Author: Bijay Kumar Jain

श्री महाश्रमण 0

श्री महाश्रमण

जैन एकता के परम समर्थक श्री महाश्रमण तेरापंथाचार्य कहते हैं जैसे गुरु वैसे शिष्य!समस्त जैन समाज की एकमात्र विश्वस्तरीय पढी जाने वाली पत्रिका, ‘जिनागम’ पिछले २० सालों से लगातार प्रयास से ‘जैन एकता’ का पौधा रोप पाया पर अभी तक यह पेड़ नहीं बन पाया है, हमें मिलकर ‘जैन एकता’ का पेड़ व उस पर मिठे फल की प्राप्ति का प्रयास करना है। आचार्य श्री महाश्रमण के द्वय गुरु आचार्य श्री तुलसी व आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने अपने आचार्यत्व के काल में भरपूर ‘जैन एकता’ के लिए मेहनत की, अन्यान्य पंथों के गुरु-भगवंतों से विनंति कर ‘जैन एकता’ के फायदों को बताया, यहॉ तक की आचार्य श्री तुलसी ने ‘संवत्सरी’ एक दिन करने के लिए अपने आचार्यत्व पद को त्यागने का भी फरमान जारी कर दिया था। आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा भी अनगिनत प्रयास किए जाते रहे, अब इन्हीं के शिष्य वर्तमानाचार्य महाश्रमण जी ने बीड़ा उठाया है कि वर्ष २०१९ को प्रयास कर ‘संवत्सरी’ एक दिन मनायेंगे और आगामी कुछ वर्षों में हम सभी विभिन्न पंथों मानने को वाले ‘जैन’ बन जायेंगे। हम सभी तो जैन हैं ही, लेकिन हम सभी के दिलों में दिगम्बर-श्वेताम्बर की भावना जो बसी है, कुछ कट्टरता भी है वो बस आमनाय की है, भले ही हम चार भाइयों की आमनाय अलग-अलग हो, पूजा-पद्धति अलग-अलग रहे लेकिन वो अपने घरों में रहे, मंदिरों में रहे, पर शहर-नगर मे ना हो, वहाँ हम केवल-केवल जैन हों, भगवान महावीर के अनुयायी हों, क्योंकि भगवान महावीर मात्र ‘जैनों’ के नहीं वो तो विश्व के हैं, क्योंकि उनके द्वारा दिया गया अहिंसा शस्त्र ही फैले आतंकवाद से हमें बचा सकता है, हमें सुरक्षा दे सकता है। कहते हैं युवा पिढ़ी जिस किसी अभियान को अपने कंधे पर पर ले लेती है वह सफल होता ही है, आज हमारे जैन समाज के युवानों ने अपने कंधे पर ‘जैन एकता’ अभियान उठा लिया है, सफलता निश्चित है बस हमें सकारात्मकता अपनाने की जरुरत है। मंत्री मुनिश्री सुमेरमलजी ‘लाडनूं’ के स्वर्गालोक की खबर सुनकर मन आद्वेलित हो गया, भगवान महावीर उन्हें मोक्ष प्रदान करें, उनके चरणों में वंदन! जय भारत! जय भारतीय संस्कृति! पूर्ण राष्ट्र की परिभाषा भाव-भूमि और भाषा

आचार्य श्री महाश्रमण 0

आचार्य श्री महाश्रमण

आचार्य श्री महाश्रमण जी का २०२३ में मुम्बई चातुर्मास घोषित : तेरापंथ धर्म संघ के ११ वें अधिशास्ता शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी ने २०२३ का चातुर्मास भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई में करने की घोषणा की गयी है, चातुर्मास में बहुआयामी आध्यात्मिक सामाजिक गतिविधियों के साथ पूरे विश्व में अहिंसा, शांति, सद्भभावना, नैतिकता, व्यसनमुक्ति का संदेश जाएगा। चातुर्मास को ऐतिहासिक व उपलब्धियों भर बनाने के लिए पूरा तेरापंथ समाज आचार्य श्री महाश्रमण चातुर्मास सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष मदन लाल तातेड़ जैन के नेतृत्व में जोर-शोर सफलता की तैयारियों में लगे हैं, ऐतिहासिक चातुर्मास की याद को चिरस्थाई बनाने के लिए छेडा नगर में एक भवन के निर्माण की योजना बनी है, जहाँ से सामाजिक आध्यात्मिक मेडिकल हॉस्टल जैसी गतिविधियां संचालित होंगी। ज्ञातव्य हो कि ६९ वर्ष पूर्व मुम्बई में आचार्य श्री तुलसी जी का चातुर्मास हुआ था। २००३ में आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी का अहिंसा यात्रा के साथ मुम्बई आगमन हुआ था, उस समय तेरापंथ भवन कांदिवली तथा महाप्रज्ञ पब्लिक स्कूल कालबादेवी का निर्माण हुआ था, दोनों ही आज मुम्बई के लैंड मार्क बने हुए हैं। आचार्य श्री महाश्रमण जी हैदराबाद में चातुर्मास सम्पन्न कर अहिंसा यात्रा के साथ रायपुर (छत्तीसगढ़) की ओर पद विहार कर रहे हैं, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी सद्भभावना, नैतिकता, व्यसन मुक्ति का संदेश देते हुए हजारों लोगों के जीवन को सही दिशा दे रहे हैं। आपका २०२१ का चातुर्मास भीलवाड़ा राजस्थान में है। – मनोहर गोखरू जैन आचार्य श्री महाश्रमण जी का २०२३ में मुम्बई चातुर्मास घोषित 

भगवान महावीर कैवल्यज्ञान 0

भगवान महावीर कैवल्यज्ञान

भगवान महावीर कैवल्यज्ञान दिगम्बर जैन मलयागिरि तीर्थ क्षेत्र  जमुई (बिहार): जैन इतिहासकारों एवं विद्वानों द्वारा यह प्रमाणित किया गया है जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के पंच कल्याणकों एवं जीवन के सन्दर्भ में जैन शास्त्रों में वर्णित तथ्यों के आधार पर माना जा रहा है कि भगवान महावीर का कैवल्यज्ञान कल्याणक ऋजुकुला (क्यूल) नदी के तट पर शालवृक्ष के नीचे जृम्भक ग्राम बिहार प्रांत में हुआ था, जिसे वर्तमान में जमुई नाम से जाना जाता है। बारह वर्ष पाँच महीने १५ दिन की घोर तपस्या के बाद वैशाख शुक्ल दशमी को कैवल्यज्ञान की प्राप्ति हुई थी, उनके समवशरण में श्री इन्द्रभूति आदि ११ गणधर, १४ हजार मुनि, गणिनी आर्यिका चंदना सहित छत्तीस हजार आर्यिकाएँ, १ लाख श्रावक व ३ लाख श्राविकाएँ थी, इनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर स्वामी हुए। अतः उपरोक्त तथ्यों, आधुनिक विद्वानों एवं परम पूज्य आर्यिका ज्ञानमति माता जी के प्रेरणा से बिहार राज्य श्री दिगम्बर जैन तीर्थ क्षेत्र कमिटी, देवाश्रम, आरा ने बिहार राज्य के जमुई जिला अंतर्गत मलयपुर पतनेश्वर पहाड़ी के निकट ऋजुकुला नदी के तट पर एक एकड़ सवा नौ डिसमील जमीन की खरीदगी कर क्षेत्र का निर्माण कराया गया, जिसमें पाँच कमरे, एक हॉल का निर्माण हुआ है। परम पूज्य ज्ञानमती माता जी के आशीर्वाद से तथा दिल्ली निवासी श्री अनील कुमार जी जैन कमल मन्दिर के सहयोग से क्षेत्र में स्थित पहाड़ी पर भगवान महावीर की कमल सहित १५ फुट ऊँची प्रतिमा स्थापित कर पूज्य रविन्द्रकीर्ति स्वामी जी के सानिध्य में पंचकल्याणक सम्पन्न हुआ। भगवान महावीर की इस पावन भूमि को ‘केवल्य धाम’ नाम से जाना जाता है। पावन ज्ञान भूमि पर क्षेत्र के सर्वांगीण विकास में आप सबों का सहयोग अनिवार्य है। भगवान महावीर केवल्य ज्ञान भूमि के निर्माण कार्यों में तन- मन- धन से सहयोग करें ताकि क्षेत्र का विकास यथावत किया जा सके। यात्रियों के मूलभूत सुविधायें तथा पानी की बोरिंग, प्रसाधन कक्ष कमरे, पहाड़ी पर सीढी का निर्माण तथा मन्दिर प्रांगण में मार्बल पत्थर का कार्य वर्ष २०१८ को पूर्ण हुआ। चम्पापुरी, पावापुरी जी के मुख्य मार्ग पर स्थित होने के कारण इस क्षेत्र पर यात्रियों का आवागमन होता रहता है। प्रबंधक-राकेश जैन-९५२५४७८८६५ उपप्रबंधक-अभिषेक जैन-९५४६५४३८४१

