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Jinagam Magazine

जैन श्रावकाचार की सामाजिक प्रासंगिकता

भगवान महावीर के आचार दर्शन का आधार समता है, आयारों में कहा गया-‘समियाए धम्मे’, अर्थात् समता से भिन्न धर्म नहीं हो सकता, जो समतावान् होता है वह पापकारी प्रवृत्ति नहीं कर सकता, वास्तव में रागद्वेष रहित कर्म ही आचार है, जिस व्यक्ति के व्यवहार में रागद्वेष की जितनी प्रबलता होगी उसका आचार एवं व्यवहार उतना ही अधिक दूषित होगा, इसलिए आचार की उच्चता के लिए समत्व में प्रतिष्ठित होना आवश्यक है। समता दो प्रकार की है-स्वनिश्रित और परनिश्रित, राग और द्वेष के उपशमन के द्वारा अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में संतुलित अनुभूति करना स्वानिश्रित समता है, सब प्राणी सुख के इच्छुक और...
वर्षायोग एक संस्कृति

वर्षायोग एक संस्कृति

-प.पू. गणाचार्य १०८ श्री विरागसागर जी महाराज वर्षायोग की प्राचीनता : वर्षायोग का सर्वाधिक प्राचीन उल्लेख दिगम्बर जैन ग्रन्थों में मिलता है, मूलाचार ग्रन्थ में मुनियों के दस स्थिति कल्पों में पद्य नामक कल्प वर्षायोग का विधान है, वहाँ पर कहा गया है कि मुनिजनों को वर्षायोग नियमत: करना चाहिए, इसी प्रकार अन्य ग्रन्थों में भी वर्षायोग का विधान है। बौद्ध के चातुर्मास का तथा हिन्दु ग्रन्थ बाल्मीकि रामायण आदि में श्री रामचन्द्र जी के चातुर्मास का उल्लेख है, चातुर्मास की परम्परा आज भी निर्वाधित रुप से चली आ रही है, दिगम्बर जैन संत आज भी नियम से चातुर्मास करते...
जीवन मोक्ष: सत्संग, समर्पण, और संत

जीवन मोक्ष: सत्संग, समर्पण, और संत

सन्त और सत्संग के बिना यह दुर्लभतम मानव जीवन भी व्यर्थ है जो सन्तों की कीमत समझ लेते हैं, उनके भीतर से यह वचन निकलता है- ‘‘जो दिन साधु न मिले, वो दिन होय उपास’’ उन्हें सत्संग के बिना उपवास-सा महसूस होता है। सत्संग आत्मा की खुराक है। आत्मा की व्यवस्था सिर्फसंतकृपा से ही हो सकती है, अपितु जिस शरीर में भव्यात्मा विराजमान है, उस शरीर की व्यवस्था तो माँ-बहन, बेटी, पत्नी या बेटा कोई भी कर सकता है, जब हम संतों के समीप जाते हैं, उनके सत्संग में मन लगाकर बैठते हैं तो वे हमें ‘‘ज्ञानामृत भोजन’’ अर्थात् ज्ञान...

मन की रफ्तार

हमने अपने घर के वरिष्ठ सदस्यों के मुंह से सुना था, ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। मन की गति को न पकड़ सका, राजा संत रईस।’’ जब भी रफ्तार का नाम लिया जाता है, कुछ बातें दिमाग में चली आती हैं। हवा की गति तेज होती है, सूर्य के प्रकाश की गति तेज होती है, ध्वनि की गति तेज होती है, इन सभी गतियों की तुलना मन के रफ्तार से नहीं की जा सकती। मन की गति को मापना संभव नहीं है। साथ-साथ भूखंड की ऊर्जाओं को मापने का प्रयास किया जाता है। ऊर्जा मापने के...

विवेक और जैन धर्म: जैन धर्म में विवेक की भूमिका

जैन धर्म किसी एक धार्मिक पुस्तक या शास्त्र पर निर्भर नहीं है, इस धर्म में ‘विवेक’ ही धर्म है | जैन धर्म में ज्ञान प्राप्ति सर्वोपरि है और दर्शन मीमांसा धर्माचरण से पहले आवश्यक है | देश, काल और भाव के अनुसार ज्ञान दर्शन से विवेचन कर, उचित- अनुचित, अच्छे-बुरे का निर्णय करना और धर्म का रास्ता तय करना | आत्मा और जीव तथा शरीर अलग-अलग हैं, आत्मा बुरे कर्मों का क्षय कर शुद्ध-बुद्ध परमात्मा स्वरुप बन सकता है, यही जैन धर्म दर्शन का सार है, आधार है | जैन दर्शन में प्रत्येक जीवन आत्मा को अपने-अपने कर्मफल अच्छे-बुरे स्वतंत्र...