।१५।।
परिवर्तन से क्या घबराना, परिवर्तन ही जीवन है।
धूप-छाँव के उलट-फेर में, हम सब का शक्ति-परीक्षण है।।१६।।
सत्य, सत्य है, एक मुखी है, उसके दो मुख कभी न होते।
दम्भ एक ही वह रावण है, उसके दस क्या, शतमुख होते।।१७।।
एक जाति हो एक राष्ट्र हो, एक धर्म हो धरती पर।
मानवता की ‘अमर’ ज्योति सब – ओर जगे जन-जन, घर-घर।।१८।।

-प्रस्तुति : रिखब चन्द जैन

शिक्षा के संग संस्कारों को भी उतारें जीवन में खास बातें

शिक्षा के संग संस्कारों को भी उतारें जीवन में खास बातें

तीर्थंकर महावीर

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के रिद्धि-सिद्धि भवन में हुए दशलक्षण पर्व के उत्तम आकिंचन्य के दिन परमपरमेष्ठी और आदिनाथ भगवान की आरती हुई। मध्यप्रदेश के जिला भिंड से ज्योति ब्रहम्चारणी दीदी और ऊषा दीदी ने पदार्पण किया। ज्योति दीदी ने जिनवाणी वंदना से शुरूआत की, बोलीं, हमें अपने साथ-साथ अपने धर्म पर भी विश्वास होना चाहिए कि हमें महावीर का धर्म मिला है। शिक्षा के साथ संस्कारों को भी अपने जीवन में उतारें। हमारा ऐसा संकल्प होना चाहिए कि हम इंसान बनेंगे और इंसान से भगवान बनेंगे।
ऊषा दीदी बोलीं, यदि मैं धर्म की बात करूं तो जो धर्म की प्रभावना करते हैं उसका जीवन में जरूर एक बार उसका प्रभाव पड़ता है। अपने व्यक्तिगत अनुभवों को साझा करते हुए बोलीं, जब मैं कॉलेज के टाइम में थी तो मां बोलती थी कि पयूर्षण पर्व आ गए हैं जा बेटा पूजा कर भक्ति कर। बच्चों तुम अपने माता-पिता से बहुत दूर हो, पर तुम अरिहंत पिता के पास हो, जो हजारों बच्चों का पालन कर रहे हैं। अंत में प्रश्नोत्तरी का दौर भी चला, सही उत्तर देने वालों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया, इससे पहले महावीर भगवान के समक्ष कुलाधिपति श्री सुरेश जैन, मुरादाबाद जैन मंदिर के प्रमुख डीके जैन, पैरामेडिकल के प्राचार्य डीके सिंह, फिजियोथेरेपी की विभागाध्यक्षा डॉ. शिवानी एम काल और हरि अभिनन्दन जैन ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलन किया।
श्रावक-श्राविकाओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रम के जरिए पूरा रिद्धि-सिद्धि भवन भक्तिरस में डुबो दिया। ……..णमोकार महामंत्र…….. और ……मंगलाचरण…… की प्रस्तुति हुई। फिजियोथीरेपी और पैरामेडिकल के छात्र-छात्राओं ने …….पधारो-पधारो पयूर्षण पर्व पर पधारो……, …….कौन है वो कौन है………….,……… हम जैन होने का परिचय देते हैं……,……..भक्तों की टोली……, …….भारत मां और देश के सैनिकों के लिए…… आदि भजनों पर सामूहिक नृत्य कर सभी को थिरकने पर मजबूर कर दिया, इसके बाद छात्र-छात्राओं ने ‘वाह रे भक्त तेरे कितने रूप हैं’ और ‘बाहुबली’ विषय पर नाटक की मनमोहक प्रस्तुती दी, अंत में तरूण सागर महाराज जी को श्रद्धांजली दी गई। संचालन दीपक जैन और अंशिका जैन ने किया, जबकि निर्णायक मंडल में टिमिट डायरेक्टर प्रो. विपिन जैन और मेघा शर्मा रहे। बाहुबली नाटक बेस्ट परफारमर ऑफ द डे चुना गया।

लोढ़ा एक्सलस में हाथों से बनी मूर्तियों का जलवा

मुंबई : के गणेशोत्सव में लोढ़ा एक्सलस कॉर्पोरेट ऑफिस कॉम्पलेक्स के गणपति की काफी चर्चा रही, इसके पीछे खास वजह यह थी कि गणपति की मुख्य मूर्ति के अलावा यहां और भी कई छोटी- बड़ी गणेश मूर्तियां एवं गणपति की पेंटिंग भी सजी थी, जो मल्टीनेशनल कंपनियों के कर्मचारियों ने अपने हाथों से बनाई थी, किसी भी मशीन की सहायता के बिना निर्मित ये विशेष मूर्तियां बेहद लुभावनी एवं प्रोफेशनल मूर्तिकारों की मूर्तिरचना के समकक्ष थी, जिनको बीते दिनों में हजारों लोगों ने दर्शन किए एवं सराहा, लोढ़ा फाउंडेशन की चेयरपरसन मंजू लोढ़ा ने सभी सहभागियों का आभार जताया।
दक्षिण मुंबई स्थित एनएम जोशी मार्ग के अपोलो मिल कंपाउंड स्थित कॉर्पोरेट ऑफिस कॉम्पलेक्स ‘लोढ़ा एक्सलस’ में स्थापित भगवान गणपति की ईको फ्रेंडली मुख्य प्रतिमा अपने आप में बेहद अदभुत एवं आकर्षक थी।