जीतो कोयम्बतूर 0

जीतो कोयम्बतूर

‘जीतो’ कोयम्बतूर की नई समिति का गठन कोयम्बतुर: भारत में समाज कल्याण की अग्रणीय संस्था जैन इन्टरनेशनल ट्रेड ऑर्गनिजेशन ‘जीतो’ कोयम्बतुर की नई समिति घोषित की गई। निवनिर्वाचित चेयरमेन रमेश बाफना ने पदाधिकारियों की घोषणा करते हुए आगामी वर्ष में होने वाले कार्यक्रमों की रूप रेखा प्रस्तुत की। श्री बाफना ने जीतो कोयम्बतूर को नई उँचाइयों पर ले जाने हेतु सभी से सहयोग का आव्हान किया। नई समिति के पदाधिकारी बने चेयरमेन-श्री रमेश बाफना, कोचेयरमैन-श्री राकेश मेहता, महामंत्री श्री सम्पत पारेख, मंत्री-श्री भेरू जैन, श्री अलकेश सेठ, कोषाध्यक्ष-श्री जम्बु कुमार, सहकोषाध्यक्ष-श्री प्रदीप कवाड़। ‘जीतो’ कोयम्बतूर महामंत्री श्री सम्पत पारेख ने ‘जिनागम’ को बताया कि श्री सुनील नाहटा तमिलनाडू जोन से केन्द्रीय सभा में प्रतिनिधित्व करेंगे। श्री इन्दरचन्द कोठारी तमिलनाडू एवं आन्ध्र प्रदेश जोन में कोयम्बतूर ‘जीतो’ का प्रतिनिधित्व करेंगे, इसके अलावा १७ विभिन्न क्षेत्रों में कार्य हेतु संयोजक एव सहसंयोजक मनोनित किए गए। ‘जीतो’ कोयम्बतूर आने वाले दिनों में विभिन्न कार्यक्रमों को मूर्त रूप देने जा रहा है। उक्त जानकारी जीतो कोयम्बतुर मीडिया प्रभारी श्री ललित जालोरी एवं राजेश बोहरा ने ‘जिनागम’ को दी है।

महामंत्र णमोकार 0

महामंत्र णमोकार

श्री विद्यासागर पाठशाला द्वारा संचालित महामंत्र णमोकार तीर्थंकर केवली के भेद तथा तीर्थंकर प्रकृति की बंध व्यवस्था किस प्रकार की है, इसका वर्णन किया जा रहा है। अरिहंतों अर्थात् केवली के कितने भेद होते हैं? अरिहंतों अर्थात् केवली के दश भेद होते हैं। (१) तीर्थंकर केवली के तीन भेद होते हैं। (१) पांच कल्याणक वाले तीर्थंकर केवली । जिन जीवों के पूर्वभव में ही तीर्थंकर प्रकृति का बंध हो गया है, उन जीवों के नियम से गर्भ कल्याणक, जन्म कल्याणक, तप कल्याणक, ज्ञान कल्याणक और निर्वाण (मोक्ष) कल्याणक यह पांचों कल्याणक होते हैं। गर्भ कल्याणक, जन्म कल्याणक, तप कल्याणक, केवलज्ञान कल्याणक और मोक्ष कल्याणक इन पांच कल्याणक वाले तीर्थंकर वे ही जीव बनते हैं, जिन्होंने तीर्थंकर बनने के पूर्व तीसरे भव में ही तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया हो अर्थात् जिस मनुष्य भव में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया है, वहां पर यदि अवद्धायुष्यक (जिन्होंने पूर्व भव की किसी भी आयु को नहीं बांधा है) है, तो ऐसा जीव नियम से देव आयु का ही बंध करता है अथवा देवायुवद्धायुष्क (जिन्होंने देव आयु का बंध कर लिया है, ऐसे जीव देव पर्याय में जाते हैं। अथवा जो नरकायुबद्धायुष्क (जिन्होंने नरक आयु का बंध कर लिया है , ऐसे जीव नरक पर्याय में जाते हैं, उनकी अपेक्षा देव पर्याय या नरक पर्याय यह दूसरा भव हुआ। देव पर्याय या नरक पर्याय से आकर पुनः मनुष्य पर्याय को प्राप्त करते हैं और मुनि दीक्षा को धारण कर चार घातिया कर्मों का क्षय कर केवल ज्ञान को प्राप्त कर तीर्थंकर प्रकृति के उदय से १३ वें गुणस्थान में नियम से ८ वर्ष अंतर मुहूर्त काल तक समवशरण में भव्य जीवों को उपदेश देकर फिर मोक्ष को प्राप्त होते हैं, उनकी अपेक्षा यह मनुष्य भव तीसरा भव हुआ। (१) तीर्थंकर प्रकृति के बंध की अपेक्षा वर्तमान मनुष्य भव पहला भव हुआ। (२) तीर्थंकर प्रकृति के सत्त्व की अपेक्षा देव पर्याय या नरक पर्याय यह दूसरा भव हुआ । (३) तथा तीर्थंकर प्रकृति के सत्त्व और उदय की अपेक्षा वर्तमान में प्राप्त मनुष्य पर्याय यह तीसरा भव हुआ। (२) तीन कल्याणक वाले तीर्थंकर केवली, जिन जीवों के वर्तमान मनुष्य पर्याय के भव में ही गृहस्थ अवस्था में दीक्षा लेने के पहले ही तीर्थंकर प्रकृति का बंध हो जाता है, उन जीवों के तप कल्याणक, ज्ञान कल्याणक और निर्वाण कल्याणक में तीन कल्याणक होते हैं। जिन जीवों ने चरम अर्थात् अंतिम शरीर को धारण किया है, ऐसे जीवों ने असंयत अर्थात् चतुर्थ गुणस्थान और देव संयत अर्थात् पंचम गुणस्थान में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया है, तब उनके तप, ज्ञान और मोक्ष यह तीन कल्याणक होते हैं। ३) दो कल्याणक वाले तीर्थंकर केवली, जिन जीवों के वर्तमान मनुष्य पर्याय के भव में ही मुनि दीक्षा लेकर फिर तीर्थंकर प्रकृति का बंध हुआ है, उन जीवों के ज्ञान कल्याणक और निर्वाण कल्याणक यह दो कल्याणक होते हैं। जिन जीवों ने चरम अर्थात् अंतिम शरीर को धारण किया है। साथ ही मुनि दीक्षा को प्राप्त कर भावलिंग के साथ मुनि व्रतों का पालन कर रहे हैं, ऐसे जीव प्रमत्त अर्थात् छठवें गुणस्थान और अप्रमत्त अर्थात् सातवें गुणस्थान में तीर्थंकर प्रकृति का बंध करते हैं, तब उनके ज्ञान कल्याणक और मोक्ष कल्याणक यह दो कल्याणक होते हैं। -बाल ब्रह्मचारी अशोक भैया भ्रमणध्वनि: ९४२४५९५४४५,९१०९३६७३१८

