Author: Bijay Kumar Jain

इंडिया नहीं भारत बोलें सभा सम्पन्न

इंडिया नहीं भारत बोलें सभा सम्पन्न

  इंडिया नहीं भारत बोलें सभा सम्पन्न सत्य, अहिंसा और विश्व शांति के अग्रदूत जन-जन के आराध्य वर्तमान शासन नायक श्री १००८ तीर्थंकर महावीर की २६२० वीजन्म कल्याणक दिनांक २५ अप्रैल २०२१ के पावन स्वर्णिम अवसर पर ‘मैं भारत हूँ’ संघ के तत्वाधान में एक भव्य वेबीनार काआयोजन कर किया गया। वेबीनार के प्रारंभ में मंगलाचरण पाठ राष्ट्रीय संवाददाता पारस जैन ‘पार्श्वमणि’ पत्रकार कोटाराजस्थान में अपनी सुमधुर आवाज में सभी को भावविभोर कर दिया। संघ के अध्यक्ष बिजय कुमार जैन मुंबई ने बताया कि इसअवसर पर जैन धर्म और देश के विकास के लिए काम करने वाले नवरत्नों को सम्मानित किया गया। जिसमें पारस जैन पार्श्वमणिपत्रकार कोटा, खिल्लीमल जैन अलवर, प्रदिप बडजात्या इंदौर, पूर्व न्यायाधीश पानाचंद जैन जयपुर, इंदु जैन दिल्ली, साहिल जैनधूलियान, पद्मश्री बिमलजैन पटना प्रमुख थे। इन्होंने अलग-अलग आयामों में जैन धर्म दर्शन में अपनी सेवाएं समाज को निस्वार्थभाव से समर्पित की। मंच का सफल संचालन खुशबू जैन ने बहुत ही शानदार अंदाज में किया जो एवं तीर्थंकर महावीर स्वामी की एवंतीर्थंकर महावीर स्वामी की जीवनी का वर्णन किया। साथ ही कोमल जैन कनक कोचर, पुष्पा देवी, अर्चना जैन और रवि जैन,श्रेयांश बैद ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति देकर सबका मन जीत लिया। विदित हो कि संगीतकार व गीतकार रवि जैन ‘मैं भारत हूँ’ संघद्वारा इंडिया नहीं भारत बोले पर एक भारत गीत भी बनाया गए। इस अवसर पर सभी ने भगवान महावीर के दिखाए अहिंसा औरसत्य के पथ पर चलने का संकल्प लिया साथ ही अपने देश को भारत के नाम से पुकारने के अभियान को युद्ध स्तर पर ले जाने कीशपथ ली। इंडिया नहीं भारत बोलें सभा सम्पन्न

तेरापंथ की अनमोल बातें

तेरापंथ की अनमोल बातें

तेरापंथ की अनमोल बातें : तेरापंथ की स्थापना हुई- आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा, संवत् १८१७, केलवा (राजस्थान)। तेरापंथ के प्रथम साधु- मुनि थिरपालजी, जिन्होंने संघ की नींव को स्थिर बनाया। तेरापंथ की प्रथम साध्वी- साध्वी कुशालांजी। तेरापंथ की स्थापना के बाद संघ में दीक्षित होने का सौभाग्य मिला साध्वीत्रय को- साध्वी कुशालां जी, मट्टू जी एवं अजबू जी। तेरापंथ का प्रथम मर्यादा पत्र (संविधान) लिखा गया- मृगसर कृष्णा ७, संवत् १८३२। आखिरी मर्यादा पत्र (संविधान) लिखा गया- आचार्य भिक्षु द्वारा माघ शुक्ला ७, संवत् १८५३। हाजरी वाचन का प्रारम्भ हुआ – श्रीमज्जयाचार्य द्वारा पौष कृष्णा संवत्‌ १९१० (रावलियां)। सेवा केन्द्र की स्थापना – श्रीमज्जयाचार्य द्वारा संवत्‌ा् १९१४ (लाडनूं)। साध्वी प्रमुखा पद का प्रारम्भ – श्रीrमज्जयाचार्य द्वारा संवत् १९१०। आचार्य भारीमलजी ने मुनि वर्धमानजी को अर्धरात्रि में दीक्षित किया। साध्वी नंदू जी (सं. १८७३), मुनिश्री जीवोजी (सं.१८८०), मुनिश्री हरखचंदजी (सं.१९०२) एवं। मुनिश्री अभयराजजी (सं.१९१७) की दीक्षा गहने-कपड़े सहित गृहस्थ वेश में हुई। आचार्य भिक्षु ने ३८ हजार पद परिणाम साहित्य लिखे। जयाचार्य ने साढ़े तीन लाख पद परिणाम साहित्य लिखे। तेरापंथ की अनमोल बातें 

सीहोर में मिली पार्श्वनाथ जी की अति प्राचीन प्रतिमा

सीहोर में मिली पार्श्वनाथ जी की अति प्राचीन प्रतिमा

सीहोर में मिली पार्श्वनाथ जी की अति प्राचीन प्रतिमा : सीहोर: मध्यप्रदेश का राजधानी भोपाल के नजदीक सीहोर जिले की सीवन नदी के किनारे चौधरी घाट पर २३वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी की सर्वांग सुंदर प्रतिमा प्राप्त हुई हैं। सीहोर शासकीय महाविद्यालय में प्रोफेसर श्री गणेशी लाल जैन व जैन समाज के अध्यक्ष श्री अजय जैन ने बताया कि प्रतिमा को चौधरी घाट से उठाकर श्री दिगम्बर जैन मंदिर सीहोर में लाकर साफ सफाई की गई।प्रतिमा ९वीं शताब्दी की प्रतीत होती हैं।प्रतिमा पद्मासन होकर पांच फन युक्त व यक्ष यक्षिणी सहित है। प्रतिमा प्राप्त होने से जैन समाज में उत्साह व्याप्त हो गया है, आसपास के समाजजन दर्शन के लिए आ रहे है। समाज ने कहा कि यदि चौधरी घाट पर खुदाई कराई जाए तो और प्रतिमाएं प्राप्त हो सकती हैं। सीहोर भोपाल इंदौर मार्ग पर स्तिथ है। राजेन्द्र जैन महावीर ने कहा कि जिस तरह प्रतिमा दिखाई दे रही हैं वैसी प्रतिमा नेमावर के सिद्धोदय तीर्थ व पुष्पगिरी तीर्थ सोनकच्छ में भी स्थापित है, दोनों तीर्थो पर विराजमान प्रतिमाएं भी खुदाई में ही मिली थी, यह इलाका जैन धर्म का प्राचीन केंद्र रहा है , पुरातत्व की दृष्टि से उक्त स्थानों की खुदाई करने पर जैन प्रतिमाएं प्राप्त हो सकती हैं। जैन समाज उक्त प्रतिमा का संरक्षण कर अपना प्राचीन इतिहास समृद्ध कर अपना कर्तव्य पूर्ण करेगा । – राजेन्द्र जैन महावीर २१७,सोलंकी कॉलोनी ,सनावद, जिला – खरगोन, मध्यप्रदेश, भारत -४५११११ भ्रमणध्वनि :९४०७४९२५७७ सीहोर में मिली पार्श्वनाथ जी की अति प्राचीन प्रतिमा

जैन एकता है जरुरी 0

जैन एकता है जरुरी

जैन एकता का प्रश्न खड़ा है सबके सम्मुख हल अभी तक क्यों कोई खोज नहीं पाया है अनेकता में एकता की बात हम कैसे कहें अलग-अलग पंथ का ध्वज हमने फहराया है गुरुओं ने अपने-अपने कई पंथ बना लिए महावीर के मूल पथ को सभी ने बिसराया है ‘संवत्सरी’ को भी हम अलग-अलग मनाते सभी एकता का भाव कहां मन में समाया है संगठन में ही शक्ति है ये क्यों नहीं विश्वास हमें भविष्य के अंधेरे का होता क्यों नहीं आभास हमें टूट टूट कर बिखर जाएंगे वे दिन अब दूर नहीं खतरे की घंटियों का क्यों नहीं अहसास हमें एक ही है ध्वज हमारा, सबका मंत्र एक ‘णमोकार’ है एक ही प्रतीक चिन्ह है, महावीर हम सब के आधार हैं अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांत सभी मूल सिद्धांत हमारे हैं रोटी-बेटी का व्यवहार आपस में हम सब करते सारे हैं वक्त आ गया है फिर एकता का बिगुल हमें बजाना है मनमुटाव छोड़ हम सब को एक ध्वज के नीचे आना है महावीर को अलग-अलग रूपों में तो हमने माना खूब अब हमें एक होकर महावीर को दिल से अपनाना है परचम एकता का नहीं लहराया तो बुद्धिमान समाज बुद्धू कहलाएगा संगठित गर नहीं हुए तो वजूद ही हमारा संकट में पड़ जाएगा देर हुई तो भले हुई अब और नहीं देर करो एक हो मन तो हमारे रोम-रोम में शक्ति का संचार होगा पुरी दुनिया में अलग ही जैन समाज का परचम लहरायेगा – युगराज जैऩ मुंबई जैन समाज