मंजू लोढ़ा

मंजू लोढ़ा

मंजू लोढ़ा की नई पुस्तक ‘…कि घर कब आओगे!’ सैनिक परिवारों के दर्द की दास्तान सीधे दिल में बहने लगती है
Manju Lodhha

वह एक विवाहिता है, जिसका मन हर पल सिकुड़ा-सा किसी कोने में दुबका बैठा रहता है, उसके चेहरे पर अवसाद और संताप हर पल चढ़ता-उतरता देखा जा सकता है, वह हर पल अपने सुहाग के इंतजार में रहती है जब पति घर लौटता है, तो उसी पल वह उसके फिर से अचानक चले जाने के डर से सहमी रहती है, और जाने पर, फोन की हर घंटी उसे किसी बुरी खबर की आशंका से डराती है, यह एक सैनिक की पत्नी है, जो खुश होती है, तड़पती है, विरह में भीतर ही भीतर हर पल खोई रहती है, न सोती है, न रोती है। जानी मानी लेखिका मंजू लोढ़ा की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘…कि घर कब आओगे’ में सैनिक पत्नियों की व्यथा पढ़कर मन द्रवित हो उठता है। आखिर सीमा पर लड़ रहे सैनिकों की पत्नियों और परिवारजनों के भी सपने होते हैं, लेकिन उनके निजी जीवन की व्यथा कुछ-कुछ ऐसी होती है कि क्या तो सपने और क्या हो अपने। मंजू लोढ़ा ने सैनिक परिवारों और सैनिकों की पत्नियों के दर्द का अपनी इस ताजा पुस्तक में बेहद मार्मिक चित्रण किया है।
वैसे तो इस पुस्तक में मंजू लोढ़ा की कई कविताएं हैं, लेकिन… ‘फिर इंतजार की घडीयां काट लूंगी’, ‘तुम साथ होते तो’, ‘तेरे जाने के बाद’, ‘नवविवाहिता की व्यथा’, ‘एक सैनिक पत्नी की कथा’, ‘पापा जब घर आए ओढ़ के तिरंगा’ आदि पढ़कर हमारा मन कहीं खो सा जाता है, लगता है कि आखिर सैनिक परिवारों की जिंदगी में इतनी सारी विडंबनाएं एक साथ हैं, तो क्यूं है, इन्हीं कविताओं में से एक कविता में सैनिक की पत्नी जब अपने पति के शहीद हो जाने पर बच्चों को भी फौज में भेजने का ऐलान करती है, तो राष्ट्रप्रेम से सजे नारी मन की मजबूती के तीखे तेवर हमारी आंखों के सामने उतर जाते हैं। मंजू लोढ़ा की ये कविताएं सैनिक परिवारों के रिश्तों को, उन रिश्तों की भावनाओं को और उन भावनाओं में छिपे भविष्य को बहुत ही करीब से जाकर पढ़ती सी लगती हैं, ये कविताएं उन रिश्तों की भावनाओं को गुनती हैं, बुनती हैं और उनकी उसी गर्माहट को ठीक उसी अहसास में परोसने में सफल होती हैं। ये कविताएं सीधे मन में समाने लगती है और पढ़ते हुए आभास होता है कि लेखिका ने सचमुच सैनिक की पत्नी और उसके परिवार के जीवन में किसी अपने के साथ की कमी को, सुख के संकट को और राष्ट्र के प्रति प्रेम से पैदा हुए दर्द के दरिया को शब्दों में बहुत ही भावों के साथ पिरोया है।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस के १२१वें जयंती वर्ष पर प्रकाशित ‘…कि घर कब आओगे!’ पुस्तक को श्रीमती लोढ़ा ने भारतमाता के वीर जवानों व उनके परिवारों को समर्पित किया है। नई दिल्ली स्थित केके पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित २४ पृष्ठ की यह पुस्तक है तो छोटी सी, लेकिन भावनाओ का ज्वार जगा जाती है। लंदन, मुंबई और नई दिल्ली में विमोचित प्रसिद्ध पुस्तक ‘परमवीर’ के बाद मंजू लोढ़ा की यह ताजा कृति सैनिक परिवारों के प्रति कृतज्ञता, सद्भावना, संवेदना, सहानुभूति और अनुकंपा का भाव जगाती है।