महिला शिक्षा की जननी महिलारत्न पं. चंदाबाई जी 0

महिला शिक्षा की जननी महिलारत्न पं. चंदाबाई जी

महिला शिक्षा की जननी महिलारत्न पं. चंदाबाई जी : माँ-श्री महिलारत्न पं.चंदाबाई जी का जन्म वि. सं.१९४६ की आषाढ-शुक्ल तृतीया की शुभ बेला में वृंदावन में हुआ था। बारह वर्ष की आयु में आपका शुभ विवाह संस्कार आरा नगर के प्रसिद्ध जमींदार जैन धर्मानुयायी पं. प्रभुदास जी के पौत्र श्री चंद्रकुमार जी के पुत्र श्री धर्मकुमार के साथ सम्पन्न हुआ था। बाबू धर्मकुमार जी की मृत्यु विवाह के कुछ समय बाद ही हो गई। मात्र तेरह वर्ष की अवस्था में ही वैधव्य की वैधवीकला ही आपकी चिरसंगिनी बनी। आपके जेठ देव प्रतिमा स्वनामधन्य बाबू देवकुमार जी ने अपनी अनुज वधू को विदुषी, समाज-सेविका और साहित्यकार बनाने में कोई कमी नहीं रखी। आपने घोर परिश्रम कर संस्कृत, व्याकरण, न्याय, साहित्य, जैनागम एवं प्राकृत भाषा में अगाध पांडित्य प्राप्त किया और राजकीय संस्कृत विद्यालय काशी की पंडित परीक्षा उत्तीर्ण की, जो वर्तमान में शास्त्री परीक्षा के समकक्ष है। महिला शिक्षा की जननी महिलारत्न पं. चंदाबाई जी ने सन्‌ा् १९०९ में भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महिला परिषद की स्थापना कर नारी जागरण का मंत्र फूँका। इस संस्था के प्लेटफार्म से आपने नारी जागरण के अनेक कार्य किये। मातुश्री केवल वचनों द्वारा ही नारी जागरण नहीं करती, बल्कि अपना क्रियात्मक योगदान भी देती थी। आपके प्रयास से बिहार के बाहर भी नारी शिक्षा एवं नारी जागरण का काम किया गया। नारी के सर्वांगीण विकास के लिए सन् १९०९ में आपने श्री देवकुमार जी द्वारा आरा नगर में एक कन्या पाठशाला की स्थापना कराई और स्वयं उसकी संचालिका बन नारी शिक्षा का बीज बोया। मातुश्री इस शाला में शाम के समय मोहल्ले की नारियों को एकत्र कर स्वयं शिक्षा देती एवं उन्हें कर्तव्य का ज्ञान कराती थी। इस छोटी सी पाठशाला से आपको संतोष नहीं हुआ। आपने सन्‌ा् १९२१ में नारी शिक्षा के प्रसार के निमित्त श्री जैन बाला विश्राम नाम की शिक्षा संस्था स्थापित की। इस संस्था में लौकिक एवं नैतिक शिक्षा का पूरा प्रबंध किया गया। विद्यालय के साथ छात्रावास की भी व्यवस्था की गई थी। इस संस्था का वातावरण बहुत ही विशुद्ध और पवित्र है। यहाँ पहुँचते ही धवलसेना हंसवाहिनी और वीणावादिनी सरस्वती आगंतुकों का स्वागत करती है। छात्रावास और विद्यालय भवनों की विशेषता ईंट चूने से बनी इमारत में नहीं बल्कि साध्वी माँ-श्री के व्यक्तित्व के आलोक से आलोकित होने वाली अगणित बालाओं के उत्थान में है। माँ-श्री ने इस संस्था में अपना तन-मन-धन सब कुछ दिया। आपकी तपस्या छात्राओं को स्वत: आदर्श बनने की प्रेरणा देती थी। माँ-श्री की सेवा, त्याग और लगन का मूल्य नहीं आंका जा सकता। इस संस्था में भारत के कोने-कोने से आकर बालायें शिक्षा प्राप्त करती थी। इसी जैन बाला विश्राम में पढ़कर बहुत बालिकाएं अनेक उच्च स्थानों पर गई। इसी विद्यालय से पढ़ कर अनेक विदुषी छात्राएँ जैन धर्म में स्त्रियों के सर्वोच्च पद आर्यिका बनी। आ. विजयमती माता जी इसकी उधारण हैं। भारत गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, श्री जयप्रकाश नारायण, श्री संत विनोबा भावे एवं श्री काका कालेलकर आदि मनीषियों ने भी इस संस्था की महत्ता को स्वीकार किया है। भारत के तत्कालीन उप राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन ने उन्हे दिल्ली बुलाकर विशेष सम्मान के साथ अभिनंदन ग्रंथ भी दिया। साहित्यिक पुरुषत्ववाद की अंतिम विजयश्री पर माँ- श्री ने महिला साहित्य को अपने व्यक्तित्व का आत्मा निर्माण कर संजोया धा। आपकी करीब १५ रचनायें प्रकाशित भी हुई हैं। सन् १९१२ से ‘जैन महिलादर्श’ नामक हिन्दी मासिक पत्र की संपादन भी करती रही। माँ-श्री श्रमण संस्कृति के प्रसार में अहर्निश संलग्न रहती थी, इसके लिए बिहार के राजगृह, पावापुरी, आरा आदि स्थानों में विपुल धनराशि व्यय कर सुंदर जैन मंदिरों का निर्माण कराया। वृन्दावन में भी एक जिनालय आपके द्वारा निर्मित है। राजगृह के विपुलांचल पर्वत पर तीर्थंंकर भगवान महावीर का प्रथम समवशरण आया, तथा बीसवें तीर्थंकर मुनिसुब्रतनाथ की यह जन्मभूमि भी है। माँ-श्री ने विपुलांचल पर्वत पर महावीर स्वामी का एवं रत्नगिरि पर्वत भगवान का मनोहारी मंदिर बनवाया, भक्तगण जिसका दर्शन कर भक्ति सरोवर में डुबकियां लगाते हैं। आरा में भगवान बाहुबली स्वामी एवं मानस्तम्भ माँ-श्री को सांस्कृतिक सुरुचि का परिचायक है। जैन बाला विश्राम में विद्यालय पक्ष के ऊपर निर्मित जिनालय और उसकी परिक्रमा अदभुत रमणीय है। मंदिरों के अतिरिक्त माँ-श्री ने अनेक जैन मूर्ति का निर्माण एवं उनकी पंचकल्याणक प्रतिष्ठायें भी करवाई हैं। हस्तशिल्प में प्रवीण, पूजा प्रतिष्ठा के अवसरों पर बनाये जाने वाले मॉडलों, नक्शों को बड़े ही कलापूर्ण ढंग से बनाती थी। भगवान के पूजा स्त्रोतों को मधुर अमृतवाणी में सुनकर श्रोता स्तब्ध रह जाते थे। इस प्रकार माँ-श्री ने अपनी विभिन्‍न प्रकार के सेवाओं द्वारा बिहार के नवनिर्माण और नवोत्थान में सहयोग दिया। आप वर्ष में दो बार विभिन्‍न स्थानों में जाकर अपने उपदेश द्वारा भी महिला जागरण का कार्य करती थी, ऐसा महान व्यक्तित्व बिरले ही पृथ्वी पर जन्म लेते है। -(स्व.) डॉ. नेमीचंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य, आरा