तीर्थंकर महावीर स्वामी का संक्षिप्त जीवन परिचय 0

तीर्थंकर महावीर स्वामी का संक्षिप्त जीवन परिचय

तीर्थंकर महावीर स्वामी का संक्षिप्त जीवन परिचय :पूरे भारत वर्ष में महावीर जन्म कल्याणक पर्व जैन समाज द्वारा उत्सव के रूप में मनाया जाता है। जैन समाज द्वारा मनाए जाने वाले इस त्यौहार को महावीर जयंती के साथ-साथ महावीर जन्म कल्याणक नाम से भी जानते हैं, महावीर जन्म कल्याणक हर वर्ष चैत्र माह के १३ वें दिन मनाई जाती है, जो हमारे वर्किंग केलेन्डर के हिसाब से मार्च या अप्रैल में आता है, इस दिन हर तरह के जैन दिगम्बर-श्वेताम्बर आदि एकसाथ मिलकर इस उत्सव को मनाते हैं, भगवान महावीर के जन्म उत्सव के रूप में मनाए जाने वाले इस त्यौहार में भारत के कई राज्यों में सरकारी छुट्टी घोषित की गयी है। जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर का जीवन उनके जन्म के ढाई हजार साल से उनके लाखों अनुयायियों के साथ ही पूरी दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ा रहा है, पंचशील सिद्धान्त के प्रर्वतक और जैन धर्म के चौबिसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी अहिंसा के प्रमुख ध्‍वजवाहकों में है। जैन ग्रंथों के अनुसार २३वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी के मोक्ष प्राप्ति के बाद २९८ वर्ष बाद तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म‍ ऐसे युग में हुआ, जहां पशु‍बलि, हिंसा और जाति-पाति के भेदभाव का अंधविश्वास जारी था। महावीर स्वामी के जीवन को लेकर श्वेताम्बर और दिगम्बर जैनियों में कई तरह के अलग-अलग तथ्य हैं: तीर्थंकर महावीर के जन्म और जीवन की जानकारी तीर्थंकर महावीर का जन्म लगभग २६०० वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन क्षत्रियकुण्ड नगर में हुआ, तीर्थंकर महावीर की माता का नाम महारानी त्रिशला और पिता का नाम महाराज सिद्धार्थ थे, तीर्थंकर महावीर कई नामों से जाने गए उनके कुछ प्रमुख नाम वर्धमान, महावीर, सन्मति, श्रमण आदि हैं, तीर्थंकर महावीर स्वामी के भाई नंदिवर्धन और बहन सुदर्शना थी, बचपन से ही महावीर तेजस्वी और साहसी थे। किंवदंतियोंनुसार शिक्षा पूरी होने के बाद माता-पिता ने इनका विवाह राजकुमारी यशोदा के साथ कर दिया गया था। तीर्थंकर महावीर स्वामी का संक्षिप्त जीवन परिचय ( Tirthankar Mahavir Swami’s brief life introduction in hindi ) भगवान महावीर का जन्म एक साधारण बालक के रूप में हुआ था, इन्होंने अपनी कठिन तपस्या से अपने जीवन को अनूठा बनाया, महावीर स्वामी के जीवन के हर चरण में एक कथा व्याप्त है, हम यहां उनके जीवन से जुड़े कुछ चरणों तथा उसमें निहित कथाओं को उल्लेखित कर रहे हैं: महावीर स्वामी जन्म और नामकरण संस्कार: तीर्थंकर महावीर स्वामी के जन्म के समय क्षत्रियकुण्ड गांव में दस दिनों तक उत्सव मनाया गया, सारे मित्रों-भाई बंधुओं को आमंत्रित किया गया तथा उनका खूब सत्कार किया गया, राजा सिद्धार्थ का कहना था कि जब से महावीर का जन्म उनके परिवार में हुआ है, तब से उनके धन-धान्य कोष भंडार बल आदि सभी राजकीय साधनों में बहुत ही वृध्दी हुई, उन्होंने सबकी सहमति से अपने पुत्र का नाम वर्धमान रखा।महावीर स्वामी का विवाह: कहा जाता है कि महावीर स्वामी अन्तर्मुखी स्वभाव के थे, शुरुवात से ही उन्हें संसार के भोगों में कोई रुचि नहीं थी, परंतु माता-पिता की इच्छा के कारण उन्होंने वसंतपुर के महासामन्त समरवीर की पुत्री यशोदा के साथ विवाह किया, कहीं-कहीं लिखा हुआ यह भी मिलता है कि उनकी एक पुत्री हुई, जिसका नाम प्रियदर्शना रखा गया था। तीर्थंकर महावीर स्वामी का वैराग्य: तीर्थंकर महावीर स्वामी के माता-पिता की मृत्यु के पश्चात उनके मन में वैराग्य लेने की इच्छा जागृत हुई, परंतु जब उन्होंने इसके लिए अपने बड़े भाई से आज्ञा मांगी तो भाई ने कुछ समय रुकने का आग्रह किया, तब महावीर ने अपने भाई की आज्ञा का मान रखते हुये २ वर्ष पश्चात ३० वर्ष की आयु में वैराग्य लिया, इतनी कम आयु में घर का त्याग कर ‘केशलोच’ के पश्चात जंगल में रहने लगे। १२ वर्ष के कठोर तप के बाद जम्बक में ऋजुपालिका नदी के तट पर एक साल्व वृक्ष के नीचे केवल ज्ञान प्राप्त हुआ, इसके बाद उन्हें ‘केवलि’ नाम से जाना गया तथा उनके उपदेश चारों और फैलने लगे। बड़े-बड़े राजा महावीर स्वा‍मी के अनुयायी बनें, उनमें से बिम्बिसार भी एक थे। ३० वर्ष तक महावीर स्वामी ने त्याग, प्रेम और अहिंसा का संदेश फैलाया और बाद में वे जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंककर बनें और विश्व के श्रेष्ठ तीर्थंकरों में शुमार हुए।उपसर्ग, अभिग्रह, केवलज्ञान: तीस वर्ष की आयु में तीर्थंकर महावीर स्वामी ने पूर्ण संयम के साथ श्रमण बन गये तथा दीक्षा लेते ही उन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हो गया। दीक्षा लेने के बाद तीर्थंकर महावीर स्वामी ने बहुत कठिन तपस्या की और विभिन्न कठिन उपसर्गों को समता भाव से ग्रहण किया। साधना के बारहवें वर्ष में महावीर स्वामी जी मेढ़िया ग्राम से कोशम्बी आए तब उन्होंने पौष कृष्णा प्रतिपदा के दिन एक बहुत ही कठिन अभिग्रह धारण किया, इसके पश्चात साढ़े बारह वर्ष की कठिन तपस्या और साधना के बाद ऋजुबालिका नदी के किनारे महावीर स्वामी जी शाल वृक्ष के नीचे वैशाख शुक्ल दशमी के दिन केवल ज्ञान- केवल दर्शन की उपलब्धि हुई।तीर्थंकर महावीर और जैन धर्म: महावीर को वीर, अतिवीर और स​न्मती के नाम से भी जाना जाता है, वे तीर्थंकर महावीर स्वामी ही थे, जिनके कारण २३वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों ने एक विशाल धर्म ‘जैन धर्म’ का रूप धारण किया। तीर्थंकर महावीर के जन्म स्थान को लेकर विद्वानों में कई मत प्रचलित हैं, लेकिन उनके भारत में अवतरण को लेकर एकमत है, वे तीर्थंकर महावीर के कार्यकाल को ईराक के जराथ्रुस्ट, फिलिस्तीन के जिरेमिया, चीन के कन्फ्यूसियस तथा लाओत्से और युनान के पाइथोगोरस, प्लेटो और सुकरात के समकालीन मानते हैं। भारत वर्ष को भगवान महावीर ने गहरे तक प्रभावित किया, उनकी शिक्षाओं से तत्कालीन राजवंश खासे प्रभावित हुए और ढेरों राजाओं ने जैन धर्म को अपना राजधर्म बनाया। बिम्बसार और चंद्रगुप्त मौर्य का नाम इन राजवंशों में प्रमुखता से लिया जा सकता है, जो जैन धर्म के अनुयायी बने। तीर्थंकर महावीर ने अहिंसा को जैन धर्म का आधार बनाया, उन्होंने तत्कालीन हिन्दु समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था का विरोध किया और सबको समान मानने पर जोर दिया, उन्होंने ‘जियो और ​जीने दो’ के सिद्धान्त पर जोर दिया, सबको एक समान नजर में देखने वाले तीर्थंकर महावीर अहिंसा और अपरिग्रह के साक्षात मूर्ति थे, वे किसी को भी कोई दु:ख नहीं देना चाहते थे।महावीर स्वामी के उपदेश ( Preachings of Mahavir Swami ) : भगवान महावीर ने अहिंसा, तप, संयम, पांच महाव्रत, पांच समिति, तीन गुप्ती, अनेकान्त, अपरिग्रह एवं आत्मवाद का संदेश दिया। महावीर स्वामी ने यज्ञ के नाम पर होने वाले पशु-पक्षी तथा नर की बली का पूर्ण रूप से विरोध किया तथा सभी जाती और धर्म के लोगों को धर्म पालन का अधिकार बतलाया, महावीर स्वामी ने उस समय जाती-पाति और लिंग भेद को मिटाने के लिए उपदेश दिये। निर्वाण: कार्तिक मास की अमावस्या को रात्री के समय तीर्थंकर महावीर स्वामी निर्वाण को प्राप्त हुये, निर्वाण के समय तीर्थंकर महावीर स्वामी की आयु ७२ वर्ष की थी।विशेष तथ्य: तीर्थंकर महावीर (Special Facts: Tirthankara Mahaveer): तीर्थंकर महावीर के जिओ और जीने दो के सिद्धान्त को जन-जन तक पहुंचाने के लिए जैन धर्म के अनुयायी तीर्थंकर महावीर के निर्वाण दिवस को हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को त्यौहार की तरह मनाते हैं, इस अवसर पर वह दीपक प्रज्वलित करते हैं। जैन धर्म के अनुयायियों के लिए उन्होंने पांच व्रत दिए, जिसमें अहिंसा, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह बताया गया। अपनी सभी इंन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने की वजह से वे जितेन्द्रिय या ‘जिन’ कहलाए। जिन से ही जैन धर्म को अपना नाम मिला। जैन धर्म के गुरूओं के अनुसार तीर्थंकर महावीर के कुल ११ गणधर थे, जिनमें गौतम स्वामी पहले गणधर थे। तीर्थंकर महावीर ने ५२७ ईसा पूर्व कार्तिक कृष्णा द्वितीया तिथि को अपनी देह का त्याग किया, देह त्याग के समय उनकी आयु ७२ वर्ष थी। बिहार के पावापूरी जहां उन्होंने अपनी देह को छोड़ा, जैन अनुयायियों के लिए यह पवित्र स्थल की तरह पूजित किया जाता है। तीर्थंकर महावीर के मोक्ष के दो सौ साल बाद, जैन धर्म श्वेताम्बर और दिगम्बर सम्प्रदायों में बंट गया। तीर्थंकर सम्प्रदाय के जैन संत वस्त्रों का त्याग कर देते हैं, इसलिए दिगम्बर कहलाते हैं जबकि श्वेताम्बर सम्प्रदाय के संत श्वेत वस्त्र धारण करते हैं। तीर्थंकर महावीर की शिक्षाएं : तीर्थंकर महावीर द्वारा दिए गए पंचशील सिद्धान्त ही जैन धर्म का आधार बने हैं, इस सिद्धान्त को अपनाकर ही एक अनुयायी सच्चा जैन अनुयायी बन सकता है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को पंचशील कहा जाता है। सत्य– तीर्थंकर महावीर ने सत्य को महान बताया है, उनके अनुसार, सत्य इस दुनिया में सबसे शक्तिशाली है और एक अच्छे इंसान को किसी भी हालत में सच का साथ नहीं छोड़ना चाहिए, एक बेहतर इंसान बनने के लिए जरूरी है कि हर परिस्थिति में सच बोला जाए। अहिंसा – दूसरों के प्रति हिंसा की भावना नहीं रखनी चाहिए, जितना प्रेम हम खुद से करते हैं उतना ही प्रेम दूसरों से भी करें, अहिंसा का पालन करें। अस्तेय – दूसरों की वस्तुओं को चुराना और दूसरों की चीजों की इच्छा करना महापाप है, जो मिला है उसमें ही संतुष्ट रहें। ब्रह्मचर्य – तीर्थंकर महावीर के अनुसार जीवन में ब्रहमचर्य का पालन करना सबसे कठिन है, जो भी मनुष्य इसको अपने जीवन में स्थान देता है, वो मोक्ष प्राप्त करता है। अपरिग्रह – ये दुनिया नश्वर है. चीजों के प्रति मोह ही आपके दु:खों को कारण है. सच्चे इंसान किसी भी सांसारिक चीज का मोह नहीं करते। १. कर्म किसी को भी नहीं छोड़ते, ऐसा समझकर बुरे कर्म से दूर रहो। २. तीर्थंकर स्वयं घर का त्याग कर साधू धर्म स्वीकारते हैं तो फिर बिना धर्म किए हमारा कल्याण वैâसे हो? ३. तीर्थंकर ने जब इतनी उग्र तपस्या की तो हमें भी शक्ति अनुसार तपस्या करनी चाहिए। ४. तीर्थंकर ने सामने जाकर उपसर्ग सहे तो कम से कम हमें अपने सामने आए उपसर्गों को समता से सहन करना चाहिए। वर्ष २०२१ में तीर्थंकर महावीर जन्म कल्याणक पर्व कब है?वर्ष २०२१ में तीर्थंकर महावीर जन्म कल्याणक २५ अप्रैल को मनाया जाएगा, जहां भी जैनों के मंदिर है, वहां इस दिन विशेष आयोजन किए जाते हैं, परंतु महावीर जन्म कल्याणक अधिकतर त्योहारों से अलग, बहुत ही शांत माहौल में विशेष पूजा अर्चना द्वारा मनाया जाता है, इस दिन भगवान महावीर का विशेष अभिषेक किया जाता है तथा जैन बंधुओं द्वारा अपने मंदिरों में जाकर विशेष ध्यान और प्रार्थना की जाती है, इस दिन हर जैन मंदिर मे अपनी शक्ति अनुसार गरीबो मे दान दक्षिणा का विशेष महत्व है। भारत मे गुजरात, राजस्थान, बिहार और कोलकाता मे उपस्थित प्रसिध्द मंदिरों में यह उत्सव विशेष रूप से मनाया जाता है।