देवभूमि बिहार का देव परिवार 0

देवभूमि बिहार का देव परिवार

बिहार के जैन तीर्थक्षेत्रों, जैन संस्थानों एवं जैन गतिविधियों की चर्चा हो एवं आरा के प्रसिद्ध जैन धर्मावलंबी देव परिवार के योगदान का स्मरण न हो, ऐसा संभव ही नहीं। जैन जागृति के अग्रदूतों में इस परिवार की सात पीढ़ियों के यशस्वी/गुणीजनों का समावेश अपने आप में एक उपलब्धि है, जिसे इतिहास से विस्मृत नहीं किया जा सकता। आरा (बिहार) के सुप्रसिद्ध देव परिवार के पूर्व पुरुष अग्रवाल कुलोत्पन गोयल गोत्रीय काष्ठासंघ के पं. प्रवर प्रभुदास जी आज से करीब २०० वर्ष पूर्व अपने परिवार के साथ बनारस में धर्मध्यान किया करते थे। वे संस्कृत व प्राकृत के प्रकांड विद्वान थे, तथा मंत्र शास्त्र के भी अच्छे ज्ञाता थे। जैन दर्शन पर भी इनका प्रभुत्व इनके समकालीन पं. दौलतराम जी एवं पं. भागचन्द जी के टक्कर का था। कविवर वृंदावन जी इनके मित्र थे और उनसे पारिवारिक संबंध था। किंवदंती यह है कि तत्कालीन भट्टारक श्री जिनेन्द्र भूषण जी ने इन्हें प्रेरणा दी कि आप पाँच जिनालय बनाने का नियम लें। पं. प्रभुदास जी की आर्थिक स्थिति मध्यम थी। उन्होंने दुखी होकर आर्थिक विवशता प्रगट की, पर भट्टारक जी के बार-बार आग्रह करने पर नियम ले लिया। काललब्धि से देखते-देखते उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होता गया और उन्होंने भगवान चंद्रप्रभु, भगवान सुपार्श्वनाथ और भगवान पदमप्रभु की गर्भ जन्‍म कल्याणक भूमि क्रमश: चंद्रपुरी जी, भदैनी जी, कौशांबी जी तथा आरा आदि स्थानों पर मंदिर, धर्मशाला का निर्माण कराकर अपना नियम पूरा किया। कालान्तर में उनके धन में वृद्धि होती गई और बिहार में उन्होंने बहुत बड़ी जमींदारी खरीदी तथा आरा आ गये। यहाँ वे १८५७ के सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी बाबू कुँवर सिंह के निकट संपर्क में आये और उन्हें आर्थिक सहयोग प्रदान किया। बाबू कुँवर सिंह द्वारा आरा में पं. प्रभुदास जी को प्रेम पूर्वक भेंट दी गई भूमि पर ‘आरा’ का प्रसिद्ध अतिशयकारी चंद्रप्रभु का मंदिर स्थापित हुआ। धार्मिक, सामाजिक कार्यों में बाबू प्रभुदास जी की अभिरुचि और लगन को लक्ष्य कर उन्हें आरा जैन समाज और सम्मेदशिखर दिगम्बर जैन बीस पंथी कोठी का प्रथम अध्यक्ष चुना गया, जिसका उन्होंने सफलतापूर्वक आजीवन निर्वाह किया। उननीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक निग्रंथ मुनियों का सर्वथा अभाव, जिनवाणी के प्रति अज्ञानता एवं दुर्दशा से जैन समाज के प्रबुद्ध लोगों का चिंतित होना स्वाभाविक था। फलस्वरूप उन्नीसवीं सदी के अंत एवं बीसवीं सदी के प्रारम्भ में कई महत्वपूर्ण संस्थाओं की नींव पड़ी। उत्तर भारत में वीर शासन को पुर्नस्थापित करने में आरा के देव परिवार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजर्षि देव कुमार ने मात्र बीस वर्ष की अल्पायु में आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हुए बैलगाड़ी से दक्षिण भारत तक के सुदूर प्रदेशों की यात्रा की। जगह-जगह जैन शास्त्रों को लिपिबद्ध किया/संभाला और जहाँ कोई व्यवस्था न बन सकी, उन शास्त्रों को आदर पूर्वक ‘आरा’ लाकर सुप्रसिद्ध श्री जैन सिद्धांत भवन की स्थापना की। भवन की व्यवस्था के लिए उन्होंने अपनी जमींदारी का सबसे कीमती गाँव संस्था के नाम कर दिया। राजर्षि देव कुमार जी ने पू. शुल्लक गणेश प्रसाद जी वर्णी के मात्र एक पोस्ट कार्ड के निवेदन पर जिनवाणी के प्रचार-प्रसार के लिए बनारस के गंगातट पर स्थित अपना विशाल भवन, घाट, जमीन सब श्री स्याद्वाद महाविद्यालय प्रारम्भ करने के लिए अर्पित कर दिया ताकि जैन विद्वान तैयार हो सके और जिनवाणी का प्रचार-प्रसार हो। वे आजीवन इस संस्था के मंत्री भी रहे और हर प्रकार से उसकी आर्थिक अड़चनों को दूर किया। महान चिंतक मैक्सम्युलर द्वारा लिखित जैन धर्म संबंधी लेखों एवं पुस्तकों से उन्हें जैन ग्रन्थों को अंग्रेजी में अनुवाद करा कर विश्वव्यापी बनाने की प्रेरणा मिली, उनके द्वारा आरा में स्थापित सेन्ट्रल जैन पब्लिशिंग हाउस द्वारा तत्त्वार्थ सूत्र, कर्मकांड, गणित शास्त्र आदि अनेक महत्वपूर्ण जैन ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद कराकर प्रकाशित किया गया जो आज भी जैन समाज की अनमोल धरोहर है। दि. जैन महासभा के संस्थापक सदस्यों में बाबु देव कुमार जी ने कई वर्षो तक जैन गजट का संपादन भी किया। शिक्षा के क्षेत्र में सुदूर मंगलोर में उन्होंने छात्रों की सुविधा के लिए, जैन होस्टल की स्थापना की तथा १९०५ में जैन महिलाओं में जागृति लाने के उद्देश्य से बिहार प्रांत का प्रथम महिला विद्यालय श्री जैन कन्या पाठशाला की नींव रखी। बिहार के तीर्थक्षेत्रों के विकास करने एवं समाज का वर्चस्व स्थापित करने के लिए उन्होंने अनेकों कदम उठाये, मुख्यतः भगवान वासुपूज्य की ज्ञान, तप व निर्वाण स्थली मंदारगिरि पर स्थित मंदिर आदि की सम्पत्ति तत्कालीन राजा से खरीद कर समाज को अर्पित किया। जैन विधवाओं की दुर्दशा देखकर उनके उत्थान के लिए बे हमेशा चिंतित रहा करते थे। जब उनके छोटे भाई धर्मकुमार की पत्नी चंदाबाई मात्र १३ वर्ष की आयु में विधवा हो गई तो उन्होंने एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्हें काशी भेजा। वहाँ से जब चंदाबाई ने संस्कृत प्राकृत और जैनागम में पारंगत होकर पंडित की उपाधि प्राप्त की, तो उन्होंने नारी जागरण और उत्थान के लिए महिला आश्रम ख्ाोलने के लिए उन्हें प्रेरित किया। दुर्भाग्यवश इसे कार्यान्वित करने के पूर्व १९०८ में देहान्त हो गया। राजर्षि देव कुमार के मृत्यु के पश्चात उनके सुयोग्य पुत्र निर्मल कुमार जी ने अपने पिता की इच्छा पूरी की और आरा स्थित अपने विशाल बाग एवं भवन का दान पत्र लिखकर श्री जैन बाला विश्रामशाला की स्थापना की। ब्र. चंदाबाई जी भी इसके लिए तैयार बैठी थी, उन्होंने अपना समूचा ज्ञान, समूचा जीवन इस महान धार्मिक अनुष्ठान के लिए समर्पित कर दिया। देश के कोने-कोने से आकर हजारों की संख्या में विधवाओं और महिलाओं ने यहाँ उनसे शिक्षा ग्रहण की, संस्था की कीर्ति दूर-दूर तक फैली। परम पूज्य आर्थिका विजयमती माताजी, पू. विमलप्रभा माताजी आदि कई महान विभूतियाँ यहाँ अध्ययन कर चुकी हैं और उन्होंने हमेशा अपने जीवन के सार्थक परिवर्तन के लिए ब्र. चंदाबाई जी एवं श्री जैन बाला विश्राम का उपकार माना है। ब्रह्मचारिणी चंदाबाई जी ने नारी जागरण के लिए अनेक शिक्षाप्रद पुस्तकें लिखी। श्री जैन महिला परिषद की संस्थापक अध्यक्षा के रूप में जीवन भर उसकी गतिविधियों का संचालन किया। उनके द्वारा संपादित एवं प्रकाशित ‘जैन महिलादर्श’ अपने आप में महिला जागृति के क्षेत्र में अलग पहचान रखता है। शिक्षा जगत विशेषकर विधवाओं और अशक्त महिलाओं के क्षेत्र में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को सराहते हुए भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा ब्र. चंदाबाई जी को दिल्‍ली में आयोजित विशाल समारोह में अभिनंदन ग्रन्थ भेंट कर सम्मानित किया गया। अपने पिता राजर्षि देव कुमार जी के कदमों का अनुसरण करते हुए निर्मल कुमार जी ने श्रवणबेलगोला, राजगृही, पावापुरी, सम्मेदशिखर, आरा, गिरनार, पालीताना आदि अनेक स्थानों में मंदिर, धर्मशाला का निर्माण कराया एवं लाखों की संपत्ति दान में दी। श्री निर्मल कुमार जी के सुपुत्र श्री सुबोध कुमार जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनमें लेखक, चित्रकार, कवि, संगीतकार, राजनीतिज्ञ, समाजसेवी आदि सभी गुणों का समावेश था। वे बहुत ही व्यवहारिक, अत्यन्त धार्मिक और सहृदय व्यक्ति थे और अपने पूर्वजों की परंपरा का निर्वाह करते हुए अपना समूचा जीवन धर्म और समाज की सेवा में लगा दिया। श्री सुबोध कुमार जी द्वारा आरा (बिहार) में श्री आदिनाथ नेत्र विहीन विद्यालय, आरा मूकबधिर विद्यालय, श्री जैन बाला विश्राम उच्च विद्यालय, श्री जैन कन्या पाठशाला उच्च विद्यालय, संगीत विद्यालय, श्री जैन महिला विद्यापीठ, श्री निर्मल कुमार चक्रेश्वर कुमार जैन कला दीर्घा, भगवान महावीर विकलांग सेवा समिति आदि अनेक धर्मानुकुल कल्याणकारी संस्थाओं की स्थापना की गई। राजगिरि के विपुलाचल पर्वत पर प्रथम देशना स्मारक के निर्माण की नींव ब्र. चंदाबाई जी द्वारा रखी गई थी। श्री सुबोध कुमार जी द्वारा १९८२ में वहाँ पर प्रथम देशना स्मारक बहुत ही भव्य रूप से करोड़ों की लागत से बनवाया गया, इसके पंच कल्याणक में साहू अशोक कुमार जी सपत्नीक सौधर्म इंद्र-इंद्राणी के रूप में सम्मिलित हुए थे। श्री सुबोध कुमार जी द्वारा बनाये गये सैकड़ों धार्मिक चित्र आरा, राजगिरि, कुंडलपुर आदि की दीर्घाओं में सुशोभित हैं। उन्होंने जैन धार्मिक विषयों पर अनेकों पुस्तकें लिखी व प्रकाशित कराई तथा संस्कृत की कई पूजाओं का हिन्दी में रूपांतर लयबद्ध करके किया। आप वात्सल्य रत्नाकर परम पूज्य विमल सागर महाराज जी के परम भक्त थे तथा उनके प्रेरणा से राजगिरि में महावीरकीर्ति सरस्वती भवन तथा बीसपंथी कोठी के अध्यक्ष के रूप में श्री सम्मेदशिखर जी में तीस चौबीस मंदिर तथा विमल ग्रंथागार, समवशरण मंदिर आदि अनेक धार्मिक कार्य सम्पन्न कराये। श्री सुबोध कुमार जी ने अपनी मृत्यु के पूर्व अनेक संस्थाओं, तीर्थक्षेत्रों आदि की देखभाल की जिम्मेदारी अपने सुपुत्र श्री अजय कुमार जी को सुपुर्द कर दी थी। पारिवारिक परंपरा का पालन करते हुए पिता की आज्ञानुसार मात्र ३० वर्ष की अल्पायु से सभी संस्थाओं का कार्य आप बहुत ही योग्यता पूर्वक एवं कुशलतापूर्वक सँभाल रहे हैं। श्री अजय कुमार जी स्वयं बहुत ही विचारशील, धार्मिक प्रवृत्ति के, सहदय, सुलझे हुए एवं व्यवहारिक व्यक्ति हैं। श्री सम्मेद शिखर बीसपंथी कोठी के अध्यक्ष तथा बिहार प्रांतीय तीर्थक्षेत्र कमेटी के मानद्‌ मंत्री के रूप में बिहार- झारखण्ड में स्थित सभी तीर्थक्षेत्रों की जिम्मेदारी आपने सफलता पूर्वक निभाई है। आपके द्वारा सभी क्षेत्रों पर अनेकों विकास के कार्य किए गए, इन्हीं गुणों के कारण बिहार सरकार द्वारा आपको बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड का अध्यक्ष भी मनोनीत किया। अनेकों शिक्षण संस्थाओं एवं धार्मिक ट्रस्टों से जुड़े होने के बावजूद भी धार्मिक कार्यों के लिये श्री अजय कुमार जी के पास समय की कमी नहीं है। वे स्वयं वर्तमान धार्मिक एवं सामाजिक परिस्थितियों के प्रति जागरूक हैं, तथा मिल- जुलकर समस्याओं का तत्काल हल निकालने में विश्वास रखते। अपने देव परिवार और पूर्वजों द्वारा किये गये धार्मिक कार्यों पर उन्‍हें गौरव है। श्री अजय कुमार जी का कहना है कि पूर्व संचित कर्मों के उदय के कारण, उन्हें जो मानव जीवन तथा गौरवशाली देव परिवार में जन्म लेने का सुअवसर मिला है, उसे जिनवाणी की सेवा तथा वीरशासन को सुदृढ़ करने में ही लगाकर बे अपने जीवन की सार्थकता तथा असीम सुख शांति का अनुभव करते हैं। अजय कुमार जैन के दोनों सुपुत्र ज्येष्ठ प्रशांत जैन आरा के दर्जनो विभिन्न संस्थाओं को संभालते हुए उत्तर प्रांतीय दि. जैन तीर्थ क्षेत्र कमीटी के महामंत्री भी है जिसके अंतर्गत चन्द्रावली, कौशाम्बी तथा भदैनी की व्यवस्था की जाती है। द्वितीय पुत्र पराग जैन बिहार के १३ तीर्थ क्षेत्रों की व्यवस्था बखुबी संभाल रहे हैं और क्षेत्रो के विकास में सेवा भाव से जुड़े हुए है। वे बिहार स्टेट दि. जैन तीर्थ क्षेत्र कमिटी के मानदमंत्री है। २४ तीर्थंकर भगवानो के १२० कल्याणक क्षेत्रों में विलुप्त ८ कल्याणक क्षेत्र मिथिलापुरी की स्थापना के लिए नेपाल के पास सितामढी बॉर्डर पर जमीन खरीद कर तीर्थ स्थापित करा रहे है। इस तरह आरा बिहार का यह देव परिवार पूरे जैन समाज के लिए प्रेरणास्त्रोत है। – डॉ. बीरेन्द्र कुमार सिंह, एम.ए., पी.एच.डी. श्री महावीर कीर्ति दिग.जैन सरस्वती भवन, राजगृही