अहिंसावादी थे तीर्थंकर महावीर -साध्वी रचना श्री 0

अहिंसावादी थे तीर्थंकर महावीर -साध्वी रचना श्री

साध्वी रचना श्री :  निरभ्र नील गगन, शांत-प्रशांत उज्ज्वल चैत्र शुक्ला त्रयोदशी की रात्रि राजा सिद्धार्थ का गृह आंगन, माता त्रिशला की कुक्षि से २४वें तीर्थंकर महावीर का जन्म हुआ था। श्रमण परंपरा के आकाश में एक ऐसा दैदीप्यमान सूर्य अंधकार को प्रकाश में बदलने के लिए क्षत्रिय कुंडग्राम में १४ महा विशिष्ट स्वप्नों के साथ धरा धाम को पावन सुपावन करने के लिए आया। अर्ताद्रिय ज्ञान से संपन्न तीर्थंकर महावीर का जन्म, जन-जन के लिए आह्लाद पैदा करने वाला था। महावीर स्वनाम धन्य थे फिर भी उनकी अनेक विशेषताओं को ध्यान में रखकर अनेक नामों से पुकारा गया, उनके गुण निष्पन्न नाम थे- वर्द्धमान, सन्मति, वीर, अतिवीर, ज्ञातपुत्र, समन (श्रमण), महावीर। महावीर ने चिदात्मा की प्राप्ति के लिए चढ़ती यौवन अवस्था में सन्यास मार्ग की ओर चरणों को गतिमान बनाया। महावीर की साधना में स्वस्वरुप की प्राप्ति तथा साथ ही साथ पर कल्याण की भावना का समावेश था। परम आलोक से साक्षात्कार के लिए महावीर के चरण साधना पथ पर निरंतर गतिशील थे। विघ्नों और बाधाओं ने उपस्थित होकर परीक्षा लेनी प्रारंभ की। महाबली महावीर उस विकट परिस्थिति के क्षणों में एक क्षण के लिए भी संत्रस्त नहीं हुए। महावीर का मन पुलकित था, तन पर होने वाले कष्टों में वे अभय और मैत्री को साथ लेकर विजयी बनते गए। महावीर के तप तेज के आगे देवकृत, मनुष्य कृत, तिर्यंच कृत उपसर्ग निस्तेज होते चले गए और एक दिन वह आया, जिसमें महावीर ने पाया कि सब द्रव्यों और सब पर्यायों को जानने की अपूर्व क्षमता से युक्त केवल ज्ञान, लंबे समय से चला आ रहा विघ्नों का ज्वार शांत हो गया। वैâवल्य प्राप्ति के साथ ही महावीर ने अखिल भारतीय विश्व को अिंहसा, अपरिग्रह और अनेकांत का आलोक प्रदान किया। उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य की त्रिपदी से आत्मवाद के सत्य को स्पष्टता से उजागर किया। पर्यावरण के प्रणेता पुरुष ने आज से लगभग २६०० वर्षों पूर्व वर्तमान की एक ज्वलंत समस्या ‘बढ़ता हुआ प्रदूषण एवम् पर्यावरण शुद्धि’ का समाधान दिया। महावीर ने कहा- (Tirthankara Mahavir says ) १. वणकम्मे- जंगलों की कटाई न हो २. फोडीकम्मे-भूमि का उत्खनन न हो व्यक्ति अपनी सुख-सुविधा के लिए असंयम को बढ़ावा दे रहा है, अगर वह महावीर के ‘संजमम्यि ये वीरयं’ के सूत्र को आत्मसात कर ले तो निश्चित ही पैâलते प्रदूषण को रोका जा सकता है। तीर्थंकर महावीर ने अहिंसा की अत्यंत सूक्ष्म व्याख्या प्रस्तुत की है। ‘‘आय तुले पयासु’’ सब जीवों को अपनी तुलना से तोलो। ‘‘हिंसा प्रसूतानि सर्व दु:खानि’’ समस्त कष्टों के मूल में हिंसा है। प्रत्येक प्राणी जीने की इच्छा रखता है फिर क्यों किसी के प्राणों का हनन हो? वर्तमान में बढ़ते हुए हिंसक कारनामों को रोकने के लिए महावीर के अहिंसा दर्शन को समझना जरुरी है। भगवान महावीर का अपरिग्रह सिद्धांत बढ़ते हुए पूँजीवाद को रोकने में समाधायक है। ‘इच्छा निरोध: तप:’ इच्छाएं आकाश के समान अनंत हैं। बढ़ती हुई इच्छाओं को विवेक के द्वारा रोकना सीखें या यों कहें कि विवेक के द्वारा रोका जा सकता है। वर्तमान में व्यक्ति की लालसा पेट नहीं पेटी भरने की है, फलत: भ्रष्टाचार चारों ओर व्याप्त हो रहा है। करप्शन को रोकने के लिए आंदोलन किए जा रहे हैं। महावीर दर्शन का अपरिग्रह सिद्धांत समाधान है। बढ़ते भ्रष्टाचार को रोकने के लिए महावीर का अनेकांत दर्शन सामुदायिक जीवन को सरसता एवम् मधुरता दे सकता है। एडजेस्टमेंट का महत्वपूर्ण आलंबन बनता है- अनेकांत। सामंजस्य का प्रशिक्षण प्राप्त होता है- अनेकांत से। सामूूहिक जीवन में रहने, कहने और सहने का अवबोध देता है- अनेकांत। टूटते-बिखरते परिवारों के लिए अनेकांत आधार-स्तंभ बन सकता है, महावीर नाम में अंग्रेजी के ७ अक्षर आते हैं। अहिंसावादी थे तीर्थंकर महावीर -साध्वी रचना श्री (Tirthankara Mahavir was a non-violenceist – Sadhvi Rachna Shri in hindi ) MAHAVIR – M for Magnanimity उदारता A for Abnegation त्याग (संयम) H for Hardihood निडरता A for Abstemious संयमी V for Verity सत्य I for Imperturbable शांत R for Remit क्षमा करना जीवन की राह को आसान बनाने के लिए ये सात शब्द स्वर्णिम सूत्र है। विश्व स्तर की समस्याओं को समाधान प्राप्त होता है कि आप उदार बनें, त्याग की चेतना को पुष्ट करें। निडरता से सत्यवृत्ति में प्रवृत्त बनें। संयमी बनकर बढ़ती आकांक्षाओं पर नियंत्रण करें। सत्य के आलोक में सफल होना सीखें। प्रत्येक परिस्थिति में शांत बने रहें और क्षमा की सरिता में स्नान कर निर्मल, पवित्र, पावन बनें। भगवान महावीर परम अहिंसावादी, उत्कृष्ट सहिष्णु, धीर-वीर गंभीर थे। उन्होंने रूढ़ धारणाओं, अंधपरंपराओं, अंधविश्वासों पर तीव्र प्रहार कर जन-जन की आस्था के आस्थान बनें।