गुरुदेव श्रीमद् विजय राजेन्द्र सूरिश्वरजी 0

गुरुदेव श्रीमद् विजय राजेन्द्र सूरिश्वरजी

जन्मस्थान एवं माता-पिता-परिवार ‘श्रीराजेन्द्रसुरिरास’ एवं श्री राजेन्द्रगुणमंजरी के अनुसार, वर्तमान राजस्थान प्रदेश के भरतपुर शहर में दहीवाली गली में पारिख परिवार के ओसवंशी श्रेष्ठि ऋषभदास रहते थे, आपकी धर्मपत्नी का नाम केशरबाई था, जिसे अपनी कुक्षि में श्री राजेन्द्र सुरि जैसे व्यक्तित्व को धारण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। श्रेष्ठि रुषभदास जी की तीन संतानें थीं, दो पुत्र : बड़े पुत्र का नाम माणिकचन्द एवं छोटे पुत्र का नाम रतनचन्द था एवं एक कन्या थी, जिसका नाम प्रेमा था, छोटा पुत्र रतनचन्द आगे चलकर आचार्य श्रीमद् विजय राजेन्द्र सूरि नाम से प्रख्यात हुए। गुरुदेव श्रीमद् विजय राजेन्द्र सूरिश्वरजी वंश : पारेख परिवार की उत्पत्ति आचार्य श्रीमद् विजय यतीन्द्रसुरि के अनुसार, वि.सं. ११९० में आचार्यदेव श्री जिनदत्तसुरि महाराज के उपदेश से राठौड़ वंशीय राजा खरहत्थ ने जैन धर्म स्वीकार किया, उनके तृतीय पुत्र भेंसाशाह के पांच पुत्र थे, उनमें तीसरे पुत्र पासुजी आहेड्नगर (वर्तमान आयड-उदयपुर) के राजा चंद्रसेन के राजमान्य जौहरी थे, उन्होंने विदेशी व्यापारी के हीरे की परीक्षा करके बताया कि यह हीरा जिसके पास रहेगा, उसकी ध्Eाी मर जायेगी, ऐसी सत्य परीक्षा करने से राजा पासु जी के साथ ‘पारखी’ शब्द का अपभ्रंश ‘पारिख’ शब्द बना। पारिख पासुजी के वंशज वहाँ से मारवाड़, गुजरात, मालवा, उत्तरप्रदेश आदि जगह व्यापार हेतु गये, उन्हीं में से दो भाइयों के परिवार में से एक परिवार भरतपुर आकर बस गया था, जन्म को लेकर ऐसा उल्लेख प्राप्त होता है कि आचार्य श्री के जन्म के पहले एक रात्रि में उनकी माता केशरबाई ने स्वप्न में देखा कि एक तरुण व्यक्ति ने प्रोज्ज्वल कांति से चमकता हुआ रत्न केशरबाई को दिया – ‘गर्भाधानेड्थ साडद्क्षीत स्वप्ने रत्नं महोत्तम्म’निकट के स्वप्नशाध्Eाी ने स्वप्न का फल भविष्य में पुत्ररत्न की प्राप्ति होना बताया। गुरुदेव श्रीमद् विजय राजेन्द्र सूरिश्वरजी जन्म समय – आचार्य श्रीमद्विजय यतीन्द्र सुरी के अनुसार, वि.सं. १८८३ पौष सुदि सप्तमी, गुरुवार, तदनुसार ३ दिसम्बर सन् १८२७ को माता केशरबाई ने देदीप्यमान पुत्ररत्न को जन्म दिया। पूर्वोक्त स्वप्न के अनुसार माता-पिता एवं परिवार ने मिलकर नवजात पुत्र का नाम ‘रत्नराज’ रखा। व्यावहारिक शिक्षा – आचार्य श्रीमद्विजय यतीन्द्र सुरी एवं मुनि गुलाबविजय के अनुसार योग्य उम्र में पाठशाला में प्रविष्ट हुए, मेधावी रत्नराज ने केवल १० वर्ष की अल्पायु में ही समस्त व्यावहारिक शिक्षा अर्जित की, साथ ही धार्मिक अध्ययन में विशेष रुचि होने से धार्मिक अध्ययन में प्रगति की। अल्प समय में ही प्रकरण और तात्विक ग्रंथों का अध्ययन कर लिया। तीव्र क्षयोपशम के कारण प्रखरबुद्धि बालक रत्नराज १३ वर्ष की छोटी सी उम्र में अतिशीघ्र विद्या एवं कला में प्रवीण हो गए, श्री राजेन्द्रसूरि रास के अनुसार उसी समय विक्रम संवत् १८९३ में भरतपुर में अकाल पड़ने से कार्यवश माता-पिता के साथ आये रत्नराज का उदयपुर में आचार्य श्री प्रमोदसुरि जी के प्रथम दर्शन एवं परिचय हुआ, उसी समय उन्होंने रत्नराज की योग्यता देखकर ऋषभदास जी ने रत्नराज की याचना की लेकिन ऋषभदास ने कहा कि अभी तो बालक है, आगे किसी अवसर पर, जब यह बड़ा होगा और उसकी भावना होगी, तब देखा जायेगा।’ यात्रा एवं विवाह विचार – जीवन के व्यापार-व्यवहार के शुभारंभ हेतु मांगलिक स्वरुप तीर्थयात्रा कराने का परिवार में विचार हुआ। माता-पिता की आज्ञा लेकर बड़े भाई माणेकचंद के साथ धुलेवानाथ – केशरियाजी तीर्थ की पैदल यात्रा करने हेतु प्रयाण किया, पहले भरतपुर से उदयपुर आये, वहाँ से अन्यत्र यात्रियों के साथ केशरियाजी की यात्रा प्रारंभ की, तब रास्ते में पहाड़ियों के बीच आदिवासी भीलों ने हमला कर दिया, उस समय रत्नराज ने यात्रियों की रक्षा की। साथ ही नवकार मंत्र के जाप के बल पर जयपुर के पास अंब ग्राम निवासी शेठ शोभागमलजी की पुत्री रमा को व्यंतर के उपद्रव से मुक्ति भी दिलायी, सभी के साथ केशरियाजी की यात्रा कर वहाँ से उदयपुर, करेडा पार्श्वनाथ एवं गोडवाड के पंचतीर्थों की यात्रा कर वापस भरतपुर आये। ऐसा उल्लेख प्राप्त होता है कि शेठ सोभागमलजा ने रत्नराज के द्वारा पुत्री रमा को व्यंतर दोष से मुक्त किये जाने के कारण रमा की सगाई रत्नराज के साथ करने हेतु बात की थी, लेकिन वैराग्यवृत्ति रत्नराज ने इसके लिए इंकार कर दिया।