१७०० वर्ष प्राचीन गोड़वाड़ में हथुंडी तीर्थ श्री रातामहावीर जी 0

१७०० वर्ष प्राचीन गोड़वाड़ में हथुंडी तीर्थ श्री रातामहावीर जी

राता महावीरजी के नाम से विख्यात प्राचीन तीर्थ हथुंडी का जैन तीर्थों में महत्वपूर्ण स्थान है। १७०० वर्ष प्राचीन गोड़वाड़ में हथुंडी तीर्थ श्री रातामहावीर जी: राष्ट्रीय राजमार्ग नं. १४ पर गोड़वाड़ की सबसे बड़ी मंडी सुमेरपुर से ३० कि. मी. एवं जवाईबांध रेलवे स्टेशन से २२ कि.मी. दूर पूर्व में बीजापुर नगर से ५ कि. मी. दूर निर्जन वन में अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के बीच अलौकिक प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त यह पावन तीर्थ गोड़वाड़ क्षेत्र को सुशोभित कर रहा है। यह पुनीत ध्यान-साधना के लिए शांत एकांत स्थान है। शास्त्रकारों के अनुसार इसे हस्तिकुण्डी, हाथिउण्डी, हस्तकुण्डिका, हस्तिकुंड, हस्तितुंडी आदि नामों से जाना जाता था। यह राष्ट्रकुटों की राजधानी थी। इस उजड़ी नगरी का एकमात्र वैभव अब ‘राता महावीर तीर्थ’ का मंदिर रह गया है, जो सदियों पुराने इतिहास को संजोए हुए। अनेक उतार-चढ़ाव की कहानी कह रहा है, इसकी संपदा और वैभव गाथा कहने वाले सं. २५८ के शिलालेख, भारत सरकार के पाली में बांगड संग्रहालय में और अन्य शिलालेख तीर्थ परिसर में सुरक्षित है। इन शिलालेखों एवं अन्य प्रशस्तियों में, इस तीर्थ के गौरवमयी इतिहास का वर्णन मिलता है।प्राचीनता: इस विशाल नगरी का कोट अरावली पर्वत की गिरिमाला में हथुंडी से गढ़ मुक्तेश्वर एवं हर गंगा के मंदिर तक आज भी टूटी-फूटी अवस्था में विद्यमान है। र्१.५ ें १ फुट की ३ इंच मोटी बड़ी ईंटें एवं स्थान-स्थान पर पत्थरों की चौड़ी नींवें नगरी की विशालता का परिचय देती है। पहाड़ पर थोड़ी ऊंचाई पर दुर्ग एवं महलों के खण्डहर मिलते हैं। ‘आठ कुआं-नव बावड़ी, सोलहसो पणिहार’’ के १४वीं शताब्दी के उल्लेख के अनुसार, यहां लगातार सोलह सौ पणिहारियां पानी भरती थीं। साथ ही आस-पास बिखरे खंडहरों व प्राचीन किले के अवशेष इस बात को पुष्ट करते हैं कि यहां कभी कोई विशाल नगरी अस्तित्व में थी। १७०० वर्ष प्राचीन गोड़वाड़ में हथुंडी तीर्थ श्री रातामहावीर जी यहां के शिलालेखों से तो उस काल के राजाओं की व्यवस्था और जैनाचार्यों के प्रति उनकी श्रद्धा की पूरी जानकारी प्राप्त होती है। राजस्थान के इतिहासकार पू.मुनिश्री जिनविजयजी ने इसे राजस्थान के ५५६ जैन मंदिरों में सबसे प्राचीन माना है।इस मंदिर की प्राचीनता का उल्लेख मुनि श्री ज्ञानसुंदरजी द्वारा रचित ‘श्री पार्श्वनाथ भगवान की परंपरा का इतिहास’ में भगवान महावीर के इस मंदिर का निर्माण वि. सं. ३६० में ‘श्री वीरदेव श्रेष्ठि’ द्वारा होकर भ. पार्श्वनाथ के ३०वें पट्टधर आ. श्री सिद्धसूरिजी के सुहस्ते प्रतिष्ठित होने का उल्लेख है। इससे इस मंदिर के १७०० वर्ष प्राचीन होने का अनुमान आता है। वि. सं. ७७८ में आ. कंकूसूरिजी के उपदेश से, हस्तिकुंडी में २७ मंदिरों का निर्माण करवाया गया था। राजा हरिवर्धन के पुत्र विदग्धराज ने महान प्रभावक आचार्य श्री यशोभद्रसूरिजी के शिष्य, आ. श्री बलिभद्रसूरिजी से प्रतिबोध पाकर जैन धर्म अंगीकार किया था। वि. सं. ९७३ के लगभग इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाके प्रतिष्ठा करवाई थी, इनके वंशज राजा मम्मटराज, हरिवर्मा, धवलराज, सिंहाजी, बालप्रासाद, मुज्जासिंह चौहान आदि राजा भी जैन धर्म के अनुयायी थे।वि. सं. १०५३, माघ शुक्ल त्रयोदशी रविवार का शिलालेख सं. २५८ अनुसार,जो कि मंदिर के प्रवेश द्वार की बायीं ओर खुदा हुआ था, वह प्रथम बीजापुर की धर्मशाला, बाद में अजमेर संग्रहालय व वर्तमान में पाली बांगड संग्रहालय में सुरक्षित है, इसमें हस्तिकुण्डी चौहान वंश के शासकों का उल्लेख है एवं धवल के संबंध में लिखा गया है। उस समय लिखी प्रशस्ति के अनुसार विदग्धराज द्वारा जीर्णोद्धार करवाए गए मंदिर में प्रथम बार ऋषभदेव भगवान की मूर्ति की स्थापना की गई। वि. सं. १०५३ में विदग्धराज के पौत्र एवं मम्मट के पुत्र धवल द्वारा पुनः जीर्णोद्धार हुआ और माघ सु. १३ रविवार को पुष्य नक्षत्र में श्री ऋषभदेव की श्री शान्त्याचार्यजी के सुहस्ते प्रतिष्ठा की गई और महाध्वज का आरोपण किया गया।सूत्रों के अनुसार, १२वीं सदी के बाद इस आदिनाथ मंदिर में पुनः महावीर भगवान की लाल वर्ण की प्रतिमा प्रतिष्ठित कर दी गई होगी। १३वीं शताब्दी से अद्यावधि तक प्राप्त सभी ‘तीर्थमालाओं’ से यह तथ्य प्राप्त होते हैं कि यह मंदिर राता महावीर का था, वि. सं. १३३५ के शिलालेख में इस मंदिर में पुनः राता महावीर के नाम का उल्लेख हुआ है। ‘‘रातो वीर पूरि मननी आस”- पं. शीलविजयजी अर्थात्‌ लाल वर्ण के महावीर मेरे मन की आशा पूरी करें। सं. १३३५ में सेवाड़ी के श्रावकों द्वारा यहां श्री राता महावीर के मंदिर में ध्वजा चढ़ाने का उल्लेख मिलता है। वि. सं. ९९६ के शिलालेख अनुसार ‘ऐतिहासिक रास संग्रह-भाग २’ विजयधर्मसूरिजी विरचित में, इसे भगवान महावीर का चैत्य कहा गया है। लावण्यसमयजी ने वि. सं. १५८६ में बलिभद्र (वासुदेवसूरि) रास में लिखा है- ‘हस्तिकुंड एहवुं अभिधान, स्थापिउं गच्छपति प्रगट प्रदान। महावीर केरइं प्रासादि, बाजई भुंगल भेरी नादि।। लावण्यसमयजी (सं.१५२१-१५९०) एवं शीलविजयजी आदि आचार्यों की तीर्थमाला, किसी सुदृढ़ आधार पर लिखी गई है। जिन तिलक सूरिजी ने भी अपनी तीर्थमाला में हथुंडी, लावण्यसमय ने ‘हस्तिकुंड’ और यहां के उपलब्ध शिलालेखों में ‘हस्तिकुंडी’ लिखा है। कुछ मान्यता के अनुसार वि. सं. १३२५, फाल्गुन सुदि ८ को हस्तिकुण्डी गच्छ के वासुदेवाचार्य द्वारा हस्तिकुण्डी में लालवर्ण की भगवान महावीर की पुनः स्थापना कर ऋषभदेव भगवान की मूर्ति को उदयपुर के निकट बाबेला में प्रतिष्ठित कर दी गई। प्राचीन काल में समय-समय पर कई आचार्य हस्तिकुण्डी पधारे और तीर्थदर्शन कर धर्मार्थ कार्य के लिए उपदेश दिए। आचार्य कक्‍्कसूरिजी सप्तम्‌ा (वि. सं. ५५८ से ६०१), आ. श्री देवगुप्तसूरिजी सप्तम्‌ा (वि. सं. ६०१ से ६२८), आ. श्री ककक्‍्कसूरिजी अष्टम्‌ा (वि. सं. ६६० से ६८०) एवं भगवान पार्श्वनाथ के ४४वें पाट पर आ. श्री सिद्धसूरिजी नवम्‌ा (वि. सं.८९३ से ९५२) के अलावा आ. श्री यशोभद्रसूरिजी (वि. सं. ९५७ से १०२९), शान्तिभद्राचार्य, वासुदेवाचार्य, सूर्याचार्य, रत्नप्रभोपाध्याय, पूर्णचंद्रोपाध्याय, सुमनहस्ति आदि ने इस तीर्थ में धर्म प्रभावना के कार्य किए।वि. सं. १२०८ में आ. श्री जयसिंह देवसूरिजी हस्तिकुण्डी पधारे। उस समय यहां का राजा अनंत सिंह राठौड़ पूर्व कर्म के विपाक से जलोदर (रेवती दोष रोग) के भयंकर रोग से पीड़ित था। आ. श्री ने जल को अभिमंत्रित कर राजा को पिलाया। इसके सेवन से राजा का रोग दूर हो गया और इससे प्रभावित होकर उसने जैन धर्म अंगीकार किया। झामड व रातडिया राठौर, हथुंडिया राठौड़ गोत्र का उत्पत्ति स्थान भी यही है। ओसवालों में यह गोत्र आज भी विद्यमान है। इसी नगर के नाम से हस्तिकुंडी नामका गच्छ प्रसिद्धि में आया। छह संडेरकगच्छ की यह उपशाखा बलभद्र (वासुदेवाचार्य) से निकली। राता महावीर मंदिर के मंडप में हस्तिकुण्डीयगच्छ के एक आचार्य की मूर्ति भी स्थापित है। मंदिर के स्तंभों आदि पर शिलालेखों से भी प्राचीनता का पता चलता है। वि. सं. ९८८ में राजा जगमाल ने आ. श्री देवसूरिजी से प्रेरणा पाकर पूरे परिवार सहित अहिंसा का व्रत धारण किया, साथ ही हजारों नागरिकों ने भी अहिंसा का व्रत लेकर, राजा के साथ मांसाहार त्यागकर जैन धर्म स्वीकार किया। वि. सं. १००० में सांभर के लाखणसी चौहान ने नाडोल में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की, तब से चौहानों और हस्तिकुंडी के राठौड़ों में (सन्‌ा १०२३ ई.) में, महमूद गजनवी ने नाडोल के रामपाल चौहान व हस्तिकुण्डी के दत्तवर्मा राठौड़ से सोमनाथ जाते हुए युद्ध किया। इस युद्ध में ये दोनों राजा पराजित हुए। गजनवी ने इन दोनों नगरों को उजाड़ दिया, जिससे मंदिर भी आक्रमण के प्रभाव से अछूते नहीं रहे। बालीसा चौहानों के बडुओं की बहियों से ज्ञात होता है कि इस नगरी का अंतिम शासक सींगा हथुंडिया राठौड़ था, जिसे वि. सं. १२३२ में वरसिंह चौहान ने मारकर बेडा सह ४२ गांवों पर कब्जा किया।वि. सं. २००१ में जीर्णोद्धारित राता महावीर के मुख्य मंदिर में कुल २४ देवकुलिकाएं हैं। द्वार के दोनों ओर ६-६ और अंदर की ओर दाएं-बाएं ६-६ हैं। मुख्य गर्भगृह में मूलनायक श्री महावीर स्वामी भगवान की, पद्मासनस्थ रक्त प्रवाल वर्ण की, १३५ सें.मी. (५२ इंची) की अत्यन्त प्रभावशाली प्रतिमा, सौध शिखरी चैत्य में प्रतिष्ठित है। इस पर लाल विलेप चढ़ा हुआ है। अतः इस मंदिर का नाम ‘राता महावीरजी’ पड़ा। प्रभु प्रतिमा ईंट व लाल चूने के मिश्रण से प्रथम दीवार बनाकर, कलाकार ने प्रतिमा का घड़न किया है, फिर लाल विलेपन है अर्थात यह प्रतिमा पाषाण की नहीं है। प्रतिमा की विशेषताएं: प्रतिमा के नीचे जो सिंह का लांछन अंकित है, उसका मुख हाथी का है अर्थात यह ‘गजसिंह’ का लांछन भगवान महावीर के लांछन सिंह एवं हस्तिकुंडी में हाथियों की बहुतायत की ओर संकेत करता है। सिंह के हाथी का मुख होने के कारण ही इस नगरी को ‘हस्तिकुण्डी’ कहते थे, जो आज अपभ्रंश होकर ‘हथुंडीr’ हो गया है। परमात्मा के गले में दो आटे की मोतियों की माला, हाथों पर बाजूबंद पक पंजों के पास दोनों हाथों में कड़े पहने हुए हैं, जो इस प्रतिमा की अलौकिक निशानियां हैं।अंतिम जीर्णोंद्धार व प्रतिष्ठा: वि. सं. १०५३ के पश्चात्‌ा मंदिर के किसी बड़े जीर्णोद्धार का प्रमाण नहीं मिलता, सिर्फ छोटी-मोटी मरम्मत होती रही। वि. सं. १९९९ तक यह मंदिर लगभग खंडहर हो गया था। अतः बीजापुर निवासियों ने जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाकर सं. १९९८ माघ सु. १० दि. २७.१.१९४२ को श्री जवेरचंदजी व श्री हजारीमलजी के नेतृत्व में कमेटी बनाकर कार्य प्रारंभ किया गया। मंदिर की प्राचीनता को कायम रखते हुए नया रूप प्रदान करने का तय हुआ। सं. २००१ में प्रारंभ हुआ कार्य सं. २००६ तक चलता रहा।श्रीसंघ ने सादड़ी चातुर्मास विराजित गोड़वाड़ उद्धारक पंजाब केशरी आ. श्री वल्लभसूरिजी को प्रतिष्ठा की विनंती की। वि. सं. १०५३, माघ शुक्ल त्रयोदशी रविवार का शिलालेख सं. २५८ अनुसार, जो कि मंदिर के प्रवेश द्वार की बायीं ओर खुदा हुआ था, वह प्रथम बीजापुर की धर्मशाला, बाद में अजमेर संग्रहालय व वर्तमान में पाली बांगड संग्रहालय में सुरक्षित है। इसमें हस्तिकुण्डी चौहान वंश के शासकों का उल्लेख है एवं धवल के संबंध में लिखा गया है। उस समय लिखी प्रशस्ति के अनुसार विदग्धराज द्वारा, जीर्णोद्धार करवाए गए। मंदिर में प्रथम बार ऋषभदेव भगवान की मूर्ति की स्थापना की गई। वि. सं. १०५३ में कु विदग्धराज के पौत्र एवं मम्मट के पुत्र धवल द्वारा पुनः जीर्णोद्धार हुआ और माघ सु. १३ रविवार को पुष्य नक्षत्र में श्री ऋषभदेव की श्री शान्त्याचार्यजी के सुहस्ते प्रतिष्ठा की गई और महाध्वज का आरोपण किया गया। सूत्रों के अनुसार, १२वीं सदी के बाद इस आदिनाथ मंदिर में, पुनः महावीर भगवान की लाल वर्ण की प्रतिमा प्रतिष्ठित कर दी ग्ाई होगी। १३वीं शताब्दी से अद्यावधि तक प्राप्त सभी ‘तीर्थमालाओं’ से यह तथ्य प्राप्त होते हैं कि यह मंदिर राता महावीर का था, वि. सं. १३३५ के शिलालेख में इस मंदिर में पुनः राता महावीर के नाम का उल्लेख हुआ है। ‘रातो वीर पूरि मननी आस’- पं. शीलविजयजी अर्थात्‌ लाल वर्ण के महावीर मेरे मन की आशा पूरी करें। सं. १३३५ में सेवाड़ी के श्रावकों द्वारा यहां श्री राता महावीर के मंदिर में ध्वजा चढ़ाने का उल्लेख मिलता है। वि. सं. ९९६ के शिलालेख अनुसार ‘ऐतिहासिक रास संग्रह-भाग २ विजयधर्म सूरिजी विरचित में इसे भगवान महावीर का चैत्य कहा गया है। लावण्यसमयजी ने वि. सं. १५८६ में बलिभद्र (वासुदेवसूरि) रास में लिखा है- ‘हस्तिकुंड एहवुं अभिधान, स्थापिउं गच्छपति प्रगट प्रदान। महावीर केरइं प्रासादि, बाजई भुंगल भेरी नादि।। लावण्यसूरिजी (सं.१५२१-१५९०) एवं शीलविजयजी आदि आचार्यों की तीर्थमाला किसी सुदृढ़ आधार पर लिखी गई है। जिन तिलक सूरिजी ने भी अपनी तीर्थमाला में हथुंडी, लावण्यसमय ने ‘हस्तिकुंड’ और यहां के उपलब्ध शिलालेखों में ‘हस्तिकुंडी’ लिखा है। कुछ मान्यता के अनुसार वि. सं. १३२५, फाल्गुन सुदि ८ को, हस्तिकुण्डी गच्छ के वासुदेवाचार्य द्वारा, हस्तिकुण्डी में लालवर्ण की भगवान महावीर की पुनः स्थापना कर, ऋषभदेव भगवान की मूर्ति को उदयपुर के निकट बाबेला में प्रतिष्ठित कर दी गई।प्राचीन काल में समय-समय पर कई आचार्य हस्तिकुण्डी पधारे और तीर्थदर्शन कर धर्मार्थ कार्य के लिए उपदेश दिए। आचार्य कक्‍्कसूरिजी सप्तम्‌ा् (वि. सं. ५५८ से ६०१), झलक आ. श्री देवगुप्तसूरिजी सप्तम् (वि. सं. ६०१ से ६२८), आ. श्री कक्‍्कसूरिजी अष्टाम् (वि. सं. ६६० से ६८०) एवं भगवान पार्श्वनाथ के ४४वें पाट पर आ. श्री सिद्धसूरिजी नवम्‌ (वि. सं. ८९२ से ९५२) के अलावा आ. श्री यशोभद्रसूरिजी (वि. सं. ९५७ से १०२९), शान्तिभद्राचार्य, वासुदेवाचार्य, सूर्याचार्य, रत्नप्रभोपाध्याय, पूर्णचंद्रोपाध्याय, सुमनहस्ति आदि ने इस तीर्थ में धर्म प्रभावना के कार्य किए।आचार्य श्री ने अपने शिष्य परिवार आ. श्री ललितसूरिजी, आ. श्री विद्यासूरिजी, पंन्यासश्री समुद्रविजयजी, पूर्णानंदविजयजी आ. ठा. सहित, वि. सं २००६, मार्गशीर्ष शुक्ल ६, शुक्रवार दि. २६.१२.१९४९ को ठीक १० बजकर ३९ मिनट पर, प्राचीन जिनबिंबों सह नूतन १२५ जिन प्रतिमाओं की अंजनशलाका प्रतिष्ठा संपन्न की एवं साथ ही आ. श्री विजयानंदसूरिजी (आत्मारामजी) की प्रतिमा स्थापित हुई। मंदिर का खात मुहूर्त वि. सं. २००२, माघ शु. १३ को पं. विकासविजयजी (वल्लभ) के हस्ते संपन्न हुआ था। बाद में मार्गशीर्ष, शु. १०, बुधवार दि. ३०.१२.१९४९, मंदिर के नीचे भोयरे में गुलाबी वर्ण की पाषाण की ५१ इंच की विशाल प्रतिमा की प्रतिष्ठा करवाई तथा इस अवसर पर तीन मुमुक्षुओं को दीक्षा प्रदान की एवं मु. श्री न्यायविजयजी, प्रीतिविजयजी एवं हेमविजयजी नामकरण किया। इसी मुहूर्त है में पास बीजापुर में भी प्रतिष्ठा संपन्न करवाई।तत्पश्चात वि. सं. २०२६, मार्गशीर्ष कृष्ण १२ को, अष्टाह्निका महोत्सव आ. श्री समुद्रसूरिजी के करकमलों से, आ. श्री जम्बुसूरिजी आदि ठाणा की उपस्थिति में, पंजाबकेशरी आ. श्री वल्लभसूरिजी की गुरु प्रतिमा की प्रतिष्ठा संपन्न हुई, साथ ही आ. श्री यशोभद्रसूरिजी की वि. सं. १३४४, माघ सुदि ११ की प्राचीन प्रतिमाजी एवं चरणपादुकाओं की प्रतिष्ठा हुई। आ. श्री नित्यानंदसूरिजी के हस्ते वि. सं. २०५१, वै. कृ. २, बुधवार को वल्लभसूरिजी प्रतिमा व पादुका की प्रतिष्ठा संपन्न हुई। समवसरण मंदिर: बीजापुर रत्न पू. पंन्यास प्रवर डॉ. श्री अरुणविजयजी की प्रेरणा एवं कुशल मार्गदर्शन से, शिल्पशास्त्र के अनुसार गोलाकृति वाले कलाकृतिमय, भव्य समवसरण मंदिर का निर्माण हुआ एवं वि. सं. २०५२, माघ शु. ७ को प्रतिष्ठा संपन्न हुई। अशोक वृक्ष के नीचे ५१ इंच भगवान की चौमुखी प्रतिमाओं को प्रतिष्ठित किया गया। छः खंडों से निर्मित समवसरण मंदिर में परमात्मा के चरित्रदर्शक चित्रपट बनाए गए हैं।इसी मुहूर्त में मुख्य मंदिर के तहखाने में, नागेश्वर पार्श्वनाथ व सहस्रफणा पार्श्वनाथ की काऊसग्ग मुद्रा सुंदर प्रतिमाजी विराजमान की गई। प्राचीन प्राप्त सभी अवशेषों को भमती में एक दीवार में सुंदर ढंग से प्रदर्शित किया गया है। मंदिरजी का अति प्राचीन प्रवेशद्वार, जिसे आ. श्री यशोभद्रसूरिजी की देहरी के बाहर, पुनः स्थापित किया गया। मूलनायक के प्राचीन वि. सं. १०५३ के अंकित लेख वाला प्रभासन मंदिर के तहखाने में सुरक्षित है। सिंदूर से लिपटी खंडित प्रतिमा रेवती दोष के शामक देवता की है, जिसकी बलिभद्राचार्य ने वि. सं. ५० १९७३ में स्थापना की थी। अधिष्ठायकदेव: मुख्य मंदिर के सामने एक छोटा-सा कलात्मक मंदिर है, जो अति प्राचीन रकक्‍तवर्णीय ‘महावीर यक्ष’ का है, जिसके एक हाथ में बिजोरा है व दूसरे हाथ में नाग है। ये तीर्थरक्षक जागृत अधिष्ठाकदेव हैं।वार्षिक मेला : यहां प्रति वर्ष चैत्र शु. एवं कार्तिक शु. १० को मेला भरता है, जिसमें आस-पास के जंगलों से हजारों भील, गरासिये आदिवासी आकर नृत्य करते हुए भगवान महावीर की आराधना करते हैं। यहां के रेवती यक्ष अति चमत्कारी है। मंदिर से पूर्व २ कि.मी. दूर, विकट पहाड़ियों के बीच हथुण्डी गांव है, जिसमें काश्तकारों की छोटी-सी बस्ती है। मंदिर के आगे बाएं उत्तर िदशा में एक खेत में, श्री पंचमुक्तेश्वर महादेवजी का मंदिर खंडहर अवस्था में है। पास ही १४वीं शताब्दी की विशाल बावड़ी है। दंतकथाओं के के अनुसार महाभारत काल में, पांडव अपनी माता कुन्ती सहित लाक्षागृह से निकलकर इस वनक्षेत्र में आए व अपने नित्यकर्म में शिव आराधना हेतु, उक्त पंच तीर्थेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण करवा कर पूजा अर्चना करते थे।मार्गदर्शन: बाली से पिण्डवाड़ा मुख्य सड़क पर २० कि.मी. दूर, बीजापुर से बायीं तरफ घोरिया जाने वाली सड़क पर ४ कि.मी. दूर यह तीर्थ स्थित है। यह रेलवे स्टेशन जवाईबांध से २० कि.मी., फालना से २७ कि.मी., सेवाड़ी से १० कि.मी., सुमेरपुर से ३० कि.मी., राणकपुर से ४५ कि.मी., बेड़ा से १७ कि.मी. और जूनाबेड़ा दादा पार्श्वनाथ से २० कि.मी. दूर पड़ता है। यहां प्रायवेट बस, ऑटो, टैक्सी जैसे साधनों से पहुंचा जा सकता है। नजदीक का हवाई अड्डा उदयपुर करीब १५० कि.मी. दूर है व जोधपुर से वाया फालना १७० कि.मी. दूर है।सुविधाएं: आधुनिक सुविधाओं युक्त ब्लॉक्स, विशाल यात्रिक भवन, अतिथिगृह, संघ भवन आदि उपलब्ध हैं। धर्म आराधना हेतु आराधना भवन, उपाश्रय की सुविधा है। विशाल भोजनशाला भवन के साथ संघ के लिए अलग रसोड़े की उपयुक्त व्यवस्था है। यहां की भोजनशाला में हर रोज सुबह दाल-बाटी बनती है, जो कि पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है। सुंदर बगीची है।पेढ़ी: श्री हथुंडी राता महावीरस्वामी तीर्थ ट्रस्ट, मु. पो. बीजापुर-३०६७०७, वाया बाली, जिला-पाली, स्टेशन जवाईबांध, राजस्थान भारत, संपर्क: ०२९३३-२४०१३९, मैनेजर: श्री छगनलालजी जैन, श्री तोलारामजी- ०९९८२४६३४६० प्रस्तुती सहयोगी ट्रस्ट अध्यक्ष: बाबूलालजी पी. जैन, मुंबई, भ्रमणध्वनि: ०९८९२६९०८३३