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आचार्य श्री नानालालजी

आचार्य श्री नानालालजी म. सा. की संक्षिप्त जीवनी अग्नि का छोटा-सा कण भी वृहत्काय घास के ढेर को क्षण भर में भस्मसात् कर देता है और अमृत का एक लघुकाय बिन्दु अथवा आज की भाषा में होम्योपैथिक की एक छोटी-सी पुड़िया भी अमूल्य जीवनदाता बन जाती है। हिरोशिमा ओर नागासाकी की वह दर्द भरी कहानी हम भूले नहीं हों तो सहज जान सकते हैं कि एक छोटा-सा अणु-परमाणु कितना भयंकर प्रलय ढा सकता है, ठीक वैसे ही जीवन के प्रवाह में संख्यातीत घटनाओं में से कभी-कभी एकाध साधारण-सी घटना सम्पूर्ण जीवन-क्रम को आन्दोलित कर सर्वतोभावेन परिवर्तन का निमित्त बन जाती है। श्रद्धेय चरितनायक के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ, आपके सोये हुए देवत्व को अपेक्षा थी किसी ऐसे निमित्त की, जो उपादान का सहयोगी बन, उसे पूर्णता कह प्रदान करे, उस समय तक आप तथाकथित धार्मिक अनुष्ठानों से सर्वथा अपरिचित थे और जितनी मात्रा में परिचय प्राप्त हुआ, वह अत्यन्त अल्प था, अत: आपका गहन चिन्तन उचित सामाधान के अभाव में उन सब क्रियाओं में रूचि नहीं लेता था, इसके विपरीत आप धर्म क्रियाओं को ढकोसला समझते थे और साधु-सन्तों के प्रति भी आपके मन में कुछ विपरित ही धारणा थी, फिर भी आपकी सोच से निसर्ग भवभीरू एवं नैतिक प्रवृति सदैव आपको आरम्भ प्रवृत्तियों से बचाए रहती थी, एक उपदेश पर की बेर में कीट होते हैं, अत्यंत बाल्यकाल में तुरन्त बेर खाने का त्याग कर लेना, आपकी भवभीरूता का प्रबल प्रमाण है। एक समय की घटना है, आपके बड़े भाई साहब मिठूलालजी, जो कुछ व्यवसाय के साथ-साथ अपनी निजी भूमि पर कृषकों से कृषि का कार्य करवाया करते और कृषि की देख-भाल किया करते थे, उन्होंने आपसे कहा ‘‘कुंए का ऊपरी भाग अधिक पानी बरसने से कारण ढह गया है, अत: उसके पुन: निर्माण के लिये चूने की आवश्यकता होगी, अत: तुम चूना पड़वाने की व्यवस्था करो।” बौद्धिक प्रतिभा एवं कर्त्तव्य क्षमता में बड़े भाईसाहब से आप अधिक कुशल थे, फिर भी आप उनको पिता की तरह हृदय से सम्मान करते थे और यथासाध्य उनकी आज्ञाओं का पूर्णरूपेण पालन करने का प्रयास करते थे, अत: आपके लिये यह आवश्यक हो गया कि कृप के पुनः निर्माण के लिए सामग्री जुटाई जाए, उसके लिये आपने पत्थर फुड़वाए, कुछ हरे वृक्ष भी कटवाए और चूना तैयार करवाकर कूप- निर्माण का कार्य सम्पन्न करा दिया। आपका व्यावसायिक दौर क्रमशः विकासोन्मुख होता रहा और आप अपनी पारिवारिक एवं सामाजिक समस्याओं के समुचित समाधान में सफलता प्राप्त करते जा रहे थे, पर नियति को आपके लिए कुछ अन्य ही इष्ट था, वह आपको इस परिवार के लघुतम घेरे से बहुत दूर विराटता की ओर ले जाना चाहती थी, जिसकी भूमिका तो नियति आप से पूर्व ही निर्मित कर दी थी जो आपको मिल गया आपको गांव से करीब आठ मील दूर ‘‘भादसोड़ा’’ ग्राम में। बात असल में यों बनी- होनहार बिरवान के होत चीकने पात’’’ के अनुसार एक प्रसंग आ गया, आपकी एक अग्रजा भगिनी थी श्रीमती मोतीबाई जिनका पाणिग्रहण भादसोड़ा निवासी सवाईलालजी साहब लोढ़ा से हुआ था। प्रसंग उस समय का है जब मेवाड़ी मुनि चौथमलजी म.सा. का चातुर्मासिक वर्षावास सम्वत् १६६४ में भादसोड़ा में था, आपकी (आचार्य देव की) बहिन श्रीमती मोतीबाई ने (पंचोले) पांच दिन तक निराहार रहने का तपश्चरण किया, तत्कालीन प्रचलित परिपाटी के अनुसार तपस्विनी बहिन के लिये ऐसे प्रसंगों पर उसके पितृगृह से वस्त्रादि (पोशाक) भेजे जाते थे, तदनुसार आपके लिए भी यह आवश्यक हो गया कि भादसोड़ा बहिन के लिये अपने परिवार से पोशाक आदि उचित सामग्री पहुँचाई जाये, चूँकि ऐसे पावन अनुष्ठान प्राय: गृह-प्रमुखों के करकमलों द्वारा ही सम्पन्न हुआ करते थे, साथ ही आप इस प्रकार की धार्मिक अनुष्ठानों की क्रियाओं से अपरिचित भी थे और आपकी इनमें रूचि भी नहीं थी, अत: अपने अग्रज श्रीमान मिठूलालजी उस समय किसी अन्य कार्य में व्यस्त थे, अत: वे नहीं जा सके, फलस्वरूप आपको ही उपर्युक्त प्रसंग पर जाने का आदेश मिला, आप उचित साधन-सामग्री लेकर इच्छा नहीं होते हुए भी अश्वारूढ़ हो चल पड़े अपने गन्तव्य की ओर… चिरस्थायी गन्तव्य वास्तव में यह आपका चिरस्थायी गन्तव्य की ओर ही गमन था, प्रकृति आपको किसी अलौकिक गन्तव्य की प्रेरणा के लिए ही यहां तक खींच लाई थी। भादसोड़ा अपनी बहिन के यहां पहुंच कर यथायोग्य व्यवहार के साथ रात्रि-विश्राम वहीं पर किया, साथ में लाई हुई सामग्री भेंट कर प्रात:काल पुन: लौटने की तैयारी करने लगे, किन्तु आपके बहनोईजी ने किसी तरह समझाया कि अभी पर्युषणों के दिन चल रहे हैं और कल तो संवत्सरी महापर्व है, कल का दिन पवित्र धार्मिक अनुष्ठानों में व्यतीत होना चाहिए, किसी भी प्रकार सवारी आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए और आप आज ही घोड़े को परेशान करना चाह रहे हैं, इस प्रकार कुछ मान-मनुहार के पश्चात् आपको अनिच्छापूर्वक वहां रूक जाना पड़ा। मेवाड़ी मुनि श्री चौथमलजी म. सा. का चातुर्मास था, अत: समस्त जैन समाज उनके पर्युषण प्रवचनों का लाभ लेने पहुंच रहा था, ‘जिनाग्ाम’ के चरित नायक को भी बहनोईजी आग्रहपूर्वक प्रवचन-स्थल से कुछ दूर बैठ कर प्रवचन श्रवण करने लगे, प्रवचन कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, फिर भी लोक-लज्जा से बैठे रहे। व्याख्यान समाप्ति के प्रसंग पर मुनिश्री ने कहा कि कल एक ऐसी बात सुनाऊंगा जिससे संसार की दशा का ज्ञान होगा, हमारे चरित नायक को कहानी रूपी बातें सुनने का अधिक शौक था, अत: सोचा कि कल की कहानी सुन लेनी चाहिए, तदनुसार दूसरे दिन भी प्रवचन में गये, जब कुछ रस आने लगा, तो उठकर कुछ आगे समीप जाकर बैठ गए। आचार्य श्री नानालालजी म. सा. की संक्षिप्त जीवनी (Brief Biography of Acharya Shri Nanalalji in hindi) सांवत्सरिक प्रवचन होने के कारण प्रवचन का विषय वैराग्योत्पादक एवं धार्मिक अनुष्ठानों के प्रति पे्ररणाप्रद था, संसार की असारता एवं हिंसाकारी आरम्भिक प्रवृत्तियों के निषेध पर बल दिया जा रहा था, चूंकि तत्कालीन वातावरण के अनुसार ग्रामीण सभ्यता में पलने वाले अधिकांश जैन धर्मावलम्बी भी कृषि कार्य किया एवं करवाया करते थे, अत: उनको उद्वोधन देने हेतु मुनिश्री तत्कालीन भाषा-शैली के माध्यम से कह रहे थे, ‘‘बड़े-बड़े वृक्ष कटवाने से बहुत पाप लगता है क्योंकि इस क्रिया से असंख्य अथवा अनन्त वनस्पति कायिक जीवों की हिंसा तो होती ही है, साथ ही अनेक तदाश्रित पशु-पक्षी आदि (चलते-फिरते) प्राणियों की भी हिंसा होती है, हिंसा, असत्य, चोरी आदि पाप-वृत्तियों में रत रहने वाला व्यक्ति मर कर दुर्गति में जाता है, कभी कुछ पुण्य कर्मों से मानव तन भी प्राप्त कर लेता है तो कभी पूरी इन्द्रियाँ नहीं मिलती अर्थात् बहरा, गूंगा, लंगड़ा आदि विकलांग बन जाता है, तो कभी दर-दर का भिखारी बन जाता है और उचित धार्मिक वातावरण मिलना भी कठिन हो जाता है, इसी शृ्रंखला में महाराजश्री ने फरमाया- यह हृास काल है अत: पंचम एवं षष्ठम आरक (काल विशेष) में इन्द्रिय शक्ति, शारीरिक संगठन आदि क्षीण होते जाएंगे, यहां तक कि छठे आरे में उत्पन्न होने वाला मानव तो बहुत लघुकाय अर्थात् एक हस्त प्रमाण ऊँचाई वाला होगा, बहुत लघु वय में पितृ-पद भोक्ता बन जायेगा, २० वर्ष की उम्र तक को वृद्ध बन १०-१२ संतान का पिता बन जायेगा, इस प्रकार औरों का आद्योपान्त विस्तृत विवेचन किया, प्रवचन तत्कालिन भावप्रवाही, हृदयग्राही एवं वैराग्योत्पादक था, किन्तु यथा ‘‘आम्र वृक्ष पर आने वाली सभी मंजरियाँ फलवती नहीं होती’’ ठीक उसी प्रकार उपदेष्टा वाणी सभी श्रोताओं के सुप्त मानस को जागृत कर दें, यह आवश्यक नहीं, कोई विशिष्ट श्रोता ही उस वाणी को कर्ण-कुम्हारों तक ही सीमित न रखकर हृदय-तन्त्री तक पहुँच पाता है और उनमें भी कोई विरल ही उसे सर्वतोभावेन जीवन परिवर्तन का आधार बना लेता है, उन विरल चेतनाओं में ही श्रद्धेय चरितनायक भी रहे हैं, जिन्होंने प्रवचन के एक-एक शब्द को एकाग्रतापूर्वक सुना एवं उसे मन-मस्तिष्क पर नियोजित कर लिया, व्याख्यान श्रवण करते समय तक उसका नूतन परिवर्तनकारी कोई स्थायी प्रभाव आप पर नहीं पड़ा। प्रवचन समाप्ति पर अन्य श्रोताओं की तरह आप भी अन्यमनस्कवत् चलते बने, बहन के निवास स्थान पर पहुँचे और अपना अश्व सजाने लगे, बहन एवं बहनोईजी आदि ने बहुत निषेध किया एवम् समझाया कि आज संवत्सरी महापर्व है, आज सवारी आदि नहीं करनी चाहिए, कल प्रात: होते ही चले जाना, किन्तु अपनी धुन के पक्के चरितनायक पर उसका कोई प्रभाव नहीं हुआ, आप अश्वारूढ़ हो चल पड़े एक अदभुत गन्तव्य की ओर, चूँकि उस समय आपकी मातुश्री अपने एक भाई, जो भदेसर में रहते थे, के यहाँ थी, आपने अपनी मातेश्वरी से मिलने हेतु भदेसर की ओर प्रयाण किया, जो भादसोड़ा से लगभग दस मील पड़ता है, उस समय तक आपकी धार्मिक आस्था सुदृढ़ नहीं हुई थी अत: आपने उस रोज संवत्सरी होने से लोक लज्जावश भोजन नहीं किया, किन्तु उपवास-व्रत का प्रत्याख्यान भी नहीं लिया।चिन्तन का मंथन श्रद्धेय आचार्य देव में अपने शैशव काल से ही चिन्तन की प्रवृत्ति रही है, आप जीवन की किसी भी सामान्य-असामान्य घटना की गहराई में पहुँचने का प्रयास करते और चिन्तन के मन्थन से निष्कर्ष का नवनीत निकाल लेते, वातावरण कुछ ऐसा ही मिला, एकान्त विजन, सुरम्य वनस्थली, वन की नीरवता को भंग करने वाला पक्षियों का कलरव, जो मानव को सतत् चिन्तन के लिए उत्प्रेरित करता है, के मध्य सजग-चेता चरित नायक अश्वारूढ़ हो चले जा रहे थे, वन की मन्द बयार चतुर्दिग् भाद्रपदिय हरियाली की रम्य छटा एवं शांत वातावरण (जो आचार्यश्री का सदा से ही चिन्तन-क्षेत्र रहा है) का समुचित सुयोग पाकर आचार्य देव के चिन्तन ने एक नूतन अंगड़ाई ली, प्रवचन में अनुश्रुत विषय पर गम्भीर चिन्तन के साथ मन्थन होने लगा, जो कुछ श्रवण किया, उसमें से जितना मानस- पटल पर अंकित रहा, उसी पर धारा प्रवाही चिन्तन चला, जिसने आपकी आपेक्षिक सुषुप्त चेतना को एक झटके के साथ उद्वेलित कर दिया, बिजली की चमक के सदृश आपको एक दिव्य प्रकाश की अनुभूति हुई, चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश पैâल गया। तात्पर्य यह है कि ज्ञान की एक दिव्य रश्मि का प्रकाश आपके अन्त:करण में प्रस्फुटित हुआ, जिसने आपकी समग्र चेतना को एकाएक आलोकित कर दिया, आनंद से भर दिया, तथाकथित धर्म विद्रोही मन, धर्माभिमुख बन धर्म की गहनता एवं सूक्ष्मता के परीक्षण में तत्पर बनने लगा।