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आजादी की ७५वीं सालगिरह पर हम भारत को ‘भारत’ ही बोलें  – जनवरी-२०२१ : वर्षों विदेशी आक्रांता से विरोध व जिद के पश्चात भारत माँ को सन १९४७ में आजादी मिली। भारत माँ का नाम बदलकर विदेशियों ने घ्ह्ग्a कर दिया, जिसे आज तक हम साथ रखे हुए हैं। यह तो हम सभी जानते हैं कि घ्ह्ग्a तो गुलामी का नाम है। वर्ष २०२१ को भारत मां स्वतंत्रता की ७५ वीं सालगिरह मनाएगी। आज भारत मां अपने १३० करोड़ बच्चों से पूछ रही है कि मेरे बच्चों यह तो बताओ कि मेरा नाम क्या है भारत है या इंडिया? हम सभी भारतीयों की आज इच्छा बनी है कि अब हम भारत को ‘भारत’ के नाम से ही पुकारा जाए, भारत को ‘भारत’ ही बोलेंगे, इसके लिए हम सभी  भारतीयों ने मिलकर १० फरवरी २०२१ से २१ फरवरी २०२१ तक भारत की राजधानी दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक, लगातार ११ दिनों तक, संध्या ५:३० से ८:३० तक पदयात्रा करेंगे और ‘भारत सम्मान दीपोमय यात्रा’ में मिलकर एक ही नारा लगाएंगे कि ‘मैं भारत हूँ’। मैं अपने साधर्मी भाइयों से निवेदन करता हूं कि भारी संख्या में दिल्ली पहुंचे, यदि दिल्ली ना भी पहुंच सकते हैं तो अपने मित्रों, सहयोगियों, परिवारों आदि जो भी दिल्ली में रहते हैं उनसे कहें कि ‘भारत सम्मान दीपोमय यात्रा’ में अपनी उपस्थिति देकर ‘भारत’ की पूर्ण आजादी के लिए अपने समय की आहुति दें। मैं विश्वास दिलाता हूं कि भारत के साथ लगा हुआ दाग घ्ह्ग् जो कि भारत माँ को मिली आजादी के समय वर्ष १९४७ में तो नहीं निकल पाया, वर्ष २०२१ को जरूर दूर चला जाएगा, यह मेरी इच्छा तो है ही साथ ही सभी भारतीयों की भी है। हमारे चलते-फिरते तीर्थंकर गुरु-भगवंतों की भी है। मैं अपने साधर्मी भाइयों को यह बताना चाहता हूं कि मैंने तीर्थंकर महावीर को नहीं देखा है, उनका स्वरूप प्रातः वंदनीय साधु-भगवंतों में देखा है, उन सभी का आशीर्वाद मुझे प्राप्त हुआ है, विशेषकर आचार्य शिरोमणि विद्यासागर जी का मैं ऋणी हूं कि उन्होंने हमेशा मुझे प्रोत्साहन दिया और भारत को ‘भारत’ ही बोले जाने के अभियान को पूर्ण करने के लिए अपना आशीर्वाद प्रदान किया। मेरे जीवन की अब एक ही इच्छा है कि १३० करोड़ भारतीयों की भारत मां विश्व में केवल ‘भारत’ के नाम से पहचानी जाए, ‘भारत’ के नाम से गौरवान्वित हो। आजादी की ७५वीं सालगिरह पर हम भारत को ‘भारत’ ही बोलें  – जनवरी-२०२१ वर्ष २०२० हम सभी भारतीयों का जैसे-तैसे गुजर गया, मैं समस्त प्रातः वंदनीय २४ तीर्थंकरों के साथ गुरु-भगवंतों के चरणों में विनती करता हूं कि वर्ष २०२१ हम सभी का अच्छा हो, हम सभी तन-मन-धन से धर्माराधना के साथ अपने परिवार, अपने राष्ट्र को समृद्ध करें, ऐसी मनोभावना के साथ….. सादर जय जिनेंद्र!

आदिनाथ पुत्र भरत के नाम से बना भारत 0

आदिनाथ पुत्र भरत के नाम से बना भारत

प्रस्तुति सौ. शैलबाला भरतकुमार काला, मुंबई आदिनाथ पुत्र भरत के नाम से बना भारत : भारत के यशस्वी पू. प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का परेड ग्राउंड, दिल्‍ली ६ में दिया गया ओजस्वी भाषण मननीय है। उन्होंने कहा था – ऋषभपुत्र ‘भरत’ के नाम से इस देश का नाम ‘भारत’ पड़ा। इस बारे में ठोस अनुसंधान पूर्वक एक पुस्तक जनता के सामने आनी चाहिये। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने भी विद्वानों के परामर्श पर सम्राट ‘खारवेल’ के शिलालेख के आधार पर इस देश का नाम संवैधानिक नामकरण‘भारतवर्ष’ स्वीकृत किया था। पहले इस देश का नाम ‘अजनाभवर्ष’ था। यह नाम प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के पिता नाभिराय के नाम पर पड़ा था। इस तथ्य को वैदिक व श्रमण संस्कृति दोनों में समान रूप से मान्यता प्राप्त है। ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती भरत के षटखंडाधिप होने की खुशी में विद्वानों व प्रजाजनों ने ‘अजनाभवर्ष’ का नाम भारतवर्ष कर दिया था। विख्यात इतिहासविद्‌ डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल लिखते हैं कि ‘‘स्वायंभुव के पुत्र प्रियव्रत, प्रियव्रत के पुत्र आग्नीघ्र, आग्नीघ्र के पुत्र नाभि के पुत्र ऋषभदेव, ऋषभदेव के १०० पुत्रों, जिनमें ‘भरत’ ज्येष्ठ थे, यही नाभि ‘अजनाभ’ भी कहलाते थे, जो परम प्रतापी थे जिनके नाम पर यह देश ‘‘अजनाभवर्ष’’ कहलाता था।पूर्वचिति अप्सरा अग्नीघ्र की भार्या थी, ने ९ खंडों में राज्य करने वाले ९ पुत्रों को जन्म दिया। उनमें ज्येष्ठ पुत्र नाभि थे, जिन्हें अजनाभ खंड का राज्य दिया गया। यही अजनाभ खंड ‘भरत खंड’ कहलाया। नाभि के पौत्र भरत उनसे भी अधिक प्रतापवान चक्रवर्ती थे, यह अत्यंत मूल्यवान ऐतिहासिक परंपरा पुराणों में सुरक्षित रह गई है।’’ (जैन साहित्य का इतिहास, पूर्व पीठिका, पृष्ठ ८) ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती भरत के षट खंडाधिप होने की खुशी में प्रजाजनों ने ‘अजनाभवर्ष’ का नाम ‘‘भारतवर्ष” कर दिया। आदिनाथ पुत्र भरत के नाम से बना भारत  ‘भरत’ से पड़ा भारत नाम: भरत के नाम से ४ प्रमुख व्यक्तित्व भारतीय परम्परा में जाने जाते हैं – १. ऋषभदेव के पुत्र भरत, २. राजा रामचन्द्र के अनुज भरत, ३. राजा दुष्यंत के पुत्र भरत, ४. नाट्य शास्त्र के रचयिता भरत। इनमें से ऋषभदेव के पुत्र भरत सर्वाधिक प्राचीन व प्रभावशाली व्यक्तित्व थे। उन्हीं के नाम से इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ हुआ। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने पहले दुष्यंत पुत्र भरत के नाम से इस देश का नाम भारतवर्ष कहा था किंतु बाद में उन्होंने इसे सुधारा और स्पष्ट किया कि ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम से ही इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। मैंनेअपनी भारत की मौलिक एकता नामक पुस्तक के पृष्ठ २२-२४ पर दुष्यंत पुत्र भरत से भारतवर्ष लिखकर भूल की थी, इसकी ओर मेरा ध्यान कुछ मित्रों ने आकर्षित किया। उसे अब सुधार लेना चाहिये। (डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ‘मार्कण्डेय पुराण एक अध्ययन’। पदमपुराण रामधारी सिंह दिनकर ने भी लिखा है कि भरत ऋषभदेव के पुत्र थे जिनके नाम पर इस देश का नाम ‘भारत’ पड़ा। प्राचीन ग्रंथ ‘अग्नि पुराण’ भारतीय विद्याओं का विश्वकोष’ कहा जाता है। इसमें धर्म, ज्योतिष, राजनीति, व्याकरण, आयुर्वेद, अलंकार, छंद, योग, वेदान्त आदि सभी विषयों का समावेश है, इस ग्रंथ में ‘भरत और भारत’ से संबंधित निम्न पंक्तियां हैं :- जरा-मृत्यु-भय ना हित धर्मो-धर्मो युगादिकम्।ना धार्म महगमं तुल्या हिमादे तान्तु नाभितः।। ऋशयो मरूदेव्यां च ऋशभाद्‌ भरतो ऽमवत‌ः।ऋशभादडदात श्री पुत्रे भाल्य ग्रामे हरिंगतःभरताद्‌ भारतवर्श भरतपात सुमतिस्वभूत ।।(अग्निपुराण ४०-४४) अर्थ – उस हिमवत प्रदेश (भारतवर्ष को पहले हिमवत प्रदेश कहते थे) में हरा, (बुढ़ापा) और मृत्यु का भय नहीं था,धर्म और अधर्म भी नहीं थे, उनमें मध्यम समभाव था, वहां ‘नाभिराजा व मरूदेवी’ से ‘ऋषभ’ का जन्म हुआ।ऋषभ से भरत हुए।ऋषभ ने राज्य भरत को प्रदान कर सन्यास ले लिया। भरत से इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ हुआ। भरत के पुत्र कानाम ‘सुमति’ था। (अग्निपुराण, ४०-४४) आदिनाथ पुत्र भरत के नाम से बना भारत  भारत सम्बंधी उल्लेख ‘मार्कण्डेय पुराण’ में भी कहा गया है, इसके रचयिता मार्कण्डेय ऋषि थे।उन्होंने भी उल्लेख किया है –‘आग्नीघ्र सुनार्नाथिसतुऋशभो ऽ मभूत द्विण:।ऋशभाद्‌ भरतो जज्ञे वीर: पुत्र शताद्‌ वर:।सोत्र्भिषिंच्यर्षभः पुत्र महाप्राव्रम्य मास्थितः।तपस्ते ये महाभाग: पुलहा संश्रय:।।हिमाह्‌व दक्षिणी वर्श भरताय पिता ददो।अग्नीपुत्र नाभि से ऋषभ उत्पन्न हुये, उनसे भरत का जन्म हुआ जो अपने १०० भाईयों में बड़े थे। ऋषभ नेज्येष्ठ पुत्र भरत का राज्याभिषेक कर महाप्रवज्या ग्रहण की और आश्रम में उस महाभाग्यशाली ने तप किया।ऋषभ ने भरत को ‘हिमवत’ नामक दक्षिण प्रदेश शासन के लिये दिया था। अत: उस महात्मा ‘भरत’ के नाम सेइस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ हुआ। (मार्कण्डेय पुराण) ‘ब्रह्माण्ड पुराण’ जो काफी प्राचीन है, उसमें भी भरत औरभारत के सम्बंध में उल्लेख मिलता है –‘नाभिस्त्वजनयत्‌ा पुत्र मरूदेव्यां महाद्युति:।ऋशमभाद्‌ भरतो यज्ञ जे वीर: पुत्रशताग्रज:।।ऋशभ पार्थिवश्रेष्ठं सर्वक्षत्रस्य पूर्णनम्‌ा।सोडभिषिंचयर्षभ: पुत्र महाप्राव्राज्य मास्तिथ:।।हिमहूंव दक्षिणं वर्श: भरताय न्यवेदमत्‌ा।तस्मास्तु भारतं वर्श तस्य नाम्ना विदर्बुधी:।(ब्रह्माण्ड पुराण)अर्थ – नाभि ने मरूदेवी से महाद्युतिवान ‘ऋषभ’ नामक पुत्र को जन्म दिया। ऋषभदेव ‘पार्थिव श्रेष्ठ और सबक्षत्रियों के पूर्वज थे, उनके १०० पुत्रों में वीर ‘भरत’ अग्रज थे। ऋषभ ने उनका राज्याभिषेक कर महाप्रवज्या ग्रहणकी थीr।उन्होंने भरत को ‘हिमवत’ नाम का दक्षिणी भाग राज्य करने के लिये दिया था और वह प्रदेश आगे चलकर भरतके नाम पर ही ‘भारतवर्ष’ कहलाया। वायुपुराण में भी ठीक ऐसा ही कहा गया है, यह पुराण विष्णु-भक्ति का मुख्यग्रंथ है, इसमें एक उद्धरण है, ऐसा ही उद्धरण नारद पुराण में मिलता है यथा-‘आसिततपुत्ररा मुनिश्रेश्ठ: भरतो नाम भूपति:।आर्शभो यस्य नाम्नेदं भरत खंड युच्यते।।स राजा प्राप्तराज्यंतु पितृपितामह: क्रमात्‌ापालरामास धर्मेण पितृवदपनयन्‌ा प्रजा:।। (नारद पुराण, पूर्वखंड)अर्थ – पूर्व समय में लुनियों में श्रेष्ठ ‘भरत’ नाम के राजा थे।वे ऋषभदेव के पुत्र थे, उन्हीं के नाम से यह देश ‘भारत वर्ष’ कहा जाता है।उस राजा भरत ने राज्य प्राप्त कर अपने पितामय की तरह से ही धर्मपूर्वक प्रजा का पालन पोषण किया था।लिंगपुराण’ शिवतत्व की मीमांसा की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, उसमें भगवान शंकर के ३८ अवतारों कावर्णन है।इस पुराण में ‘भरत और भारत’ के सम्बंध में लिखा है –‘नाभिस्तजनपत पुत्र मरूदेव्यां महामति:।ऋशकभ पार्थिव श्रेश्ठं सर्वक्षत्र-सुपूजितम्‌ा।।ऋशभपाद्‌ भरणे जझे वीर: पुत्र भाताग्रज:।सकृभिशिकृचय ऋशभो भरत पुत्र वत्सज:।।हिमाद्रेदी तर वर्श भरताय न्‍्यय वेदयात्‌ा।के तस्मातं भारत वर्श यस्य नाम्ना विदुर्बुधा:।।लिंगपुराण, ४७/४९/२३)अर्थ- महामति नाभि को मरूदेवी नाम की धर्मपत्नी से ऋषभ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, यह ऋषभ पार्थिवों(नृपतियों) में आता है और संपूर्ण क्षत्रियों द्वारा पूजित था। ऋषभ से भरत की उत्पत्ति हुई जो अपने १०० भ्राताओंमें अग्रजन था। पुत्र वत्सल ऋषभदेव ने भरत को सम्यपद पर अभिषिक्त किया, उन्होंने हिमवान के दक्षिणी भागको भरत के लिये दिया, उसी भरत के नाम से विद्वान इसे ‘भारतवर्ष’ कहते हैं। स्कन्द पुराण’ एक वष्हकाय ग्रंथहै, इसकी ६ संहिताओं में ८४,००० श्लोक हैं। इस ग्रंथ में भारतवर्ष के नामकरण का जिक्र आया है –नाभे: पुत्र षबृभ, ऋशभाद्‌ भरतो मवेत्।तस्य नाम्ना त्विदं वर्श भारत चेति कीते ।।(स्कंद पुराण, माहेश्वर खंडस्थ कौमाखंड)अर्थ- नाभि का पुत्र ऋषभ और ऋषभ से ‘भरत’ हुआ, उसी के नाम से यह देश ‘भारत’ कहा जाता है। ‘श्रीमद्‌भागवत’ भक्ति का अमर स्त्रोत है, महर्षि व्यासदेव ने इस ग्रंथ में उल्लेख किया है –येशां रवलु महायोगी भरतो ज्येशठः श्रेश्ठ: गुणश्रया।येनेदं वर्श भारतामिति व्यपदिशन्तिं ।।अर्थ – श्रेष्ठ गुणों के आश्रयभूत, महायोगी भरत अपने १०० भाईयों में श्रेष्ठ थे, उन्हीं के नाम पर इस देश को‘भारतवर्ष’ कहते हैं। (श्रीमद्‌ भागवत ५-४-९)‘सार्थ’ एकनाथी भगवान ने भी मराठी भाषा में उल्लेख किया है – अर्थ- ऋषभदेव के पुत्र भरत ऐसे थे, जिनकीकीर्ति सारे संसार में आश्चर्यजनक रूप से फैली हुई थी। भरत सर्वपूज्य हैं। कार्य आरम्भ करते समय भरत जी कानाम स्मरण किया जाता है। ऐसे भरत के नाम पर इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा।ऐसा तो ऋषभाचा पुत्र जपसी नाम भरत त्यांच्या नामाची कीर्ति विचित्र। परम पवित्र जगामापी तो भरतु राहिलामूमिकेसी।म्हण्पेणि भारतवर्श म्हणती यासी।सकल कर्म्मरिम्मी करिता संकल्पवासी।ज्याचिया नामामि स्भरतासी। (सार्थ एकनाथी भावत २-४४-४३) सूरदास हिन्दी के प्रसिद्ध कवि थे, उन्होंने ‘सूरसागर’ ग्रंथ की रचना की थी उन्होंने भी उल्लेख किया है-ऋषभदेव जब वन को गये, नवसुत नवौ-खंड-न प भये।भरत सौ भरत खंड को रच, करे सदा ही धर्म अरू न्याव।।(सूरसागर, पंचम स्कंध पृष्ठ ४५०/४५४)शिवपुराण में शंकर से सम्बंधित महत्वपूर्ण मान्यताएं का वर्णन है, इस पुराण में २४,००० श्लोक हैं। इसमें ‘भरत’के सम्बंध में कहा गया है –नाभे: पुत्र चं वृशभो वृशभात् भरतोऽयवत्।तस्य नाम्ना त्विदं वर्श भारत चेदि कीर्त्यते।। (शिवपुराण ३७/५७)अर्थ – नाभि के पुत्र वृषभ हैं और वृषभ के पुत्र भरत हुए, उनके नाम से इस देश का नाम भारतवर्ष हुआ।‘महापुराण’ में भी वृषभ और भरत से सम्बद्ध अनेक उद्धरण मौजूद हैं। महापुराण भगवाज्जिनसेनाचार्य काख्याति प्राप्त ग्रंथ है, इसकी रचना ईसवी सन् ९वीं शदी में की गई थी, जिसके एक स्थान पर लिखा है-ततोभिषिच्य-साम्राज्ये भरत सुनुमामिपमम्।भगवान‌ भारतवर्ष तत्सनाथं व्यधादिदम ।।महापुराण ४७//७६इसके पश्चात्‌ा भगवान ऋषभदेव ने अपने ज्येष्ठ पुत्र का राज्याभिषेक किया तथा भरत से शासित प्रदेशभारतवर्ष हो ऐसी, घोषणा की थी। इसी ग्रंथ में एक दूसरे स्थान पर भरत और भारत दोनों के नाम की सार्थकताबतलाई गई, वह इस प्रकार है- प्रमोद भरतः प्रेम निर्भरा बंधुता सदा।तमाहवतं भरतं भावि समस्त भारधतितम्।।तन्‍नस्ना भारतं वर्षामि तिहासींजनास्पदम्।हिमाद्रेशसमुद्राच्च क्षेत्र चक्रमृतामिदम्।।अर्थ- समस्त भरत क्षेत्र के भावी आधिपति को आनंद की अतिशयता से प्रगाढ़ प्रेम करने वाले बंधु समूह ने ‘भरत’ऐसा कहकर संबोधन दिया। उस भरत के नाम से हिमालय से समुद्र पर्यन्त यह चक्रवर्तियों का क्षेत्र ‘भारतवर्ष’नाम से लोक में प्रसिद्ध हुआ।‘पेरूदेव चम्पूः जैन साहित्य का सुप्रसिद्ध काव्य है, इसमें पुरूदेव ऋषभदेव का जीवन चारित्र साहित्यिक सांचे मेंप्रस्तुत किया गया है, पुरूदेव ऋषभदेव के संदर्भ में ही भरत और भारत का भी उल्लेख है-तन्न्‍म्ना भारतं वर्शामितिहासीज्जनास्पदम्हिमाद्रेशसमुदाच्च क्षेत्र चक्रभूतादिकम् (पुरूदेवचम्पू ६,३२)अर्थ-भरत के नाम से यह देश ‘भारतवर्ष’ प्रसिद्ध हुआ, ऐसा इतिहास है। हिमालय कुलांचल से लेकर लवणसमुद्रतक का यह क्षेत्र ‘चक्रवर्ती’ का क्षेत्र कहलाता है। ‘वसुदेवहिंदी’ प्राकृत भाषा का प्रसिद्ध जैन ग्रंथ है, इसमें एक स्थान पर वसुदेवहिंदी के लेखक ‘धर्मसेनमणि’ नेउल्लेख किया है –तत्व भरहो भरहवास चूड़ामणि, तस्सेव णामेण इहं भारतवासंति पवपुचंति।’ (वसुदेवहिंदी प्र. ख. पष्ष्ठ ८६)अर्थ- भारतवर्ष का चूड़ामणि भरत हुआ, उसी के नाम से इस देश को ‘भारतवर्ष’ कहते हैं। ‘जम्बूद्वीप पण्णत्ति’एक प्रसिद्ध जैन ग्रंथ है इसमें जम्बूद्वीप का साधिकार विवेचन किया गया है, इसके भारतक्षेत्राधिकारी मेंभारतवर्ष के नामकरण के सम्बंध में लिखा गया है-‘भरते अईत्यदेवे णहि डिड्समहाज्जुए जावपति ओवमढिइए परिवसइ।स ए एणट्ढेणं गोयमा, एवं वुच्चइ भरहेवासं।।’अर्थ- इस क्षेत्र में एक महर्द्धिक, महाद्युति वंत, पल्‍यो पमथति वाले ‘भरत’ नाम के देव का वास है। उसके नामसे इस क्षेत्र का नाम भारतवर्ष प्रसिद्ध हुआ। इसी अधिकार में एक दूसरे स्थान पर लिखा है,‘भरतनाम्नश्चक्रिणो देवाच्च भारत नाम प्रवष्तं भारत वर्षाच्च तयानचि।’अर्थात्‌ा भरत चक्रवर्ती के नाम से भारत वर्ष का नामकरण हुआ और भारतवर्ष से उनका सीधा सम्बंध है। इसप्रकार वैदिक पुराण व परम्परा तथा जैनों के पुराण ग्रंथ में ऋषभदेव के पुत्र ‘भरत’ को ही ‘भारतवर्ष’ नाम कोमुलाधार मानते हैं, इसमें कोई दो मत नहीं है।संदर्भ:- भरत और भारत डॉ. प्रेमसागर जैन