आचार्य ऋषभ चंद्र सूरी​ 0

आचार्य ऋषभ चंद्र सूरी​

जावरा: दादा गुरूदेव के पाट परम्परा के अष्टम पट्टधर वर्तमान गच्छाधिपति श्रीमोहनखेडा तीर्थ विकास प्रेरक मानव सेवा के मसीहा, आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. आदि ठाणा का ऐतिहासिक मंगलमय प्रवेश, आचार्य पाट गादी पर विराजित होने के लिए हुआ। आचार्यश्री का सामैया सहित विशाल चल समारोह पहाडिया रोड स्थित चार बंगला लुक्कड परिवार के निवास से प्रारंभ हुआ, जो नगर के प्रमुख मार्गों से होता हुआ पिपली बाजार स्थित आचार्य पाट परम्परा की गादी स्थल पर पहुंचा, इस चल समारोह में आगामी १५ जनवरी २०२० को श्री मोहनखेडा महातीर्थ में होने वाली दीक्षा के मुमुक्षु अजय नाहर का वर्षीदान का वरघोडा भी निकाला गया, जिसमें मुमुक्षु ने अपने दोनों हाथों से दिल खोलकर वर्षीदान किया, स्मरण रहे आज से तीन वर्ष पूर्व आचार्यश्री को जावरा श्रीसंघ के द्वारा आचार्य पद प्राप्त होने से पूर्व श्रीसंघ ने काम्बली ओढा कर आचार्य पद ग्रहण करने के लिए विनती की थी, विदित हो कि यहां पर दादा गुरूदेव श्रीमद्विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की पाट परम्परा के सात आचार्य पूर्व में इस पाट पर विराजित होकर धर्मदेशणा जैन समाज को दे चुके हैं। आचार्यश्री ने पाट पर विराजित होकर अपने धर्म संदेश में कहा कि धर्म उत्कृष्ट मंगल है ऐसे धर्म को धारण करने वाले व्यक्ति को देवता भी नमन करते हैं। १५० वर्षों बाद १५१वें वर्ष में मुझे इस पाट पर बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, गुरूदेव की असीम कृपा है साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविकाओं की मेरे प्रति निष्टा बनी हुई है तभी मैं पाट गादी पर बैठने के लायक बना हॅू। आचार्य श्री ने कहा कि इस पाट गादी से मुझे उर्जा मिलेगी, मैं शरीर से पीड़ित जरूर हँू पर मन से पीड़ित नहीं हूँ, जीवन हमेशा परिवर्तनशील है समय सबके साथ न्याय करता हैं, व्यक्ति को कभी भी विपरित परिस्थिति में नहीं घबराना चाहिए, मेरे जीवन में भी कई विपरित परिस्थितियां आई थी पर दादा गुरूदेव की कृपा से मुझे समय-समय पर समाधान मिला है मेरे द्वारा शताब्दी महोत्सव में सभी आचार्य, भगवंत एवं साधु-साध्वी को एकमंच पर लाने का प्रयास किया गया, उसमें मुझे सफलता मिली, उसकी सभा भी जावरा दादावाडी में आचार्य हेमेन्द्रसूरीश्वरजी की निश्रा में हुई थी, हमारे श्रावकों का मन एक है, सभी श्रावक-श्राविका दादा गुरूदेव राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के प्रति निष्ठावान है, हमने सभी आचार्यों को विनती की थी सभी ने स्वीकार भी किया एवं हमने सामूहिक चातुर्मास भी श्री मोहनखेडा महातीर्थ में संवत्सरी प्रतिक्रमण के साथ किया, शताब्दी महोत्सव पूरे देश में विख्यात भी हुआ। जावरा की पाटगादी पर क्रियोद्धार दिवस का १५०वां वर्ष मनाने की मेरी बहुत भावना थी पर अनुकूल परिस्थितियां नहीं बन पाई, इस वजह से मैं नहीं आ पाया और हमने श्री मोहनखेडा महातीर्थ में १५०वें वर्ष पर दादा गुरूदेव को तपांजली अर्पित करने के उद्देश्य से ८०० से अधिक वर्षीतप की आराधना करवाकर दादा गुरूदेव को तपांजली अर्पित की, जिसमें हमारे मुनि भगवंत साध्वी वृन्द एवं समाज के श्रावक- श्राविकाओं ने वर्षीतप की आराधना की। मोक्ष प्राप्ति के लिए देव की जरूरत नहीं होती, मोक्ष प्राप्ति के लिए सामायिक प्रतिक्रमण ही अमृत क्रिया है। पाट गादी पर जावरा श्रीसंघ का बहुत योगदान है। आचार्य श्री ने घोषणा करते हुए कहा कि जावरा नगर में महिलाआें को पर्यूषण पर्व में प्रतिक्रमण करने में बहुत दिक्कत होती है इसके लिए जावरा श्रीसंघ बायो का उपाश्रय जब भी बनाएगा, उसमें श्री मोहनखेडा महातीर्थ की ओर से एक करोड़ आठ लाख रू. का सहयोग प्रदान किया जाएगा। वरिष्ठ साध्वी श्री संघवणश्रीजी म.सा. ने अपने संयम काल में खूब सेवा की है उन्हें उनको हमारे पूर्वाचार्यों ने सेवाभावी की पदवी से अलंकृत किया था, ने आज साध्वीश्री को शासन ज्योति पद से अलंकृत गया था, दादावाडी मंदिर को भी ५० वर्ष पूर्ण हो चुके हैं मेरी यह भावना है कि २०२३ तक इसका भी पूर्ण नवीनीकरण किया जाये। जावरा संघ एकता व भव्यता के लिए जाना जाता है, इस अवसर पर बांसवाडा, मंदसौर, इन्दौर, राजगढ, नागदा, नीमच, रतलाम, खाचरौद, झाबुआ, बदनावर, नागदा जं, बडनगर सहित ५० से अधिक श्रीसंघों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम में आचार्य श्री ऋषभचन्द्र सूरीश्वर म.सा. को प्रथम बार पाट पर विराजित होने के पश्चात् प्रथम गुरूचरण पूजा का लाभ जावरा निवासी मेघराजजी चम्पालालजी लोढा पूर्व राज्यसभा सांसद को प्राप्त हुआ। आचार्य श्री को सकल जैन श्रीसंघ जावरा की ओर से काम्बली ओढाई गई, तत्पश्चात् बांसवाडा निवासी चन्दूलाल दलीचंद सेठिया परिवार द्वारा काम्बली ओढाई गई। श्री आदिनाथ राजेन्द्र जैन श्वेताम्बर पेढी ट्रस्ट श्री मोहनखेडा तीर्थ की ओर से ट्रस्टी बाबुलाल खेमसरा, मेघराज जैन, संजय सर्राफ, आनंदीलाल अम्बोर, तीर्थ के प्रबंधक प्रितेश जैन आदि ने ट्रस्ट की ओर से काम्बली ओढाई। राजगढ श्रीसंघ से दिलीप भंडारी, नरेन्द्र भंडारी पार्षद, दिलीप नाहर, सुनील बाफना आदि ने आचार्यश्री को काम्बली ओढाई, इस अवसर पर जावरा श्रींसंघ अध्यक्ष ज्ञानचंद चोपड़ा, कोषाध्यक्ष विनोद बरमेचा, राजमल लुंक्कड, कन्हैयालाल संघवी, धर्मचन्द्र चपलोद, पदम नाहटा, कमल नाहटा, देवेन्द्र मूणोत, प्रकाश चौरडिया, प्रकाश संघवी व्ाâाकू, माणक चपलोद, भंवर आंचलिया, राजेश वरमेचा, राकेश पोखरना, सुभाष डुंगरवाल, अनिल चोपडा, पारस ओस्तवाल, अभय सुराणा, पुखराज कोचेट्टा, सुनील कोठारी, अनिल कोठारी, पवन पाटनी, पवन कलशधर, प्रदीप चैधरी, संजय तलेसरा, अनीस ओरा, विभोर जैन, अर्पित तलेसरा, महावीर चैरडिया, अंकित लुक्कड आदि उपस्थित थे।