१० फरवरी २०२१ के अभियान की घोषणा के रूपरेखा में हुआ बदलाव 0

१० फरवरी २०२१ के अभियान की घोषणा के रूपरेखा में हुआ बदलाव

‘भारत को केवल भारत ही बोला जाए’ अभियान की सफलता के लिए १० फरवरी २०२१ को दिल्ली में भारत सम्मान दीपोमय यात्रा का आयोजन किया गया था। दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन के कारण ‘भारतसम्मान दीपोमय यात्रा’को स्थगित कर दिया गया, लेकिन कई भारतीयों ने दिल्ली पहुंचकर दिल्ली के कई सांसदों से संपर्क स्थापित किया, ऐतिहासिक प्रतिवेदन दिया और सभी सांसदों से निवेदन किया कि अब ‘भारत को भारत ही बोला जाए’, विश्व में भारत का सम्मान ‘भारत’ के नाम से ही हो। कहते हैं इंसान में यदि जज्बा हो और कार्य करने की मौलिकता हो, तो सफलता मिलती ही है, वही हुआ जब हम सभी भारतीय विभिन्न राज्यों के मुंबई से विनोद माहेश्वरी, सुंदरलाल बोथरा, डॉ जगन्नाथ चव्हाण, गुलबर्गा कर्नाटक से दिपक बलदवा, गणेश बंग, राजस्थान से श्रीमती सरोज मरोठी, श्रेयांश बेद, अरविंद उभा, दलीप पंचारिया अन्य ने दिल्ली में सांसदों से मिलकर निवेदन किया कि अब भारत को ‘भारत’ ही बोला जाए के लिए आप संसद में प्रयास करें, सभी सांसदों नेकहा कि हम पूरी कोशिश करेंगे। इस बार चल रहे संसद सत्र में हम भारत को केवल ‘भारत’ ही बोला जाए अभियान को जरूर उठाएंगे, यदि नहीं हो पाया तो विश्वास दिलाते हैं कि अगले संसद सत्र में भारत को केवल भारत ही बोला जाएगा मुद्दा जरूर पास हो जाएगा। चतुर्विद जैन समाज ने स्वीकार कर लिया है कि हम तीर्थंकर आदिनाथ के पुत्र भरत चक्रवर्ती के नाम से देश का नाम जो ‘भारत’ पड़ा था, अब हम हमारे देश को ‘भारत’ ही बोलेंगे, किसी भी दूसरे नाम से नहीं पुकारेंगे। विश्वास दिलाता हूँ कि जिस प्रकार देश में जागरूकता आयी है कि अब हम हमारे देश को केवल ‘भारत’ कहेंगे तो वह समय दूर नहीं, जब विश्व में भारत को ‘भारत’ ही कहा जाएगा। हमारा देश भरत चक्रवर्ती का देश विश्व में ‘भारत’ के नाम से गौरवान्वित होगा।